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लहर के विरुद्ध : एक सियासी कहानी

हमने खेदन भाई को इतना परेशान कभी नहीं देखा था. आज उनके पेट में वैसी ही मरोड़ें उठ रही थीं जैसी बखरौर के मेले से एक-दो दिन पहले बाबूजी की कमीज़ की जेब में पड़ी अठन्नियों की खनक सुनकर उठा करती थीं. आज वे जल्द से जल्द काम पर चले जाना चाहते थे. भाभी को संझौती के बेरा ही बता दिया था कि कल आठ बजते-बजते उन्हें काम पर चले जाना है, इसलिए नाश्ता या पनपियाऊ की चिंता न करें. पनपियाऊ और दोपहर के खाने का इंतजाम गुमाश्ता चा के घर था. पिछले तीन दिनों से गुमाश्ता चा अपने घर के पिछवाड़े की गैर-मजरूआ और झगड़ालू ज़मीन पर चाहारदिवारी खिंचवा रहे थे. यदि उन्हें दसहरी के बखेड़े का डर न रहता और इस तरह के मामलों के फौजदारी मुकदमों में बदल जाने की हकीकत से वे वाकिफ न होते तो शायद आज का काम रुकवा सकते थे, क्योंकि खेदन भाई की तरह उनके पेट में भी मरोड़ें उठ रहीं थीं.

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धुल में अटी हुई सुदर्शन बाबा की जीप जैसे ही धर्मपरसा बाज़ार में दाखिल हुई थी, चारों तरफ हडकंप मच गया था.
“आ गए….आ गए…. बाबा जी आ गए…!”
“सुदर्शन बाबा जिंदाबाद! जिंदाबाद!! जिंदाबाद!! हमारा नेता कैसा हो! …!!”
एक तरफ की आवाज़ थमती तो दूसरी तरफ से उठने लगती थी. बाज़ार में थोड़ी देर के लिए अफरातफरी का माहौल पैदा हो गया था. क्या बच्चे, क्या बूढ़े, क्या जवान, जिसे देखो मिडिल स्कूल की दिशा में यूं भागे जा रहा था जैसे महीने में एक बार बटने वाली कोटे की एक किलो चीनी या दो लीटर किरोसिन तेल कि चाह में लोग डीलर के द्वारे की ओर भागते थे. आज तो बहरहाल जीप में सुदर्शन बाबा सवार थे! वरना केवल जीप को नज़दीक से एक नज़र देख लेने मात्र के लिए ही लोगों की भीड़ मिडिल स्कूल के अहाते में इकट्ठा हो गई होती. क्योंकि यह वही ज़माना था जब हमारे इलाके के गांवों में कोई मोटरगाड़ी कहीं से भूले-भटके आ जाती तो बच्चों को भागने के बहाने उत्सुक बड़े भी उसके के इर्द-गिर्द मंडराने लगते थे और एक दुसरे की नज़रें बचा कर उसे छू लेने की कोशिश कर डालते थे. लेकिन सभी मोटरगाड़ियों के साथ ऐसा नहीं होता था. पता नहीं किस ज़माने में किस सरकारी स्कीम के तहत हमारे गाँव के कुछ लोगों ने ग्रामीण बैंक की मांझा शाखा से खेती के उपकरण खरीदने के लिए कुछ पैसे क़र्ज़ लिए थे. पैसे तो ले लिए लेकिन यह भूल गए थे कि उन्होंने वो क़र्ज़ लौटना भी है. अब उन पैसों की उगाही की ज़िम्मेदारी मांझा थाना को दे दी गई थी. ऐसे में जब भी थाने की जीप गांव की सरहद में दाखिल होती, तो गांव से कर्जदारों के यह जा वह जा का सिलसिला शुरू हो जाता था.
“देखो-देखो नथुआ भागा…!”
“अरे ये तो लखन मियां हैं…!”
कभी कभार कोई अभागा पकड़ लिया जाता तो उसकी रात अमूमन थाने में ही गुजरती थी. घरवाले रात का खाना वहीं पहुंचा आते थे. दुसरे दिन थानेदार को कुछ दे दिलाकर पकड़े गए व्यक्ति को वापस लाया जाता था, अलगे तकाजे तक के लिए. इसी पुलिस थाने की फजीहत की डर से खेदन भाई ने कभी बैंक से क़र्ज़ नहीं लिया और अपने खेतों के साथ दूसरों के खेतों में मेहनत मजदूरी कर अपने परिवार का भरणपोषण करते रहे.

