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यूक्रेन की क्रांति और क्रीमिया संकट
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यूक्रेन की क्रांति और क्रीमिया संकट

क्रीमिया जल रहा है और दुनिया भर के देश अपनी दादागीरी में मस्त हैं. क्रीमिया संकट की शुरुआत से ही तनाव कम करने और शांतिपूर्ण रास्ता तलाशने के लिए सभी पक्षों से प्रत्यक्ष एवं रचनात्मक वार्ता का प्रयास होना चाहिए था, लेकिन वर्तमान हालात देखकर यह साफ़ हो जाता है कि विश्‍व पटल पर इस देश को लेकर हाल में जो घटनाएं हुई हैं, उन्होंने केवल इस देश का संकट बढ़ाने का ही काम किया.

nnnnnक्रीमिया 18वीं सदी से रूस का हिस्सा रहा है, लेकिन 1954 में तत्कालीन रूसी नेता ख्रुश्‍चेव ने भेंट के तौर पर क्रीमिया यूक्रेन को दे दिया था. ताजा हालात बताते हैं कि 2014 की शुरुआत में यूक्रेन की राजधानी कीव में सरकार विरोधी प्रदर्शन हुए, जिनमें सैकड़ों लोग हताहत हुए. फलस्वरूप तत्कालीन राष्ट्रपति विक्टर यानुकोविच को अपदस्थ करके एलेक्जेंडर तुर्चिनोव को कार्यकारी राष्ट्रपति बनाया गया, लेकिन इसके बाद घटनाक्रम ने एक अलग ही मोड़ ले लिया, जब रूस ने यूक्रेन के क्रीमिया प्रायद्वीप में अपनी सेनाएं भेज दीं. दरअसल, यूक्रेन सरकार ने नवंबर 2013 में यूरोपीय संघ यूनियन के साथ होने वाले एक समझौते को रद्द कर दिया था. यह एक व्यापारिक समझौता था, जिसके रद्द होने और रूस के साथ जाने के बाद यूक्रेन की राजधानी कीव में सरकार विरोधी प्रदर्शन शुरू हो गए. बात यह थी कि अगर यह समझौता लागू हो जाता, तो यूक्रेन 28 देशों के यूरोपीय संघ में शामिल हो जाता और यह यूक्रेन की जनता को कतई बर्दाश्त नहीं था. इसलिए इसी के विरोधस्वरूप यूक्रेन की जनता सड़कों पर उतर आई और कीव में प्रदर्शन शुरू हो गए.

22 जनवरी को वहां उस वक्त हिंसा शुरू हो गई, जब सरकार ने राजधानी में हो रहे प्रदर्शन पर लगाम लगाने के लिए सख्त क़ानून लागू कर दिया, जिसके अंतर्गत सरकारी इमारतों तक जाने का रास्ता रोकने पर गिरफ्तारी का प्रावधान कर दिया गया और प्रदर्शनकारियों के हेलमेट या मास्क पहनने पर भी रोक लगा दी गई. पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हुई झड़प मेंे सैकड़ों लोग मारे गए और हजारों घायल हो गए. 26 फरवरी, 2014 को हथियारबंद रूस समर्थकों ने यूक्रेन के क्रीमिया प्रायद्वीप में संसद और अन्य सरकारी इमारतों पर कब्जा कर लिया. रूसी सैनिकों ने क्रीमिया के हवाईअड्डों, एक बंदरगाह एवं सैन्य अड्डे पर भी कब्जा कर लिया, जिससे रूस और यूक्रेन के बीच आमने-सामने की जंग जैसे हालात बन गए. 2 मार्च को रूस की संसद ने भी राष्ट्रपति पुतिन के यूक्रेन में रूसी सेना भेजने के निर्णय का अनुमोदन कर दिया.

इसके पीछे तर्क दिया गया कि वहां रूसी मूल के लोग बहुतायत में हैं, जिनके हितों की रक्षा करना रूस की ज़िम्मेदारी है. दुनिया भर में इस संकट से चिंता छा गई और कई देशों के राजनयिक अमले सक्रिय हो गए. अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा एवं उनके यूरोपीय सहयोगियों ने रूस के क़दम को अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के लिए ख़तरा बताया. अन्य देशों द्वारा भी इस संदर्भ में रूस से अपील की गई. ताजा हालात यह हैं कि यूक्रेन की सेना ने क्रीमिया के सीमावर्ती इलाकों में अपना डेरा डाल दिया है. दूसरी ओर रूसी संसद ने यूक्रेन में फौज भेजने के प्रस्ताव को मंजूरी पहले ही दे दी है. यूक्रेन ने अपनी फौजों को युद्ध के लिए तैयार रहने को कहा है. यूके्रन के प्रधानमंत्री यात्सेन्युक ने तो यहां तक कह दिया है कि उन्हें उम्मीद है कि रूस अपनी सेना यूक्रेन में नहीं भेजेगा, क्योंकि इसका अर्थ होगा सीधे-सीधे युद्ध. इसके पहले यूक्रेन में सैनिक भेजने की अनुमति मांगते हुए रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने देश की संसद से कहा था कि रूसी सेना को तब तक यूक्रेन में तैनात रखा जाए, जब तक वहां के राजनीतिक हालात सामान्य नहीं हो जाते.

