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अतिरिक्त धन का मायाचक्र
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अतिरिक्त धन का मायाचक्र

अब राष्ट्र के लिए महत्व की बात है-कि नई-नई कंपनियां खोलकर नए-नए काऱखाने या फैक्टरियां लगाई जाएं, उत्पादन बढ़ाया जाए, उसमें ही फालतू पड़े सब रुपयों का उपयोग होना चाहिए. मान लीजिए आपके पास 5 लाख रुपये फालतू पड़े हैं. आप शेयर बाज़ार में किसी कंपनी के शेयर ख़रीदते हैं. कल्पना कीजिए जूट मिलों के शेयर ख़रीदते हैं तो आपके उन फालतू रुपयों से एक भी जूट मिल का नया लूम नहीं लगेगा, एक भी राज बोरा या कलत्तान ज़्यादा नहीं बनेगा. स़िर्फ आपके रुपये उन लोगों के पास चले जाएंगे, जिनके रुपये पहले उन मिलों में लगे हुए थे. आपका नाम उनके नाम की जगह दर्ज हो जाएगा. अब आप से जो रुपया उन व्यक्तियों को मिलेगा उसका वे जो चाहें उपयोग करेंगे. उनसे वे जुआ खेलें, अपने लिए मकान बनवाएं या शराब पी-पी कर ख़त्म कर दें, वे कुछ भी कर सकते हैं. राष्ट्र को आपके इन 5 लाख रुपयों के इंवेस्टमेंट का क्या लाभ पहुंचा?

शासन ने कई बार कंपनी लॉ या क़ानूनों में संशोधन और परिवर्तन किए. 1956 के आख़िरी क़ानून के बारे में एक बार समझा जाता था कि अब जालसाज़ी या बेईमानी वाली कंपनियां खड़ी ही नहीं हो सकेंगी. पर क़ानून कुछ भी हो, किसी भी प्रकार से अभी तक इन दुष्कर्मों में कमी नहीं हुई है. क़ानून का किस तरह से उल्लंघन करके जनता को ठगा जा सकता है, उसके अनेक नए-नए मार्ग दिखाए जा रहे हैं. नई कंपनी खड़ी करने वाले जब इच्छित पूंजी इकट्ठी कर लेते हैं, तब आराम से ख़ुद डायरेक्टर, मैनेजर इत्यादि बनकर बड़ी-बड़ी तनख्वाहें लेकर मौज उड़ाने लगते हैं.

अब आप कहेंगे कि अगर ऐसी बात है तो हम कभी भी पुरानी या चालू कंपनियों के शेयर नहीं ख़रीदेंगे, हम तो हमेशा नई ही कंपनियों के शेयर लेंगे और रुपया सीधे उनके बैंक शेयर अप्लीकेशन मनी के रूप में जमा कराएंगे. विचार तो ठीक है, पर अगर आपको इसका अनुभव नहीं है कि क्या हाल चाल है और रुपयों के मामले में पूरी जानकारी नहीं है तो निश्चय ही आप अपनी रक़म गंवा बैठेंगे.

नई कंपनी खड़ी करना एक ऐसा फन है, जिसमें भयानक जालसाज़ी हो सकती है. मुझे खेद से कहना पड़ता है कि भारत में कंपनी खड़ी करने वालों में ईमानदार और भले आदमियों की अपेक्षा जालसाज़ और बेईमानों का प्रतिशत कहीं अधिक है.

शासन ने कई बार कंपनी लॉ या क़ानूनों में संशोधन और परिवर्तन किए. 1956 के आख़िरी क़ानून के बारे में एक बार समझा जाता था कि अब जालसाज़ी या बेईमानी वाली कंपनियां खड़ी ही नहीं हो सकेंगी. पर क़ानून कुछ भी हो, किसी भी प्रकार से अभी तक इन दुष्कर्मों में कमी नहीं हुई है. क़ानून का किस तरह से उल्लंघन करके जनता को ठगा जा सकता है, उसके अनेक नए-नए मार्ग दिखाए जा रहे हैं. नई कंपनी खड़ी करने वाले जब इच्छित पूंजी इकट्ठी कर लेते हैं, तब आराम से ख़ुद डायरेक्टर, मैनेजर इत्यादि बनकर बड़ी-बड़ी तनख्वाहें लेकर मौज उड़ाने लगते हैं. जिस उद्देश्य से कंपनी शुरू की गई थी और प्रतिज्ञा पत्र में जो वादे किए गए थे, उन्हें पूरा करने का कोई प्रयत्न नहीं किया जाता. अगर काऱखाना वग़ैरह नया लगाना होता है तो बहुधा मशीनरी आदि ख़रीदने में बड़ी बड़ी दलाली या कमीशन वे स्वयं या अपने मित्रों या संबंधियों द्वारा सीधे या टेढ़े मार्ग से ले लेते हैं. वह समस्त जमा की हुई पूंजी खा बैठते हैं. फिर कंपनी फेल हो गई ऐसी घोषणा करते, आख़िर में उसे फड़चा में भेज देते हैं यानी बंद कर डालते हैं.

