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अग्नयाशय का कैंसर
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अग्नयाशय का कैंसर

page-10अग्नयाशय(पैन्क्रियस) पेट के पीछे और छोटी आंत (छोटी आँत का प्रारंभ) के पहले भाग के पास एक बड़ी ग्रंथि होती है. अग्नयाशय शक्तिशाली पाचन एन्जाइमों का रिसाव करता है. ये एन्ज़ाइम वसाओं, प्रोटीनों और कार्बोहाइड्रेट्स को पचाने में मदद करते हैं. अग्नयाशय हार्मोन-इंसुलिन और ग्लूकागॉन को रक्त में छोड़ते हैं. ये हार्मोन रक्त में ग्लूकोज़ स्तर को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.
अग्नयाशय का कैंसर संयुक्त राज्य अमेरिका में कैंसर से होने वाली मौतों के पांचवा सबसे बड़ा कारण है और भारत में लगातार बढ़ रहा है. अग्नयाशय के कैंसर का इलाज शुरूआत में मुश्किल है, क्योंकि इसके कोई खास लक्षण नहीं हैं. समयपूर्व जो लक्षण दिखते है उन्हें पहचानना मुश्किल है, क्योंकि ये सीधी अग्नयाशय के कैंसर का संकेत नही देते. क्योंकि अग्नयाशय शरीर में गहराई पर स्थित है और दूसरे अंगों के पीछे छुपा हुआ है, चिकित्सक नियमित जांच के दौरान देख या अनुभव कर नहीं सकते हैं. अग्नयाशय के कैंसर का पता अक्सर किसी विकसित चरण पर लगता है. इस स्थिति में यह बहुत तेजी से बढ़ता और फैलता है. अंतिम स्थिति में इसका इलाज करना कठिन है, जिसका परिणाम निम्न उपचार दरों में होता है. एक्सोक्राइन अग्नयाशय के कैंसर के ट्यूमर का सर्वाधिक प्रचलित प्रकार है. जो कोशिकाएं पाचन एन्जाइमों का रिसाव करती हैं वो अग्नयाशय के एक्सोक्राइन वाले भाग को बनाती हैं. अग्नयाशय के बाहरी रिसाव वाले के ज़्यादातर ट्यूमर प्रकृति में असाध्य होते हैं. अग्नयाशय के बाहरी रिसाव के ट्यूमर को एडीनोकार्सिनोमा कहते हैं. ये अग्नयाशय के लगभग 95% मामलों में पाए जाते हैं. अग्नयाशय के एडीनोकार्सिनोमा सामान्य रूप से अग्नयाशय की नलिकाओं से उत्पन्न होते हैं, लेकिन ये उन कोशिकाओं से भी विकसित हो सकते हैं जो अग्नयाशय के एन्ज़ाइम बनाती हैं.
एंडोक्राइन ट्यूमर जो कोशिकाएं हार्मोनों का रिसाव करती हैं वो अग्नयाशय के आंतरिक भाग (एंडोक्राइन) का निर्माण करती है. एंडोक्राइन ट्यूमर बहुत कम होते हैं. एंडोक्राइन ट्यूमर को खास तौर पर आइलेट कोशिका ट्यूमरों के रूप में जाना जाता है. आइलेट कोशिका के ट्यूमर भी कई प्रकार के होते हैं जिनको हार्मोन का रिसाव करने वाली कोशिकाओं के प्रकार के अनुसार विभाजित किया गया है. जिनसे वो उत्पन्न होते हैं. इंसुलिनोमा-उन कोशिकाओं से उत्पन्न होते हैं जो इंसुलिन बनाती हैं. ग्लूकागॉनोमा-उन कोशिकाओं से जो ग्लूकागॉन का रिसाव करती हैं. गैस्ट्रिनोमा – उन कोशिकाओं से जो गैस्ट्रिन (हार्मोन मुक्तिकृत द्वारा पेट) बनाती हैं. सोमेटोस्टेटिनोमा-उन कोशिकाओं से जो सोमेटोस्टेटिन बनाती हैं. वीआईपीओमा -उन कोशिकाओं से आते हैं जो वैसो सक्रिय आंत्रिय पैप्टाइड (वी आई पी) बनाती हैं. ये ट्यूमर यदि हार्मोनों का रिसाव करते हैं तो उन्हें काम करने वाले के रूप में और यदि रिसाव नहीं करते हैं तो उन्हें काम न करने वाले के रूप में जाना जाता है. अधिकांश काम करने वाले आइलेट कोशिका ट्यूमर बिनाइन यानी सुसाध्य होते हैं, जबकि काम न करने वाले ट्यूमरों के मलिगनेंट (असाध्य) होने की ज्यादा संभावना होती है. इन ट्यूमरों का उपचार ट्यूमर के विशिष्ट प्रकार और उसके विकसित होने के चरण पर निर्भर करता है.