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सबसे बड़ी बात यह है कि रूस का एक विशाल नौसैनिक बेड़ा यूक्रेन के क्रीमिया प्रांत में पहले से ही मौजूद है. यूक्रेन पहले से ही क्रीमिया में सैन्य हलचल को लेकर बेहद गुस्से में है. यूक्रेन का कहना है कि मॉस्को यूक्रेन की नई सरकार को एक सैन्य संघर्ष के लिए मजबूर कर रहा है. दूसरी तरफ़ रूस के इस ़फैसले के पहले हाल मेंे अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने यूक्रेन में किसी तरह के सैन्य दखल के प्रति रूस को चेतावनी भी दी थी. बराक ओबामा ने कहा था कि रूस को सैन्य हस्तक्षेप की क़ीमत चुकानी पड़ सकती है. इन हालात से यह बात ज़रूर निकल कर सामने आ रही है कि अगर समय रहते कोई बीच का रास्ता न निकाला गया, तो यह स्थिति पूरे विश्‍व के लिए ख़तरनाक साबित हो सकती है.

क्या है विवाद

-यूक्रेन के राष्ट्रपति विक्टर यानुकोविच रूस समर्थक हैं, जिन्हें संसद ने गत 22 फरवरी को अपदस्थ कर दिया.

-संसद ने एक पश्‍चिम समर्थक सरकार नियुक्त की, जिसका मकसद 4.6 करोड़ की आबादी वाले यूक्रेन को यूरोपीय संघ के क़रीब लाना है.

हालांकि इसे किसी युद्ध की तैयारी के तौर पर न देखे जाने की बात कही जा रही है. यूक्रेन संकट शुरू होने के बाद ओबामा ने ब्रिटेन, जर्मनी, पोलैंड, फ्रांस, कनाडा, इटली, जापान, साइप्रस, रूस एवं चीन जैसे देशों के नेताओं से बात की. अमेरिकी उपराष्ट्रपति जो बाइडेन एवं विदेश मंत्री जॉन केरी भी यूक्रेन मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने में सक्रिय रहे हैं. जॉन केरी का कहना है कि यूक्रेन में रूसी सैन्य कार्रवाई गलत है. संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून ने फ्रांस, जर्मनी, इटली, तुर्की, ब्रिटेन, पोलैंड, यूरोपीय संघ, कनाडा एवं जापान के नेताओं से भी बातचीत की. संयुक्त राष्ट्र प्रमुख ने यूक्रेन में बढ़ते तनाव पर चिंता व्यक्त करते हुए विश्‍व के नेताओं से स्थायी और निष्पक्ष राजनीतिक समाधान की दिशा में काम करने को कहा है. मून ने यूक्रेन में तनाव और अविश्‍वास बढ़ने के मद्देनज़र अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की है कि वह स्थिति को सामान्य बनाने में मुख्य भागीदारों की मदद करे. यूक्रेन मसले पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सदस्य देशों की बैठकों का दौर जारी है. यूक्रेन के आग्रह पर एक अनौपचारिक बैठक का पिछले दिनों आयोजन किया गया, जिसमें संयुक्त राष्ट्र के प्रतिनिधि देश उपस्थित थे, लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि सुरक्षा परिषद अब तक इस संकट पर एक आम दृष्टिकोण बनाने में असफल रही है. मॉस्को सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य है और वह परिषद के किसी भी निर्णय को अपने वीटो के अधिकार से रद्द करने में भी सक्षम है. यूक्रेन में प्रतिद्वंद्वियों के प्रदर्शनों के साथ अलगाववादी तनाव बढ़ने के बीच रूस समर्थक कार्यकर्ताओं ने क्रीमिया में कीव समर्थक रैली में लोगों पर पिछले दिनों डंडों और कोड़ों से प्रहार किया.

