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आडवाणी की चाणक्य नीति
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आडवाणी की चाणक्य नीति

संघ की एक आदत रही है कि कभी मुसीबत का सामना मत करो, पीठ दिखाकर अलग हट जाओ और इसका उदाहरण संजय जोशी का ही है कि जब नरेंद्र मोदी ने उनके ख़िलाफ़ अभियान चलाया और मुंबई अधिवेशन में शामिल होने के लिए संजय जोशी के निष्काषन की शर्त रखी, तो संघ ने संजय जोशी को अकेला छोड़ दिया.

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लालकृष्ण आडवाणी की नई राजनीतिक चालों ने भाजपा और संघ को हैरान-परेशान कर दिया है. जिस शख्स को सबने कमज़ोर और बूढ़ा समझ लिया था, वही आज चाणक्य की भूमिका में उतरता दिखाई दे रहा है. इसके दूरगामी परिणाम क्या होंगे, यही बता रही है इस बार की आमुख कथा.

गोवा  में नरेंद्र मोदी की जय-जयकार क्या हुई कि भारत की राजनीति में नई उथल-पुथल प्रारंभ हो गई. जनता दल यूनाइटेड, ममता बनर्जी एवं नवीन पटनायक की नई तिकड़ी सामने आ गई. उनके साथ आने की शुरुआत लालकृष्ण आडवाणी एवं नीतीश कुमार की बातचीत के बाद ही हुई. भारतीय राजनीति के सबसे चतुर खिलाड़ियों में से एक लालकृष्ण आडवाणी ने आख़िर वह कौन सी सलाह नीतीश कुमार को दी कि जिसके बाद तेज़ी से तीसरे मोर्चे के गठन की बात शुरू हो गई. उनके बारे में जानकारी थोड़ी देर के बाद आपको देते हैं, पर पहले आपको यह बताते हैं कि गोवा में कैसे संघ ने अपनी इच्छा भारतीय जनता पार्टी पर थोपी.

कहानी अटल बिहारी वाजपेयी के समय से शुरू होती है. अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से संघ की पकड़ भारतीय जनता पार्टी पर धीरे-धीरे कम या कमज़ोर होती गई. इस पकड़ को कमज़ोर करने के लिए ब्रजेश मिश्रा एवं रंजन भट्टाचार्य अटल जी की तरफ़ से काम कर रहे थे और दूसरी तरफ़ सुरेश सोनी भी यही काम कर रहे थे. संघ के स्वयंसेवक कट्टर हिंदू राष्ट्र का सपना देख रहे थे, लेकिन वाजपेयी और आडवाणी यह समझ गए थे कि कट्टर हिंदूवाद के सिद्धांत पर चलकर सरकार नहीं बनाई जा सकती, क्योंकि सरकार केवल हिंदुओं के बलबूते नहीं बन सकती थी. देश में लगभग 20 प्रतिशत मुसलमान हैं, उन्हें न तो ख़त्म किया जा सकता है और न ही राजनीतिक रूप से अप्रभावी बनाया जा सकता है. इसलिए उन्होंने सह-अस्तित्व के सिद्धांत पर सत्ता चलाने की छद्म-नीति अपनाई और एक संतुलन क़ायम किया.

इसके तहत वाजपेयी ने उदारवादी चेहरा अपनाया और लालकृष्ण आडवाणी ने कट्टरवादी. आडवाणी की इच्छानुसार मदनदास देवी ने विश्‍व हिंदू परिषद की लगाम कसी और राम मंदिर आंदोलन को ब्रेक लगाया. इससे विश्‍व हिंदू परिषद की साख ख़त्म हो गई. संघ की भावनाओं को भी संघ के लोगों ने पलीता लगाया, क्योंकि उस समय संघ में यह बात शुरू हो गई थी कि उसकी शाखाओं में मुसलमानों को भी लाया जाए. संघ के स्वयंसेवकों, जिन्होंने अपने जीवन के सुनहरे वर्ष कट्टर हिंदूवादी विचाराधारा में काटे थे, को यह लगा कि जब उनकी पार्टी सत्ता में आ गई और उनके लोग प्रधानमंत्री और गृहमंत्री बन गए, तो अब जब हिंदू राष्ट्र नहीं बना, तो फिर यह आख़िर बनेगा कब? ऐसे में संघ के लोगों का मनोबल आसमान से धरती की तरफ़ गिरने लगा.

