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फिर एक बार कछुआ और खरगोश : कौन कछुआ कौन खरगोश
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फिर एक बार कछुआ और खरगोश : कौन कछुआ कौन खरगोश

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अगर आप यह समझते हैं कि राजनाथ सिंह ने बड़ी उदारता से नरेंद्र मोदी को भाजपा की चुनाव प्रचार समिति का प्रभारी बनाकर उनके लिए प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी की राह आसान कर दी है, तो यह आपकी भूल है. दरअसल, राजनाथ सिंह की यह चाल, अपनी राह से सभी रोड़े हटाने की थी. राजनाथ सिंह ने बड़ी ही चालाकी से अपनी बिसात बिछाई और उस पर मोदी के बहाने लालकृष्ण आडवाणी को कुर्बान कर दिया. ऐसे में सुषमा स्वराज एवं अरुण जेटली खुद-ब-खुद पीछे खड़े हो गए. नरेंद्र मोदी के नाम पर मची ग़दर में राजग बिखर गया, लेकिन राजनाथ ने चुप्पी साधे रखी. और अब, जबकि सब कुछ राजनाथ सिंह की नीयत के हिसाब से हो रहा है, तब वह बेहद होशियारी के साथ नरेंद्र मोदी की काट में लग चुके हैं. 

राजनाथ सिंह यह बात बहुत अच्छी तरह समझते हैं कि देश का अगला प्रधानमंत्री उत्तर प्रदेश ही तय करेगा और उन्हें यह भी मुगालता है कि भाजपा के लिए उत्तर प्रदेश से उनसे बेहतर प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार नहीं हो सकता. हालांकि नरेंद्र मोदी की ख्वाहिश भी लखनऊ से ही चुनाव लड़ने की थी, लेकिन राजनाथ सिंह ने उन्हें हिंदुत्व और धर्म नगरी का हवाला देते हुए बनारस की लोकसभा सीट से लड़ने को तैयार कर लिया. 

नरेंद्र मोदी के साथ खड़े रहकर भी राजनाथ सिंह किस सफाई से उनकी जड़ें काट रहे हैं, इसका अंदाजा आप इस बात से लगाएं कि राजनाथ सिंह के मोदी नाम के जाप से भाजपा की प्रचार समिति के प्रभारी मोदी का कद अचानक पार्टी से बड़ा हो चुका है, जबकि भाजपा में ऐसा पहले कभी भी नहीं हुआ था. भाजपा के इतिहास में पहले कभी इतनी जल्दबाजी और हड़बड़ी में चुनाव के साल भर पहले किसी भी नेता को चुनाव प्रचार समिति की कमान नहीं दी गई थी!

राजनाथ सिंह दरअसल, खुद को अटल बिहारी वाजपेयी की जगह स्थापित करना चाह रहे हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि वह अटल बिहारी वाजपेयी की तरह बोलने में माहिर हैं और पार्टी में सबको स्वीकार्य भी हैं. स्वीकार्यता के इसी खेल में वह बड़ी ही सफाई से नरेंद्र मोदी को मात देना चाहते हैं. लखनऊ से चुनाव लड़ने की उनकी सोच इसी रणनीति का हिस्सा है. अपनी योजना को सफल बनाने के लिए राजनाथ सिंह न स़िर्फ कुशल सियासी दांव-पेंच चल रहे हैं, बल्कि वह पंडितों एवं ज्योतिषियों की मदद भी ले रहे हैं. पूजा-पाठ और तंत्र-मंत्र के ज़रिए देश के सियासी हालात अपने पक्ष में करने की कोशिशें भी हो रही हैं. ग्रह-नक्षत्रों की चाल की गणना बैठाकर यह जुगत भी लगाई जा रही है कि लोकसभा चुनाव अपने तय वक़्त से पहले, यानी इसी साल नवंबर में ही हो जाए. इसके लिए किसी ऐसे मुद्दे की तलाश की जा रही है, जिसे हवा देकर संसद के शीतकालीन सत्र में इतना उबाल पैदा कर दिया जाए कि या तो संसद भंग कर दी जाए, या फिर दबाव में आकर यूपीए सरकार चुनाव की घोषणा कर दे.

