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कैसी होगी नई सुबह
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कैसी होगी नई सुबह

अफगानिस्तान में अप्रैल में राष्ट्रपति चुनाव होने हैं. हामिद करज़ई के बाद कौन बनेगा अफगानिस्तान का राष्ट्रपति, इसे लेकर अमेरिका, पाकिस्तान और भारत की जिज्ञासा स्वाभाविक हैं, क्योंकि लंबे अर्से के बाद करज़ई का शासन समाप्त हो रहा है. चुनाव की सुगबुगाहट और प्रचार अभियान के शुरू होते ही तालिबान ने भी अपने आतंकी पांव पसारने शुरू कर दिए हैं. ऐसे में अमन-चैन की आस में अफगानियों के ज़ेहन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि अफगानिस्तान में लोकतंत्र की नई सुबह कैसी होगी.

p11अफगानिस्तान में 5 अप्रैल को राष्ट्रपति चुनाव होने वाले हैं. चुनाव प्रचार जोरों पर है. अफगानिस्तान से इस साल अमेरिकी अगुवाई वाले नाटो बलों की विदाई के बीच इस चुनाव को अफगानिस्तान के लिए काफी अहम माना जा रहा है. यह चुनाव भारत के लिए भी अहम है, क्योंकि वर्तमान राष्ट्रपति हामिद करजई का रुख भारत के प्रति हमेशा से ही दोस्ताना रहा है. अफगानिस्तान के कानून के मुताबिक करज़ई तीसरी बार राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार नहीं हो सकते. ऐसे में भारत के लिए अब देखने वाली बात यह होगी कि इस चुनाव में अगला राष्ट्रपति जो बनेगा, वह भारत के हितों का कितना ख्याल रखेगा.

फिलहाल चुनाव प्रचार के साथ-साथ अपराधी एवं विद्रोही तत्व खूनी खेल भी शुरू कर चुके हैं. अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा सहायता बल (आईएएसएफ) के वरिष्ठ अमेरिकी कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल मार्क मिली ने भी अफगानिस्तान में आतंकवादी हमले की आशंका व्यक्त की है. कयास तो यहां तक लगाए जा रहे हैं कि तालिबान निर्दोष अफगानी नागरिक, अफगान सेना या अमेरिकी गठबंधन सैनिकों पर और हमले कर सकता है. आखिर तालिबान चाहता भी तो यही है कि अफगानिस्तान में आतंक और भय का माहौल पैदा कर फिर से तालिबानी शासन स्थापित किया जा सके. यह चुनाव विदेशी सैनिकों के अफगानिस्तान से हटने की तैयारी के बीच साढ़े तीन लाख अफगान बलों के लिए एक परीक्षा भी माना जा रहा है. इसी वर्ष के अंत तक अफगानिस्तान से नाटो सैनिकों की वापसी भी होनी है.

हामिद करज़ई 2004 में अफगानिस्तान के पहले चुने गए राष्ट्रपति बने. इससे पहले वे तीन साल तक देश के आंतरिक नेता के तौर पर काम कर रहे थे. उनका जन्म 24 दिसंबर, 1957 में कंधार में हुआ. करज़ई का भारत से नाता पुराना रहा है. काबुल में कुछ देर पढ़ाई करने के बाद वे भारत के शिमला में पढ़ाई के लिए चले गए. 90 के दशक के शुरुआती सालों में जब तालिबान का उदय हुआ था तो करज़ई ने पहले उसका समर्थन किया था, लेकिन 1994 तक आते-आते वे तालिबान को शक़ की निगाह से देखने लगे. इसके बाद उन्होंने अपनी राह अलग कर ली. दिसंबर 2001 में तालिबान को उनके अंतिम गढ़ कंधार से निकालने में करज़ई ने अहम भूमिका निभाई थी. अफगानिस्तान में 2001 में संयुक्त राष्ट्र के समर्थन में सम्मेलन हुआ, ताकि वहां अंतरिम सरकार का गठन हो सके. करज़ई को तब तक अमेरिका का समर्थन हासिल हो चुका था.