फिर वाजपेयी जी की हार हुई. भाजपा सत्ता से बाहर निकल गई और विपक्ष के नेता पद के लिए संघर्ष शुरू हुआ. आडवाणी जी सत्ता का महत्व और उसकी चालों को बहुत अच्छी तरह समझते हैं. उन्हें समझ में आया कि लहर एक बार फिर आएगी, उनकी नाव किनारे पर लगेगी और वह प्रधानमंत्री अवश्य बन जाएंगे. उस समय विशेष स्थिति यह बन गई थी कि आडवाणी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए अटल बिहारी वाजपेयी सीन से ग़ायब हो चुके थे. इसलिए आडवाणी को लगा कि उन्हें तत्काल अपनी छवि ठीक करनी चाहिए और कट्टरवादी से सेक्युलर बन जाना चाहिए. आडवाणी पाकिस्तान गए और वहां उन्होंने जिन्ना की प्रशंसा की. उनके पारिवारिक संबंध मुसलमानों से थे ही, क्योंकि उनकी बेटी की शादी मुस्लिम युवक से हुई थी. इस प्रक्रिया में काफी हद तक उनकी छवि सेक्युलर हो गई और तभी संघ के कहने पर संजय जोशी ने आडवाणी का त्यागपत्र मांग लिया.

संघ की एक आदत रही है कि कभी मुसीबत का सामना मत करो, पीठ दिखाकर अलग हट जाओ और इसका उदाहरण संजय जोशी का ही है कि जब नरेंद्र मोदी ने उनके ख़िलाफ़ अभियान चलाया और मुंबई अधिवेशन में शामिल होने के लिए संजय जोशी के निष्काषन की शर्त रखी, तो संघ ने संजय जोशी को अकेला छोड़ दिया. संजय जोशी से मदनदास देवी एवं सुरेश सोनी ने कहा था कि वह आडवाणी से इस्तीफ़ा लें. उन दिनों नरेंद्र मोदी आडवाणी के सबसे ख़ास सिपहसालार थे. संजय जोशी से बदला लेने के खेल में सीडी कांड हुआ, जिसमें संजय जोशी को फंसाया गया. यहीं से भाजपा में एक नई परंपरा की शुरुआत हुई कि बिना जांच या कारण बताओ नोटिस के वरिष्ठ पदाधिकारियों पर कार्यवाही की शुरुआत हो गई और यह कहावत सही लगने लगी कि अपने ही अपनों को खाते हैं या फिर बाड़ ही खेत को खा जाती है. उन दिनों आडवाणी के सिपहसालारों में नरेंद्र मोदी के अलावा, अरुण जेटली, सुषमा स्वराज, अनंत कुमार एवं वेंकैया नायडू भी थे. उनके सहारे आडवाणी जी ने प्रधानमंत्री पद पर अपना दावा ठोंक दिया, लेकिन साल दर साल भाजपा की सीटें कम होती गईं, समर्थन घटता गया और आडवाणी का सपना टूटता गया. आडवाणी का साथ उनके साथी छोड़ने लगे और एक वक्त ऐसा भी आया कि मदनदास देवी और मोहन भागवत ने भी आडवाणी का साथ छोड़ दिया. मोहन भागवत ने खुली घोषणा कर दी कि आडवाणी के किसी साथी को कमान नहीं देंगे, जिसके बाद नितिन गडकरी भाजपा के अध्यक्ष बने.

