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पठानकोट : आतंकी हमले का सच
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pathankotनारको-पॉलिटिक्स और नारको-टेररिज्म ने पंजाब के सीमावर्ती इलाके को अपने कब्जे में ले लिया है. कुछ ही महीने पहले गुरदासपुर के दीनानगर में और अब पठानकोट में हुआ आतंकी हमला इसी साठगांठ की मुनादी है. घटना के महज दो दिनों पहले गुरदासपुर के एसपी पद से हटाया गया सलविंदर सिंह इस नेक्सस का प्यादा भर है. पठानकोट हमले की गहराई से जांच कर रही नेशनल इंवेस्टिगेशन एजेंसी (एनआईए) उस दिशा में भी ठोस तरीके से आगे बढ़ रही है कि सलविंदर सिंह जैसे प्यादों की भूमिका सीमा से ड्रग तस्करों को माल के साथ अंदर घुसाने और एवज में मोटी रकम हासिल करने से आगे बढ़ती हुई पंजाब को आतंक के पुराने दिनों में लौटाने की साजिशों में कैसे शुमार हो गई.

पठानकोट हमले के पीछे पाकिस्तानी हैंडलरों की तो पहचान कर ली गई है और उसकी सूची (लिस्ट) पाकिस्तान को सुपुर्द भी कर दी गई, लेकिन देश के अंदर बैठे हैंडलरों एवं गाइडों की पहचान सार्वजनिक करने में क्या अड़चन है? क्या नारको-पॉलिटिक्स और नारको-टेररिज्म के पंजाब में बने गठजोड़ के पीछे के चेहरे खुफिया एजेंसियां नहीं पहचानतीं? इस सवाल का जवाब है कि पहचानती हैं, लेकिन जिस देश में राष्ट्र से बड़ी राजनीति हो और जन से बड़ा धन हो, वहां ऐसे लोगों के नाम कैसे उजागर होंगे!

पठानकोट हमले के पीछे जैश-ए-मुहम्मद या यूनाइटेड जेहाद काउंसिल या मुत्ताहिदा जेहाद काउंसिल और इन गुटों के अलमबरदार मौलाना मसूद अजहर, उसके भाई अब्दुल रऊफ असगर, अशफाक अहमद, हाजी अब्दुल शकूर, कासिम जान या सैयद सलाहुद्दीन की भूमिका सीमा पार का मसला है. असली मसला तो यह है कि इन तत्वों को भारत में पैर फैलाने-पसारने का मौक़ा घर में बैठे किन लोगों ने दिया? पठानकोट हमले की जांच में एनआईए की मदद कर रही मिलिट्री इंटेलिजेंस के एक अधिकारी ने बताया कि अकेला सलविंदर सिंह ही कई सारे रहस्यों से पर्दा उठा सकता है, अगर उससे सख्ती से पूछताछ की जाए.

एनआईए को अभी सख्ती बरतने का मा़ैका नहीं मिला है, इसमें पंजाब की स्थानीय राजनीति और पुलिस एक बड़ी अड़चन है. एनआईए की अब तक की जांच और स्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर यह बात सा़फ हो चुकी है कि भारतीय सीमा में घुसे आतंकियों के पठानकोट में एयरफोर्स की चाहरदीवारी तक पहुंचने में गाइड का काम गुरदासपुर के स्थानांतरित एसपी सलविंदर सिंह ने किया था. सलविंदर की ही गाड़ी अकालगढ़ गांव तक पहुंचने में आतंकियों का ज़रिया भी बनी.

एसपी सलविंदर सिंह के संदेहास्पद बयान
यह बात सामने आ चुकी है कि घटना के दो दिनों पहले ही गुरदासपुर के एसपी पद से सलविंदर सिंह का पंजाब सशस्त्र पुलिस में तबादला हो चुका था. इसके बावजूद अपने सुपीरियर अफसरों को सूचित किए बगैर सलविंदर सिंह देर रात पंजपीर क्यों गए थे? बॉर्डर के नज़दीक बेहद संवेदनशील क्षेत्र में अकेले क्यों घूम रहे थे? अपने साथ सुरक्षाकर्मी लेकर क्यों नहीं गए?

उनके वाहन में वायरलेस नहीं था, तो उस पर नीली बत्ती क्यों लगी थी? आतंकियों ने पहले (प्रथम) वाहन का अपहरण करने के बाद उसके ड्राइवर एकाग्र सिंह को मार डाला, तो दूसरे वाहन का अपहरण करने के बाद उसमें सवार लोगों को क्यों छोड़ दिया? सलविंदर ने झूठ क्यों बोला कि वह पंजपीर दरगाह पर मत्था टेकने पहले से आते रहे हैं? दरगाह के केयरटेकर सोम ने यह क्यों कहा कि उसने सलविंदर सिंह को दरगाह पर पहली बार देखा है? सलविंदर का दोस्त राजेश वर्मा उस दिन दरगाह पर दो बार क्यों गया था?

