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जम्मू और कश्मीर : बाढ़ सरकार की अक्षमता उजागर कर गई

जम्मू और कश्मीर : बाढ़ सरकार की अक्षमता उजागर कर गई

kgsकश्मीर घाटी में भयानक बाढ़ के एक महीने बाद भी उसकी विनाशलीला दिखाई पड़ रही है. श्रीनगर का केंद्रीय व्यावसायिक क्षेत्र लाल चौक खंडहर जैसा दिखाई पड़ रहा है. हर तरफ टूटी-फूटी इमारतें, सड़कें देखने को मिल रही हैं. जहां तक निगाह जाती है बस कूड़ा-करकट और सड़ांध फैैली दिखाई पड़ती है. इस तरह की तबाही श्रीनगर के तकरीबन पचहत्तर फिसदी हिस्से में देखने को मिल रही है. शहर और देहात के विभिन्न क्षेत्रों में स्थापित सैकड़ों राहत शिविरों में हजारों बाढ़ प्रभावित लोग आज भी रह रहे हैं. जम्मू और कश्मीर सरकार ने बाढ़ से हुए नुक्सान का आकलन करते हुए कहा है कि तकरीबन एक लाख करोड़ की संपत्ति नष्ट हुई है. इस विनाशकारी बाढ़ की ज़द में आकर लगभग तीन लाख इमारतें ढह गई हैं, जिनमें ढाई लाख रिहाइशी मकान भी शामिल हैं. फिलहाल तो ऐसा लग रहा है कि आम कश्मीरियों को इस नुकसान की भरपाई करने में दशकों लग जाएंगे.
सबसे बड़ी विडंबना तो यह है कि सरकार ने न तो बाढ़ से पहले अपनी जिम्मेदारियां निभाई और न बाद में अपनी जिम्मेदारियों को निभाती दिख रही है. इस बात में कोई संदेह नहीं है कि अगर सरकार ने समय रहते उचित कदम उठाए होते तो शायद श्रीनगर के अधिकांश क्षेत्रों खासतौर पर व्यावसायिक दृष्टि से महत्वपूर्ण लालचौक को इस तबाही से बचाया जा सकता था. सच्चाई तो यह है कि राज्य में इस विनाशकारी बाढ़ की तबाहियों ने जहां उमर अब्दुल्लाह के नेतृत्व वाली सरकार की अयोग्यता को पूरी तरह बेनाकाब कर दिया है. वहीं इस प्राकृतिक आपदा ने राज्य के राजनीतिक परिदृश्य और विशेष रूप से और एक खास तरह की सोच में असाधारण बदलाव पैदा कर दिया है. कुछ एक अलगाववादी नेताओं को छोड़कर बाक़ी का नेतृत्व(लीडरशिप) इस बाढ़ में अपनी भूमिका निभाने में नाकाम साबित हुई. कश्मीरी नौजवानों और कई जगहों पर सेना के जवानों ने अपनी जान पर खेल कर हजारों बाढ़ प्रभावित लोगों की जान बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की. अब जाकर श्रीनगर और दूसरे प्रभावित क्षेत्रों में सिसकती ज़िन्दगियां बहाल होने की कोशिश कर रही हैं. सरकार की नाक़ामी आमजनों के लिए बहस का मुद्दा बनी हुई है.
दक्षिणी कश्मीर 7 सितम्बर को बाढ़ की चपेट में आ गया था. बाढ़ ने यहां जिस कदर तबाही मचाई थी उसे देखकर यह निश्‍चित तौर पर कहा जा सकता था कि बाढ़ का यह पानी श्रीनगर और घाटी के दुसरे क्षत्रों मेंभी पहुंचेगा और बड़े पैमाने पर तबाही मचाएगा. बावजूद इसके सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी रही. मुख्यमंत्री या सरकार का कोई पदाधिकारी इस बात का साफ-साफ जवाब नहीं दे पाता है कि सरकार ने समय रहते जनता को बाढ़ से पहले इसकी खबर देने में नाकाम क्यों हो गई? बाढ़ के पानी को दक्षिणी कश्मीर से श्रीनगर पहुंचने के दो दिन पहले सरकार ने बचाव की पहल क्यों शुरू नहीं की. लोग हैरान हैं कि बाढ़ की चपेट में आने वाले क्षेत्रों से लोगों को निकलने के लिए नौकाओं को तैयार क्यों नहीं रखा गया था? आपात सेवाओं को हरकत में क्यों नहीं लाया गया? साथ ही इन विभागों से जुड़े अफसरों और कर्मचारियों को ड्यूटी पर हाज़िर रहने का आदेश क्यों नहीं दिया गया. झेलम नदी में पानी का स्तर बढ़ते ही पुलिसकर्मी ड्यूटी छोड़कर कैसे और कहां भाग गए? शहर के अस्पतालों से मरीजों को सुरक्षित स्थानों पर क्यों नहीं ले जाया गया? जम्मू के एकमात्र बच्चों के अस्पताल में वेंटिलेटर पर मौजूद नवजात बच्चों को प्राथमिकता के आधार पर क्यों नहीं