साल 2001 में तालिबान के पतन के बाद से देश में करजई का शासन है. उन पर कई बार जानलेवा हमले किए गए. हो सकता है कि इन चुनावों के बाद मई के आखिर में दो मजबूत दावेदारों के बीच दूसरा रन ऑफ हो. अब्दुल्ला अब्दुल्ला साल 2009 के चुनाव में दूसरे नंबर पर रहे थे. तब करजई की जीत हुई थी और चुनावों में धांधली होने का आरोप लगा था. अब्दुल्ला पूर्व विदेश मंत्री हैं और उन्हें पद के मजबूत दावेदार के तौर पर देखा जा रहा है. हालांकि पिछले दिनों अब्दुल्ला के दो सहयागियों की जिस तरह से गोली मारकर हत्या कर दी गई, वो चुनाव में हिंसा के वीभत्स रूप को सामने ला रहा है. चुनाव में अब्दुल्ला के अलावा अन्य प्रमुख उम्मीदवारों में पूर्व वित्त मंत्री अशरफ गानी और करजई के प्रति वफादार जलमाई रसौल तथा राष्ट्रपति के बड़े भाई कयूम करजई शामिल हैं.
तालिबान के चंगुल से आजाद होने के बाद अफगानिस्तान में काफी ब़डे बदलाव देखने को मिले हैं. हालांकि अफगानियों द्वारा अमेरिकी सेना के विरोध के कारण इसका खामियाजा भी यहां के नागरिकों को विरोध और खून-खराबे के तौर पर देखने को मिला है. अमेरिका, भारत और अन्य देशों से मिली अरबों डॉलर की सहायता के चलते अफगानियों के जीवनस्तर में काफी सुधार आया है. तालिबान शासन की तुलना में वहां के बच्चे स्कूल जाने लगे. महिलाएं घरों से निकलने लगीं. आंक़डे बताते हैं कि सत्तर लाख बच्चे स्कूल जाने लगे हैं. हालांकि यह सच्चाई है कि अमेरिकी मदद के बिना अफगानिस्तान सरकार की स्थिति रेंगने वाली सरकार की हो जाएगी. इस साल के अंत तक अमेरिकी बलों के स्वदेश लौटने का असर अफगानिस्तान को मिलने वाली सुविधाओं और वित्तीय सहायता पर भी पड़ सकता है. जब तक ओबामा प्रशासन अफगानी राष्ट्रपति हामिद करजई को सुरक्षा समझौते पर हस्ताक्षर के लिए नहीं मना लेता, तब तक वित्तीय सुविधाओं को लेकर अनिश्‍चितता बनी रहेगी. इस समझौते के तहत 2014 के बाद भी कुछ अमेरिकी सैनिक अफगानिस्तान में रह सकेंगे. करजई ने इस पर हस्ताक्षर करने के लिए कुछ शर्तें रखी हैं. अमेरिका चाहता है कि करजई जल्द ही इस समझौते पर हस्ताक्षर कर दें. ऐसा नहीं होने पर अफगानिस्तान को दी जा रही मदद अमेरिका वापस ले सकता है. वर्ष 2001 में तालिबान को सत्ता से उखाड़ फेंकने के बाद से अमेरिका अफगानिस्तान को मदद के तौर पर 88 अरब डॉलर दे चुका है. अब देखने वाली बात यह होगी कि चुनाव के बाद अफगानिस्तान में हालात किस तरह के रहते हैं. तालिबान शासन की तुलना में अफगानिस्तान में काफी हद तक अमन-चैन कायम हो गया है. हालांकि छिटपुट घटनाएं होती रहीं, लेकिन इसका उदाहरण सिर्फ अफगानिस्तान ही नहीं, बल्कि तमाम इस्लामिक देश हैं.

अब्दुल्ला अब्दुल्ला अफगानिस्तान में राष्ट्रपति चुनाव के लिए सबसे मजबूत उम्मीदवार हैं. अब्दुल्ला अब्दुल्ला का जन्म 1960 में हुआ था. 1995 में जब कुछ समय के लिए अफगानिस्तान में नॉर्दन एलायंस का शासन था तो वे विदेश मंत्री बने. अब्दुल्ला अब्दुल्ला का संबंध जनजातीय ताजिक समुदाय से है. पेशे से डॉक्टर रहे अब्दुल्ला अब्दुल्ला ने पाकिस्तान में कुछ समय शरणार्थियों के साथ काम किया. अस्सी के दशक में वे ताजिक समुदाय के नेता अहमद शाह मसूद के साथ जुड़ गए. फिर तालिबान के आने के बाद भी वे निर्वासन में काम कर रहे विदेश मंत्री के तौर पर जाने जाते रहे. नॉर्दन एलायंस के नेता जनरल मसूद की हत्या के बाद वे गुट के तीन अहम नेताओं में से एक बनकर उभरे.

