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कोमा का क्वेश्चन मार्क
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कोमा का क्वेश्चन मार्क

19 साल तक कोमा में रहने के बाद रेलवे कर्मचारी ग्रेजबस्की जब होश में आए तो दुनिया देखकर उन्हें चक्कर आने लगे. 1988 में एक रेल हादसे में गंभीर रूप से घायल ग्रेजबस्की कोमा में चले गए थे. उस समय पोलैंड में कम्युनिस्ट सरकार थी. ग्रेजबस्की ने पोलैंड टीवी को बताया कि आज लोग एक यंत्र कान में लगाकर घूम रहे हैं, उससे बातें कर रहे हैं. ऐसी दुकानें खुल गई हैं, जिनमें हर तरह का सामान है. यह सब देखकर मेरा दिमाग़ घूमने लगा है. मैं जो देख रहा हूं, क्या वह सच है. 19 साल में दुनिया इतनी बदल गई कि वह हैरत में पड़ गए. उस समय खाद्यान्न समेत सारी चीजें राशन में मिलती थीं. दुकानों में स़िर्फ चाय और विनेगर बेचने की अनुमति थी. जनता को बोलने की छूट नहीं थी. ग्रेजबस्की कहते हैं, मैं जब कोमा में गया था, उस समय लाल झंडे पूरे शहर में लहरा रहे थे. आज लाल झंडा कहीं नहीं दिखता. वह अपने परिवारीजनों से पूछते हैं कि कहां चले गए ये लाल झंडे वाले. पोलैंड में लोकतंत्र की स्थापना हो गई है. ग्रेजबस्की लोकतंत्र को नहीं समझ पा रहे हैं. वह कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े हुए थे. घरवाले बमुश्किल उन्हें हाल के वर्षों में हुए बदलावों के बारे में समझा पा रहे हैं. उन्हें इस बात की बेहद ख़ुशी है कि अब हम जितना चाहें उतना मीट ख़रीद कर खा सकते हैं. उस समय मीट स़िर्फ राशन की दुकानों से मिलता था. ग्रेजबस्की के होश में आने की संभावना बहुत कम थी. इसके बावजूद डॉक्टर 19 साल से उनका इलाज कर रहे थे. पेट्रोल पंप देखकर वह हैरत में पड़ जाते हैं और कहते हैं कि अब तो पेट्रोल पंप जाओ और तेल ले लो. कोमा से पहले हालात ऐसे थे कि तीन-चार घंटे बाद ही पेट्रोल मिलता था. मोबाइल फोन देखकर वह बेहद प्रभावित हैं. ग्रेजबस्की कहते हैं, मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि लोग बात करते समय टहलते क्यों हैं, एक जगह खड़े होकर बात क्यों नहीं करते.

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