निकाला गया? दक्षिणी कश्मीर में बाढ़ आ जाने के बाद ज्यादातर मंत्रियों और अफसरों को अपने-अपने परिवार के साथ जम्मू क्यों भाग जाने दिया गया? झेलम के बांध को वहां से क्यों नहीं तोड़ा गया जहां बाढ़ आने से पहले ही बांध तोड़ने की रवायत रही है? बाढ़ के दौरान मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह को हेलीकॉप्टर से प्रभावित क्षेत्रों में रोटियां, बिस्किट, केले और पानी की बोतलें फेंकतें हुए देखा गया. आलोचकों का यह सवाल सही है कि क्या एक यह एक मुख्यमंत्री का काम है? जो काम एक पुलिसकर्मी कर सकता था उस काम को करने में मुख्यमंत्री ने अपना समय क्यों बर्बाद किया? उन्होंने बाढ़ से प्रभावित लोगों को बचाने के लिए दूसरी राज्यों से सहायता प्राप्त करने की कोशिश क्यों नहीं की? सच्चाई तो यह है कि सरकार ने बाढ़ से पहले और उसके बाद भी अपनी नाकामी के भरपूर सबूत दिए. हद तो यह है कि बाढ़ से हुई तबाही के एक महीना बीत जाने के बाद भी सरकार अभी तक यह बताने में नाक़ाम साबित हुई है कि घाटी में झेलम नदी में सामान्य रूप से बहने वाले 25 हजार क्यूसेक पानी की बजाय एक लाख 20 हजार क्यूसेक पानी कहां से आ गया? सरकार की उस समय की दयनीय स्थिति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि एक महीना बीत जाने के बाद भी यह ज्यादातर क्षेत्रों में पीने का साफ पानी और बिजली सप्लाई को बहाल करने में नाकाम साबित रही है. आज एक महीना बाद भी घाटी में कैंसर की दवाईयां उपलब्ध नहीं हैं. उमर अब्दुल्लाह के नेतृत्व वाली सरकार के पिछले 6 साल के कार्यकाल में कई ऐसी बातें हुईं जो सरकार को कमजोर और असफल साबित करने के लिए काफी हैं, लेकिन बाढ़ इस सरकार की अक्षमता को सतह पर ले आई. इस भयानक बाढ़ में इंसानी जिंदगियों को बचाने में अगर किसी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है तो वह कश्मीर का नौजवान और भारतीय सेना थी. आम कश्मीरी नौजवानों ने अपनी जान जोखिम में डालकर कई प्रभावित क्षेत्रों में जाकर लोगों को बचाया और उन्हें सुरक्षित जगहों तक पहुंचाया. कश्मीरी नौजवान पूरे जोश और मानवीयता के साथ बचाव कार्य जारी रखा. ठीक उसी तरह से फौज ने भी कुछ इलाकों में समय पर बचाव कार्य शुरू कर हज़ारों लोगों की जिंदगी बचाई. हालांकि फौज पर बचाव कार्य के दौरान आम कश्मीरियों के बजाय अपने जवानों और दूसरे राज्यों के मजदूरों और सैलानियों को प्राथमिकता देने के आरोप लगाए जा रहे हैं, बावजूद इसके इस सच्चाई से कोई इनकार नहीं कर सकता कि सेना की त्वरित कार्यवाही की वजह से हजारों लोगों की जान बाढ़ में बह जाने से बच गई.
सात सितंबर को श्रीनगर में बाढ़ का पानी घुसने के साथ ही यहां तैनात फौज की 15 वीं कोर के उच्चाधिकारियों की एक मीटिंग हुई. इसके बाद फौज को फौरन बचावकार्य शुरू करने का आदेश दिया गया. फौज ने नेशनल डिजास्टर रिलीफ फोर्स( राष्ट्रीय आपदा मोचन बल) की सहायता से दूसरे राज्यों के सैड़कों लोगों को दिल्ली, जम्मू और चंडीगढ़ पहुंचा दिया. श्रीनगर के हमहमा वायुसेना स्टेशन में हजारों बाढ़ प्रभावितों को पनाह दी गई. कुल मिलाकर सेना ने इस भयानक बाढ़ में आवाम के लिए एक बेहतरीन काम किया. कई अलगववादी नेता भी शहर के विभिन्न क्षेत्रों में आवाम की मदद करते और लोगों को बचाते दिखे, लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि अलगाववादी नेताओं में से कई सहायता सामग्री बांटते हुए फोटो खिंचवाने का कोई मौैका नहीं छोड़ना चाहते थे. इस तरह की तस्वीरें सोशल नेटवर्किंग साइट पर अपलोड की जा रहीं थी और स्थानीय अखबारों में छपने के लिए भेजी जा रहीं थीं.

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