fbpx
Now Reading:
मुद्रा की शक्ति और उसकी मान्यता
Full Article 7 minutes read

मुद्रा की शक्ति और उसकी मान्यता

अपने लेनदारों को धोखा देने के लिए यह एक मार्ग है. अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में स्वीकार कर लिया गया है कि अपनी करेंसी यानी नोट छापने की मशीनें तेज़ कर दें. समझ में नहीं आता कि इस तरह मानसिक रूप से एक रुपये को एक हज़ार मान लेने से क्या फर्क़ पड़ने वाला है? जो वस्तु पहले एक रुपये में मिलती थी, वही एक हज़ार में मिलने लगेगी. फर्क़ स़िर्फ क़र्ज़ चुकाने में पड़ेगा. इसी तरह जो देश लेनदार हैं, वे भी अपने देनदारों से ज़्यादा वसूल करने के लिए अपनी करेंसी घटा लेते हैं यानी जितने नोट छपे हुए चलन में हैं, उन्हें कम कर देते हैं. पहली परिस्थिति को मुद्रा स्फीति यानी फुगावा कहते हैं, दूसरी को मुद्रा अवस्फीति यानी संकोच कहते हैं. दोनों ही तरह की हरकतें ईमानदारी की नहीं हैं. ये बेईमानी की ही बातें हैं. जिस देश की आर्थिक नीति ने फुगावा या संकोच किया, वह देश बेईमान की श्रेणी में ही माना जाएगा. अतएव विश्व में अपनी या अपने राष्ट्र की सच्ची क़ीमत बनानी है, उचित मूल्यांकन कराना है तो आप अपनी मुद्रा का मूल्य स्थिर करिए, स्फीति या अवस्फीति नहीं होनी चाहिए. इसकी क़ीमत जहां तक हो, स्थिर होनी चाहिए.

भारत को आज़ाद हुए 12 साल बीत गए. इन 12 वर्षों में 5 या 6 वित्त मंत्री बदल चुके हैं. हर मंत्री की मुद्रा नीति भिन्न-भिन्न थी. पर हर्ष का विषय यह है कि अभी तक विश्व में भारत की आर्थिक नीति का डब्बा गुल नहीं हुआ है. हालांकि इन कुछ वर्षों में सरकार को स्फीति (फुगावा) की नीति कुछ मात्रा में अपनानी पड़ी है, पर चूंकि इसका भी एक निश्चित सिद्धांत है कि अमुक हद तक स्फीति निर्दोष ही नहीं, बल्कि विकास के लिए अत्यावश्यक भी है. भारत की परिधि उस सीमा के बाहर नहीं गई है और कोई खतरे की बात नहीं हुई. मुद्रा स्फीति कितनी और क्यों उपादेय है? यह एक स्वतंत्र विषय है, जिस पर विश्व के अर्थशास्त्रियों में भारी मतभेद है, पर प्रस्तुत पुस्तक का ध्येय मुद्रा की समस्याओं में घसीटने का नहीं है. इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि काग़ज़ के रुपये (नोट) भी उसी तरह से न्यूनाधिक हो सकते हैं, जिस तरह से प्राचीन काल में रुपयों में चांदी कम-अधिक कर दी जाती थी. यह बताना कि भारत के लिए कितने नोट पर्याप्त हैं, बड़ी मुश्किल बात है. पहले यह देखिए कि नोट चाहिए ही क्यों!

Related Post:  दिल्ली एयरपोर्ट पर रोके गए थे शाह फैसल, अब हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार से मांगा जवाब

जिस देश में बैंक पूर्ण रूप से विकसित न हुए हों, वहां ज़्यादा नोटों के लेन-देन की आवश्यकता होती है, नहीं तो ज़्यादातर हिसाब-किताब, लेन-देन चैकों से ही होता है. मान लीजिए, आपने पांच हज़ार रुपये का सामान खरीदा है और पांच हज़ार एक सौ रुपये का बेचा है. तो वास्तव में एक सौ का ही नोट समझना चाहिए. बाक़ी पांच हज़ार का तो आपने चैक दे दिया. वही चैक आपको वापस मिल गया. यह सब तब होता है, जब आप सामान उसी आदमी से खरीदते हैं, जिसको आपने सामान बेचा भी है. अगर आप एक ही से सामान नहीं भी लेते-बेचते हैं, अलग-अलग आदमियों से व्यवहार करते हैं तो भी खरीदार और विक्रेता सबके खाते एक ही बैंक में हों तो सब अपने-अपने चैक बैंक में डाल देंगे. किसी को कुछ भी न देना पड़ेगा, न लेना पड़ेगा.

