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भारत की भावी आर्थिक विदेश नीति
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भारत की भावी आर्थिक विदेश नीति

भारत की अर्थव्यवस्था बहुत ही नाजुक दौर से गुजर रही हैै, पिछले साल सकल घरेलू उत्पाद(जीडीपी)में पांच प्रतिशत की दर से बढ़ोत्तरी हुई है. ऐसे में नरेंद्र मोदी देश की कमान संभालने जा रहे हैं. उन्होंने विकास के मुद्दे पर चुनाव लड़ा और विजय हासिल की. वर्तमान में भारत अपनी अधिकांश जरूरतों के लिए विश्‍व की तीन सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं अमेरिका, चीन और जापान पर निर्भर है. ऐसे में मोदी की आथ्ििक विदेश नीति कैसी होगी ? दुनिया की तीन सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के साथ उनके संबंध कैसे होंगे? यह देखना बेहद दिलचस्प होगा…

page-11नरेंद्र मोदी के भारत के नए प्रधानमंत्री बनने की खबर आते ही दुनिया का देश के प्रति नज़रिया बदला-बदला दिखाई देने लगा है. पूरा विश्‍व भारत के आर्थिक परिदृश्य को लेकर बेहद आशावादी और सकारात्मक रुख अपना रहा है. दुनिया की तीन सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं (अमेरिका, चीन और जापान) भारत के साथ अपने संबंधों को लेकर बेहद गंभीर नज़र आ रही हैं. हर किसी की नज़र राष्ट्रवादी विचारधारा वाले नरेंद्र मोदी और मोदीनॉमिक्स कहलाने वाली आर्थिक विदेश नीति पर है. सभी अपने-अपने हिसाब से मोदी की संभावित आर्थिक नीतियों के बारे में अंदाजा लगा रहे हैं और अपने लिए मौका तलाश रहे हैं. मोदी की आथ्ििक विदेश नीति में दुनिया की तीन सबसे बड़ी आर्थिक ताकतों की क्या भूमिका होगी, यह देखना बेहद महत्वपूर्ण होगा. वर्तमान में भारत दुनिया का सबसे बड़ा बाजार है, किसी भी बड़ी अर्थव्यवस्था के लिए भारत के साथ अपने संबंधों को बेहतर बनाए रखना जरूरी हो गया है. भारत के साथ आर्थिक संबंधों को अनदेखा करके कोई भी देश किसी भी तरह का नीतिगत फैसला नहीं ले रहा है. भारत की भूमिका वैश्‍विक आर्थिक परिपेक्ष्य में लगातार बदल रही है. मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद इसमें इज़ाफा ही होगा. मोदी ने चुनाव प्रचार के दौरान गुजरात मॉडल को लोगों के सामने रखा. मोदी के मुख्यमंत्री रहते गुजरात ने 10 प्रतिशत की दर से तरक्की की है. गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने प्रदेश में उद्योगों की स्थापना के लिए सकारात्मक माहौल बनाया. जिससे निवेश में बढ़ोत्तरी हुई. फलस्वररूप गुजरात ने चहुंमुखी विकास किया, जिसकी बदौलत दुनिया में मोदी को एक विकास पुरुष के रूप में पहचान मिली. उन्होंने लेस गवर्नमेंट, मोर गवर्नेंस और नो रेड टेप, ओनली रेड कारपेट जैसी नीतियों पर काम किया. परिणाम स्वरूप दुनिया को आर्थिक मॉडल पर भरोसा हुआ. निवेशक गुजरात में निवेश करने के लिए आगे आए. वर्तमान में देश को ऐसी आर्थिक नीतियों की आवश्यकता है जो कि नीतिगत रूप से सही हो और सरकार के पास उसे क्रियान्वयित करने की क्षमता भी हो. ऐसा करके ही देश में निवेश के लिए सकारात्मक माहौल बनाया जा सकता है, साथ ही देशी-विदेशी निवेशकों को निवेश के लिए आकर्षित किया जा सकता है. मोदी इस तरह का काम गुजरात में कर चुके हैं.
गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी के जापान के साथ संबंध बेहद प्रगाढ़ रहे हैं. मोदी जापान को दूसरे देशों की तुलना में ज्यादा तरजीह देतेे हैं. वर्ष 2012 में मोदी जापान सरकार के आमंत्रण पर जापान की यात्रा पर गए थे. तब उन्होंने टोक्यो के अलावा नोगाया, कोब, ओसाका और हेमामत्सू आदि शहरों का दौरा बुलेट ट्रेन से किया था. अपने सफर के दौरान वे दुनिया के सबसे बड़े औद्योगिक क्षेत्र से गुजरे थे. वे जापान के आर्थिक और तकनीकी विकास की कहानी से बहुत प्रभावित हुए थे. मोदी जापान से इतना प्रभावित हैं कि वह भारत की ब्रैंडिंग जापान की तर्ज पर करना चाहते हैं. जो कि आज भी अपने उच्च गुणवत्ता वाले उत्पादों के लिए जाना जाता है. भारत का प्रधानमंत्री चुने जाने के बाद मोदी को जापान के प्रधानमंत्री शिंजो अबे ने जिस तरह ट्विटर पर बधाई दी और मोदी ने जिस तरह उन्हें धन्यवाद दिया उससे यह साबित होता है कि दोनों ही देशों के प्रधानमंत्रियों के व्यक्तिगत संबंध दोनों देशों को संबंधों को नए आयाम तक ले जाने में बेहद कारगर सिद्ध होंगे. मोदी ने अबे को बधाई देते हुए कहा कि आपके साथ काम करने का मेरा बेहतरीन अनुभव रहा है, मैं भारत और जापान के संबंधों को नई ऊंचाइयों तक ले जाने में आपका सहयोग करूंगा. इससे यह बात स्पष्ट तौर पर कही जा सकती है कि अगले पांच साल में जापान भारत का सबसे करीबी मित्र होगा.
नरेंद्र मोदी मोदी ओर शिंजो अबे के बीच कई विशिष्ट समानताएं हैं. पहली, दोनों ही राष्ट्रवादी विचारधारा के हैं. दूसरी, दोनों ही अपने-अपने देश की अर्थव्यवस्था को लेकर आशान्वित हैं. तीसरी, जिस तरह अबे अपनी आर्थिक नीतियों के बल पर जापान की सत्ता पर पूर्ण बहुमत के साथ आसीन होकर जापान के राजनीतिक अस्थिरता के दौर को खत्म किया, ठीक उसी तरह मोदी भी अपनी आर्थिक नीति और गुजरात मॉडल और विकास के मुद्दे पर 30 साल बाद देश की पहली पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने में सफल हुए. चौथा, अबे की आर्थिक नीतियों को अबेनॉमिक्स और मोदी की आर्थिक नीतियों को मोदीनॉमिक्स कहा जाता है. मोेदी और अबे दोनों को जानने वालों के अनुसार एक हद तक दोनों की आर्थिक और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर समझ एक जैसी है. खासकर एशिया में भारत और जापान के विकास और उनकी भूमिका को लेकर. दोनों चीन को लेकर चिंतित हैं, दोनों को लगता है कि चीन का एशिया में आधिपत्य बढ़ता जा रहा है. चीन का सामना करने के लिए दोनों देशों को नीतिगत तरीके से आगे बढ़ना होगा. गुजरात दंगों के संदर्भ में अमेरिका ने मोदी को लेकर जो रुख अपनाया था, उसने मोदी को लुक ईस्ट पॉलिसी की ओर रुख करने को मजबूर किया, इसी वजह से समय के साथ मोदी का रुझान जापान की ओर बढ़ता गया. मोदी की कुछ नीतियां जापान को प्रभावित कर सकती हैं, खासकर मोदी ने अपने भाषणों में आयरन अयस्क को लेकर जो बात कही है कि भारत आयरन अयस्क का निर्यात करता है और महंगी कीमत पर स्टील का आयात करता है. जापान भारत से लौह अयस्क आयात करने वाला सबसे प्रमुख देश है, यदि भारत ऐसा करता है तो इससे जापान की अर्थव्यवस्था पर इसका बड़ा प्रभाव पड़ेगा. हालांकि वर्तमान में भारत की स्टील निर्माण क्षमता बेहद कम है, इंफ्रास्टक्चर के निर्माण के लिए आवश्यक स्टील का देश में निर्माण नहीं हो पाता है. स्टील निर्माण क्षमता को बढ़ाने में भारत को अभी वक्त लगेगा. वर्ष 2012-13 में भारत-जापान के बीच द्विपक्षीय व्यापार 18.61 बिलियन अमेरिकी डॉलर का है. यह चीन और अमेरिका की तुलना में बेहद कम है. लेकिन आशा की जा रही है कि मोदी के कार्यकाल में इसमें तेजी से वृद्धि होगी. जापान पहले से ही भारत के इन्फ्रास्टक्चर विकास की कहानी में बेहद करीब से सहयोग करता रहा है, जिसमें 90 बिलियन अमेरिकी डॉलर से बन रहा दिल्ली-मुंबई औद्योगिक गलियारा भी शामिल है. मोदी अपने व्यक्तिगत समीकरणों के सहारे इससे ज्यादा सहयोग जापान से ले सकते हैं. शायद जापान भी इसी बात का इंतजार कर रहा है.
