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मनमोहन की विवेकशून्य विदेश निति
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मनमोहन की विवेकशून्य विदेश निति

मनमोहन सिंह पिछले दस वर्षों से भारत के प्रधानमंत्री हैं. मनमोहन सिंह ने अपनी विवकेशून्यता के कारण इन वर्षों में भारतीय विदेश नीति को पूरी तरह से गर्त में पहुंचा दिया है. आज भारत विश्‍व के हर मोर्चे पर असफल है तो उसके लिए मनमोहन सिंह की तथाकथित विदेश नीति ही ज़िम्मेदार है. भारत की स्थिति यह है कि जहां एक ओर उसके प़डोसियों से अनबन है, वहीं दूसरी ओर विश्‍व शक्तियां आए दिन भारत के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाती हैं. सवाल यह उठता है कि क्या मनमोहन सरकार की कोई विदेश नीति है? 

l2013092949607क्या आपने ऐसे प्रधानमंत्री का नाम सुना है, जो संभावित सवालों के जवाब तक रटकर पत्रकार सम्मेलन में जाता हो. मनमोहन सिंह ऐसा करते हैं. अगर मनमोहन सिंह इतने ही विवेकशून्य हैं तो भला भारत के इस प्रधानमंत्री से विदेश नीति के मसले पर किसी तरह की नीतिगत सुदॄढता की क्या कल्पना की जा सकती है. कहां यहां तक जा रहा है कि भारत की कोई विदेश नीति है ही नहीं. इसपर अचरज भी नहीं होना चाहिए. नेहरू के बाद मनमोहन सिंह दूसरे प्रधानमंत्री हैं, जो इस पद पर दस साल से विराजमान हैं. प्रधानमंत्री बदलते रहे, लेकिन दुर्भाग्यवश भारत की विदेश नीति से संबंधित कोई सिद्धांत आज तक नहीं बना. मनमोहन ने तो अपने कार्यकाल में विदेश नीति को और भी गर्त में पहुंचा दिया. मनमोहन सिंह के कुनबे में एक से ब़ढकर एक क्षत्रप हैं. पूर्व विदेश मंत्री एस.एम. कृष्णा ने संयुक्त राष्ट्र में अपने लिखित भाषण की जगह किसी दूसरे देश के विदेश मंत्री का भाषण पढ़ दिया. नये विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद को पता है कि सरकार चंद महीनों की ही है, इसलिए बहुत कुछ करने की गुंजाइश नहीं है. वे अक्सर विदेश दौरों पर ही रहते हैं, लेकिन नतीजा सिफर. मनमोहन सिंह की अकर्मण्य विदेश नीति के कारण भारत आज खुद वैश्‍विक मानचित्र पर अपनी पहचान खो चुका है. यही कारण है कि आज उत्तर में नेपाल से लेकर दक्षिण में मालदीव तक और पूरब में बांग्लादेश से लेकर पश्‍चिम में अफगानिस्तान तक भारत का पड़ोसी इलाका राजनीतिक अस्थिरता और बदलाव के दौर से या तो गुजर चुका है या गुजर रहा है.
मनमोहन ने अपने शासनकाल में अमेरिका का सर्वाधिक 10 बार दौरा किया. ब़डी बात यह है कि इतने अधिक दौरों के बाद भी आज अमेरिका भारत की तुलना में पाकिस्तान के अधिक करीब है और बहुत चालाकी से भारतीय बाजार का दोहन भी कर रहा है. अभी हाल ही में अपने अमेरिकी दौरे में मनमोहन ने पाकिस्तान को आतंकवाद का केंद्र बताया था. बदले में संयुक्त वक्तव्य में शरीफ और ओबामा ने भारत को बचपना छोड़ने और कश्मीर पर बातचीत करने की नसीहत दे डाली. देवयानी खोबरागडे के मामले ने अमेरिका के साथ हमारे संबंधों की पोल खोल ही दी है. एक वह समय था, जब भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने बिना अमेरिका की धमकियों की परवाह किए परमाणु परीक्षण किया और विश्‍व जनमानस को यह भलीभांति समझा दिया कि भारत को कोई भी देश कमजोर न आंके.