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अब बाबा जी की जीप मिडिल स्कूल के गेट के सामने किसी मस्त मौला साधू की तरह जम कर विराजमान हो चुकी थी. उस जीप का पीछा करते गर्दोगुबार की जो लहर उठी थी, वो भी वहां जमा लोगों की भीड़ के साथ ज़मीन पर बैठ चुकी थी. मिडिल स्कूल का अहाता खचाखच भर चूका था. जिधर देखो उधर सिर ही सिर नज़र आते थे. कहीं तिल धरने मात्र धरने की जगह नहीं थी. जिन्हें अन्दर जगह नहीं मिली थी वे मिसिरिया आम की शाखों पर चढ़कर चिपक गए थे या स्कूल की चारदीवारी को अपना ठीकाना बनाया था. इसी अहाते के एक कोने में स्कूल के बेंचों को जोड़ कर एक मामूली सा स्टेज खड़ा कर दिया गया था. उबड़-खाबड़ बेंचों को ढकने के लिए उनपर परमेसर साह की बहु की दहेजुआ चादर डाल दी गई थी.
लाउडस्पीकर! लाउडस्पीकर! कई आवाजें एक साथ आईं. हमें कुछ समझ में नहीं आया. विदेसिया की माइक! जिसे लोगों ने “विदेसिया की माई” की उपाधि दे रखी थी. हम भी उसे इसी नाम से जानते थे. आज विदेसिया की माई धोखा देने की मूड में आ गई थी. विदेसिया जैसे ही आवाज़ उंची करने की कोशिश करता माइक की चींख निकल जाती थी. “चूँ…चूँ…चूँ…!” बलीटोला का खदेरन डर गया था कि कहीं “बिदेसिया ने सरयां के अठजाम का जो बन्टाधरा किया था वैसा ही कुछ यहां भी कर दिया तो सारा मज़ा किरकिरा हो जाएगा.” लेकिन उसका यह डर निराधार साबित हुआ.

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आज से कुछ महीनों पहले दिल्ली में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को उन्हीं के सिख अंगरक्षकों ने गोलियों से भून डाला था. इंदिरा जी की लाश जो ज़मीन पर गिरी तो उसकी धमक से हजारों घर जल उठे, सैकड़ों सुहाग उजाड़ गए और अनेकों गोदें सुनी हो गईं. अब उस आग की तेज़ी ज़रा कम हो आई थी. लिहाज़ा ज़द में आये लोगों में से जो बच गए थे उन्होंने अपने-अपने ज़ख्मों को झाड़ कर और बची-खुची जिंदगियों को समेट कर आगे बढ़ने की तैयारियां शुरू कर दी थीं. इंदिरा गांधी की जगह उनके पुत्र राजीव जी ने ले ली थी. हमारे गांव-जवार की औरतें इंदिरा जी का मातम मना चुकी थीं. लेकिन इंदिरा गांधी का दर्द अभी भी दिलों को गर्मा रहा था.

भारत मां के बेटी रहली हमनी सन के माई / उनका के मरलस कौन दुनी कसाई!
यह दर्द केवल हमारे ही इलाके का दर्द नहीं था, बल्कि पूरा देश इसकी टीस महसूस कर रहा था. बड़ी उम्र के लोगों की बातें कौन करे, हम बच्चे भी इस एहसास से परे नहीं थे. हमने अभी-अभी चित्रकारी की क्लास में रंगों से रंग बनाने का हुनर सीखा था. उस हुनर का सबसे पहला उपयोग हमने हाथ छाप वाले झंडे बनाने में किया. बड़े लोग तो चुनावों का इंतज़ार बड़ी बेसब्री से कर रहे थे, लेकिन हम बच्चों ने चुनाव की आहट से पहले ही चुनावी जुलुस निकाल दिया था.
“इंदिरा गाँधी..! जिंदाबाद..!! जिंदाबाद, जिंदाबाद…!”

