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फसल बीमा योजना किसानों के साथ छलावा है

फसल बीमा योजना किसानों के साथ छलावा है

हमारे मुल्क में किसानों की हालत सुधारने या उन्हें राहत देने के मक़सद से सरकारी स्तर पर कई पहल हुई हैं. एक दशक पहले शुरू हुई राष्ट्रीय फसल बीमा योजना ऐसी ही एक पहल है. इस योजना का सीधा-सीधा मक़सद फसल नष्ट होने की स्थिति में क्षतिपूर्ति करना और किसान को मदद पहुंचाना है. अपने घोषित मक़सद की वजह से ज़ाहिर है कि यह योजना काफी लोकलुभावनी दिखाई देती है, लेकिन हक़ीक़त इसके उलट है. बीमा कंपनियों ने बड़ी चालाकी से इसकी ऐसी शर्तें तय की हैं कि हर्जाने का दावा मान्य होने पर कंपनियों को बहुत मामूली भुगतान करना पड़े. मुआवज़ा भी तब मिलता है, जब तालुका या प्रखंड स्तर पर फसल बर्बाद हुई हो. इससे कम क्षेत्र में नुक़सान होने पर भरपाई नहीं की जाती. इतना सब कुछ पक्ष में होने के बाद भी कंपनियों की नीयत किसानों को फायदा देने की नहीं है. फसल बीमा का अग्रिम प्रीमियम वसूल करने वाली बीमा कंपनियां ज़रूरत पड़ने पर दावा राशि का भुगतान करने में भी आनाकानी करती हैं. बीमा कंपनियों की इन धांधलियों का मामला हाल में मध्य प्रदेश विधानसभा में उठा. विधायकों ने सरकार से मांग की कि किसानों को बीमा कंपनियों से फसल बीमा योजना का फायदा दिलाया जाए.

ग़ौरतलब है कि किसानों से जुड़े इस अहम मसले को विपक्ष ने नहीं, बल्कि सत्ता पक्ष के कुछ विधायकों ने उठाया. विधायकों का कहना था कि सूबे के कई ज़िलों में सोयाबीन की फसल बर्बाद हो गई, मगर प्रभावित किसानों को बीमा कंपनियों ने अभी तक क्षतिपूर्ति भुगतान नहीं किया. सर्वे हो जाने के बाद भी उक्त कंपनियां किसानों को दावा राशि का भुगतान करने में आनाकानी कर रही हैं, जिसके चलते किसान बर्बादी की कगार पर पहुंच गए हैं. यदि समय रहते दावा राशि का भुगतान नहीं हुआ तो उन्हें खाने के लाले पड़ जाएंगे. विडंबना यह है कि एक तऱफ किसानों को फसल बीमा का फायदा नहीं मिला, वहीं बैंक अधिकारी क़र्ज़ वसूली के लिए उन्हें परेशान कर रहे हैं. किसानों पर दंड एवं ब्याज लगाया जा रहा है, कुर्की की जा रही है. यदि सरकार ने जल्द कोई क़दम नहीं उठाया तो किसानों के सामने मुसीबत खड़ी हो जाएगी. मध्य प्रदेश में होने वाली ख़री़फ की फसलों में सोयाबीन एक प्रमुख फसल है. कई ज़िलों में सोयाबीन की फसल बहुतायत में होती है. बीते साल हुई लगातार बारिश ने सोयाबीन की फसल में पहले पीला मोजेक रोग और बाद में तंबाकू इल्ली लगने से काफी नुक़सान हुआ. ख़ास तौर पर होशंगाबाद और हरदा ज़िले में सोयाबीन की पूरी फसल बर्बाद हो गई. कहने को यहां फसल बीमा था और किसानों ने बीमे का अग्रिम प्रीमियम भी भरा, लेकिन बीमा कंपनियों ने अभी तक इन बीमा दावों को मंजूर नहीं किया. न स़िर्फ क्षतिपूर्ति भुगतान करने में आनाकानी की जा रही है, बल्कि जहां-जहां भुगतान किया गया, उसमें भी धांधली है. बीमा कंपनियां फसल बीमा योजना की आड़ में किस तरह गोरखधंधा करती हैं, इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है. फसल बीमा योजना के तहत होशंगाबाद ज़िले में 49 हज़ार 175 किसानों से बीमा प्रीमियम काटा गया. कुल बीमित राशि 222 करोड़ रुपये की थी, जिसके लिए दो निजी कंपनियों को दस फीसदी यानी 22 करोड़ 22 लाख रुपये का प्रीमियम मिला, लेकिन जब फसल ख़राब हो गई तो कंपनियों ने 222 करोड़ रुपये की राशि में से केवल 17 करोड़ 15 लाख रुपये के क्षतिपूर्ति भुगतान का हिसाब लगाया यानी प्रीमियम राशि में से भी 5 करोड़ 5 लाख रुपये बचा लिए गए. बीते रबी सीजन में भी बीमा कंपनियों ने गेहूं की फसल के लिए किसानों से 15 करोड़ 73 लाख रुपये का प्रीमियम लिया, लेकिन जब भुगतान की बारी आई तो उन्हें स़िर्फ 85 लाख रुपये देकर चलता कर दिया.

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फसल बीमा योजना की सबसे बड़ी गड़बड़ी योजना का स्वैच्छिक और अनिवार्य होना है. जो भी किसान बैंक या सहकारी संस्था से ऋृण लेता है, बैंक उससे बिना पूछे अनिवार्य रूप से प्रीमियम काट लेता है. उसे कोई जानकारी, रसीद या पॉलिसी पेपर नहीं दिया जाता, जिसके चलते किसान को मालूम नहीं चलता कि उसकी फसल का बीमा हुआ भी है या नहीं. मौसम आधारित फसल बीमा योजनाएं हमारे यहां पश्चिमी देशों से आई हैं. इसके पीछे विश्व बैंक की सिफारिशों एवं बहुराष्ट्रीय कंपनियों का बहुत बड़ा दबाव था. पश्चिमी देशों और हमारे यहां की परिस्थितियों में बुनियादी फर्क़ है. यूरोपीय देशों में जहां सैकड़ों-हज़ारों एकड़ ज़मीन के किसान और कंपनियां बहुतायत में हैं, वहीं हमारे यहां छोटे-छोटे काश्तकार हैं. वहां के किसान संतुष्ट होकर स्वेच्छा से अपनी फसल का बीमा कराते हैं, लेकिन हमारी सरकारों ने यह बीमा ज़बरदस्ती किसानों पर थोपा है. किसान चाहे न चाहे, उसे बीमा कराना पड़ेगा. हमारे यहां सभी फसल बीमा योजनाएं सरकार के अनुदान और सहयोग से क्रियान्वित हो रही हैं. इसके बाद भी तस्वीर यह है कि पैसा किसान एवं सरकार का, मुना़फा कंपनियों का, नुक़सान स़िर्फ और स़िर्फ किसान का. तमाम सरकारी दावों और वायदों के बाद भी फसल बीमा योजना किसानों के लिए स़िर्फ एक छलावा साबित हुई है. किसानों की आत्महत्याएं फसल बीमा योजना की नाकामी को उजागर करती हैं. राष्ट्रीय बीमा योजना अमल में आए एक दशक से ज़्यादा हो गया, लेकिन किसानों की आत्महत्याओं में कोई कमी नहीं आई. सरकार इस योजना की पुनर्समीक्षा करे, गड़बड़ियों को दुरुस्त करे, तभी किसानों को फसल बीमा योजना का फायदा मिल पाएगा.

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