सलविंदर ने दरगाह पर फोन करके उसे देर रात तक खुला रखने के लिए क्यों कहा था? आतंकियों ने ड्राइवर एकाग्र सिंह और बाद में सलविंदर के फोन से ही पाकिस्तान में बैठे अपने आकाओं से लंबी-लंबी बातें कीं, निर्देश प्राप्त किए, लेकिन पंजाब पुलिस ने न कोई सर्विलांस की और न रास्ते में सलविंदर की गाड़ी को इंटरसेप्ट करने की कोई कार्रवाई की. ऐसे कई सवाल लोगों के सामने तो आए, लेकिन उनके जवाब सार्वजनिक नहीं हुए. मामले की छानबीन कई स्तरों पर चल रही है, इसलिए उनके जवाब अभी सार्वजनिक तौर पर खुलेंगे भी नहीं. लेकिन कई ऐसे भी सवाल हैं, जो खुद में जवाब भी देते हैं.

मसलन, तबादला होने के बावजूद सलविंदर सिंह के अनाधिकृत क्षेत्र में संदेहास्पद रूप से पाए जाने की आधिकारिक पुष्टि के बावजूद उनके खिला़फ विभागीय कार्रवाई क्यों नहीं शुरू की गई? मीडिया के समक्ष अपने अपहरण की मनगढ़ंत कहानियां सुना रहे सलविंदर सिंह पर पंजाब पुलिस के आकाओं ने फौरन सेंसर क्यों नहीं लगाया और उन्हें मासूम बताने में क्यों लगे रहे? जब पहले वाहन का अपहरण करने के बाद उसके ड्राइवर एकाग्र सिंह को आतंकवादियों ने मारा था, तो पंजाब पुलिस के कुछ अधिकारी यह क्यों कह रहे थे कि एकाग्र सिंह की हत्या सलविंदर सिंह ने की है और उसके खिला़फ हत्या का मुक़दमा दर्ज होना चाहिए?

पंजाब पुलिस का वह आला अधिकारी कौन है, जिसने सलविंदर पर हत्या का म़ुकदमा दर्ज नहीं होने दिया? सबसे अहम यह है कि सलविंदर सिंह को कानूनी तौर पर हिरासत में लेकर पूछताछ करने से एनआईए को कौन रोक रहा है? ध्यान रहे कि जिस पंजपीर दरगाह पर सलविंदर गए थे, उसी दरगाह के नज़दीक आतंकवादियों के पाकिस्तानी ब्रांड एपकॉट के जूतों के निशान मिले. सलविंदर सिंह का दोस्त राजेश वर्मा भी दरगाह पर पहली बार गया था.

पंजाब, नारको-पॉलिटिक्स और नारको-टेररिज्म
आपको याद होगा कि कुछ अर्सा पहले कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने जब यह कहा था कि पूरा पंजाब ड्रग्स की चपेट में है और प्रत्येक दस में से सात युवक नशीली दवाओं की लत के शिकार हैं, तो उनकी खूब हंसी उड़ाई गई थी. तब केंद्रीय राजनीति में उभरने की जद्दोजहद में लगे नरेंद्र मोदी ने राहुल के बयान पर कटाक्ष किया था. लेकिन, मोदी जब गुरदासपुर में भाजपा प्रत्याशी विनोद खन्ना के लिए चुनाव प्रचार करने आए, तो उन्होंने भी कहा कि पाकिस्तान की सीमा से लगे पंजाब के साढ़े पांच सौ किलोमीटर के क्षेत्र को नशीली दवाओं का रोग लग चुका है.

दोनों नेताओं के बयानों का यहां उल्लेख करने का उद्देश्य यह बताना है कि पाकिस्तान से लगे इस संवेदनशील क्षेत्र में जब ड्रग्स के रोग का सबको पता है, तो इसका धंधा करने वाले लोगों एवं गिरोहों का भी सबको पता होगा. फिर उसे समय पर क्यों नहीं रोका गया? कांग्रेस ने अपने समय में नहीं रोका और भाजपा ने अपने समय में इसे रोकने की कोई पहल नहीं की. नतीजतन, यह इतने भयानक रोग में तब्दील हो गया. नशीली दवाओं के धंधे के जितने मामले देश भर में दर्ज होते हैं, उसके आधे अकेले पंजाब में दर्ज होते हैं. पिछले लोकसभा चुनाव के दरम्यान ही अकेले पंजाब में सबसे अधिक नशीले पदार्थों और शराब की बरामदगी हुई थी.