अफगानिस्तान में चुनाव के बाद अगला राष्ट्रपति कौन होगा, यह तो बाद की बात है, लेकिन इतना तो तय है कि हामिद करज़ई ने जिस जिम्मेदारी के साथ अफगानिस्तान का पुनर्निर्माण किया है, उसे शायद ही कोई उसी ढंग से आगे ब़ढा पाए. करज़ई ने विकास का एक ऐसा खाका खींचा है, जिसके नक्शे कदम पर कोई भी अगला राष्ट्रपति बहुत तेजी से आगे ब़ढ सकता है. हालांकि यह चुनाव बाद देखने वाली बात होगी.
पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई अफगानिस्तान और भारत के खिलाफ हमेशा विरोधी रुख अपनाती रही है. दूसरी तरफ अमेरिका ने भी पाकिस्तान को खुश रखने के लिए भारत को अफगानिस्तान से हमेशा दूर ही रखा. भारत ने भी अफगानिस्तान में अपना सहयोग पुनर्निर्माण तक ही सीमित रखा. भारत और अफगानिस्तान के सम्बन्ध आपस में हमेशा ही मैत्रीपूर्ण रहे हैं. पाकिस्तान चाहता है कि अफगानिस्तान में भारत विरोधी रुख हो. दूसरी ओर अमेरिका चाहता है कि वह अफगानिस्तान में एक ऐसी सत्ता स्थापित करे, जो अमेरिका विरोधी न हो, लेकिन अफगानिस्तान में पाकिस्तान के कुछ ऐसे सहयोगी हैं, जो अमेरिका के कट्टर विरोधी हैं. ऐसे में अपने सपने को साकार करने के लिए अमेरिका को अफगानिस्तान में भारत कि भूमिका को स्वीकार करना होगा. यह सब करज़ई जैसे अच्छे शासक ही कर सकता है, जो चुनाव परिणाम के बाद सामने आएगा.
अफगानिस्तान के सुरक्षित भविष्य को लेकर भारत ने पिछले एक दशक के भीतर अपना काफी कुछ दांव पर लगाया है. इस दौरान भारत ने वहां दो अरब डॉलर से भी ज्यादा के निवेश किए हैं, जिसके तहत वहां न केवल 220 किमी लंबी सड़क बनाई गई है, बल्कि बिजली ट्रांसमिशन लाइन और सलमा बांध भी बनाया है. इसके अलावा काबुल में अफगानिस्तान की संसद के भवन का निर्माण भी किया है. इसलिए अफगानिस्तान में चुनाव बाद बनने वाले राष्ट्रपति का महत्व भारत के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है.
हाल के घटनाक्रम को देखा जाए तो अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करज़ई ने अमेरिका को खरी-खरी सुना दिया है. करजई ने कहा है कि वे अमेरिका के साथ सुरक्षा के द्विपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर के समझौते को तभी स्वीकार करेंगे, जब अमेरिका अफगानिस्तान में शांति के लिए तालिबान से बातचीत की शुरुआत में सहायता करे. उन्होंने यह भी साफ कर दिया है कि वे अमेरिका के सामने किसी कीमत पर नहीं झुकेंगे और न ही उनका देश किसी तरह का दवाब सहेगा. क्या करज़ई की नीतियों को चुनाव में निर्वाचित राष्ट्रपति लागू कर सकेंगे, यह देखने वाली बात होगी.


 

साल 2001 में तालिबान के पतन के बाद से देश में करजई का शासन है. उन पर कई बार जानलेवा हमले किए गए. करजई द्वारा तीसरे कार्यकाल के लिए मना करने के बाद 5 अप्रैल को वोटिंग की राह साफ हो गई है. हो सकता है कि इन चुनावों के बाद मई के आखिर में दो मजबूत दावेदारों के बीच दूसरा रन ऑफ हो. अब्दुल्ला साल 2009 के चुनाव में दूसरे नंबर पर रहे थे. तब करजई की जीत हुई थी और चुनावों में धांधली होने का आरोप लगा था. अब्दुल्ला अब्दुल्ला पूर्व विदेश मंत्री हैं और उन्हें पद के मजबूत दावेदार के तौर पर देखा जा रहा है.


 

तालिबान का रुख

तालिबान का रुख तालिबान ने अफगानिस्तान में पांच अप्रैल को होने वाले राष्ट्रपति चुनाव को नामंजूर कर दिया है. साथ ही इसमें बाधा डालने के लिए हमले भी तेज कर दिए हैं. तालिबान ने अफगानिस्तान के विभिन्न इलाकों में कई आत्मघाती बम हमले भी करने शुरू कर दिया है. पिछले दिनों तालिबान ने कम सुरक्षा वाले रेस्टोरेंट पर हमला कर 21 व्यक्तियों की हत्या कर दी थी. 2001 के बाद से ही तालिबान इस कोशिश में है कि वह दोबारा से अफगानिस्तान में अपनी पैठ बनाए. हालांकि, वर्तमान राष्ट्रपति करज़ई ने तालिबान की इस कोशिश पर पानी फेर दिया और उसके खिलाफ हर क़डी कार्रवाई की. अब तालिबान यह चाहता है कि करज़ई के जाने के बाद वह किसी दूसरे शासक को मजबूती से वहां पांव न जमाने दे. हालांकि, राष्ट्रपति उम्मीदवारों में प्रबल दावेदार अब्दुल्ला अब्दुल्ला भी तालिबानियों के भुग्तभोगी रह चुके हैं. इसलिए वह कभी नहीं चाहेंगे कि तालिबान अपने नापाक मंसूबों में कामयाब हों. अब्दुल्ला की यह सोच भारत ही नहीं, संपूर्ण विश्‍व के हित में है, जो अफगानिस्तान में एक नई सुबह लेकर आएगी.

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