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विकास दर धीरे-धीरे गिरने लगी है
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विकास दर धीरे-धीरे गिरने लगी है

वेन जियाबाओ पिछले दिनों लंदन गएऔर वहां उन्होंने ब्रिटिश प्रधानमंत्री को इस बात के लिए फटकारा कि उन्हें अपने अतिथि के सामने मानवाधिकार पर भाषण नहीं देना चाहिए, लेकिन तब ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन के पास जियाबाओ की बात सुनने के अलावा कोई विशेष चारा नहीं था, क्योंकि वह चीन से व्यापार और निवेश को इच्छुक थे. चीन ने ब्रिटेन को एक हाई स्पीड ट्रेन सिस्टम बेचा है. जो कंपनी यूके में यह ट्रेन बनाती है, वह इसका उत्पादन बंद करने वाली है. चीन निर्मित यह ट्रेन वाक़ई खूबसूरत है. रेल बनाने वाले प्राचीन देश ने उत्पादन बंद दिया है और मध्य क्षेत्र ने इसका अधिग्रहण कर लिया है.

21वीं सदी के पहले कुछ वर्षों में आसानी से मिली 8-9 फीसदी की उच्च वृद्धि दर ने भारतीय नेताओं को संतुष्ट कर दिया था, लेकिन तब भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था की सवारी कर रहा था. जब बूम समाप्त हुआ तो विकास दर धीरे-धीरे गिरने लगी और फिर कभी दोबारा 9 प्रतिशत और इसके ऊपर नहीं पहुंची. 2010-11 में 8.5 प्रतिशत की विकास दर तो सूखे के साल से बाहर निकलने (रिकवरी) की वजह से हासिल हुई थी. जल्दी कीजिए, इससे पहले कि विकास की यह धीमी फिसलन व्यवस्था को धराशायी न कर दे, परिवर्तन कीजिए.

आखिरकार क्यों हाई स्पीड ट्रेन चीन बना सकता है और भारत नहीं बना सकता? भारतीय रेल प्रणाली गंदगी, भीड़भाड़, मंद गति और खतरनाक प्लेटफार्मों का पर्याय क्यों बन गई है? जब मैं 50 के दशक में भारतीय रेल से यात्रा किया करता था तो इसका भविष्य उज्ज्वल दिखता था, लेकिन हाल-फिलहाल का मेरा अनुभव डरावना रहा है. जहां तक मेरा अनुमान है, यह अंतर दोनों देशों के राजनीतिक शासन की अलग-अलग विशेषताओं के कारण है. हालांकि दोनों ही देशों में रेल विभाग सरकार के पास है, लेकिन भारत में यह मंत्रालय सरकार अपने सहयोगी दल को ईनाम के तौर पर देती है, ताकि ये मंत्री जिस क्षेत्र से चुनकर आए हैं, वहां अपने आधार को मज़बूत करने में इसका इस्तेमाल कर सकें. रेल भाड़ा कम रखना सस्ती लोकप्रियता का साधन बन गया है, लेकिन ये लोग यह समझने की कोशिश नहीं करते कि यात्री अच्छी सुविधा के लिए थोड़ा ज़्यादा भाड़ा देने से परहेज़ नहीं करेंगे. भारत एशिया में सबसे प्राचीन रेल प्रणाली वाला देश है, लेकिन आज स्थिति यह है कि भारत रेलवे के क्षेत्र में विस्तार के अलावा इससे जुड़ी अन्य सभी गतिविधियों में नेतृत्व खो चुका है.