और यह सब कुछ इसलिए, ताकि भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में देखे जाने वाले नरेंद्र मोदी के पास इतना समय ही न रहे कि वह अपने नाम पर लोगों को एकमत कर सकें या अपनी जीत पक्की करने की खातिर टीम की रणनीति बना सकें. अगर राजनाथ सिंह के मंसूबों के मुताबिक़ आम चुनाव नवंबर में हो जाते हैं, तो यकीनन नरेंद्र मोदी वक़्त की कमी के कारण गुजरात दंगों के चलते बनी अपनी विभाजनकारी नेता की छवि बदल पाने में कामयाब नहीं हो पाएंगे. और तब ऐसेअगर राजग किसी तरह सत्ता के नज़दीक पहुंच भी जाता है, तब भी शायद नरेंद्र मोदी के नाम पर भाजपा और उसके सहयोगी दलों में एक राय न बन सके. ऐसी आनन-फानन और रस्साकशी की स्थिति में राजनाथ सिंह के लिए बेहद आसान यही होगा कि वह अचानक अपना सिर ताजपोशी के लिए आगे कर दें. इस बात से इत्तेफाक न रखने वालों के लिए, इस संदर्भ में यहां यह याद रखना बेहद मौजूं और मुनासिब होगा कि कैसे, ऐसे ही तिकड़मों के बूते राजनाथ सिंह अचानक भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गए थे.

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नरेंद्र मोदी के साथ खड़े रहकर भी राजनाथ सिंह किस सफाई से उनकी जड़ें काट रहे हैं, इसका अंदाजा आप इस बात से लगाएं कि राजनाथ सिंह के मोदी नाम के जाप से भाजपा की प्रचार समिति के प्रभारी मोदी का कद अचानक पार्टी से बड़ा हो चुका है, जबकि भाजपा में ऐसा पहले कभी भी नहीं हुआ था. भाजपा के इतिहास में पहले कभी इतनी जल्दबाजी और हड़बड़ी में चुनाव के साल भर पहले किसी भी नेता को चुनाव प्रचार समिति की कमान नहीं दी गई थी! न ही पहले कभी इस मसले पर पार्टी के किसी अध्यक्ष या संसदीय बोर्ड ने इतनी ज़द्दोज़हद की थी, क्योंकि अमूमन चुनाव होने के चार-पांच महीने पहले भाजपा में यह ज़िम्मेदारी तय करने की परंपरा-सी रही है. वैसे, अब पार्टी के ज़्यादातर लोग राजनाथ सिंह के मकसद के पीछे के निहितार्थ जानने और समझने लगे हैं. इतनी बात तो भाजपा के शीर्ष नेताओं की समझ में आ चुकी है कि राजनाथ सिंह अब खुद को अटल बिहारी वाजपेयी समझने लगे हैं. जिस लखनऊ से अटल जी ने सात बार चुनाव ल़डा और पांच बार विजय हासिल की, उस जगह को वह अपने नाम करना चाहते हैं. हालांकि ज्योतिषों एवं पंडितों की सलाह पर उनका मन कुछ डगमगा भी रहा है, क्योंकि उनके ज्योतिषों की गणना यह कहती है कि अगर वह लखनऊ की बजाय अंबेडकर नगर सीट से चुनाव लड़ेंगे, तो उनकी भारी जीत पक्की है.

राजनाथ सिंह यह बात बहुत अच्छी तरह समझते हैं कि देश का अगला प्रधानमंत्री उत्तर प्रदेश ही तय करेगा और उन्हें यह भी मुगालता है कि भाजपा के लिए उत्तर प्रदेश में उनसे बेहतर प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार नहीं हो सकता. हालांकि नरेंद्र मोदी की ख्वाहिश भी लखनऊ से ही चुनाव लड़ने की थी, लेकिन राजनाथ सिंह ने उन्हें हिंदुत्व और धर्म नगरी का हवाला देते हुए बनारस की लोकसभा सीट से लड़ने को तैयार कर लिया. जो लोग राजनाथ सिंह को जानते हैं, उन्हें यह बात अच्छी तरह मालूम है कि राजनाथ सिंह को कांटे से कांटा निकालना खूब आता है. जब राजनाथ सिंह केंद्र में भूतल परिवहन मंत्री थे, तब भी उत्तर प्रदेश में उन्होंने केशरीनाथ त्रिपाठी, कलराज मिश्र एवं लालजी टंडन को दरकिनार कर मुख्यमंत्री का पद हथिया लिया था. राजनाथ सिंह जब उत्तर प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष थे, तब उन्होंने कल्याण सिंह के ख़िलाफ़ ऐसा माहौल बना दिया कि वह सीधे-सीधे अटल बिहारी वाजपेयी से बगावत कर पार्टी से बाहर हो गए.