 

प्रधानमंत्री की असफलता

  • चीन के दौरे पर कई बार गए, लेकिन सीमा विवाद जस का तस.

अन्य मुद्दों पर भी गतिरोध बरकरार.

  • अमेरिका के दौरे पर 10 बार गए, लेकिन आज भी अमेरिका भारत के बदले पाकिस्तान को ज्यादा तरजीह देता है.
  • श्रीलंका, पाकिस्तान, मालदीव, नेपाल, थाईलैंड, बांग्लादेश, म्यांमार, अफगानिस्तान जैसे पड़ोसियों से तनाव बरक़रार रहा.
  • संयुक्त राष्ट्र का दौरा भी ख़ूब किया, लेकिन भारत को सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता नहीं दिला सके.
  • अधिकांश विदेशी दौरों पर विश्‍व समुदाय को विश्‍वास में नहीं ले सके कि भारत में वैश्‍विक नेतृत्व का गुण है.
  • 26/11 के दोषियों पर क़डी कार्रवाई के लिए पाकिस्तान पर वैश्‍विक दबाव नहीं बना सके और न ही आतंकवाद पर भारत की चिंता से पाकिस्तान को अवगत करा सके.
  • अफ्रीकी और लातिन अमेरिकी देशों के महत्व को नहीं समझ सके.

मनमोहन कहते हैं कि उनकी सरकार की सबसे ब़डी उपलब्धि अमेरिका से परमाणु करार है. क्या मनमोहन उस करार के बारे में बखान कर रहे हैं, जिस करार को अंजाम देकर हमने अपने परमाणु-कार्यक्रमों की स्वायत्ता खो दी. मनमोहन सिंह को यह नहीं भूलना चाहिए कि इस करार के कारण अमेरिकियों को हमने अपनी परमाणु-परिधि में घुसने का अधिकार दे दिया. परमाणु दुर्घटना के मौके पर हमने अमेरिकी शर्तों को भी मान लिया. इस करार के कारण भारत-ईरान गैस पाइपलाइन प्रभावित हुई. कई दूसरे विकासशील देशों के साथ कृषि और जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों पर भी इसका असर हुआ, क्योंकि ये देश सोचते हैं कि भारत के अमेरिका का अधीनस्थ साझेदार बन जाने से इनके हितों के साथ समझौता हुआ है. इन सब के बावजूद अभी तक अमेरिकी परमाणु-सौदा कारगर होना भी शुरू नहीं हुआ है. यह है मनमोहन सरकार की सबसे ब़डी विदेश नीति की सफलता, जिसे लेकर पिछले दिनों वे पत्रकारों के सम्मेलन में तारीफ करते नहीं थक रहे थे. पिछले दस वर्षों में अपने पड़ोस में पल रही अराजकता को भी मनमोहन सरकार टकटकी लगाए देखती रही. यही कारण है कि भारत के प्रति पाकिस्तान के दिलो-दिमाग में न तो डर बढ़ा और न ही प्रेम. कमजोर मनमोहन के इरादों और उनकी कायर सरकार के बारे में पाकिस्तान के नेताओं को पता चल गया है. वे समझते हैं कि इस सरकार से बात करने का कोई फायदा नहीं है. यही कारण है कि कभी पाकिस्तानी सैनिक हमारे सैनिकों का सिर कलम कर अपने साथ ले जाते हैं तो कभी सिर काटकर विडियो बनाते हैं तो कभी जेल में ही नृशंस हत्या कर देते हैं. सीमा पर आतंकवाद हावी है और शरीफ तालिबान के नुमाइंदे बने फिर रहे हैं. पाकिस्तान चीन और श्रीलंका के साथ एक ऐसा गठबंधन तैयार कर रहा है, जो भारत को घेरने में निर्णायक भूमिका निभाए. इस तरह से पाकिस्तान अपने नापाक हरकतों को अंजाम देता रहता है और हम पाक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की खिदमत में छप्पन भोग परोसते हैं और इस मेहमाननवाजी के बदले में नवाज शरीफ मनमोहन को देहाती औरत की उपाधि देते हैं. मतलब साफ है मनमोहन सिंह के 10 वर्षों के शासनकाल में पाकिस्तान सभी मोर्चों पर सफल रहा है और भारत पूरी तरह से विफल. मनमोहन सिंह और चीनी प्रधानमंत्री ली काचियांग के बीच कई दौर की मुलाकात हुई. हर बार चीन ने दोनों देशों के बीच सहयोग और दोस्ताना संबंध बनाए रखने के लिए अपनी प्रतिबद्धता जताई. भारत और चीन ने सीमा रक्षा सहयोग सहित विश्‍वास बहाली के लिए कई समझौते भी किए, लेकिन मनमोहन सरकार के चीनी विशेषज्ञ सीमा विवाद से निपटने में ज्यादा काबिलियत नहीं दिखा सके. आर्थिक मसले पर निर्यात की वस्तुओं को भी ब़ढाने में भारत सरकार असफल रही. पिछले साल भारत और चीन के बीच 67 अरब डॉलर का व्यापार हुआ और 2015 तक 100 अरब डॉलर तक के व्यापार का लक्ष्य है, लेकिन समस्या ये है कि व्यापार संतुलन भारत के पक्ष में नहीं है. पिछले साल भारत के खिलाफ व्यापारिक घाटा 41 अरब डॉलर का था, जिससे भारत को काफी चिंता है. हाल ही में चीनी प्रधानमंत्री ने इस असंतुलन को दूर करने का वादा किया था, लेकिन इस वादे पर आज तक अमल नहीं हुआ है. सही मायने में देखा जाए तो मनमोहन सरकार के 10 वर्ष चीन के साथ सीमा पर तनाव और उसे सुलझाने की कवायद में ही गुजर गया और समस्या जस की तस बनी रही.


