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भारत पर हमले की धमकी
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भारत पर हमले की धमकी

आतंकवादी अजहर मसूद ने भारत के ख़िलाफ़ जेहाद छेड़ने की धमकी दी है. मसूद की यह धमकी निश्‍चित रूप से आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ने में भारत सरकार की नाकामी को जाहिर करती है. एक तरफ़ भारत पाकिस्तान से बेहतर संबंधों की बात करता है, वहीं दूसरी तरफ़ पाकिस्तान की सरपरस्ती में कई दहशतगर्द आतंकी अभियान चला रहे हैं. लिहाजा, यह कहना गलत नहीं होगा कि भारत सरकार की गलत नीतियों की वजह से देश में आतंकवाद का विस्तार हो रहा है और अजहर मसूद जैसे दहशतगर्दों का मनोबल बढ़ रहा है. आख़िर आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ने में सरकार की कैसी रणनीति होनी चाहिए? इसी मसले पर प्रस्तुत है चौथी दुनिया की यह रिपोर्ट…  

pag11आतंक की नर्सरी बन चुके पाकिस्तान में फिर से जैश-ए-मुहम्मद के आतंकी खुलेआम भारत के ख़िलाफ़ आतंकी कारनामों को अंजाम देने के लिए एकजुट हुए हैं. भारत के ख़िलाफ़ हमले को अंजाम देने की साजिश का मुख्य सरगना है अजहर मसूद. आतंकवादियों की इस घोषणा से न स़िर्फ पाकिस्तान द्वारा आतंकवाद को पनाह देने पर फिर से चर्चा शुरू हो गई है, बल्कि भारत का पाकिस्तान द्वारा आतंकी गतिविधियों में सहयोग करने का आरोप भी सही साबित हो रहा है. पिछले दिनों जैश-ए-मुहम्मद के प्रमुख अजहर मसूद ने गुलाम कश्मीर में एक रैली की, जिसमें उसने भारत के ख़िलाफ़ जमकर ज़हर उगला. इस रैली में अजहर ने कहा कि भारत के ख़िलाफ़ जेहाद फिर शुरू करने का वक्त आ गया है. खुफिया रिपोर्टों के मुताबिक, आतंकी सरगना मसूद ने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में हाल में एक आतंकी रैली की थी. रैली में मसूद ने दावा किया था कि उसके पास फिदायीन बम्बर की एक पूरी फौज तैयार है, जो उसका इशारा मिलते ही भारत पर हमला करेगी.
भारत के इंटेलिजेंस ब्यूरो के पूर्व प्रमुख एवं दक्षिण एशिया में आतंकवादी संगठनों के विशेषज्ञ ए के डोवाल बताते हैं कि कश्मीर पर कब्जे को लेकर जैश-ए-मोहम्मद भारत के ख़िलाफ़ पागलपन की हद तक दुश्मनी रखता है. मसूद अजहर का अचानक सक्रिय हो उठना वाकई चिंता का विषय है. यह रैली भारत की संसद पर हमले के लिए फांसी पर लटकाए जा चुके अफजल गुरु द्वारा लिखी गई किताब के विमोचन के लिए बुलाई गई थी. पाकिस्तानी मीडिया ने भी इस रैली को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं. उसने कहा है कि आख़िर पाक सरकार की आतंकवाद को लेकर कोई नीति है भी या नहीं? इस रैली से आतंकवाद पर पाकिस्तान के दोहरे मापदंड की कलई खुल जाती है. 2001 में भारतीय संसद पर हुए हमले के मास्टर माइंड मसूद अजहर की यह रैली पाक अधिकृत कश्मीर की राजधानी मुजफ्फराबाद में उसी दिन हुई थी, जिस दिन भारत गणतंत्र दिवस की खुशियां मना रहा था. पाकिस्तान के जाने-माने अख़बार डॉन का कहना है कि प्रतिबंधित संगठन के नेता का वर्षों बाद ऐसी किसी रैली में दिखना सरकार की आतंकवाद के ख़िलाफ़ नीति पर सवाल खड़े करता है. सवाल यह है कि प्रतिबंधित संगठन का नेता कैसे फिर से सक्रिय हो गया? यह सब अचानक तो हुआ नहीं होगा, क्योंकि यह रैली पूरी तैयारी के साथ आयोजित की गई थी. कहा तो यहां तक जाता है कि रैली में शामिल होने के लिए लोग बसों से ढोकर लाए गए थे. इस रैली में कथित तौर पर अजहर ने कहा कि भारत के ख़िलाफ़ जेहाद फिर शुरू करने का वक्त आ गया है. मुजफ्फराबाद में मसूद के भाषण को फोन पर सुनने के लिए क़रीब 313 फिदायीन जुटे. इसमें अजहर ने अज्ञात जगह से समर्थकों को संबोधित किया. आख़िर ऐसा कैसे हो सकता है कि इस रैली की ख़बर स्थानीय प्रशासन एवं सुरक्षा एजेंसियों को न रही हो. शंका इस बात की तरफ़ भी है कि पाक सरकार के इशारे पर ही इस रैली को अंजाम दिया गया. भारत में चुनाव का माहौल है और ऐसे में पाक के फिरकापरस्ती तत्व एक बेहतर मा़ैका देख रहे हैं भारत में उपद्रव फैलाने के लिए. .