इसलिए यह कहना बिल्कुल गलत नहीं होगा कि फिलहाल राजनाथ सिंह नरेंद्र मोदी को स़िर्फ और स़िर्फ हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं. इन दिनों खुद को उदारवादी नेता के रूप में पेश कर रहे राजनाथ सिंह को मालूम है कि नरेंद्र मोदी को भाजपा की चुनावी रणनीति के केंद्र में रखने से देश की राजनीति में ज़बरदस्त ध्रुवीकरण देखने को मिलेगा. खासकर, बिहार, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश एवं पश्‍चिम बंगाल में, जहां अल्पसंख्यकों की बड़ी आबादी है और जो लोकसभा सीटों के नतीजे तय करती है. वहां यह ध्रुवीकरण निर्णायक साबित होगा और तब देश का अगला लोकसभा चुनाव सेक्युलरिज्म के मुद्दे पर लड़ा जाएगा और तब ऐसी स्थिति में, भाजपा में जो सेक्युलर चेहरा नज़र आएगा, वह राजनाथ सिंह का ही होगा. हालांकि तब मोदी को उनकी विकास पुरुष वाली छवि का फ़ायदा नहीं मिल पाएगा. और ये हालात कांग्रेस को भी बहुत रास आएंगे, क्योंकि भ्रष्टाचार, महंगाई और घोटालों के आरोपों से जूझ रही कांग्रेस भी सेक्युलरिज्म की ओट में अपने सारे गुनाह छिपाने की कोशिश करेगी. दूसरी संभावना यह भी बनती है कि इस ध्रुवीकरण और बनारस की गंगा-जमुनी तहजीब के समीकरणों की वजह से अगर नरेंद्र मोदी बनारस से चुनाव हार जाते हैं, तब राजनाथ सिंह के लिए उनकी प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी पर दावेदारी और भी आसान हो जाएगी. दरअसल, राजनाथ सिंह इन दिनों मोदी के नाम की माला जपकर उनका भला नहीं कर रहे, बल्कि वह ऐसा करके मोदी विरोधियों को और हवा दे रहे हैं. राजनाथ सिंह इन दिनों न तो राम मंदिर के मसले पर कुछ बोल रहे हैं और न ही कट्टर हिंदूवाद का समर्थन कर रहे हैं. अल्पसंख्यकों से जुड़े मसलों पर भी राजनाथ सिंह का रुख लचीला ही नज़र आ रहा है, जिसकी बानगी हालिया दिनों में खूब दिखी. मतलब यह कि राजनाथ सिंह बड़े सधे और नपे-तुले अंदाज़ में अपनी महत्वाकांक्षाओं को परवान चढ़ा रहे हैं.

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जब नरेंद्र मोदी के खासमखास अमित शाह उत्तर प्रदेश जाकर राम मंदिर का मसला उछालते हैं, तो राजनाथ चुप रहते हैं. वहीं जयपुर में अल्पसंख्यकों से जुड़े मुद्दों पर आयोजित सेमिनार में जाकर वह मुसलमानों के प्रति अपने लचीले रुख का भी प्रदर्शन कर आते हैं. राजनाथ सिंह जानते हैं कि भाजपा का जनाधार लगातार खिसक रहा है, जिसे थामे रखना उनके लिए भी एक बड़ी चुनौती है. लिहाज़ा, खुद को बचाते हुए उन्होंने नरेंद्र मोदी को ही एनडीए का दायरा बढ़ाने की अग्नि परीक्षा में झोंक दिया है. नरेंद्र मोदी की वाहवाही करके, उन्हें पार्टी का सबसे दमदार नेता बताकर राजनाथ सिंह ने किस चालाकी से उन्हें दुरुह स्थितियों में फंसाया है, इसका अंदाजा फिलहाल नरेंद्र मोदी को भी नहीं है.