ध्यान रहे, ये तमाम काम वे विशुद्ध क़ानून द्वारा वैध तरीक़े से करते हैं. आप कुछ नहीं कर सकते, ज़्यादा से ज़्यादा आप शेयर होल्डरों की मीटिंग में जाकर कुछ हल्ला मचाएंगे. अगर आप बहुत सतर्क होंगे तो, वहां जाकर आप डायरेक्टरों को भला-बुरा कहते समय अगर उन डायरेक्टोरं को जालसाज़ या बेईमान कहने की ग़लती कर बैठे तो वे फौरन आप पर मानहानि का दावा ठोक देंगे और संभव है, आपको और बड़ी रक़म अपनी ग़लती की सज़ा के रूप में निकाल कर देनी पड़े. इस तरह शोर मचा आने से आपको कोई फायदा नहीं है.

भारत में हर वर्ष इसी तरह लाखों रुपये जनता के डूबते हैं. अगर वे सही अर्थ में असली कंपनियों के काम में लगाए गए होते तो राष्ट्र की संपत्ति अच्छे परिमाण से बढ़ती.

आप इन बेईमान या जालसाज़ कंपनी खड़ी करने वालों के हथकंडों से बच भी गए तो भी कई कंपनियां ऐसी होती हैं, जो बराबर सही आयोजन के अभाव में सफल नहीं हो सकतीं. एक काऱखाने को खड़ा करने में 50 लाख रुपये की आवश्यकता है. कंपनी खड़ी करने वाले व्यक्तियों के अंदाज पत्र के हिसाब से 25 लाख ही लगने थे. इस भूल भरी गणना का वही परिणाम होगा कि काऱखाना खड़ा ही नहीं हो पाएगा. जितने रुपये लगे वे निष्फल गए और फिर कंपनी का पुनर्निर्माण होगा. कई-कई कंपनियां, दूसरे तीसरे या चौथे पुनरोद्धार के बाद कहीं जाकर कमाने जैसी बन पड़ती हैं. जिन्होंने शुरू में शेयर ख़रीदे थे, उनकी पूंजी तो इन पुनर्निर्माणों में घट घटाकर एक तिहाई या एक दशांश या इससे भी कम रह जाती है. अनुभवी नागरिक जानता है कि कब जोखिम है और कब नहीं है. वह आराम से मौक़े का इंतज़ार करता रहता है और जब समय अनुकूल होता है तभी शेयर ख़रीदता है. यह सब देखते हुए साधारण ख़रीददार घबड़ा उठता है. कई ऊंच-नीच देखर वर्षों उत्सुकता और चिंताओं को सह कर आख़िर सफलता भी मिल जाए तो भी भविष्य में ऐसा न करने की ही प्रेरणा उसे मिलती है.

इस सब संदेहात्मक स्थिति से बचने के लिए क्या करें क्या न करें की उथल-पुथल में पड़ने से बचने के लिए आवश्यक है कि नई कंपनियों के निकट ही न जाएं और पुरानी जमी हुई कंपनियों के ही शेयर लें. ये शेयर आपका शेयर दलाल शेयर मार्केट में ख़रीदकर दे देगा. बल्कि इससे भी अच्छा है सिक्योरिटी या नगरपालिका का क़र्ज़. इस पर ब्याज़ की दर भले ही कम हो, पर यह बिलकुल बिना जोखिम का निश्चिंतता का इंवेस्टमेंट है.

अख़बारी विज्ञापनों में नई-नई कंपनियों का विशद विवरण हो तो आप प्रलोभन में मत पड़िए. उसकी जगह सावधान होकर विचार कीजिए कि आपकी रक़म ख़तरे में जाने से बच रही है या नहीं.

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