कैंसर एक बहुकारकीय रोग है. जोखिम वाले कारकों का होना या नहीं होना इसके होने की अकेली वजह नहीं है. कुछ आदतों से बच कर और स्वस्थ जीवनशैली को अपनाकर कैंसर होने की संभावनाओं को कम किया जा सकता है.

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अग्नयाशय का कैंसर होने की संभावना 40 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में ज्यादा होती है. धूम्रपान करने वाले लोगों में न करने वालों की तुलना में अग्नयाशय का कैंसर होने की संभावना अधिक होती है. सिगरेट पीना इसका सबसे प्रबल और जोखिम वाले कारकों में से एक है. सिगरेट के धुंए में कार्सिनोजन एक बड़ी मात्रा में होता है. यह अग्नयाशय में कैंसर का सबसे प्रमुख कारण है. असंतुलित खानपान से भी इसका खतरा रहता है.मांस, कोलेस्ट्रॉल, तला हुआ भोजन और नाइट्रोज़एमाइनों की अधिक मात्रा वाले आहार अग्नयाशय के कैंसर का जोखिम बढ़ा सकते हैं. फल और सब्ज़ियों का अधिक मात्रा में सेवन करने से इसका खतरा कम होता है. कुछ समय पहले के शोध से ये बात भी सामने आई है कि मोटापा और व्यायाम न करना भी इस कैंसर के कारणों में से एक हो सकता है. अग्नयाशय का कैंसर पुरुषों में महिलाओं से डेढगुना ज्यादा होने की संभावना होती है. लेकिन महिलाओं के बीच तंबाकू के बढ़ते इस्तेमाल की वजह से आंकड़ों में बदलाव हो रहे हैं और महिलाओं में भी इसका जोखिम बढ़ रहा है. यह बीमारी वंशानुगत भी होती है. अग्नयाशय के कैंसर वाले 10 प्रतिशत रोगियों में यह रोग वंशानुगत कारणों से होता है. पर्यावर्णीय कारक अग्नयाशय के कैंसर की संभावना को काफी बढ़ाते हैं. कैंसर के कारणों एसबेस्टस, रासायनिक दवाएं, डाय और पैट्रोरसायनों का कैंसर के साथ संबंध रहा है अग्नयाशय की दीर्घ-कालिक जलन को अग्नयाशय के कैंसर से जोड़ कर देखा जाता है. आनुवांशिक पैंक्रियाइटिस का अग्नयाशय का कैंसर विकसित होने की संभावना अधिक होती है. मधुमेह को भी अग्नयाशय के कैंसर से जोड़ कर देखा जाता है. मधुमेह अग्नयाशय के कैंसर का एक लक्षण होता है, और यह अग्नयाशय का कैंसर के जोखिम को बढ़ा भी सकता है. किसी बीमारी की वजह से जिन रोगियों के पेट का एक भाग निकाल दिया जाता है (अर्थात आंशिक गैस्ट्रैक्टॉमी) ऐसे लोगों में अग्नयाशय के कैंसर होने की संभावना अधिक होती है, इसमें पेट में दर्द होता है यह दर्द ट्यूमर के बढ़ने के कारण होता है. जो इसे आसपास के अंगों के विरुद्ध ज्यादा जगह लेने की कोशिश करता है और धक्का लगाता है इस कारण दर्द होता है. भोजन करने के बाद लेटे होने पर यह दर्द हो सकता है. इसमें भूख नहीं लगती है या भोजन करने की इच्छा नहीं होती है. या कहें भोजन से घृणा हो जाती है. इस वजह से वजन में कमी आती है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि कैंसर कोशिका स्वस्थ कोशिकाओं से पौष्टिक तत्वों लेने के लिए प्रतिस्पर्धा करती हैं. अग्नयाशय के ट्यूमर सामान्य रुप से पाचन क्रिया में हस्तक्षेप करते हैं, जो वज़न और घटा देता है. इस दौरान पीलिया हो जाता है, पित्त नलिका का अंतिम भाग अग्नयाशय के सिर के पीछे पर अग्नयाशय की नलिका के साथ जुड़ता है और छोटी आंत के प्रारंभ (ड्यूओडेनम) में खाली होता है. जैसे अग्नयाशय के सिर में कोई ट्यूमर बढ़ता है पित्त नलिका अवरुद्ध हो जाती है. जब नलिका अवरोधित हो जाती है पित्त यकृत में लौट जाता है और रक्तप्रवाह में प्रवेश करता है जिससे आंखे और त्वचा पीली हो जाती है. क्योंकि पित्त पाचन नलिका में नहीं पहुंचता है, मल हल्के या मिट्टी के रंग का हो जाता है पीलिया मूत्र में पित्त इकट्ठा होने से इसका रंग सामान्य से गहरा हो जाता है.
