fbpx
Now Reading:
औषधीय पौधों की तस्‍करी

प्राकृतिक वन संपदाओं से संपन्न पूर्वोत्तर के राज्यों में वन क़ानून की ढिलाई और प्रशासनिक व्यवस्था दुरुस्त न होने के कारण वन औषधि भंडारों का चीन सहित अन्य पड़ोसी देश दोहन कर रहे हैं. असम, अरुणाचल, मेघालय एवं मिजोरम सहित क्षेत्र के अन्य राज्यों में एक अंतरराष्ट्रीय गिरोह सक्रिय है, जो हर वर्ष 15 से 20 करोड़ रुपये मूल्य की औषधीय वनस्पतियों की तस्करी करता है. उक्त बातों का खुलासा अभी हाल में औषधीय वनस्पतियों से जुड़े एक वैज्ञानिक ने किया है. वनस्पति वैज्ञानिकों की मानें तो इस इलाक़े से प्रतिदिन ट्रकों में लाद कर बहुमूल्य औषधीय वनस्पतियां म्यांमार और बांग्लादेश के रास्ते चीन, जर्मनी, ब्रिटेन एवं अमेरिका भेजी जाती हैं. इस काले कारोबार से जुड़े अंतरराष्ट्रीय गिरोह को कथित रूप से देश के कुछ औद्योगिक घरानों का भी सहयोग हासिल है. क्षेत्र के जंगली-पहाड़ी इलाक़ों में पाए जाने वाले औषधीय पौधों की पहचान स्थानीय आदिवासियों को नहीं होती और इसी का फायदा गिरोह के एजेंट उठाते हैं. वे आदिवासियों को थोड़े से पैसे देकर पौधे ख़रीद लेते हैं. अगर स्थानीय आदिवासियों को यह मालूम हो कि वे जो पौधे बेच रहे हैं, उनकी क़ीमत अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में काफी है तो शायद वे ऐसा न करें. इसके लिए वनांचल और पहाड़ी क्षेत्रों में जागरूकता अभियान चलाने की आवश्यकता है.

पूर्वोत्तर के कई राज्यों में संरक्षित वनांचल और बायोस्फेयर रिज़र्व को छोड़ कर सारे वन आदिवासियों की सामुदायिक संपत्ति होते हैं. हमें ऐसी पहल करनी होगी, ताकि हमारी जैव संपदा संरक्षित रहे और आदिवासियों को उसका अधिक लाभ भी मिले. अभी हाल में एक रिपोर्ट आई है कि भारत के पहाड़ी और जंगली इलाक़ों में उपलब्ध तीन सौ से अधिक औषधीय वनस्पतियों की प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर है. अगर सरकार इनके संरक्षण की दिशा में पहल नहीं करेगी तो आने वाले वर्षों में कई वनस्पतियां विलुप्त हो जाएंगी.

पूर्व राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम ने भी अपनी पूर्वोत्तर यात्रा के दौरान कहा था कि इस क्षेत्र को प्रकृति ने इतना कुछ दिया है कि अगर इसका सही तरीके से संरक्षण और उपयोग किया जाए तो यह इस क्षेत्र के साथ-साथ पूरे देश को आर्थिक रूप से समृद्ध बना सकता है. डॉ. कलाम का उक्त कथन वास्तव में विचारणीय है. प्राकृतिक संसाधनों को लेकर आज पूरा विश्व जागरूक है और इस दिशा में अनेक शोध कार्य भी चल रहे हैं, लेकिन भारत का रवैया अभी भी उदासीन है. पूर्वोत्तर के राज्यों में खनिज के साथ-साथ औषधीय एवं जैव संपदाओं की भरमार है. आज चिकित्सा विज्ञान में इन्हीं दुर्लभ औषधीय पौधों एवं वनस्पतियों से कई असाध्य रोगों की दवाएं विकसित की जा रही हैं. इन दवाओं का हमारे शरीर पर कोई प्रतिकूल असर भी नहीं पड़ता. योग गुरु बाबा रामदेव भी कहते हैं कि देश में प्रचुर मात्रा में औषधीय पौधे हैं, जिनमें अनेक रोगों को जड़ से मिटाने की क्षमता उपलब्ध है, लेकिन हमें ऐसे पौधों एवं वनस्पतियों की पहचान कर उन्हें संरक्षित करना होगा, ताकि उनका उपयोग किया जा सके. हमारी इस बहुमूल्य प्राकृतिक संपदा पर अब अनेक देशों की नज़र लग चुकी है और ऐसे पौधों-वनस्पतियों की तस्करी हो रही है. सरकार को इस पर तत्काल रोक लगानी चाहिए.