इस प्रकरण में रेखांकित करने वाला तथ्य यह है कि पुलिस की नौकरी छोड़कर ड्रग्स के धंधे में आए जगदीश सिंह भोला ने गिरफ्तार होने पर कहा था कि उपमुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल के रिश्तेदार एवं अकाली दल के नेता विक्रम सिंह मजीठिया भी ड्रग्स के धंधे में शामिल हैं. इस पर केस भी दर्ज हुआ और इंफोर्समेंट निदेशालय ने मजीठिया को बुलाकर पूछताछ भी की, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई. इतना संवेदनशील मामला सत्ता के गलियारे और क़ानून के पेचोखम में उलझा कर रख दिया गया. पंजाब के एक रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी शशिकांत को पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करके कहना पड़ा कि पंजाब में नारको-पॉलिटिक्स हावी है और राजनीतिक दलों एवं नेताओं की ड्रग्स तस्करों से साठगांठ है.

नारको-पॉलिटिक्स के कारण नारको-टेररिज्म का भीषण रोग इस सीमावर्ती इलाके में पसर गया है. इसकी एवज मेंनेताओं और धंधेबाजों ने अकूत धन कमाया है. यह बात सब जानते हैं. नेता जानते हैं, पुलिस जानती है, प्रशासन जानता है. और, ये सब मिलकर खूब कमाते हैं. बदले में लोग नशे की गोली से मरते हैं और अब आतंकियों की गोली से मर रहे हैं. धीरे-धीरे इसी धंधे को ज़रिया बनाकर पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई ने इसमें पाकिस्तान, कनाडा एवं ब्रिटेन में अड्डा जमाए बैठे आतंकी गुटों को एकजुट करना शुरू कर दिया.

पठानकोट की ताजा घटना से पांच महीने पहले गुरदासपुर के ही दीनानगर में आतंकियों ने हमला किया था, उस समय भी केंद्रीय खुफिया एजेंसियों और मिलिट्री इंटेलिजेंस ने नारकोटिक्स के धंधे के नारको-टेररिज्म की शक्ल में बदलने की आधिकारिक पुष्टि की थी, लेकिन पंजाब सरकार और पंजाब पुलिस ने इस मामले में कोई एहतियाती कार्रवाई नहीं की और केंद्र सरकार ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया.

सेना खुफिया शाखा के अफसर बताते हैं कि ड्रग्स से आने वाले अकूत धन और सियासत को लेकर नेता चुप्पी साधे रहे और पुलिस भी इसका फायदा उठाती रही. दीनानगर का आतंकी हमला भी इसी तरह फौजी वर्दीधारी पाकिस्तानी आतंकियों ने किया था और सात लोगों को मार डाला था. उसमें गुरदासपुर के एसपी बलजीत सिंह भी शहीद हुए थे. तब खुफिया एजेंसी आईबी ने केंद्रीय गृह मंत्रालय को जानकारी दी थी कि आईएसआई पाकिस्तान के आतंकी सरगनाओं और पाकिस्तान एवं कनाडा में बैठे खालिस्तान समर्थकों को एकजुट करने तथा पंजाब में आतंकवाद को वापस लौटाने की साजिशें कर रही है.

इस सिलसिले में लश्करे तैयबा के तुफैल नायत मीर को कनाडा और जर्मनी में बब्बर खालसा इंटरनेशनल के नेताओं से मिलने के लिए भेजा गया था. भारतीय खुफिया एजेंसी रिसर्च एंड अनालिसिस विंग (रॉ) कनाडा एवं इंग्लैंड में आईएसआई के प्रतिनिधियों और कुछ प्रमुख खालिस्तान समर्थकों के मिलने-जुलने की पुष्टि कर चुकी है. आईएसआई बब्बर खालसा इंटरनेशनल के अलावा खालिस्तान ज़िंदाबाद फोर्स, इंडियन सिख यूथ फेडरेशन और खालिस्तान टाइगर फोर्स जैसे संगठनों को फिर से सक्रिय करने की कोशिशों में तेजी से लगी हुई है.