नितिन गडकरी के आने के बाद संघ की तमाम कोशिशों के बावजूद दिल्ली में उनके ख़िलाफ़ साजिशें चलती रहीं. संघ नितिन गडकरी को दोबारा अध्यक्ष बनाने के लिए कटिबद्ध था और कोई सपने में भी नहीं सोच पा रहा था कि नितिन गडकरी दोबारा अध्यक्ष नहीं बनेंगे. पर एक शाम इनकम टैक्स के कुछ लोग उनके घर पर पहुंचे और उन्होंने कंप्रोमाइज कर लिया. अब उन्हें यह तय करना था कि वह राजनीति करेंगे या अपना बिजनेस एंपायर बचाएंगे. उन्होंने बिजनेस एंपायर बचाना ज़्यादा ठीक समझा, क्योंकि उन्हें लगा कि राजनीति कभी भी की जा सकती है. ऐसे में राजनाथ सिंह की लॉटरी लग गई. इस घटनाक्रम में संघ खुद को कमज़ोर और असहाय महसूस करने लगा. संघ की बात भाजपा के पदाधिकारी नहीं सुनते थे. इतना ही नहीं, संघ की विचारधारा को भी भाजपा ने तिलांजलि दे दी. दरअसल, दो बिल्लियों की लड़ाई में रोटी बंदर के हाथ लग गई.

संघ ने नरेंद्र मोदी को उकसाया, जिससे गुरु-शिष्य में झगड़ा शुरू हो गया. आडवाणी प्रधानमंत्री बनना चाहते थे, लेकिन संघ ने यह इच्छा नरेंद्र मोदी के मन में भी जगा दी. संघ का यह मानना था कि इन दोनों की लड़ाई में वह जिसका साथ दे देगा, वही आगे निकल जाएगा. संघ ने अपना सारा वजन नरेंद्र मोदी के पक्ष में लगा दिया. जो अशोक सिंघल अहमदाबाद में मंदिर गिराने के नाम पर नरेंद्र मोदी को पानी पी-पीकर कोसते थे, वही अशोक सिंघल  नरेंद्र मोदी के पक्ष में साधु-संतों का सम्मेलन करने लगे, ताकि वह प्रधानमंत्री बन सकें. जो संघ नरेंद्र मोदी को हिदायतें देता था कि वह संजय जोशी को पार्टी से निकालने जैसा दबाव न बनाएं, वही संघ नरेंद्र मोदी के साथ हो गया. अरुण जेटली, मुरली मनोहर जोशी एवं वेंकैया नायडू पहले आडवाणी के साथ थे, अब वे नरेंद्र मोदी के साथ चले गए. इसलिए कह सकते हैं कि पहला राउंड आडवाणी को मात देकर संघ ने जीता, पर इस बाज़ी में अभी भी शह और मात की गुंजाइश है, क्योंकि मोदी कैंपेन कमेटी के अध्यक्ष बने हैं, प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नहीं.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का यह प्रयोग अगर सफल होता है या असफल होता है, तो दोनों ही स्थितियों में हिंदुत्व का बोलबाला रहेगा. 20 प्रतिशत मुसलमान और 10 प्रतिशत सामान्य या उदारवादी हिंदू मोदी को सांप्रदायिक मानते हैं, जो कि कांग्रेस का समर्थन करते हैं, यानी देश का एक तिहाई से अधिक हिस्सा मोदी को कट्टरवादी हिंदू मानता है. अगले चुनाव में देश तीन हिस्सों में बंटेगा, कट्टर हिंदू, उदारवादी हिंदू एवं मुसलमान. मुसलमान उसके साथ जाएंगे, जो कट्टर हिंदुओं को हराने वाला दिखाई देगा. कांग्रेस इस वोट की स्वाभाविक दावेदार दिखाई देती है. इसका मतलब यह है कि देश में हिंदुओं और मुसलमानों का ध्रुवीकरण बढ़ेगा. ध्रुवीकरण का खेल उत्तर प्रदेश के चुनावों में देश देख चुका है और भाजपा भी देख चुकी है. उत्तर प्रदेश के चुनावों में वरुण गांधी ने हिंदुओं के पक्ष में लंबी-लंबी बातें कहीं, मुसलमानों के हाथ तक काट देने की धमकी दी और उन्हें भद्दे-भद्दे विशेषण दिए. परिणाम यह निकला कि भारतीय जनता पार्टी की सीटें घट गईं. वरुण गांधी की सभाओं में भीड़ तो दिखी, लेकिन वह वोट में परिवर्तित नहीं हुई. यही नरेंद्र मोदी के साथ भी हो सकता है. उनकी सभाओं में भीड़ तो दिखेगी, लेकिन वह वोट में कितनी परिवर्तित होगी, इसमें शंका है. मुस्लिम ध्रुवीकरण जितना होगा, उतना ध्रुवीकरण हिंदुओं का कभी हो ही नहीं सकता.