गौर कीजिए. अभी तक भाजपा तीन बार केंद्र की सत्ता पर काबिज़ हो चुकी है, लेकिन उसे लोकसभा में कभी बहुमत नहीं मिल सका. वह दो सौ सीटों से ऊपर कभी नहीं जा पाई. उस पर तुर्रा यह कि 2004 के बाद से एनडीए का कुनबा लगभग बिखरता जा रहा है. सहयोगी दल एक-एक कर गठबंधन से अलग होते जा रहे हैं. अभी एनडीए में शिवसेना, हरियाणा जनहित कांग्रेस, असम गण परिषद और अकाली दल ही भाजपा के साथ हैं. ज़ाहिर है, मोदी को पुराने साथियों को अपने साथ बनाए रखने के अलावा, नए साथियों की तलाश करने की भारी मशक्कत करनी पड़ेगी. पुराने साथी रहे नवीन पटनायक एवं ममता बनर्जी की वापसी के कोई संकेत फिलहाल नहीं मिल रहे हैं. उस पर भाजपा ने हिमाचल, उत्तराखंड एवं कर्नाटक में अपनी सत्ता गंवाई ही है. अगर हम लोकसभा सीटों के आधार पर भी आकलन करें, तो हरियाणा की 10, पश्‍चिम बंगाल की 42, उड़ीसा की 21, आंध्र प्रदेश की 42, केरल की 20 और तमिलनाडु की 39, यानी कुल 174 सीटों पर भाजपा की मौजूदगी शून्य है. पूर्वोत्तर राज्यों और असम में भी पार्टी की उपस्थिति नाममात्र है. ये सारे हालात मोदी के लिए ऐसा चक्रव्यूह बनाते हैं, जिनसे पार पाना असंभव नहीं है, लेकिन बेहद मुश्किल ज़रूर होगा. बात यहीं ख़त्म नहीं होती. नरेंद्र मोदी की पीठ थपथपा कर उनके साथ हमक़दम होकर भी राजनाथ सिंह उनके लिए किस क़दर मुश्किलें बढ़ा रहे हैं, इसकी बानगी राजनाथ सिंह के बयान से देखिए. राजनाथ सिंह फरमाते हैं कि चुनाव से पहले गठबंधन करने की भाजपा की कोई योजना नहीं है. अब बिना गठबंधन किए भला मोदी के नेतृत्व में क्या भाजपा आंकड़ा छू पाएगी?

संघ भी कमोबेश इस बात से परिचित है, लिहाज़ा वह अभी भी मोदी के पक्ष में खुलकर सामने नहीं आ रहा. केंद्र में भाजपा की पहली सरकार महज़ तेरह दिन ही चल पाई थी. वह बहुमत के जादुई आंकड़े नहीं जुटा पाई थी, जबकि उसके पास अटल बिहारी वाजपेयी जैसा उदारवादी चेहरा था. दूसरी बार भी भाजपा सरकार का कार्यकाल स़िर्फ तेरह महीने चल सका. तीसरी बार भाजपा सरकार ने पूरे कार्यकाल तक राज तो किया, लेकिन उसके पास अपनी केवल 183 सीटें थीं. 2009 में जब भाजपा लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में चुनाव मैदान में उतरी, तब उसके पास 2004 में मिली कुल 137 सीटें थीं, फिर भी भाजपा के हिस्से में लोकसभा की स़िर्फ 116 सीटें आ सकीं. ज़ाहिर है, इस लिहाज़ से नरेंद्र मोदी के सामने इस बार चुनौतियां बहुत बड़ी हैं. उस स्थिति में भी, जब भाजपा अन्य दलों के साथ मिलकर चुनाव लड़े और उसे पिछली बार की तरह 543 में से 365 सीटों पर ही संतोष करना पड़े और बाकी सीटें सहयोगी दलों के लिए छोड़ देनी पड़ें. अगर गठबंधन का विस्तार भी किया जाता है, तो भी ऐसे में 200 के आंकड़े को 272 के जादुई आंकड़े तक ले जाना बेहद मुश्किल ही होगा.

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ऐसे में यह सवाल सहज उठता है कि पार्टी को भला कैसे सीटें प्राप्त होंगी, कैसे कोई शेष सांसदों का प्रबंध करेगा और कैसे मोदी के नाम पर आवश्यक सहमति बनेगी? अगर यह मान भी लिया जाए कि मोदी की अगुवाई में 180 सीटें आ भी जाती हैं, तो क्या ऐसे में गठबंधन की सरकार बन पाएगी? मुस्लिम वोट के लालच मेंे नीतीश कुमार, चंद्रबाबू नायडू, ममता बनर्जी एवं नवीन पटनायक मोदी से जो दूर चले गए, क्या वे वापस आएंगे? राजनाथ सिंह इस चुनावी जोड़-गणित का पूरा हिसाब लगाकर ही अपनी बाज़ी मोदी के नाम से खेल रहे हैं. दो दिनों पहले ही अपने एक बेहद क़रीबी ज्योतिषी मित्र से मंत्रणा करते हुए उन्होंने कहा कि पश्‍चिम बंगाल, उत्तर-पूर्व और दक्षिण भारत में भाजपा कोई बड़ी ताक़त तो है नहीं. नरेंद्र मोदी ने अपने जिस खास आदमी अमित शाह को उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाकर भेजा है, वह इतने कम समय में सपा और बसपा की पकड़ वाले इलाकों की ज़मीनी हकीक़त भला कैसे बदल पाएंगे. ऐसे में मोदी की लड़ाई बेहद कठिन हो जाएगी.