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क्रीमिया में गतिरोध गहराने के चलते यूरोप एवं अमेरिका यूक्रेन के भविष्य को लेकर रूस के ख़िलाफ़ खड़े हो गए हैं. शीत युद्ध के बाद यह पूर्व एवं पश्‍चिम के बीच सबसे ख़तरनाक टकराव है. हालांकि क्रीमिया को लेकर रूस और अमेरिका सहित पश्‍चिमी देशों के बीच जारी गतिरोध पर अमेरिका ने नरमी के संकेत दिए हैं. अमेरिका ने कहा है कि वह क्रीमिया की वृहद स्वायत्तता का समर्थन करने को तैयार है, बशर्ते वह अहिंसक हो. अंतरिम प्रधानमंत्री अर्सेनी यातसेनयुक ने कहा है कि यूक्रेन अपनी भूमि का एक इंच भी मास्को को नहीं देगा. इससे पहले रूसी सेना एवं क्रेमलिन समर्थक बंदूकधारियों ने काला सागर प्रायद्वीप पर अपना कब्जा जमा लिया था. यूक्रेन का कहना है कि क्रीमिया उसका हिस्सा है और आने वाले दिनों में भी वह उसका अभिन्न हिस्सा रहेगा. क्रीमिया के रूस समर्थक चाहते हैं कि वह यूक्रेन से अलग होकर रूस में मिल जाए. दूसरी तरफ़ तनावपूर्ण माहौल के बीच रूसी सेना के ट्रक को जिस तरह से सेवास्तोपोल में घूमते देखा जा रहा है, उससे विवाद और अधिक बढ़ने की आशंका है.

विरोध प्रदर्शन क्यों

-राष्ट्रपति यानुकोविच ने रूस के साथ संबंधों को तरजीह देते हुए यूरोपीय संघ के साथ समझौता खारिज कर दिया था, जिसके बाद यूक्रेन में प्रदर्शन शुरू हो गए थे.

-संसद ने एक पश्चिम समर्थक सरकार नियुक्त की, जिसका मकसद 4.6 करोड़ की आबादी वाले यूक्रेन को यूरोपीय संघ के क़रीब लाना है.

कहा तो यहां तक जा रहा है कि रूसी ट्रक यूक्रेन के सैन्य अड्डे तक गया और कुछ देर घूमने के बाद वह वापस अपने सैन्य अड्डे पर चला गया. यूक्रेनी सेना के अधिकारियों ने इसे उकसाने वाला क़दम बताया है. रूस के इन क़दमों पर विश्‍व जगत ने गहरी चिंता व्यक्त की है. क्रीमिया संकट से उपजे तनाव के बीच यूरोपीय संघ और अमेरिका, दोनों ही रूस पर प्रतिबंध लगाने पर चर्चा कर रहे हैं. हालांकि यूरोपीय संघ और अमेरिका का यह क़दम आने वाले दिनों में विश्‍व के देशों के बीच तनातनी अधिक बढ़ाएगा. अमेरिका को लग रहा है कि यूक्रेन और रूस के बीच गतिरोध जस का तस बना हुआ है. दूसरी तरफ़ रूस पहले ही चेतावनी दे चुका है कि अगर उस पर प्रतिबंध लगाए गए, तो वह उसका कड़ा जवाब देगा. रूसी विदेश मंत्री ने कहा है कि रूस को यूक्रेन संकट के हिस्सेदार की तरह पेश नहीं किया जाना चाहिए. सेर्गेई लावरोव ने कहा कि हम विदेशी साझीदारों के साथ बातचीत के जरिये यूक्रेन के धड़ों को इस संकट से बाहर लाने में मदद करने को तैयार हैं. हालांकि हम इस विवाद में रूस को पक्ष बनाने की कोशिश को स्वीकार नहीं करेंगे. हालांकि अधिकतर जर्मन रूस पर आर्थिक प्रतिबंध लगाने के पक्ष में नहीं हैं.

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सर्वे में पाया गया है कि क्रीमिया में हालात बिगड़ जाने के बाद भी 38 फ़ीसद लोगों का यही मानना है कि रूस के रुख को बदलने के लिए आर्थिक प्रतिबंध सही क़दम नहीं है. ज़्यादातर लोगों का कहना है कि वे चांसलर मर्केल की उस नीति का समर्थन करते हैं, जिसके तहत इस मामले में रूस से ज़्यादा से ज़्यादा दूरी बनाई जा सके. जर्मन सरकार से वे इतनी ही उम्मीद करते हैं कि वह मॉस्को और कीव के बीच संपर्क स्थापित कराने में मदद करे और खुद पूरे मामले से दूरी बनाकर रखे. 77 फ़ीसद लोगों ने कहा कि वे रूस को जी-8 देशों की सूची से निकाल देने का समर्थन नहीं करते और 92 फ़ीसद लोगों का कहना था कि रूस के साथ राजनयिक संबंध खराब करने का सवाल ही खड़ा नहीं होता. जहां तक यूक्रेन को आर्थिक सहयोग देने की बात है, तो जर्मनी के 72 फ़ीसद लोग इसके पक्ष में हैं. केवल 12 फ़ीसद लोगों का ही मानना है कि जर्मनी को सैन्य कार्रवाई में यूक्रेन की मदद करनी चाहिए. 15 फ़ीसद लोगों ने कहा कि पुतिन एक विश्‍वसनीय नेता हैं, जबकि अन्य का कहना है कि रूस के हित में पुतिन किसी भी हद तक जा सकते हैं.

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