उल्लेखनीय है कि चिकित्सा के क्षेत्र में सबसे पुराना ग्रंथ चरक संहिता भारत में बहुत पहले से उपलब्ध हैं. माना जाता है कि इसकी रचना ईसा पूर्व एक हज़ार वर्ष पहले हुई थी. इस प्राचीन ग्रंथ में 340 से अधिक औषधियों के नाम दिए गए हैं, जिनकी प्राप्ति वनस्पतियों से होती है. इनमें से अधिकतर वनस्पतियां हमारे आसपास मौजूद हैं, लेकिन हम उन्हें पहचान नहीं पाते. हमारे देश में सर्वाधिक प्रचलित चिकित्सा की एलोपैथिक प्रणाली में भी इन औषधीय पौधों एवं वनस्पतियों का उपयोग होता है. चिकित्सा विज्ञान से जुड़े कई संस्थान औषधीय वनस्पतियों से दवा बनाने की दिशा में शोध कर रहे हैं. इन शोधों से कई रोगों की दवाएं बनाने में कामयाबी भी हासिल हुई है. कई दवा कंपनियां औषधीय पौधों एवं वनस्पतियों की व्यवसायिक खेती भी शुरू कर चुकी हैं. केंद्र सरकार को चाहिए कि वह ऐसी पहल को प्रोत्साहित करे.

वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद के वैज्ञानिकों का मानना है कि आधुनिक चिकित्सा पद्धति में वनस्पतियों का दवाओं के रूप में उपयोग तो होता है, लेकिन आयुर्वेदिक पद्धति की तरह सीधे नहीं, बल्कि इन्हें पहले परिष्कृत किया जाता है. यह पद्धति जटिल और ख़र्चीली है. इसलिए आधुनिक चिकित्सा पद्धति में इन वनस्पतियों का उपयोग अधिक नहीं हो पाया है. वैसे केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय 90 के दशक में ही औषधीय पौधों की खेती को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं घोषित कर चुका है, लेकिन इसका असर वर्तमान में कहीं नहीं दिख रहा है. इस बीच भारतीय जैव संपदा पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों की भी वक्र दृष्टि पड़ने लगी है. अमेरिका सहित कई पश्चिमी देश भारतीय जैव संपदा पर डाका डालने की ताक में लगे हैं. ध्यान रहे कि बहुराष्ट्रीय कंपनियां पहले ही नीम, बासमती, हल्दी, करेला एवं गेहूं की एक विशेष किस्म को पेटेंट कराकर अपने इरादे स्पष्ट कर चुकी हैं. अब केंद्र सरकार ने भारतीय जैव संपदा का पूरा रिकॉर्ड एक प्राधिकरण को सौंपने का मन बनाया है, जो इन कंपनियों के इरादे पर सख्त नज़र रखेगा.

अनुमानतः इस समय पूर्वोत्तर के राज्यों समेत पूरे देश में 17 हज़ार से अधिक किस्म की वनस्पतियां हैं. इनमें से अधिकांश का उपयोग दवा के रूप में किया जाता है. बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने भारतीय वनस्पति की कई प्रजातियों पर दावा भी ठोंक रखा है. उदाहरण के तौर पर हल्दी को देखा जा सकता है. भारत के कड़े विरोध के बाद अमेरिका की एक कंपनी ने हल्दी पर लिए गए पेटेंट को छोड़ा. भारतीय वनस्पतियों पर लगी इन कंपनियों की नज़र को ध्यान में रखकर ही पेटेंट क़ानून 2002 संसद में पारित किया गया था. अब यह इंडियन बायो डायवर्सिटीज एक्ट बन चुका है. अब कोई भी विदेशी कंपनी भारत सरकार की इजाज़त के बग़ैर यहां की किसी भी वनस्पति पर शोध कार्य नहीं कर सकती. जैव संपदा से संबंधित क़ानून बन जाने से बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर तो किसी हद तक अंकुश लग गया है, लेकिन अब औषधीय पौधों एवं वनस्पतियों पर देशी-विदेशी तस्करों की निगाहें लग गई हैं. कुछ वर्ष पूर्व अरुणाचल विश्वविद्यालय में वनस्पति विज्ञान के एक प्राध्यापक ने कहा था कि अब छात्रों को वनस्पति दिखाने के लिए भी जंगलों में अंदर तक जाना पड़ता है. पहले विश्वविद्यालय परिसर एवं आसपास के क्षेत्रों में ही अनेक वनस्पतियां दिख जाती थीं. सुप्रीमकोर्ट ने जबसे जंगलों में पेड़ों की कटाई पर रोक लगा दी है, तबसे वनस्पति तस्करों का धंधा और भी बढ़ा है. कुछ रुपये किलो की दर पर ख़रीदी गई वनस्पतियां देश से बाहर भारी क़ीमत में बिकती हैं. इस धंधे में स़िर्फ तस्कर ही मालामाल होता है. पूर्वोत्तर के कई राज्यों में संरक्षित वनांचल और बायोस्फेयर रिज़र्व को छोड़ कर सारे वन आदिवासियों की सामुदायिक संपत्ति होते हैं. हमें ऐसी पहल करनी होगी, ताकि हमारी जैव संपदा संरक्षित रहे और आदिवासियों को उसका अधिक लाभ भी मिले. अभी हाल में एक रिपोर्ट आई है कि भारत के पहाड़ी और जंगली इलाक़ों में उपलब्ध तीन सौ से अधिक औषधीय वनस्पतियों की प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर है. अगर सरकार इनके संरक्षण की दिशा में पहल नहीं करेगी तो आने वाले वर्षों में कई वनस्पतियां विलुप्त हो जाएंगी.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Input your search keywords and press Enter.