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राजनीति में उलझे नौकरशाह
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राजनीति में उलझे नौकरशाह

राजनीति के मल्लयुद्ध में नौकरशाहों का पक्ष लेना अक्सर उनके लिए ही घातक साबित होता है. पंजाब के दो वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों के खिला़फ मुकदमा दायर किया गया है. उन पर आरोप है कि मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल, उनकी पत्नी और बेटे सुखबीर बादल के खिला़फ आय से अधिक संपत्ति मामले में उन्होंने गवाहों को डराया-धमकाया और सबूतों के साथ छेड़छाड़ की. गौरतलब है कि बादल एवं उनके परिवारवालों को अदालत ने आरोपों से बरी कर दिया था, लेकिन ये दोनों पुलिस अधिकारी अब जांच एजेंसियों के निशाने पर हैं. दोनों अधिकारियों, एसपी (निगरानी) सुरिंदर पाल सिंह और डीआईजी बी के उप्पल ने बादल परिवार के खिलाफ मुकदमे का विरोध किया था. आश्चर्य की बात तो यह है कि पंजाब में इस तरह का यह अकेला मामला नहीं है. राज्य में भ्रष्ट बाबुओं की तो जैसे शामत आ गई है. राज्य के एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी और ट्रांसपोर्ट डायरेक्टर मनदीप सिंह भी सीबीआई की जांच के दायरे में आ गए हैं. उन पर पंचायत सचिवों की नियुक्ति में घालमेल का आरोप है. इस घोटाले में राज्य विधानसभा के स्पीकर निर्मल सिंह कहलान और 13 अन्य नौकरशाहों के भी शामिल होने का संदेह है. कोई आश्चर्य नहीं कि राज्य सरकार ने जांच के लिए सीबीआई के अनुरोध को ठुकरा दिया था. जांच एजेंसी ने इसके बाद गृह मंत्रालय का दरवाजा खटखटाया. हालांकि सीबीआई को घोटाले में शामिल सभी लोगों के खिलाफ जांच की अनुमति मिल गई है, लेकिन इससे सियासी गलियारों में राजनीति का खेल बंद होने की कोई संभावना नजर नहीं आती.

पीएमओ और सूचना आयोग में भिड़ंत

सूचना अधिकार कानून के तहत दर्ज की गई अर्जियों के चलते प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) केंद्रीय मंत्रियों की संपत्तियों का खुलासा करने को मजबूर भले हो गया हो, लेकिन नौकरशाही 2004 के पद्म पुरस्कारों से संबंधित जानकारियां सार्वजनिक करने के मामले में अभी भी रुकावट बनी हुई है. केंद्रीय सूचना आयुक्त ने इस साल अप्रैल में ही प्रधानमंत्री कार्यालय को उक्त जानकारियां उपलब्ध कराने का आदेश जारी कर दिया था, लेकिन यह अब तक नहीं हो पाया है. पीएमओ के रवैये से नाराज नए केंद्रीय सूचना आयुक्त ए एन तिवारी ने अब इस बाबत मंत्रालय की उपसचिव संयुक्ता रे को पत्र लिखा है.

नौकरशाही पर नजर रखने वाले लोगों के लिए पीएमओ के अधिकारियों का यह रवैया हैरान नहीं करता है. 2004 का यह मामला मौजूदा मनमोहन सिंह सरकार से सीधे संबंधित नहीं है, लेकिन यह बात किसी से छुपी नहीं है कि पद्म पुरस्कारों की सूची के साथ अक्सर छेड़छाड़ होती है और पीएमओ के अधिकारी अपनी मर्जी से नामों की कांट-छांट करते हैं, जिससे विवाद पैदा होते हैं. पीएमओ के मौजूदा आला अधिकारी भी अपने इस विशेषाधिकार को खोना नहीं चाहते और इसीलिए संबंधित दस्तावेज सार्वजनिक करने से लगातार बचने की कोशिश करते रहे हैं. लेकिन लाख टके का सवाल यह है कि पीएमओ केंद्रीय सूचना आयोग के आदेश की कब तक अनदेखी करता रहेगा? सवाल यह भी है कि क्या तिवारी पीएमओ से अपनी बात मनवाने में कामयाब होंगे? आखिर हाल ही में केंद्रीय सूचना आयुक्त का पद संभालने वाले तिवारी के लिए यह पहली बड़ी चुनौती हो सकती है.

1 comment

  • पीएमओ के सभी अधिकारीयों के संपत्ति की जाँच होनी चाहिए……पीएमओ में कई बेशर्म स्तर के भ्रष्ट और गद्दार अधिकारी कार्यरत हैं जिससे भ्रष्टाचार,अराजकता और कुव्यवस्था का पूरे देश में बोलबाला है…ये बेशर्म अधिकारी सर्वोच्च न्यायलय के निर्णयों में भी हस्तक्षेप करतें हैं और उसे भ्रष्ट लोगों के पक्ष में प्रभावित कर देते हैं……इन सब की ब्रेनमेपिंग तथा लाई डिटेक्टर टेस्ट के जरिये नैतिकता और ईमानदारी की भी जाँच की जानी चाहिए…..शर्मनाक अवस्था है पीएमओ की…..

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