बुखार, कंपकंपी, दस्त, डायबटीज, दस्त लगते हैं, दस्त अग्नयाशय के एन्जाइमों के अभाव के कारण से होते हैं, जो पाचन को प्रभावित करता है.
निदान
अग्नयाशय के कैंसर का निदान जांचों से किया जा सकता है जिनमें चिकित्सा परीक्षण, विभिन्न इमेजिंग तकनीक, रक्त परीक्षण और बायोप्सी प्रक्रियाएं शामिल हैं. मेडिकल हिस्ट्री वर्तमान स्वास्थ्य स्थिति, बताए गए लक्षणों, पिछली चिकित्सा समस्याओं, उपचार, परिवार की मेडिकल हिस्ट्री, जीवनशैली और धूम्रपान करना, तंबाकू चबाना, शराब पीना, आहार आदि आदतों की समीक्षा की जाती है. अल्ट्रासोनोग्राफ़ी, सीटी स्कैन,एमआरआई, पॉज़ीट्रॉन एमीशन टोमोग्राफ़ी (पीईटी) और पीईटी-सीटी (इमेजिंग), ईआरसीपी, बायोप्सी, रक्त परीक्षण की मदद से मरीज की स्थिति का आकलन किया जाता है. अग्नयाशय के कैंसर अधिकांशतः अग्नयाशय की नलिकाओं में पाए जाते हैं. अग्नयाशय की नलिका का एडीनोकार्सिनोमा सबसे अधिक प्रचलित प्रकार का अग्नयाशय का कैंसर है और सामान्य रूप से अग्नयाशय के सिर में पाया जाता है. ट्यूमर की कोई विशिष्ट आकृति नहीं होती है और यह आसपास के स्वस्थ ऊतकों में बढ़ता है, जिनमें पड़ोस में अग्नयाशय के ऊतक, रक्त वाहिकाएं और लिम्फ़ नोड्स शामिल हो सकते हैं. म्यूसिन असामान्य रूप से उच्च स्तर ट्यूमरों द्वारा उत्पादित किया जाता है.
उपचार
अग्नयाशय के कैंसर (कर्क रोग) का समयपूर्व चरणों में निदान करना कठिन है, और इस प्रकार से जिस समय तक कोई रोगी किसी चिकित्सक के पास जाता है और अग्नयाशय का कैंसर (कर्क रोग) के साथ निदानित किया जाता है तब तक रोग सामान्य रूप से फैल चुका होता है और निरोगकारी उपचार केवल कुछ रोगियों के लिए एक विकल्प है. केवल 10 से 15 प्रतिशत रोगियों को शल्यक्रिया का प्रस्ताव दिया जा सकता है. शल्यक्रिया एकमात्र तरीका है जो कैंसरीय ट्यूमर को शरीर से बाहर हटा सकता है. लेकिन विकसित चरणों वाले रोगियों में
आपरेशन करना संभव नहीं होता है. क्योंकि कैंसर लिम्फ़ नोडों और अन्य दूरस्थ अंगों तक फैल जाता है. शल्यक्रिया कैंसर के उन रोगियों में संभव है जहां मुख्य रक्त वाहिकाएं, लिम्फ़ नोड और अन्य दूरस्थ अंग प्रभावित नहीं हैं. यदि एकदम बगल वाले ऊतक और लिम्फ़ नोड प्रभावित होते हैं, तो भी शल्यक्रिया अभी भी एक विकल्प हो सकता है क्योंकि प्रक्रिया के दौरान बगलवाले ऊतक को हटाया जा सकता है. विकसित चरणों में शल्यक्रिया रोगी को आराम देने और कैंसर की अन्य जटिलताओं को को कम करने के लिए की जाती है. शल्यक्रिया का प्रकार कैंसर के चरण और स्थान पर निर्भर करता है. तीन प्रकार का ऑपरेशन अग्नयाशय के कैंसर के उपचार के लिए किया जाता है. पहला अग्नयाशय और छोटी आंत के प्रारंभिक भाग को काटना, दूसरा