आईएसआई ने खालिस्तान समर्थक गुटों और हरकत उल जेहाद, हरकत उल मुजाहिदीन, हिजबुल मुजाहिदीन एवं जैशे मुहम्मद के खास प्रतिनिधियों को मिलाकर एक समन्वय भी कायम किया है. खालिस्तान ज़िंदाबाद फोर्स के रंजीत सिंह नीता, इंडियन सिख यूथ फेडरेशन के लखबीर सिंह रोड़, दल खालसा इंटरनेशनल के परमजीत सिंह पंजवार, दल खालसा के महाल सिंह एवं बलबीर सिंह जैसे लोग आईएसआई के नियमित संपर्क में हैं. इस समन्वय का ही नतीजा है, पाकिस्तान के ननकाना साहिब में अभी हाल ही बब्बर खालसा और लश्कर के खास लोगों के बीच हुई मुलाकात.

एनआईए के हाथ लगे पाकिस्तानी आतंकी अब्दुल करीम टुंडा ने भी आईएसआई के संरक्षण में पाकिस्तानी और खालिस्तानी सिरफिरों द्वारा सीमावर्ती इलाके में आतंकी वारदात कराए जाने की तैयारियों का सुराग दिया था. टुंडा ने कहा था कि कश्मीर को भारत विरोधी बनाने के बाद आईएसआई पड़ोसी राज्य पंजाब को भी अस्थिर करने में जुटी हुई है. एनआईए के एक अफसर ने कहा कि आतंकियों द्वारा एसपी सलविंदर सिंह को न पहचानने और रास्ते में फेंक देने की बातें सरासर झूठी हैं.

एसपी को न मारने का आतंकियों को निर्देश मिला हुआ था. आतंकियों की आपसी बातचीत, फोन पर मिल रहे हैंडलरों के निर्देशों और सलविंदर सिंह, उसके दोस्त राजेश वर्मा एवं रसोइए की बातचीत के विरोधाभास से यह तथ्य पकड़ में आया है. इस आधार पर यह पड़ताल की जा रही है कि भारत में घुसे आतंकी या सीमा पार से निर्देश दे रहे उनके हैंडलर्स कहीं सलविंदर को पहले से तो नहीं जानते थे! एकाग्र सिंह को मार डालने और सलविंदर सिंह पर हाथ न डालने की हिदायत सीमा पार बैठे आकाओं ने क्यों दी थी? एकाग्र सिंह और सलविंदर सिंह के फोन से ही आतंकियों ने अपने पाकिस्तानी आकाओं के फोन (+923017775253 और +923000597212) पर बातचीत की थी.

ऑपरेशन की खामियों को लेकर सवाल
पठानकोट हमले का दूसरा पहलू त्वरित सुरक्षा व्यवस्था की समझदारी और समन्वय की भीषण खामियों को उजागर कर रहा है. पठानकोट प्रकरण के बाद सेना की यह मांग ठोस शक्ल लेने लगी है कि नेशनल सिक्योरिटी गार्ड का कमांड एंड कंट्रोल उसके हाथों में दे दिया जाए. समझदारी और समन्वय में प्रोफेशनल कमियां उजागर होने के मद्देनज़र सेना एनएसजी की कमान अपने हाथों में चाहती है. ज़मीनी और व्यवहारिक ज़रूरत भी यही है. नेशनल सिक्योरिटी गार्ड की पूरी ट्रेनिंग सेना ही संभालती है.

ऐसे में यह सवाल लाजिमी है कि उसकी कमान अल्प सुरक्षा विशेषज्ञता वाले आईपीएस अफसर के हाथों में क्यों हो? एनएसजी के स्पेशल एक्शन ग्रुप (एसएजी) में सेना से प्रतिनियुक्ति पर आए अफसर और जवान शामिल रहते हैं, जबकि स्पेशल रेंजर्स ग्रुप (एसआरजी) में अर्द्धसैनिक बलों और पुलिस से प्रतिनियुक्ति पर आए अफसर और जवान होते हैं. आतंकी कार्रवाइयों में सीधे ऑपरेशन के लिए एसएजी को ही पहले उतारा जाता है. मुंबई हमले के समय से ही एनएसजी के कमांड एंड कंट्रोल को लेकर सेना में बात चल रही है. यह ज़रूरत और मांग पठानकोट हमले के बाद मजबूत हो गई है. इस स्थिति के कारण ही बाद में गृह मंत्रालय को पीछे किया गया और रक्षा मंत्रालय को आगे. गृह मंत्री राजनाथ सिंह के बजाय रक्षा मंत्री मनोहर पार्रिकर को मीडिया के समक्ष पेश किया गया.