भारत को आज़ाद हुए 12 साल बीत गए. इन 12 वर्षों में 5 या 6 वित्त मंत्री बदल चुके हैं. हर मंत्री की मुद्रा नीति भिन्न-भिन्न थी. पर हर्ष का विषय यह है कि अभी तक विश्व में भारत की आर्थिक नीति का डब्बा गुल नहीं हुआ है. हालांकि इन कुछ वर्षों में सरकार को स्फीति (फुगावा) की नीति कुछ मात्रा में अपनानी पड़ी है, पर चूंकि इसका भी एक निश्चित सिद्धांत है कि अमुक हद तक स्फीति निर्दोष ही नहीं, बल्कि विकास के लिए अत्यावश्यक भी है. भारत की परिधि उस सीमा के बाहर नहीं गई है और कोई खतरे की बात नहीं हुई. मुद्रा स्फीति कितनी और क्यों उपादेय है? यह एक स्वतंत्र विषय है, जिस पर विश्व के अर्थशास्त्रियों में भारी मतभेद है, पर प्रस्तुत पुस्तक का ध्येय मुद्रा की समस्याओं में घसीटने का नहीं है.

मान लीजिए, आप सबके खाते अलग-अलग बैंकों में हैं तो भी चैकों से सबका ब्योरेवार हिसाब रोजाना बनकर बैंक की आपस की एक या दो एंट्री में सारा लेन-देन भुगत जाता है. खाली जो बेशी या कमी होती है, उसी का भुगतान होता है. यह सब बैंकों के एक समायोजन गृह के मा़र्फत होता है. यह ज़्यादा-थोड़ी रक़म, जिसका भुगतान करना पड़ता है, वह भी क्यों किया जाए, यह सिरदर्द बना रहता है. इसको भी हटाने के लिए सबने अपने-अपने खाते रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया में खोल रखे हैं, जिससे सबके नामे-जमा के इंद्राज रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की बहियों में किए जाते हैं. कहने का मतलब यह है कि बंबई जैसे शहर में रोज़ाना करोड़ों रुपयों के लेन-देन होते रहने के बावजूद एक रुपये के करेंसी नोट की भी आवश्यकता नहीं पड़ती. तो फिर कितने नोट होने चाहिए? अगर इसी तरह रिजर्व बैंक के नामे-जमा ही करना है, तो नोटों का करना ही क्या है? क्यों कम-ज़्यादा छाप रहे हैं.

Related Post:  धारा 370 बोले PM मोदी, कश्मीर हमारा आंतरिक मसला, सोच-समझकर लिया गया है फैसला

जैसा कि पहले कह आए हैं, बैंकिंग, बिजनेस, पूर्ण विकास किसी देश में हो ही नहीं सकता. भारत में तो यह बहुत ही पिछड़ा हुआ है. द्वितीय महायुद्ध के पहले भारत और पाकिस्तान के संयुक्त राज्य के लिए 4 अरब रुपयों के करेंसी नोट पर्याप्त माने जाते थे. आज खाली भारत के लिए ही 20 अरब रुपयों की करेंसी पर्याप्त नहीं है. क्या यह सब मुद्रा स्फीति है? नहीं. स्फीति का अर्थ खाली नोट ज़्यादा छापना ही नहीं है. बिना कारण, तदनुरूप धन की वृद्धि हुए बिना नोट छाप देना ही मुद्रा स्फीति है. भारत की आर्थिक या औद्योगिक व्यवस्था विकास के मार्ग पर अग्रसर हो रही है. अत: जैसा अर्थ तंत्र है, उसमें उसी अनुपात से नोटों को बढ़ाना अनिवार्य सा बन जाता है. दूसरे देशों की अपेक्षा भारतीय करेंसी अब भी विश्व में न्यूनतम है. यहां अभी तक एक आदमी के पीछे 100 रुपये की भी करेंसी नहीं है, जबकि अमेरिका में एक आदमी के पीछे 2000 रुपये से भी अधिक है. इतनी ही करेंसी ग्रेट ब्रिटेन में प्रचलित है. ज्यों-ज्यों भारतीय नागरिकों का जीवन स्तर ऊंचा होगा, त्यों-त्यों यहां का वित्त बढ़ेगा. अनिवार्य रूप से यहां की करेंसी उसी अनुपात से बढ़ती रहेगी और इसको कम स्फीति नहीं कह सकेंगे. आज भी कई बुज़ुर्गों का कहना है कि हमें तो इन काग़ज़ के नोटों का भरोसा नहीं है, हम तो सोने या चांदी को ही द्रव्य मानेंगे. वे सोना-चांदी ही इकट्ठा करते हैं. यही कारण है कि इन धातुओं की क़ीमत दिनोंदिन इतनी ज़्यादा बढ़ती जा रही है. मेरी राय में यह भी मानव बुद्धि की एक सनक है, वरना सोना-चांदी धन क्यों और नोट धन क्यों नहीं?

Related Post:  आर्थिक मंदी ने तोड़ी मोदी सरकार की कमर, RBI ने खोला खजाना, 1.76 लाख करोड़ से होगी मदद 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Input your search keywords and press Enter.