सत्य तो यह है कि नरेंद्र मोदी का आज जो भी कद है, वह आडवाणी और अटल बिहारी वाजपेयी जैसा नहीं है, बल्कि उनसे बहुत कम है. देश की स्थितियां बाबरी मस्जिद गिराए जाने जैसे दिनों वाली नहीं हैं और संघ की इतनी ताक़त नहीं है. संघ का यह प्रयोग देश में हिंदुत्व का ज्वार तो पैदा करेगा, लेकिन ख़ुद मोदी प्रधानमंत्री बनने में कितने सफल होंगे, इस पर सवालिया निशान है. यह अलग बात है कि हिंदुत्व का ज्वार अगर आता है, तो संघ की इच्छा पूरी हो जाती है, क्योंकि उसका दर्द है कि उसकी शाखाओं में संख्या घट रही है. भाजपा संघ को भाव नहीं दे रही है. उसके छोटे-छोटे नेता भी संघ की अनदेखी कर रहे हैं और भाजपा का संघ की विचारधारा से दूर भागना भी संघ का दर्द बढ़ा रहा है. पूरे देश में अगर हिंदुत्व की बात होती है, तो संघ को अपने दर्द से थोड़ा आराम मिलेगा.

मोदी अगर पूरी संख्या न ला पाए, या उनकी संख्या वहां तक पहुंच भी जाए, जो अटल जी और आडवाणी जी के समय आई थी, तब भी भाजपा की सरकार बनती दिखाई नहीं देती. ऐसी स्थिति में शिवसेना एवं अकाली दल के अलावा, नरेंद्र मोदी का कोई दूसरा सहयोगी नहीं होगा. इसका मतलब यह है कि अगर भाजपा को किसी और दल को साथ लाना है, तो उस स्थिति में नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री नहीं बन सकते. तब भाजपा के पास सुषमा स्वराज एवं अरुण जेटली, जिन्हें संघ प्रधानमंत्री बनाना नहीं चाहेगा, की जगह राजनाथ सिंह का नाम आगे करने के अलावा, कोई दूसरा चारा नहीं बचेगा. पिछली बार भी जब आडवाणी जी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने की बात उठी थी, तब भी राजनाथ सिंह पार्टी के अध्यक्ष थे और उन्होंने कहा था कि पार्टी का अध्यक्ष मैं हूं, तो मैं प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार क्यों नहीं बन सकता. आज भी राजनाथ सिंह अध्यक्ष हैं और आडवाणी पहले से कमज़ोर हैं. इस स्थिति में राजनाथ सिंह आगे आएंगे और नरेंद्र मोदी राजनाथ सिंह द्वारा किए गए एहसान का बदला उस समय उनका समर्थन करके चुकाएंगे.

अगर इतनी संख्या आती है कि नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री न बनें और कोई दूसरा प्रधानमंत्री बने, तो समर्थन मिल जाए, इस स्थिति में राजनाथ सिंह प्रधानमंत्री बन सकते हैं. संघ के लोगों का कहना है कि आज की तारीख़ में आडवाणी ने जो अशोक सिंघल के साथ किया, संघ के साथ किया, संजय जोशी के साथ किया और मदनलाल ख़ुराना के साथ किया, वह सब आडवाणी को याद दिलाने की ज़रूरत है. और इस राउंड में नरेंद्र मोदी अगर पिट गए, तो संघ उनका भी बैंड बजा देगा. इस स्थिति में भाजपा के सारे कद्दावर नेता एक किनारे हो जाएंगे और जो बच जाएंगे, उनकी हैसियत संघ के नेताओं से बहुत कम होगी. संघ की अभी इसलिए नहीं चलती, क्योंकि लालकृष्ण आडवाणी का कद मोहन भागवत सहित संघ के सभी नेताओं से बड़ा है और वह सबसे ज़्यादा अनुभवी हैं, उम्र में भी बड़े हैं. इसका दूसरा अर्थ यह है कि मोदी जीतें या हारें, मोदी प्रधानमंत्री बनें या राजनाथ सिंह, भाजपा सत्ता से जाए या सत्ता में आए, हर हाल में संघ का इक़बाल क़ायम होगा. यही संघ चाहता था. संघ को कभी सत्ता से मोह नहीं रहा. उसकी हालत बहादुर शाह ज़फ़र जैसी है कि जैसी भी है, सत्ता चलती रही. संघ फिर 20 साल बाद सत्ता में आने की योजना बनाएगा.