अच्छा होता अगर पूर्व प्रधानमंत्रियों से सबक लेते

  • जब संसद में ब़डे और महत्वपूर्ण निर्णय लिए जा रहे होंे और जब देश आंतरिक कठिनाइयों से गुजर रहा हो तो ऐसे में प्रधानमंत्री का विदेश दौरे पर जाना कहीं से भी तर्कसंगत नहीं है. ऐसा करना प्रधानमंत्री द्वारा अपनी जिम्मेदारियों से मुुंह मो़डने के समान है.
  • नेहरू, इंदिरा गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी अपने प्रधानमंत्रित्व काल में संसद सत्र के दौरान कभी विदेश दौरे पर नहीं गए.
  • जब गुजरात में दंगा हुआ तो देश के आंतरिक हालात को देखते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अपना विदेश दौरा रद्द कर दिया था और उस समय के विदेश मंत्री यशवंत सिन्हा को ऑस्ट्रेलिया भेजा था.

पैसे खर्च होते रहे, मनमोहन सिंह घूमते रहे

  • 2012 में जी-20 और रियो प्लस 20 सम्मेलनों में भाग लेने के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सात दिन की यात्रा पर मेक्सिको और ब्राजील गए, जहां 26.94 करो़ड रुपये खर्च हुआ.
  • परमाणु सुरक्षा सम्मेलन, ब्रिक सम्मेलन और इब्सा सम्मेलनों में भाग लेने के लिए प्रधानमंत्री 2010 में अमेरिका और ब्राजील गए. उनके इस यात्रा पर कुल खर्च आया 22.7 करो़ड रुपया.
  • अटल बिहारी वाजपेयी अपने 5 साल के कार्यकाल में कुल 35 विदेश दौरे किए, जिस पर कुल खर्च आया 185 करो़ड रुपया.
  • हाल ही में मनमोहन अमेरिकी दौरे पर गए. ओबामा से उनकी मुलाकात औपचारिकता मात्र बन कर रह गई और वे ओबामा से कुछ भी हासिल नहीं कर पाए, जबकि आतंकवाद सहित कई बिन्दु ऐसे थे, जिस पर भारत के लिए अमेरिका का समर्थन और विश्‍वास जरूरी था.