जब चुनाव करीब आया तो नेताओं ने मामूल के मुताबिक पार्टियों की अदला-बदली की. पार्टियों ने भी अपने उम्मीदवार तय किये. हमारे लोक सभा क्षेत्र से भी कई संजीद और कई गैर-संजीद उम्मीदार मैदान में उतरे, लेकिन फिर भी जीत कांग्रेस की झोली में थी. देखना सिर्फ यह रह गया था कि कांग्रेस का निकटतम प्रतिद्वंद्वी कितने लाख वोटों से हारता है. कांग्रेस…! इंदिरा…! राजीव…! के अलावा माहौल में कोई और नाम था ही नहीं. इसी बीच एक मुंह से दुसरे मुंह होता हुआ एक नाम हमारे कामों से टकराया था और देखते ही देखते एक आंधी का रूप धारण कर लिया था. खेदन भाई और गुमाश्ता चा ने भी सुदर्शन बाबा का नाम हैरत की मूर्ति बन कर सुना था. और जब उन्हें पता चला कि सुदर्शन बाबा धर्मपरसा आने वाले हैं तो उनके पेटों में मरोड़ें उठने लगी थीं.

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सुदर्शन बाबा किसी आरोप में जेल में बंद थे. उन्होंने जेल से ही अपना नामांकन दाखिल किया था. जेल जाना उनके चुनावी अभियान के लिए कितना अहम था इसका अंदाज़ा उनके जीप के पीछे लगे दो कटआउट्स से हो जाता था. दरअसल मिडिल स्कूल पहुँचते ही हमारी पहली नज़र उनके कटआउटस पर पड़ी थी. उन कटआउटस में वे हाथों में हाथकड़ी और पैरों में बेड़ी पहने किसी फ़िल्मी हीरो की तरह नज़र आ रहे थे.

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एक लम्बी “चूँ!!!!!!!!!!!!!!!!!” के बाद विदेसी की माइक बजने के लिए तैयार हो चुकी थी. बैटरी डिस्चार्ज हो गई थी, इसलिए वोल्यूम कम रखना पड़ा था. लेकिन वॉल्यूम कम करना तो अलग बात है यदि लाउडस्पीकर नहीं भी होता तो भी कोई खास फर्क नहीं पड़ता. सुदर्शन बाबा की आवाज़ में शेर की दहाड़ थी.
‘बुजुर्गो और दोस्तों!’
बाबा अब स्टेज पर खड़े हो चुके थे. औपचारिकताओं के बाद उन्होंने सबसे पहले यह कहा कि उन्हें झूठे मुकदमे में फंसाया गया है. उसके बाद घन-गरज के साथ एक घंटे तक बोलते रहे. उन्होंने कांग्रेस के उम्मीदवार या विपक्ष के किसी भी उम्मीदवार का नाम नहीं लिया. बस अपनी बातें कहते रहे. आवाज़ का उतार चढाव लोगों पर अपना जादू छोड़ रहा. जब वे अपने भाषण के इस भाग पर पहुचे तो माहौल बिलकुल बदल चूका था.
‘आज, दिवाली आती है … होली आती है … ईद आती है… आपके बच्चे नए-नए कपडे पहनते हैं. आप उन्हें पैसे देते हैं … मिठाइयाँ खरीदते हैं … वो खुश हो जाते हैं. लेकिन मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं होता. परब त्यौहार के मौकों पर जब मेरे बच्चे मुझसे मिलने आते हैं (अब उनका गला रूंध चूका था) तो पूछते हैं कि पापा आप घर कब आओगे?’ अब बाबा की आँखों से आंसूओं की धारा बहने लगी थी. सभा में मौजूद शायद ही कोई व्यक्ति था जिसकी आंखें नम नहीं थीं.
उन्होंने अपना भाषण इस बात पर समाप्त किया “मैं जेल में हूँ … मेरे पास चुनाव लड़ने के लिए पैसे नहीं हैं … मैं केवल आप के सहारे चुनाव में खड़ा हुआ हूँ. यदि आप चाहते हैं कि मेरे बच्चे मेरे साथ होली मनाएं, दीवाली मनाएं, ईद मनाएं! तो मेरे कार्यकत्ता आपके पास जाएंगे ….”
अभी उनका आग्रह समाप्त भी नहीं हुआ था कि लोगों के हाथ अपनी-अपनी जेबों में तैर गए थे, और जेबों से पैसे निकल-निकल कर वोलेंटीयर्स की चादरों में गिरने लगे थे. सुदर्शन बाबा का जादू कैसे सिर चढ़कर बोल रहा था उसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता था कि चंद दिनों पहले जिस गायक ने कांग्रेस की सभा में “भारत मां के बेटी” वाला गीत गया था उसने भी अपने पॉकेट में मौजूद सारे पैसे बाबा की झोली में डाल दिया था. उस रात दिहाड़ी मजदूरों के घर चुल्हा नहीं जला था. उन्हीं देहाड़ी मजदूरों में खेदन भाई भी शामिल थे. इस सभा ने इस क्षेत्र के वोटों का फैसला कर दिया था. बाबा ने हमारे लोक सभा क्षेत्र में इस तरह की कई और सभाएं कीं. वे जहां गए हर जगह लोगों ने उन्हें हाथों हाथ लिया. उन्हें पैसे भी दिए और मन ही मन वोट देने का वादा भी कर लिया. नतीजा यह निकला कि कांग्रेस की लहर के बावजूद कांग्रेस के उम्मीदवार की ज़मानत तक जब्त हो गई.