 

ख़तरनाक है अजहर मसूद
अजहर मसूद ने फरवरी 2000 में जैश-ए-मोहम्मद की स्थापना की थी. पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के कार्यकाल में पाकिस्तान में इस संगठन को प्रतिबंधित कर दिया गया था, लेकिन यह कभी ख़त्म नहीं हुआ. मसूद को 1994 में कश्मीर में उस वक्त धर दबोचा गया था, जब वह जाली पुर्तगाली पासपोर्ट पर सीमा पार जाने की कोशिश कर रहा था. इंडियन एयरलाइंस के विमान आईसी- 814 का जब आतंकवादियों ने अपहरण कर लिया था, तो अजहर को उसमें सवार यात्रियों एवं चालक दल के सदस्यों की रिहाई के बदले जम्मू की एक जेल से दिसंबर, 1999 में छोड़ा गया था. इस विमान को आतंकवादी अगवा करके अफगानिस्तान में कंधार लेकर चले गए थे. अजहर ने ही जम्मू-कश्मीर विधानसभा पर अक्टूबर 2001 में हुआ हमला प्रायोजित किया था. उसके संगठन ने लश्कर-ए-तैयबा के साथ मिलकर 13 दिसंबर, 2001 को भारतीय संसद भवन पर हमले को अंजाम दिया था. मौलाना मसूद अजहर पाकिस्तान स्थित बहावलपुर के मॉडल टाउन इलाके में जैश के मुख्यालय से अपनी जेहादी गतिविधियां चलाता है. जैश का यह मुख्य केंद्र खुलेआम एक बड़े मजहबी मदरसे (उस्मान-ओ-अली) का संचालन करता है, जहां सैकड़ों बच्चों को इस्लाम की चरमपंथी व्याख्या पढ़ाई जाती है