पठानकोट ऑपरेशन की खामियों को लेकर तमाम सवाल उठे और केंद्र सरकार की तऱफ से तमाम सफाइयां पेश हुईं, लेकिन सुरक्षा तंत्र से जुड़े सूत्र ही पठानकोट अरेंजमेंट्स की खामियों की ओर इशारा कर रहे हैं. उनका कहना है कि खुफिया एजेंसी की सटीक सूचना के बाद भी सुरक्षा व्यवस्था पुख्ता करने में इतनी कोताही क्यों हुई? इस कोताही की वजह से सर्वाधिक संवेदनशील पठानकोट एयरबेस की सुरक्षा दांव पर लग गई. सीमा पार से हुई घुसपैठ पर सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) की लापरवाहियां उजागर हुईं, लेकिन गृह मंत्रालय ने अब तक कोई सख्त कार्रवाई नहीं की.

आतंकियों की घुसपैठ से सीमा पर बीएसफ की गश्त प्रणाली और व्यवस्था पूरी तरह संदेह के घेरे में आ गई है. यह संदेह भी पुख्ता होने लगा है कि ड्रग कार्टेल के साथ कहीं बीएसएफ की भी पुलिस जैसी मिलीभगत तो नहीं है? यह सवाल भी उठ रहा है कि जब पठानकोट में सेना की भारी कुमुक और क्रैक स्पेशल फोर्स मौजूद थी, तो फिर दिल्ली से एनएसजी को वहां क्यों भेजा गया? गृह मंत्रालय ने रक्षा मंत्रालय से समन्वय स्थापित किए बगैर सीधे एनएसजी को कैसे भेज दिया?

सेना में यह सवाल उठ रहा है कि एनएसजी का कमांड एंड कंट्रोल प्रोफेशनल हाथों में न होने के कारण लेफ्टिनेंट कर्नल ईके निरंजन की बेमानी शहादत हो गई. ढीले-ढाले ऑपरेशन के कारण दुनिया में खराब संदेश गया, सो अलग. सवाल उठ रहा है कि क्या यह प्रोफेशनल ऑपरेशन था? 36 घंटे तक आतंकवादी वायुसेना परिसर में तांडव मचाते रहे और सात लोग शहीद हो गए. खुफिया एजेंसियां अपना इनपुट देकर घर बैठ गईं. क्या सूचनाएं देने के बाद खुफिया एजेंसियों का कोई दायित्व नहीं होता? एक पुलिस अफसर की गाड़ी पर आतंकवादी सड़कों पर आखेट करते रहे, इस पर क्या राज्य पुलिस का कोई दायित्व नहीं बनता?

आतंकी एक गाड़ी अगवा करते हैं, उसके ड्राइवर को मारते हैं. फिर दूसरी गाड़ी अगवा करते हैं, जिसमें एक एसपी बैठा होता है. उसकी नीली बत्ती वाली गाड़ी लेकर दुश्मन देश से आए आतंकी भारत की सड़कों पर आखेट करते हैं और हमारा पुलिस-प्रशासन तंत्र सोता रहता है! यह शर्मनाक नहीं, तो क्या है? जब एक आम आदमी भी यह समझ रहा है कि ऐसा हमला पाकिस्तानी सेना का छद्म युद्ध है, तो फिर दिल्ली ने सेना को ऑपरेशन में सीधे तौर पर क्यों नहीं शामिल किया?

खुफिया सूचनाओं और सुरक्षा-़खतरे के बदलते परिदृश्य से भी यह सा़फ-सा़फ दिख रहा है कि पाकिस्तान अपना ध्यान कश्मीर से हटाकर पंजाब पर केंद्रित कर रहा है. नशे का जाल फैलाने के बाद पंजाब अब उसके लिए अधिक मुफीद साबित हो रहा है. फिर सरकार ने समय रहते हुए इसकी व्यवस्था क्यों नहीं देखी? पठानकोट का ऑपरेशन दिल्ली से नियंत्रित होने के बजाय सीधे तौर पर पश्चिमी कमान के तहत होना चाहिए था.

केंद्र को जब यह खुफिया जानकारी 24 घंटे पहले मिल चुकी थी कि पंजाब में ऐसी घटना होने जा रही है, तो फिर समुचित व्यवस्था करने में देरी क्यों हुई? पठानकोट में सेना की पूरी ब्रिगेड है. ऐसे में, ऑपरेशन को वायुसेना के गरुड़ कमांडोज और डिफेंस सिक्योरिटी कोर (डीएससी) पर छोड़ दिया जाना अन-प्रोफेशनलिज्म का चरम है. रिटायर सैन्यकर्मियों के पुनर्वास के लिए बनाई गई डीएससी का दायित्व केवल सेना प्रतिष्ठान की चौकीदारी करना है.

