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सॉफ्ट नहीं, सॉफ्टर कहिए जनाब
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सॉफ्ट नहीं, सॉफ्टर कहिए जनाब

page-9बोस्टन और बंगलुरू में बम धमाके हुए. 9/11 के 12 साल बाद हुई यह घटना अमेरिका की आतंकवाद विरोधी पुलिस के लिए एक सदमा थी. जिन लोगों ने इस धमाके की योजना बनाई थी, उनका मक़सद अधिक से अधिक नुक़सान पहुंचाना था, लेकिन नुक़सान कम हुआ, क्योंकि केवल तीन लोग मारे गए और क़रीब सौ लोग घायल हुए. अमेरिका के लोगों की क़िस्मत अच्छी थी कि बहुत अधिक नुक़सान नहीं हुआ. अमेरिकी अधिकारी इस मामले पर काफी गंभीर रुख़ अपना रहे हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने मैसाचुसेट्‌स के गवर्नर और बोस्टन के मेयर से संपर्क किया. बोस्टन के पुलिस अधिकारी फेडरल फोर्स के साथ सहयोग कर रहे हैं. आतंकवादी चाहे अमेरिका के हों या फिर बाहर के, पकड़े ज़रूर जाएंगे और उन्हें सज़ा भी दी जाएगी. सारा देश इस मामले में एक साथ खड़ा है. इसी तरह की घटना बंगलुरू में भी घटी है. इसके लिए भारत के गृहमंत्री को ज़िम्मेदार ठहराया जा रहा है. कुछ समय पहले जब गृहमंत्री ने आतंकवाद विरोधी मुहिम चलाने के लिए मुख्यमंत्रियों की बैठक बुलाई थी, तो कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने उसमें भाग लेने से मना कर दिया था और गृहमंत्री का साथ नहीं दिया था. उस बैठक में आतंकवाद से निपटने के उपायों पर बातचीत की जा सकती थी, लेकिन उसे अंतत: छोड़ दिया गया.

निष्कर्ष यह कि सुशील कुमार शिंदे अधिक सौभाग्यशाली नहीं हैं. इसमें कोई शक नहीं है कि बंगलुरू धमाके की गुत्थी सुलझा ली जाएगी, लेकिन इस तरह की घटनाओं पर जैसी राजनीति की जा रही है, उसे ठीक नहीं कहा जा सकता है. कांग्रेस का मानना है कि इस धमाके से भाजपा को न केवल ़फायदा होगा, बल्कि उसे अधिक वोट भी मिलेंगे. इस तरह की बातों से राष्ट्रीय एकता को धक्का लगता है. दिल्ली की ओर से कोई गंभीरता नहीं दिखाई जा रही है और न ही इस तरह की घटनाओं पर काबू पाने की जल्दबाज़ी ही दिखाई पड़ रही है. विभिन्न दलों के प्रवक्ता अभी भी धर्मनिरपेक्षता बनाम सांप्रदायिकता और समावेशी विकास बनाम द्रुत वृद्धि का राग छेड़े हुए हैं. यह स्पष्ट है कि आतंकवाद के मामले में भी राज्य इससे संबंधित अधिकार केंद्र को देने के लिए तैयार नहीं हैं. राज्यों के लिए यह बात कोई मायने नहीं रखती कि आतंकवाद देश के लिए कितना बड़ा खतरा है. दरअसल, हम लोग अभी भी भारत को एक देश की तरह नहीं, बल्कि राज्यों के समूह के रूप में देखते हैं. 26/11 की घटना के पांच साल बाद भी भारत के पास आतंकवाद से लड़ने के लिए कोई राष्ट्रीय रण्नीति नहीं है और न ही इसे बहुत अधिक महत्व दिया जा रहा है.

इसके अलावा राष्ट्रीय एकता को तोड़ने वाले दूसरे खतरनाक संकेत भी मिल रहे हैं. मैंने पहले ही इस बात की शिकायत की थी कि भारत के राज्यों की अपनी-अपनी अलग विदेश नीति होने लगी है. इसके बावजूद कुछ नहीं हुआ और जयललिता ने आईपीएल में चेन्नई की ओर से श्रीलंका के खिलाड़ियों के खेलने पर प्रतिबंध लगा दिया. उन्होंने प्रधानमंत्री को भी इसके बारे में लिखा. मेरी जानकारी के मुताबिक़, प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय संप्रभुता के इस मामले पर भी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. आईपीएल ने समर्पण कर दिया और चेन्नई सुपरकिंग्स को इस प्रतिबंध से फायदा हुआ तथा बीसीसीआई का चेन्नई के साथ दोस्ताना व्यवहार रहा. न आईपीएल और न ही बीसीसीआई को इस मामले में कुछ कहना चाहिए था. अगर किसी के पास भारत का वैध वीजा है, तो उसे भारत में कहीं भी जाने के लिए स्वतंत्र होना चाहिए. तमिलनाडु कोई राष्ट्र राज्य नहीं है, बल्कि वह भारतीय संघ की एक इकाई है. अगर वह वैध वीजा पर भारत आने वाले लोगों को अपने यहां आने से रोकता है, तो उसके इस क़दम को तुरंत रोका जाना चाहिए.

1962 में एआईएडीएमके के अन्नादुरई ने लोकसभा में तमिलनाडु के अलग होने की धमकी दी थी, लेकिन उस समय एक होकर इसका विरोध किया गया था. अगर उसी तरह की बात फिर से उठाई जाती है, तो हमारे लिए यह ़खतरे का संकेत होना चाहिए. ऐसा न हो कि इस पर प्रतिक्रिया करने की बजाय हम लोग शांत रह जाएं. ऐसा नहीं है कि गठबंधन धर्म निभाने के लिए किसी को मा़फ कर दिया जाए, लेकिन अफसोस!  यहां तो अब एआईएडीएमके यूपीए-2 का हिस्सा भी नहीं है. महाराष्ट्र में बाल ठाकरे चाहते थे कि ग़ैर-मराठी लोगों को द्वितीय स्तर का दर्जा दिया जाए. अभी भी महाराष्ट्र में रहने वाले उत्तर प्रदेश एवं बिहार के लोगों को राज ठाकरे की पार्टी एमएनएस द्वारा प्रताड़ित किया जा रहा है. महाराष्ट्र में कांगे्रस सत्ता में है, लेकिन वह इसके विरुद्ध कोई कठोर क़दम नहीं उठा रही है. पश्चिम बंगाल की स्थिति और भी बदतर है. वहां अराजकता छा गई है और पुलिस राजनीतिक दलों का साथ दे रही है. क्या होगा अगर प्रेसिडेंसी कॉलेज को बर्बाद कर दिया जाता है? मां, माटी और ममता का क्या मतलब है? किसी भी समय वहां राष्ट्रपति शासन लगाने की नौबत आ सकती है. 1960 के दशक में कहा जाता था कि भारत एक सॉफ्ट स्टेट है, लेकिन आज कहा जा सकता है कि यह सॉफ्ट नहीं, बल्कि सॉफ्टर स्टेट है. जितनी जल्दी हो सके, भारत को अपनी स्थिति बदलनी होगी, नहीं तो बहुत देर हो जाएगी.

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