2002 में गुजरात में हुए दंगों को जेनोसाइड मानते हुए अमेरिका ने मोदी वीजा देने से इनकार कर दिया था. मोदी ने ओबामा के बधाई संदेश का जवाब देने में 48 घंटे से ज्यादा का समय लिया, इसे मोदी के कूटनीतिक कदम के रूप में देखा जा रहा है. फिलहाल दोनों के बीच विश्‍वास की कमी नज़र आ रही है. लेकिन मोदी के प्रधानमंत्री चुन लिए जाने के बाद दोनों देश वीजा मुद्दे को छोड़कर आगे बढ़ने की कोशिश करेंगे. दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति भारत से अच्छे संबंध बनाए रखना चाहती है. अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के कार्यकाल में हुआ भारत-अमेरिका परमाणु समझौता एक ऐसा उदाहरण है जिससे यह मालूम होता है कि अमेरिका अपने आर्थिक हितों को साधने कि लिए किसी भी हद तक जा सकता है. उसने इस समझौते को मूर्तरूप देने के लिए दुनिया भर के देशों से भारत को समर्थन दिलवाया और नियमों में आवश्यक्तानुसार संशोधन करवाए. लेकिन अब तक यह समझौता कार्यान्वित नहीं हो पाया है. मोदी बहुत ही व्यवहारिक, देशी आर्थिक नीति की वकालत करते हैं, उन्हें विदेशी आर्थिक सिद्धातों पर ज्यादा भरोसा नहीं है. यदि वैश्‍विक आर्थिक नीतियां और सिद्धान्त उनके कार्यक्रमों के अनुरूप और मदद करने वाले होंगे तो वह उन्हें फीजेबिलिटी के आधार पर अपना सकते हैं. हो सकता है कि मोदी का आर्थिक मॉडल राज्य द्वारा नेतृत्व की जाने वाली आर्थिक नीति पर आधारित हो. जहां सरकार की भूमिका सबसे प्रमुख हो. मोदीनॉमिक्स के कारण खुली अर्थव्यवस्था की नुमांइदगी करने वाले पश्‍चिमी देशों खासकर अमेरिका को नुक़सान होगा. मोदी का आर्थिक मॉडल देश को स्वालंबी बनाने और अपने पैरों पर खड़ा करने की दिशा में काम करेगा. मोदी ने अपने चुनावी भाषणों में देश को दुनिया का सबसे बड़ा मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने की बात करते रहे हैं. इसके लिए आर्थिक नीतियों में व्यापक पैमाने पर बदलाव करने की जरूरत होगी. मोदी विदेश नीति को आर्थिक आधार पर साधते दिखाई देंगे. अमेरिका के साथ वीजा नियमों में संशोधनों को लेकर पहले से ही टकराव होता रहा है. भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स को दिए जाने वाले वीजा की संख्या को सीमित करने के कारण भारतीय आईटी कंपनियों को नुक़सान हो रहा है. अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा लगातार अमेरिकियों को सचेत करते रहे हैं कि यदि वह मेहनत नहीं करेंगे तो उनकी नौकरियां भारतीय छीन लेंगे. आउटसोर्सिंग को लेकर बने नियमों के अलावा भारत-अमेरिका परमाणु समझौते को लेकर जो स्थिति बनी हुई है, उसे पटरी पर लाना मोदी के लिए चुनौती होगा. फुकुशिमा परमाणु हादसे के बाद लोगों और देशों के रुख में न्यूक्लियर लायबिलिटी ऑन सिविल डेमेजेस के मुद्दे पर अनिर्णय की स्थिति बनी हुई है. जिसे अमेरिका जल्दी से जल्दी सुलझाना चाहता है. भारत-अमेरिका रक्षा क्षेत्र में भी सहयोग कर रहे हैं. भारत अमेरिका से बड़ी मात्रा में हथियार और सैन्य उपकरण खरीद रहा है. इसलिए अमेरिका को मोदी नजरअंदाज नहीं कर सकेंगे.