गरुड़ वायुसेना परिसर के अंदर की देखरेख के लिए है. हमलों से सुरक्षा करने की ज़िम्मेदारी सेना की है, बशर्ते उसे सही समय पर टार्गेट पूरा करने का समुचित हुक्म प्राप्त हो. केंद्रीय गृह सचिव राजीव महर्षि को सेना के रैंक एंड प्रोफाइल तक की जानकारी नहीं है. वह कहते रहे कि वायुसेना के सात लोग शहीद हो गए, जबकि उनमें अलग-अलग महकमे और अलग-अलग रैंक के लोग थे.
सेना के साथ समन्वय की भी भारी कमी रही.

हालांकि, सेना की पश्चिमी कमान के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल कमल जीत सिंह ने कहा कि यह कहना सही नहीं है कि ऑपरेशन में सेना की भूमिका सीमित थी. लेकिन, उन्होंने जो ब्यौरा दिया, उससे ही यह स्पष्ट हुआ कि पठानकोट ऑपरेशन में सेना की भूमिका सीमित रही. सिंह के मुताबिक, आतंकियों से पहला मुक़ाबला डीएससी और गरुड़ का हुआ. डीएससी के लोग बहुत बहादुरी से लड़े. उनमें से एक ने एक आतंकवादी को मार गिराया, दूसरे आतंकवादी की गोली से वह शहीद हो गया. दूसरा मुक़ाबला सैन्य टुकड़ी से हुआ.

इसके बाद एनएसजी ने ऑपरेशन टेकओवर कर लिया. यह विशेष बलों, गरुड़ और एनएसजी का संयुक्त अभियान था. सेना के बम निरोधक दस्ते ने अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. पठानकोट आतंकी हमले से निपटने के मामले में केंद्र सरकार की रणनीति की आलोचना कर रहे रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि ऑपरेशन में सीधे तौर पर सेना का इस्तेमाल किया जाना चाहिए था, जो उसी क्षेत्र में तैनात है और स्थानीय भूगोल से पूरी तरह वाकिफ भी.

विचित्र, किंतु सत्य यह है कि राज्य सरकार ऐसे ऑपरेशंस में सेना को शरीक किए जाने की पक्षधर नहीं है. जुलाई, 2015 में दीनानगर आतंकी हमले के समय भी मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने सेना के इस्तेमाल को लेकर असहमति जताई थी और यह कहकर बात संभाली थी कि सेना का इस्तेमाल बड़े ऑपरेशंस में होना चाहिए. वह मानते हैं कि यह काम तो राज्य पुलिस का है. जबकि पंजाब पुलिस का क्या हाल है, यह जगज़ाहिर है. दीनानगर हमले के समय पोलैंड में तफरीह कर रहे उपमुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल ने भी ऐसा ही बयान दिया था.

सुलगते सवाल, जिन पर सरकार का ध्यान नहीं है

  • पठानकोट हमले में सेना, पुलिस, एयरफोर्स एवं सीमा सुरक्षा बल के आईएसआई से साठगांठ होने के संकेत मिल रहे हैं. क्या इसकी जांच नहीं होनी चाहिए?
  • हमला करने वाले आतंकियों को सीमा पार के हैंडलर्स ने एसपी सलविंदर सिंह को मारने से क्यों मना किया?
  • अपने वरिष्ठ अफसरों को सूचित किए बगैर सलविंदर देर रात पंजपीर क्यों गए थे?
  • जब पठानकोट में सेना मौजूद थी, तो दिल्ली से एनएसजी कमांडो क्यों भेजे गए?
  • गृह मंत्रालय ने रक्षा मंत्रालय से समन्वय स्थापित किए बगैर सीधे एनएसजी को कैसे भेज दिया?
  • खुफिया एजेंसी की सटीक सूचना के बावजूद सुरक्षा व्यवस्था पुख्ता करने में इतनी कोताही क्यों बरती गई?
  • जब यह जानकारी 24 घंटे पहले मिल चुकी थी कि पंजाब में ऐसी घटना होने जा रही है, तो समुचित व्यवस्था करने में देरी क्यों हुई?
  • देश के अंदर बैठे हैंडलर्स और गाइडों की पहचान सार्वजनिक करने में क्या अड़चन है?
  • क्या नारको-पॉलिटिक्स और नारको-टेररिज्म के पंजाब में बने नेक्सस के पीछे के चेहरों को खुफिया एजेंसियां नहीं पहचानती हैं?
  • पाकिस्तान से लगे इस संवेदनशील क्षेत्र में जब ड्रग्स के रोग के बारे में सबको पता है, तो इसका धंधा करने वाले लोगों एवं गिरोहों का भी सबको पता होगा. फिर उसे समय पर क्यों नहीं रोका गया?