अफगानिस्तान भारत का अच्छा मित्र हो सकता है, लेकिन मनमोहन सरकार की अफगानिस्तान पर कोई स्टैंड नहीं होने के कारण इस देश की गुत्थी उलझती ही जा रही है और भारत सरकार है कि अमेरिकी इशारे के बिना दो कदम नहीं चल सकती. मनमोहन सरकार की अपनी कोई पहल नहीं है. मनमोहन सिंह की जगह अगर कोई दूसरा साहसी प्रधानमंत्री होता तो वह अफगानिस्तान को भारत-पाक मैत्री का सेतु बना सकता था.
मालदीव की आबादी मात्र सा़ढे तीन लाख है. जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे, उस समय श्रीलंका से आए अस्सी तमिल अतिवादियों ने मालदीव के तत्कालीन राष्ट्रपति मॉमून अब्दुल गयूम की सत्ता पलटने का प्रयास किया था, जिसे राजीव गांधी ने ऑपरेशन कैक्टस के माध्यम से विफल करार दिया था. इससे अच्छी भारतीय कूटनीति क्या हो सकती थी, लेकिन आज मनमोहन सिंह मूकदर्शक बन कर अबला की तरह मालदीव की ओर देख रहे हैं, जो बेहद शर्मनाक है. मनमोहन सिंह से पहले भारत के इतिहास में ऐसा कमजोर प्रधानमंत्री कभी नहीं हुआ होगा, जो तमिल पार्टियों के डर से कोलंबो नहीं गए. श्रीलंका के मसले पर ऐसा कर के मनमोहन ने विवेकशून्य होने का परिचय दिया. श्रीलंका अपने विवेक से काम नहीं कर रहा है, बल्कि इसके पीछे चीन और पाकिस्तान की रणनीति काम कर रही है. आने वाले दिनों में यह सम्भव है कि अभी तक जो आतंकवाद काश्मीर और नेपाल की तरफ से रिसकर आ रहा था, अब श्रीलंका की तरफ से आ सकता है. मनमोहन ने कोलकाता सरकार के दबाव में आकर बांग्लादेश सरकार से जल-संधि स्थगित कर दिया था. मनमोहन सरकार की ऐसी दब्बू विदेश नीति भला किस समस्या का समाधान करेगी.
भारत के प्रति नेपाल का रवैया निराशाजनक रहा है. नये साल पर नेपाल के भूतपूर्व नरेश ज्ञानेंद्र परिवार समेत भारत आए हुए थे, लेकिन मनमोहन सरकार से कुछ अच्छे करने की आशा बेकार ही है. चीन चाहता है कि भारत की पक़ड नेपाल पर ढीला हो जाए. यही कारण है कि चीन नेपाल में भारत विरोधी माहौल तैयार करने में लगा हुआ है. कोशी नदी के बाढ़ का मामला हो या पशुपतिनाथ मंदिर का मामला, नेपाल भारत की ओर अब आशा भरी निगाहों से नहीं देखता. जिस तरह से चीन नेपाल में माओवाद को ब़ढावा दे रहा है, उससे भारत का परेशान होना स्वाभाविक है. चीन 1962 में भारत से युद्ध के बाद नेपाल को अपने सामरिक हितों के लिए महत्वपूर्ण मानने लगा, इसीलिए वह नेपाल को भारी पैमाने पर हथियारों की सप्लाई करता रहा है. माओवादी यह मानते हैं कि नेपाल की गरीबी का मुख्य कारण भारत है. नेपाल धीरे-धीरे चीन की गिरफ्त में आ रहा है और मनमोहन सरकार आज तक इस सत्य को समझ नहीं सकी. भारत सरकार इन वर्षो में नेपाल की जनता को विश्‍वास में लेकर कोई रणनीति नहीं बना सकी. भारत को चाहिए था कि सुनियोजित तरीके से नेपाल को अपने प्रभाव में रखे और चीन के नेपाल पर प्रभाव को कम करे, लेकिन यह सब मनमोहन सरकार नहीं कर सकी.