समय के साथ आर्थिक विकास का केंद्र पश्‍चिमी देशों से पूर्व की ओर खिसक गया है. जिसमें चीन अग्रणी है. भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती चीन है. भारत को यदि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को बढ़ावा देना है और दुनिया को एक बाजार बनाना है तो उसे चीन की चुनौती का सामना करना होगा. चीनी उत्पादों से कम कीमत पर उच्च गुणवत्ता वाले उत्पाद बाजार में उतारने होंगे. वर्तमान में भारत और चीन के बीच का व्यापार 65 बिलियन डॉलर का है. जिसके अगले दो साल में 100 बिलियन डॉलर तक पहुंचने की संभावना है. भारत की चीन के साथ व्यापार घाटे में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है. वर्तमान में भारत में जो आर्थिक परिदृश्य है वह चीनी कंपनियों को आकर्षित नहीं कर पा रहा है. इन्फ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में भारत चीन की मदद ले सकता है, खासकर बुलेट ट्रेन के मसले पर. बुलेट ट्रेन को भारत में लाना मोदी के ऐजेंडे में शीर्ष पर है. जिस तरह चीन ने बड़ी तेजी से बुलेट ट्रेन नेटवर्क स्थापित किया है, उसने समूचे विश्‍व को अपनी ओर आकर्षित किया है. सस्ती तकनीक होने के कारण भारत चीन को इसकी स्थापना के लिए मौका दे सकता है, हालांकि जापान ने दिल्ली मेट्रो सहित देश के कई शहरों में मेट्रो-ट्रेन सेवा की स्थापना के लिए सहयोग किया है. साथ ही जापानी बुलेट ट्रेनों की भी एक सुदृढ़ पहचान है, लेकिन चीन इस काम जापान की तुलना में तेजी से कर सकता है, इस वजह से उसे जापान पर वरीयता दी जा सकती है, यदि ऐसा होता है तो भारत चीन-संबंधों के लिहाज से यह एक नई और सफल शुरुआत होगी.
भारत के तेज गति से विकास के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में निवेश की आवश्यकता है. यह इन तीन देशों के सहयोग के बिना संभव नहीं है. अमेरिका किसी भी स्थिति में चीन और भारत के बढ़ते प्रभाव को पसंद नहीं करता है, दोनों ही उसके वैश्‍विक आधिपत्य के लिए खतरा हैं. भारत की चीन से करीबी उसे स्वीकार नहीं होगी. इसलिए वह नए माहौल में भारत का सहयोग करेगा. जापान भारत का पुराना सहयोगी है, भारत का उसके प्रति झुकाव सामान्य है. राजीव गांधी के बाद अटलबिहरी वाजपेयी चीन की यात्रा करने वाले पहले प्रधानमंत्री थे. उसके बाद भारत-चीन के बीच सहयोग में बढोत्तरी हुई थी. उसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए मोदी भी चीन के साथ संबंधों को बेहतर बनाने की कोशिश करेंगे. अंततः यह दोनों देशों के लिए फायदे का सौदा साबित होगा. मोदी किस तरह इन तीनों देशों के बीच संतुलन साधेंगे, यह देखना बेहद दिलचस्प होगा. क्योंकि उन्होंने देश की जनता से समृद्ध और सशक्त भारत बनाने का वादा किया है.

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