जैश से जगतार तक जुड़ रहे खुफिया सूचनाओं के सूत्र

पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के लिए जासूसी करने के सिलसिले में पकड़े गए वायुसेना कर्मी रंजीत से मिली सूचनाएं जितनी महत्वपूर्ण हैं, उनसे अधिक चिंतित करने वाली हैं, जैश ए मुहम्मद और बब्बर खालसा इंटरनेशनल के आपसी लिंक की सूचनाएं. दिल्ली में सेना के एक मेजर एवं उसके दो गुर्गों की गिरफ्तारी के बाद खुलासा हुआ कि वे पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या करने वाले जगतार सिंह हवारा के लगातार संपर्क में थे.

जगतार सिंह हवारा अपनी गतिविधियां तिहाड़ जेल से ही ऑपरेट कर रहा है और मेजर के ज़रिये आईएसआई के लगातार संपर्क में है. गिरफ्तार मेजर आतंकी संगठन बब्बर खालसा इंटरनेशनल (बीकेआई) के संपर्क में था और सेना की संवेदनशील सूचनाएं आईएसआई एवं बीकेआई तक पहुंचाता था. पठानकोट हमले में भी मेजर की संदेहास्पद भूमिका सामने आई है.

इसी मेजर के दो गुर्गे कुछ अर्सा पहले अंबाला छावनी इलाके से पकड़े गए, जिनके पास से भारी तादाद में आरडीएक्स बरामद हुआ था. वे बब्बर खालसा इंटरनेशनल के सदस्य बताए गए थे. अभी हाल ही पंजाब के बठिंडा में तैनात वायुसेना के जवान रंजीत को पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी को सूचनाएं देने के सिलसिले में पकड़ा गया. लंदन से ऑपरेट कर रही खूबसूरत महिला दामिनी मैकनॉट के ज़रिये रंजीत वायुसेना की संवेदनशील सूचनाएं आईएसआई तक पहुंचा रहा था. रंजीत को एक बार पहले भी पकड़ कर छोड़ दिया गया था, लेकिन बाद में जासूसी की पुष्टि के बाद उसे फिर से दबोच लिया गया. वायुसेना से रंजीत को फौरन बर्खास्त कर दिया गया.

लेकिन, माना जा रहा है कि पठानकोट वायुसेना बेस की अंदरूनी जानकारियां रंजीत ने ही आईएसआई तक पहुंचाई थीं. रंजीत वायुसेना बेस के विमानों, उनकी संख्या और उनकी तैनातियों के बारे में जानकारियां देने के साथ-साथ युद्धाभ्यासों की भी सूचनाएं लीक कर रहा था. पठानकोट प्रकरण के क्रम में खुफिया एजेंसियां वायुसेना के जवान सुनील कुमार की भी फाइलें खंगाल रही हैं, जिसे आईएसआई के लिए जासूसी करते हुए पठानकोट वायुसेना स्टेशन से 29 अगस्त, 2014 को गिरफ्तार किया गया था. 

  • एनएसजी का कमांड एंड कंट्रोल पुलिस के बजाय सेना को देने की मांग
  • पंजाब को फिर से नरक बना रहा नारको-पॉलिटिक्स और नारको-टेररिज्म गठजोड़
  • गृह मंत्रालय पीछे, रक्षा मंत्रालय आगे
  • आतंकी खुलेआम सड़क पर करते रहे आखेट, पंजाब पुलिस का संदेहास्पद चेहरा उजागर

एक जनवरी को पालम से उड़ा था एनएसजी का पहला जत्था

तीन सौ ब्लैक कैट कमांडो थे, जो अत्याधुनिक हथियारों एवं उपकरणों से लैस होकर पठानकोट में आतंकियों से लड़ने के लिए दिल्ली से आए थे. इस ऑपरेशन को पहले की तरह कोई नाम तो नहीं दिया गया, लेकिन इसमें 21 कमांडो जख्मी हुए और एक अफसर लेफ्टिनेंट कर्नल ईके निरंजन शहीद हुए. एनएसजी के एसएजी कमांडो का पहला जत्था दिल्ली के पालम मिलिट्री एयरबेस से एक जनवरी को अपरान्ह तीन बजे उड़ा था, जिसमें कर्नल निरंजन भी सवार थे. एसएजी कमांडो में केवल सेना के अधिकारी और जवान ही रहते हैं.

पहले जत्थे में 160 लोग थे. एनएसजी की 80-80 की दो स्ट्राइक यूनिट्स दो एवं तीन जनवरी को पठानकोट पहुंचीं और ऑपरेशन में शामिल हुईं. एनएसजी को पठानकोट धावा बोलने का आदेश गृह मंत्रालय से प्राप्त हुआ था. पहली टीम मेजर जनरल दुष्यंत सिंह के नेतृत्व में पठानकोट पहुंची थी. लेफ्टिनेंट कर्नल निरंजन एनएसजी के 19वें शहीद हैं. 2014 के मई महीने में ही निरंजन एनएसजी में शामिल हुए थे. 2004 में सेना की इंजीनियरिंग कोर में उन्हें कमीशन मिला था. बम डिस्पोजल की विशेष ट्रेनिंग उन्हें अमेरिका में एफबीआई के साथ मिली थी. 