पॅन्क्रिएटेक्टॉमी (डिस्टल अग्नयाशय को काटना), पॅन्क्रिएटेक्टॉमी यानि पहली शल्यक्रिया में, ड्यूओडेनम (छोटी आंत के प्रारंभिक भाग), अग्नयाशय के सिर, पित्ताशय और पित्त नलिकाओं को हटा दिया जाता है. अवशिष्ट अग्नयाशय, पित्त नलिका और पेट को उसके बाद आंत से जोड़ दिया जाता है. यह शल्यक्रिया जटिल और तकनीकी रूप से संतोषजनक नहीं है इसलिए शल्यक्रिया की सफलता शल्यचिकित्सक की कुशलता और अनुभव और शल्यक्रिया के बाद की देखभाल पर निर्भर करती है. इसलिए पॅन्क्रिएटोड्यू ओडेनेक्टॉमी का इलाज उन चिकित्सालयों में करवाना ज़्यादा अच्छा है जहां ऐसी शल्यक्रिया बड़ी संख्या में की जाती हो.
पॅन्क्रिएटेक्टॉमी में डिस्टल अग्नयाशय को काट दिया जाता है कई मामलों में तिल्ली (स्प्लीन) को भी हटा दिया जाता है. यह शल्यक्रिया अग्नयाशय की पूंछ और शरीर में स्थित ट्यूमरों के लिए एक विकल्प है. पॅन्क्रिएटेक्टॉमी में तिल्ली (स्प्लीन) के साथ पूरे अग्नयाशय को हटा दिया जाता है. इस प्रकार की शल्यक्रिया अग्नयाशय के सिर और शरीर के ट्यूमरों के लिए की जाती थी, लेकिन पूरे अग्नयाशय को हटाने की प्रक्रिया में, आइलेट कोशिकाओं को नुकसान पहुंचता हैं. जो अग्नयाशय की एंडोक्राइनीय क्रिया पर भी असर डालता है. ऐसे लोगों मूं शर्करा स्तरों पर खराब नियंत्रण होता है और उनको जीवन भर इंसुलिन लेने की जरूरत हो सकती है.
आहार और पौष्टिक तत्व पर सुझाव
कम मात्रा में और बार-बार खाना खाएं
हल्का भोजन खाएं जिसको खाने और पचाने में आसान हो
अपनी पसंद का खाना खाएं
खाने में विटामिन और खनिज शामिल करें
उच्च वसा वाले भोजन से बचें
शराब पीना और धूम्रपान करना छोड़ दें
किसी आहार विशेषज्ञ से परामर्श लें
अपने चिकित्सक के सुझाव मानें और कोई दिक्कत हो तो उन्हें बताएं अग्नयाशय के कैंसर से बचने के लिए आहार और स्वस्थ जीवनशैली बहुत जरूरी है. जिन रोगियों के अग्नयाशय के कैंसर का इलाज किया गया है, उनके लिए कीमोथेरपी और रेडियोथेरपी के साथ थकान दूर करने के लिए व्यायाम लाभदायक है. जरूरत के मुताबिक सही व्यायाम करने से रोगी के लिए सामान्य सेहत पाना आसान हो जाता है. अग्नयाशय का कैंसर संक्रामक नहीं है और यह निकट संपर्क होने पर भी परिवार के सदस्यों को नहीं फैलता है. जब आप रसायन-चिकित्सा (कीमोथेरपी) या रेडियोथेरपी ले रहे होते हैं तब आपकी इम्युनिटी कम होती है. इसलिए सर्दी, खांसी, बुखार या किसी अन्य संक्रमण वाले लोगों के साथ संपर्क से बचना चाहिए. जिन बच्चों को कुछ समय पहले टीका लगाया गया है उनसे भी संक्रमण हो सकता है. अग्नयाशय के कैंसर वाले दस प्रतिशत रोगियों के संबंधियों मे भी रोग पाया गया है.

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