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चुनाव जीतने के बाद बाबा जी गुलर का फूल बन गए, राक्षस की जटा बन गए, नायब हो गए. पांच साल बाद जब एक बार फिर चुनावी दौरे पर धर्मपरसा आये तो लोगों ने न तो उनकी जीप का इंतज़ार किया और न ही उन्होंने चंदे मांगे. शेर की दहाड़ भी अब मंद पड़ चुकी थी. उनकी गाड़ियों के पीछे लगे कटआउट्स में हाथों की हथकड़ियाँ और पैरों की बेड़ियों टूट चुकी थीं. अब वे उन कटआउट्स में सफ़ेद कुर्ता पाजामा पहने हाथ लहराते नज़र आ रहे थे. अब बेतरतीब बढ़ी दाढ़ी चहरे से गाएब हो चुकी थी. हाँ, मुछों की ऐठन उस समय भी वैसी ही थी जैसी इस बार थी. इस बार उनके काफले में पांच जीप शामिल थे. वे खुद चमचमती हुई एम्बेसडर कार में सवार थे. कार्यकर्ताओं की संख्या भी पिछले चुनाव की तुलना में कई गुना अधिक हो गई थी, लेकिन फिर भी बाबा जी चुनाव हार गए.
उसके बाद उन्होंने कई पार्टियाँ बदलीं, लोकसभा और विधानसभा के कई क्षेत्र बदले. बीच में कई अनुकूल लहर वाले चुनाव भी आए, लेकिन उनकी नैय्या चुनावी भंवर में हमेशा गोते खाती रही. शायद लोगों के दिलों को छूने की उनकी शक्ति समाप्त हो चुकी थी.

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अब हमारे इलाके में मोटरगाडी कोई अनोखी चीज़ नहीं रही, लेकिन आज भी मांझा थाना की जीप गांव की सरहद में दाखिल होते ही हड़बोंग मचा देती है. आज भी जीप देखर कर्जदारों के भागने का सिसिला बदस्तूर बना हुआ है. गुमाश्ता चा ने जिस गैर-मजरूआ और विवादस्पद ज़मीन पर चारदीवारी खिंचवाई थी उस ज़मीन से किसी दानव के दो लम्बे-लम्बे हाथों की तरह दो-दो मोबाइल टावर उग आये हैं. इन्टरनेट और मोबाइल लोगों की जिंदगियों की आवश्यकता बन चुके हैं. इसी आवश्यकता का उपभोग करते-करते एक दिन इलेक्शन कमीशन की वेबसाइट पर अपने ज़िले के विधानसभा उम्मीदवारों की जानकारी लेते समय अचानक मेरी नज़रें सुदर्शन बाबा की सम्पति पर रुक गई. उनकी अचल सम्पति तकरीबन 50 करोड़ रूपये की थी. मैंने खेदन भाई को याद किया आज से तैंतीस वर्ष पहले उन्होंने अपनी देहाड़ी सुदर्शन बाबा को दी थी. उन्होंने वो पैसे बाबा जी की हालत पर तरस खा कर दिए थे या अपनी किसी आकांक्षा की पूर्ति की उम्मीद में, यह तो मालूम नहीं, लेकिन आज खेदन भाई बूढ़े हो चुके हैं, उनकी पत्नी भगवन को प्यारी हो चुकी हैं, और उनका बेटा तिलक मंरेगा मजदूर है. हालात के थपेड़ों ने तिलक को समय से पहले बूढ़ा कर दिया है. आज उसके सामने भी एक चुनाव है. इस चुनाव में भी एक लहर पैदा हो गई है. यह लहर इस लिए पैदा हुई है क्योंकि लोगों को उम्मीद है कि चुनाव के बाद सब कुछ अच्छा हो जाएगा. अब देखना यह है कि तिलक लहर के साथ जाता है या खेदन भाई की तरह लहर के विपरीत.

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