 

15वां लोकसभा सत्र और मनमोहन सिंह का विदेश दौरा

  •  15वीं लोकसभा का दूसरा सत्र 2 जुलाई से 7 अगस्त 2009 तक चला. इस सत्र के दौरान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इटली, फ्रांस और इजिप्ट की यात्रा पर रहे.
  •  तीसरा सत्र 19 नवंबर से 18 दिसंबर 2009 तक चला. इस सत्र के दौरान प्रधानमंत्री त्रिनिदाद और टोबैगो, अमेरिका, रूस और डेनमार्क की यात्रा पर रहे.
  •  चौथा सत्र 22 फरवरी से 7 मई 2010 तक चला. इस दौरान मनमोहन सउदी अरब, भूटान, ब्राजील और अमेरिका की यात्रा पर रहे.
  •  छठा सत्र 9 नवंबर से 13 दिसंबर 2010 तक चला. इस सत्र के दौरान मनमोहन दक्षिण कोरिया, बेल्जियम और जर्मनी की यात्रा पर रहे.
  •  आठवां सत्र 1 अगस्त से 8 सितंबर 2011 तक चला. इस दौरान मनमोहन सिंह बांग्लादेश की यात्रा पर रहे.
  •  नौवां सत्र 22 नवंबर से 21 दिसंबर 2011 तक चला. इस सत्र के दौरान रूस के मास्को की यात्रा पर गए थे.
  •  दसवां सत्र 12 से 30 मार्च और 24 अप्रैल से 22 मई 2012 तक चला. सत्र के दौरान दक्षिण कोरिया की यात्रा पर रहे.
  •  ग्यारहवां सत्र 8 अगस्त से 7 सितंबर 2012 तक चला. इस सत्र के दौरान मनमोहन तेहरान और ईरान की यात्रा पर गए.
  •  चौदहवां सत्र के दौरान 5 अगस्त से 7 सितंबर 2013 तक चला. इस सत्र के दौरान रूस के सेंट पिटर्सबर्ग की यात्रा पर रहे.
  • 15वीं लोकसभा के सिर्फ पहले, पांचवे, सातवे, बारहवें और तेरहवें संसद सत्र के दौरान मनमोहन अपने देश में रहे.

आदर मांगने से नहीं, प्राप्त करने से मिलता है, लेकिन हर मोर्चे पर फेल हो चुके मनमोहन को इतिहास से उम्मीद है कि इतिहास उनके मूल्यांकन में कुछ उदारता का परिचय देगा. मनमोहन भूल जाते हैं कि इतिहास हमेशा उन्हीं लोगों को सम्मान देता है, जो अपने कारनामों से मिसाल कायम करते हैं. आखिर इतिहास उनके प्रति क्यों उदारता बरते? मनमोहन को भी इतिहास याद रखेगा, लेकिन उनका नाम भारत के प्रधानमंत्रियों की सूची में सबसे निचले पायदान पर होगा. काश, देश 10 साल बिना प्रधानमंत्री के होता.

मनमोहन सिंह की यात्रा पर खर्च

देश यात्रा  खर्च (रुपये में)
इटली 14,56,86,000
चीन और कजाकिस्तान 12,35,99,000
फ्रांस और इजिप्ट 11,20,57,000
यूएस, त्रिनिदाद और टोबैगो 23,27,41,000
डेनमार्क 10,69,28,000
सउदी अरब 13,41,30,000
अमेरिका और ब्राजील 22,70,33,000
दक्षिण कोरिया (2010 में) 11,65,23,000
दक्षिण कोरिया (2012 में) 30,47,03,000
मॉस्को (2009 में) 7,86,94,000
मॉस्को (2011 में) 8,61,24,000
बांग्लादेश 7,56,94,000
म्यांमार 8,86,19,000
तेहरान 9,80,67,000
बेल्जियम और जर्मनी 14, 56,65,000

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