अख़बार डॉन का तर्क है कि पाक सेना और पाकिस्तानी हुक्मरान अक्सर यह कहते हैं कि जेहादी संगठनों पर प्रतिबंध केवल पाकिस्तान में है, पाक अधिकृत कश्मीर में नहीं. यह तर्क अत्यंत हास्यास्पद है, क्योंकि इससे इस सवाल का जवाब नहीं मिलता कि आख़िर मसूद अजहर अब भी अपने गृह जिले बहावलपुर से क्यों काम कर रहा है? मसूद अजहर के पाकिस्तान में होने को लेकर कई बार सवाल उठता रहा है और हर बार पाकिस्तानी हुक्मरानों ने जमकर झूठ भी बोला है. मसूद की पाकिस्तान में उपस्थिति को लेकर पाक का कोई अधिकारी कभी यह कहता है कि वह पाकिस्तान में नहीं है, तो दूसरे ही पल पाक का कोई मंत्री कह बैठता है कि वह पाकिस्तान में ही है. ऐसे ही घटनाक्रम में कुछ साल पहले भारत में पाकिस्तान के हाई कमिश्‍नर शाहिद मलिक ने कहा था कि जैश-ए-मोहम्मद का मुखिया मौलाना मसूद अजहर पाकिस्तान में नज़रबंद नहीं है और वह कहां है, उसके बारे में कुछ भी मालूम नहीं है, लेकिन मलिक को उस समय शर्मनाक स्थिति का सामना करना पड़ा, जब पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने कहा कि अजहर बहावलपुर के अपने घर में नज़रबंद है, लेकिन उसे भारत को नहीं सौंपा जा सकता. सवाल यह उठता है कि आख़िर अजहर को भारत को क्यों नहीं सौंपा जा सकता?
भारत के लिए बड़ा सवाल यह है कि पाकिस्तान ने मसूद अजहर को पनाह क्यों दी? इस बात को भुलाया नहीं जा सकता कि संसद पर हमले के बाद मसूद अजहर पाकिस्तान में छिपा था और वहां की सरकार ने उसे भारत को सौंपने से इंकार कर दिया था. अगर पाक सरकार यह कहती है कि अजहर मसूद को नहीं सौंपा जा सकता, तो भारत सरकार का उसके इस बयान पर क्या रुख है? आज तक भारत सरकार ने पाक के इस बयान पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं की? अफगानिस्तान से अमेरिकी फौजों के धीरे-धीरे हटने के बाद अजहर का यूं उभरना पाकिस्तान की रणनीति में बड़े बदलाव की ओर इशारा कर रहा है. खुफिया सूत्रों का यह भी कहना है कि मसूद का अचानक इस तरह से सामने आना पाकिस्तानी सरकार की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है, जिसका मकसद भारत में चुनाव के दौरान गड़बड़ी फैलाकर दुनिया का ध्यान कश्मीर मुद्दे की ओर खींचना है. कुछ प्रमुख अख़बारों का कहना है कि यह सब कुछ नवाज शरीफ की रणनीति के तहत किया जा रहा है, जिसमें भारत के ख़िलाफ़ अपरोक्ष हमले तेज करने के लिए आतंकवादी संगठनों को बढ़ावा दिया जा रहा है.
हाल में पेंटागन से रिटायर जनरल जैक कीन और रक्षा विशेषज्ञ ने अमेरिकी कांग्रेस से कहा है कि पाकिस्तान शुरू से ही भारत में आतंकवादी संगठनों के माध्यम से आतंकी कार्रवाई का समर्थक रहा है और नवाज शरीफ के सत्ता में आने के बाद भी उसका यह समर्थन जारी है. यह बात दुनिया जानती है कि पाकिस्तान में सेना और उसका हित सबसे ऊपर है और सरकार न केवल कमजोर, बल्कि भ्रष्ट भी है. ऐसी सरकार से अधिक उम्मीद नहीं की जानी चाहिए. भारत को चाहिए कि वह अपने स्तर पर पाकिस्तान प्रायोजित आतंकी कार्रवाइयों का मुंहतोड़ जवाब दे, लेकिन देश की यह उम्मीद कभी पूरी नहीं होगी, भारत सरकार के रवैये से कम से कम ऐसा ही लगता है. पाकिस्तान में जिस तरह से रोज बम विस्फोट होते हैं, सैकड़ों की संख्या में लोग मारे जाते हैं, उससे तो यही लगता है कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था वहां के टैंकों में है. पाकिस्तान के इतिहास को देखा जाए, तो हम पाएंगे कि इस देश में स़िर्फ गोली-बंदूक की खेती होती है. खैर मामला चाहे जो भी हो, लेकिन मसूद अजहर और अन्य आतंकियों का फिर से सक्रिय होना आतंकवाद पर पाक सरकार की दोहरी नीति की पोल खोलता है.
अजहर के इस मंसूबे से इस बात की शंका लाजिमी है कि वह भारत की चुनावी रैलियों में अंधाधुंध फिदायीन हमलों की साजिश रच रहा है. अजहर के मूवमेंट की निगरानी कर रही खुफिया एजेंसियों ने इस बात की चेतावनी दी है कि मसूद फिर से हवाई जहाज हाईजैक करने जैसी वारदातों को अंजाम दे सकता है. मसूद के इरादों से आने वाले दिनों में भारत में सिलसिलेवार बम ब्लास्ट से भी इंकार नहीं किया जा सकता. अगर ऐसा है, तो इसकी रोकथाम के लिए भारतीय सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों को मिलकर काम करना होगा, ताकि आतंकियों के नापाक मंसूबों पर रोक लगाई जा सके. मसूद के हमले की धमकी को देखते हुए भारत को चाहिए कि वह अपने खुफिया तंंत्र को चाक-चौबंद करे और इस बात के लिए गंभीर क़दम उठाने के लिए तत्पर रहे कि आतंकी किसी अवांछित गतिविधियों को अंजाम न दे पाएं.
अजहर मसूद के दोबारा सिर उठाने की घटना के पीछे काफी हद तक भारत भी ज़िम्मेदार है. जब कंधार हाईजैक कांड हुआ था, तो भारत को किसी भी क़ीमत पर आतंकवादियों को नहीं छोड़ना चाहिए था, लेकिन भारत की तो यह नीति रही है कि जब-जब आतंकवादियों ने किसी का अपहरण किया, तो उनकी मांग पर भारत ने सबसे ख़तरनाक आतंकी छोड़ दिए. अजहर मसूद आतंकवादियों की उसी ब्लैकमेलिंग का परिणाम है. दूसरी जो सबसे बड़ी गलती भारत सरकार ने की, वह यह कि आतंकियों को छोड़ने के बाद कभी भी उनकी धरपकड़ के लिए पाकिस्तान सरकार पर उचित दबाव नहीं बना सकी और न ही वैश्‍विक मंच को इस मसले पर पाकिस्तान के ख़िलाफ़ कर सकी. भारत सरकार की इस कमजोर नीति को पाकिस्तान सरकार भलीभांति भांप चुकी है और इसीलिए भारत सरकार की मांग को सिरे से खारिज करके कह देती है कि वह अजहर मसूद को भारत के हवाले नहीं करेगी. अगर भारत किसी तरह का दबाव बनाने में कामयाब हो भी जाता है, तो पाकिस्तान का जवाब होता है कि भारत जिस आतंकवादी की बात कर रहा है, वह पाकिस्तान में है ही नहीं. जैसा कि उसने अजहर मसूद के मामले में किया. भारत को चाहिए कि वह आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान से आर-पार की नीति अपनाए. अगर भारत ऐसा करता है, तो आने वाले दिन देश के लिए सुखद होंगे.

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