जब मोदी को कैंपेन कमेटी का अध्यक्ष बनाया जा सकता था, तो प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार भी बनाया जा सकता था. आडवाणी ने मोदी की हालत हिलसा मछली जैसी कर दी है, जिसे बंगाली बर्तन में डालकर दाना खिलाते हैं और फिर उसे काटकर खा जाते हैं. जैसे हिलसा मछली समुद्र से निकल कर तड़पती है और दो-तीन घंटे तक नहीं मरती, वैसी ही स्थिति भाजपा में कुछ लोगों की हो गई है. कैंपेन कमेटी का अध्यक्ष बनते ही नरेंद्र मोदी को लगा कि उनका रास्ता आसान है, पर उनके रास्ते में संभावित पहले बंगाली राजनाथ सिंह हैं और दूसरे बंगाली लालकृष्ण आडवाणी. आडवाणी जी पेट दर्द की वजह से गोवा नहीं गए और सुषमा स्वराज नरेंद्र मोदी के भाषण से पहले हवाई जहाज़ पकड़ने का बहाना बनाकर दिल्ली चली आईं. नरेंद्र मोदी ने कहा कि उन्होंने आडवाणी जी से बात कर ली, आडवाणी जी ने उन्हें आशीर्वाद भी दे दिया और संघ की तरफ़ से सुरेश सोनी ने फरमान सुना दिया कि आडवाणी आएं या न आएं, नरेंद्र मोदी की ताजपोशी करनी ही है. जब आडवाणी ने मोहन भागवत से सवाल किया, तब जाकर पता चला कि सुरेश सोनी ने बिना संघ प्रमुख से बात किए संघ की तरफ़ से यह फरमान सुना दिया.

और यहीं से आडवाणी ने चाणक्य का नंद वंश को नाश करने वाला स्वरूप धारण कर लिया. उन्होंने एक तरफ़ सुरेश सोनी एवं रामलाल को भाजपा से हटाए जाने की शर्त रखी और दूसरी तरफ़ नीतीश कुमार को राजनीति के भविष्य की पगडंडी दिखा दी. ऐसे में मोदी मदमस्त हाथी की तरह दलदल की तरफ़ बढ़ रहे हैं और उनके समर्थक सारे देश में जिंदाबाद का नारा लगाते हुए उन्हें गहरे दलदल की तरफ़ ढकेल रहे हैं. नवंबर में कई विधानसभाओं के चुनाव होने हैं. अगर उन चुनावों में भाजपा पिट गई, तब मोदी का क्या होगा? हिंदुस्तान का मतदाता आज तक तो किसी एक्स्ट्रीम पोलराइजेशन की तरफ़ नहीं झुका है. इस संपूर्ण ड्रामे में अगर किसी का कद बढ़ा है, तो वह संघ का कद बढ़ा है और संघ में मोहन भागवत और भैया जी जोशी का कद बढ़ा है. लालकृष्ण आडवाणी की नाराज़गी ने नरेंद्र मोदी के ज्वार को रोक दिया, भारतीय जनता पार्टी को कंपा दिया और एनडीए के टूटने का सामान तैयार कर दिया. जिन्होंने लालकृष्ण आडवाणी को कमज़ोर और बूढ़ा समझ लिया था, आज वे उनके अगले क़दम का सांस रोककर, डरते हुए इंतज़ार कर रहे हैं.