भाजपा के एक बड़े कद्दावर नेता कहते हैं कि दरअसल, राजनाथ सिंह ने यह सारा गुणा-भाग करने के बाद ही मोदी का नाम आगे किया है, क्योंकि वह कतई नहीं चाहते कि भाजपा की असफलता का ठीकरा उनके माथे फूटे. अगर भाजपा की हार होती है, तो यह कलंक मोदी के नाम ही लगे. इन्हीं आशंकाओं से त्रस्त होकर पहली बार संघ ने भाजपा की चुनावी राजनीति में सीधा दखल दिया है और इस बात के सा़ङ्ग संकेत भी दिए कि कोई भी कार्यकर्ता या नेता संघ या पार्टी से बड़ा नहीं हो सकता, भले ही वह नरेंद्र मोदी ही क्यों न हों. संघ आज की तारीख में भाजपा को अपने हिसाब से चलाना चाहता है. राजनाथ सिंह को संघ का भरोसा हासिल है, क्योंकि भाजपा के बड़े नेताओं में से एक स़िर्फ वही हैं, जिन्होंने कभी संघ का साथ नहीं छोड़ा.

ऐसा भी नहीं है कि मोदी इन सारी बातों से पूरी तरह अनजान हैं. उन्हें अंदाजा है अपनी चुनौतियों का. लिहाज़ा, उन्होंने भी बगैर किसी शोर-शराबे के अपनी छवि बदलना शुरू कर दिया है. अब मोदी के भाषणों में कॉमन सिविल कोड, अयोध्या और अनुच्छेद 370 जैसे विवादास्पद मुद्दे नहीं होते. वह गुजरात में सद्भावना यात्रा पर निकले हैं. मुस्लिम विज़न डॉक्युमेंट्री बना रहे हैं. मुस्लिम सम्मेलन भी कर रहे हैं. वह हिंदूवाद और उदारवाद का मिला-जुला चेहरा बनाना चाहते हैं. मोदी के बारे में चाहे जितनी आशंकाएं ज़ाहिर की जाएं, पर वह खुद को लेकर बड़े आश्‍वस्त दिखते हैं. वह हर तरह से राजनीतिक लहर पैदा करने की कोशिश में हैं, जबकि दूसरी ओर राजनाथ सिंह बड़े इत्मीनान से मोदी के नाम को हवा देने में लगे हैं. राजनाथ सिंह को मालूम है कि गणित भाजपा के पक्ष में नहीं है. भाजपा अगर हार जाती है तब, या फिर बमुश्किल सहयोगी दलों के सहारे वह सरकार बनाने की स्थिति में आती है तब, दोनों ही सूरतों में मोदी का प्रधानमंत्री बनना मुश्किल दिख रहा है. और दोनों ही स्थितियों में राजनाथ सिंह के लिए प्रधानमंत्री बनने का रास्ता आसान हो जाएगा.

इस तरह राजनाथ सिंह और नरेंद्र मोदी के बीच एक बार फिर कछुआ और खरगोश वाली कहानी दोहराई जाएगी. अब देखना यह है कि कौन कछुआ साबित होगा और कौन खरगोश?

भाजपा के एक बड़े कद्दावर नेता कहते हैं कि दरअसल, राजनाथ सिंह ने यह सारा गुणा-भाग करने के बाद ही मोदी का नाम आगे किया है, क्योंकि वह कतई यह नहीं चाहते कि भाजपा की असफलता का ठीकरा उनके माथे फूटे. अगर भाजपा की हार होती है, तो यह कलंक मोदी के ही नाम लगे. इन्हीं आशंकाओं से त्रस्त होकर पहली बार संघ ने भाजपा की चुनावी राजनीति में सीधा दखल दिया है और इस बात के सा़ङ्ग संकेत भी दिए कि कोई भी कार्यकर्ता या नेता संघ या पार्टी से बड़ा नहीं हो सकता, भले ही वह नरेंद्र मोदी ही क्यों न हों.

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