सलविंदर भी तो नहीं था आईएसआई के सौंदर्य-जाल में!

पठानकोट प्रकरण में केंद्रीय भूमिका निभाने के संदेही पुलिस अधिकारी सलविंदर सिंह पर एनआईए को शक है कि वह भी आईएसआई के सौंदर्य-जाल में फंसा था. सलविंदर की फाइलें और पृष्ठभूमि खंगाली गई, तो उसका दिलफेंक इतिहास भी सामने आया है. सलविंदर सिंह के खिला़फ पंजाब पुलिस की पांच महिला सिपाहियों के यौन शोषण का मामला चल रहा है. उक्त महिला पुलिसकर्मियों की शिकायत पर पंजाब पुलिस के महानिदेशक ने बाकायदा आईजी गुरप्रीत कौर देव को मामले की जांच का निर्देश दिया था.

यह भी उजागर हुआ कि सलविंदर सिंह ने शादीशुदा होते हुए भी ग़ैर क़ानूनी तरीके से टांडा निवासिनी एक महिला से शादी कर ली थी, उससे बेटा भी है. टांडा के बारादरी मोहल्ले के वार्ड संख्या-12 निवासिनी करनजीत कौर का कहना है कि अपने प्रभाव के कारण सलविंदर सिंह ने मामले को दबवा दिया. करनजीत कौर ने सलविंदर एवं उसके बेटे साहिल प्रीत सिंह का डीएनए टेस्ट कराने की मांग की है. महिला का कहना है कि नौ अप्रैल, 1994 को सलविंदर सिंह ने जालंधर के गुरुद्वारा शहीदां समस्तपुर में उसके साथ शादी की थी. उस समय सलविंदर एएसआई था. 21 सितंबर, 1999 को करनजीत कौर ने सलविंदर के बेटे को जन्म दिया. जून, 2000 में सलविंदर उसे छोड़कर भाग गया.

पाकिस्तान ने दिया कार्रवाई का भरोसा

ऐसा पहली बार हुआ है, जब पाकिस्तान और भारत की सरकारों ने किसी आतंकी हमले के लिए एक-दूसरे पर दोषारोपण करने के बजाय सकारात्मक ढंग से बातचीत की. इससे उम्मीद की जा सकती है कि पठानकोट हमले में शामिल आतंकियों के खिला़फ पाकिस्तान कार्रवाई कर सकता है. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ ने पठानकोट आतंकी हमले के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को स्वयं फोन करके बातचीत की. नरेंद्र मोदी ने कहा कि पाकिस्तान के लिए यह आवश्यक है कि वह इस हमले के लिए ज़िम्मेदार संगठनों एवं व्यक्तियों के विरुद्ध ठोस और त्वरित कार्रवाई करे.

भारत की ओर से पठानकोट हमले से संबंधित आवश्यक एवं कार्रवाई योग्य सूचनाएं पाकिस्तान को उपलब्ध करा दी गई हैं. नवाज़ शरीफ ने भरोसा दिलाया है कि उनकी सरकार आतंकवादियों के विरुद्ध शीघ्र और निर्णायक क़दम उठाएगी. पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने बयान जारी करके कहा है कि पठानकोट पर चरमपंथी हमले के बारे में वह भारत से मिले सुरागों पर काम कर रहा है. ग़ौरतलब है कि इस हमले की ज़िम्मेदारी पाकिस्तान के चरमपंथी गुट यूनाइटेड जेहादी काउंसिल ने ली है. पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय ने कहा कि वह भारत सरकार के संपर्क में है.

यह भी कहा गया कि पाकिस्तान सरकार चरमपंथ से असरदार तरीके से निपटने और उसे ़खत्म करने के लिए प्रतिबद्ध है. पाकिस्तानी पत्रकार हामिद मीर ने कहा कि नवाज सरकार इस संबंध में सख्त क़दम उठा सकती है. मीर ने कहा कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से पाकिस्तान को जो सुबूत दिए गए हैं, उनके आधार पर नवाज शरीफ पर कार्रवाई करने का दबाव बना है. इस संबंध में उन्होंने कई बैठकें कीं, जिनमें ज़रूरी क़दम उठाने पर विचार-विमर्श किया गया.

 

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