मोदी अगर पूरी संख्या न ला पाए, या उनकी संख्या वहां तक पहुंच भी जाए, जो अटल जी और आडवाणी जी के समय आई थी, तब भी भाजपा की सरकार बनती दिखाई नहीं देती. ऐसी स्थिति में शिवसेना एवं अकाली दल के अलावा, नरेंद्र मोदी का कोई दूसरा सहयोगी नहीं होगा. इसका मतलब यह है कि अगर भाजपा को किसी और दल को साथ लाना है, तो उस स्थिति में नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री नहीं बन सकते.

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  • “उत्तर प्रदेश के चुनावों में वरुण गांधी ने हिंदुओं के पक्ष में लंबी-लंबी बातें कहीं, मुसलमानों के हाथ तक काट देने की धमकी दी और उन्हें भद्दे-भद्दे विशेषण दिए. परिणाम यह निकला कि भारतीय जनता पार्टी की सीटें घट गईं. वरुण गांधी की सभाओं में भीड़ तो दिखी, लेकिन वह वोट में परिवर्तित नहीं हुई. यही नरेंद्र मोदी के साथ भी हो सकता है. उनकी सभाओं में भीड़ तो दिखेगी, लेकिन वह वोट में कितनी परिवर्तित होगी, इसमें शंका है. मुस्लिम ध्रुवीकरण जितना होगा, उतना ध्रुवीकरण हिंदुओं का कभी हो ही नहीं सकता.”

    लगता है ये संतोष भारतीय पागल हो चूका है. इसको पता नहीं की वरुण गाँधी के भाषण का कोई प्रमाण नहीं मिला है और उसे कोर्ट ने भी बरी कर दिया है तो इस पागल के हिसाब से कोर्ट ने गलत फैसला दिया है और ये वरुण गाँधी (जो अभी मिनिस्टर भी नहीं बना है ) उसकी तुलना नरेन्द्र मोदी से कर रहा है. इससे बड़ा पागलपन और क्या हो सकता है. इससे ही पता चलता है की इसको राजनीती की कितनी समझ है. ऐसे तथाकथि अपने आप को बुद्धिमान घोषित करने वाले पत्रकारों की आज बाढ़ आ चुकी है.

  • तथ्य काल्पनिक हैं संघ कभी भी एक पार्टी का नहीं रहा किन्तु आम आदमी के लिए यह बीजेपी के लिए कार्य करता है मीडिया की नज़रों मैं भी यह बीजेपी के साथ होता है. किन्तु एक खाश बात जो की हर किसी को नहीं पता वह यह है की इसके उच्च कोटि के प्रचारक व्यकिति विसेस के लिए कार्य करते हैं. चाहे वो किसी पार्टी के हों. यह अलग बात है की शीर्ष पदाधिकारी बीजेपी के लिय ही कार्य करते है जो देश हित की हे बात करते है.
    मीडिया मैं बैठे लोग व्यापर ज्यादा करते हैं इसी लिए मीडिया आज निम्न कोटि का मन जाता हैः.
    वास्तविक खबरिन शीशे के घरों मैं या आफिसों मैं नहीं बलिक जनता के बिच मिलाती हैं.

  • क्या राजग को अक एक सूत्र में मोदी बांध पायगे या इस सबके लिए भी राजनाथ सिंह को आना पडेगा या ये अडवानी की नई चाल है जो बाद में नजर आयेगी ! मोदी इस चुनाव के मोहरे ही बनकर रह्जायंगे ओर जनता की भावनाओ से एक बार फिर बीजेपी खेलती नजर आयगी

  • पूरी तरह से तर्क हिन पोस्ट है ,सुरेश सोनी का सिक्का चलता है इस बात से सहमत हुआ जा सकता है पर मोदी को उकसाया गया लिख कर आप साबित कर रहे है की मोदी अनाडी है ,आज गुजरात में सिर्फ मोदी ही है बाकी कोई नही , दूसरी बात बीजेपी के पास मोदी के अलावा कोई विकल्प नही ,और आज तो उन्हें पीएम पद का उम्मीदवार बनने की भी खबरे आ रही है इसका मतलब आप खुद समझे की आपका आकलन कितना सही था ।।।।

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