1950 के दशक में हमने इस वायदे के साथ महालानोविस मॉडल अपनाया था कि भारत मशीनें बनाने के लिए मशीन बनाएगा, ताकि हम टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में नई ऊंचाइयों को छू सकें और इस क्षेत्र में सबसे आगे खड़े हों. तो फिर भारत में तेज़ गति की रेलें बनाने के प्रयास क्यों नहीं किए गए? भारतीय रेल के कोच का डिजायन इतना घटिया क्यों होता है? खाने के विकल्प सीमित होते हैं और खाना अस्वास्थ्यकर होता है. टॉयलेट्‌स के बारे में तो कोई टिप्पणी करना ही बेकार है. एक बार फिर उत्तर वही है कि देश की अर्थव्यवस्था के प्रबंधन की गुणवत्ता बिगड़ गई है. जब भारत ने पहली कार बनाई तो हमने एंबेसडर मॉडल अपनाया और आज भी नौकरशाहों द्वारा इसका इस्तेमाल किया जा रहा है. बेशक मारुति को भारत में स्थापित किया गया, लेकिन यह केवल युवराज संजय गांधी को अपने पसंदीदा खिलौनों के साथ व्यस्त रखने के लिए था. आज भी भारत निर्मित कारों की स्थिति दारुण ही होती, यदि निजी कंपनियों को इस क्षेत्र में आने की अनुमति नहीं दी जाती.

जब आप भारतीय उद्योगपतियों से बात करते हैं और खासकर जब वे बाहर हों तो सामान्यतय: वे भारत के चमत्कारिक विकास की बात करेंगे. यहां इस बात की का़फी संतुष्टि है कि विकास दर 8.5 फीसदी है, जो 9 फीसदी से थोड़ी ही कम है. लेकिन मेरा अनुमान है कि यह 7 से 7.5 फीसदी के बीच ही होगी. यूपीए-2 ने पहले दो साल में कोई सुधार नहीं किया और ऐसा लगता है कि यह लोकपाल की उलझन और घोटालों के दलदल से फिलहाल 2012 के अंत तक निकल भी नहीं पाएगा. तब तक उत्तर प्रदेश में चुनाव होना है, जिसमें कांग्रेस उलझी रहेगी और सुधार की बात धरी की धरी रह जाएगी. ऐसी बात नहीं है कि कोई यह नहीं जानता कि क्या किया जाना है. प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री ने कई बार सही बात कही है.

बड़े-बड़े उद्योग लगाइए, जो लाखों रोज़गार सृजित करेंगे. आधारभूत संरचना के क्षेत्र में आ रहे ह्रास पर क़ाबू पाइए, भूमि अधिग्रहण संबंधी विवादों को निपटाइए, जनजातियों और अन्य लोगों के संपत्ति के अधिकार को स्थापित कीजिए और उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षण संस्थाओं की मांग को विदेशी संस्थाओं को अनुमति देकर समाप्त कीजिए. लाखों लोगों को शिक्षित कीजिए, यही सब भारत की जनता को लाभ दिलाएंगे. बाल कुपोषण को समाप्त कीजिए. हम लोगों ने कितने समय में जाना है कि ये सारी बातें भी एजेंडे में थीं. 21वीं सदी के पहले कुछ वर्षों में आसानी से मिली 8-9 फीसदी की उच्च वृद्धि दर ने भारतीय नेताओं को संतुष्ट कर दिया था, लेकिन तब भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था की सवारी कर रहा था. जब बूम समाप्त हुआ तो विकास दर धीरे-धीरे गिरने लगी और फिर कभी दोबारा 9 प्रतिशत और इसके ऊपर नहीं पहुंची. 2010-11 में 8.5 प्रतिशत की विकास दर तो सूखे के साल से बाहर निकलने (रिकवरी) की वजह से हासिल हुई थी. जल्दी कीजिए, इससे पहले कि विकास की यह धीमी फिसलन व्यवस्था को धराशायी न कर दे, परिवर्तन कीजिए.

1 comment

  • The government of American stooge manmoahn singh often complains that there isn’t enough money to feed all the poor, yet will extends corporate tax concessions worth billions of rupees. It talks about having to stop food wastage in order to be able to address hunger, when it allows millions of tons of food grains to rot in warehouses or be eaten by rats. If there is a shortage of food grains, it should halt their export for use as cattlefeed in Europe. Besides, why were farmers pushed from growing grains to cash crops?

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