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राष्ट्रीय सुरक्षा प्रबंधन के मायने

राष्ट्रीय सुरक्षा प्रबंधन के मायने

राष्ट्रीय सुरक्षा एक ऐसा शब्द है, जिसका इस्तेमाल आजकल आम तौर पर किया जाता है. प्राय: यह शत्रु देश के आक्रमण से सुरक्षा से संबंधित होता है अथवा उन हथियारबंद आतंकवादियों से सुरक्षा से, जो राष्ट्र के प्रभुत्व को चुनौती देते हैं या राष्ट्रीय एकता-अखंडता को नुक़सान पहुंचाते हैं, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा का अभिप्राय केवल इसी से नहीं है, बल्कि इसे और अधिक वृहद अर्थों में समझने की आवश्यकता है. राष्ट्रीय सुरक्षा प्रबंधन तीन शब्दों से बना है. इस पर चर्चा करने से पूर्व इन तीनों शब्दों का अर्थ समझना अच्छा होगा. इसमें प्रथम शब्द है राष्ट्रीय, जिसका मतलब है जो राष्ट्र से संबंधित हो. भारत के संदर्भ में प्राय: इसे राष्ट्र-राज्य के बजाय राज्य-राष्ट्र कहा गया है. यह भारतीय समाज की अनेकता की ओर संकेत करता है और इस तथ्य की ओर भी संकेत करता है कि भारत के राज्य यूरोप के राज्यों की तरह के राष्ट्र नहीं रहे हैं, बल्कि उनसे भिन्न रहे हैं. बहु-सांस्कृतिक और बहु-राष्ट्र राज्य होने के बाद भी भारतीय समाज के कुछ हिस्से भारत राष्ट्र के अंतर्गत आते हैं.

सुरक्षा से अभिप्राय केवल सीमा की सुरक्षा अथवा राष्ट्रीय एकता और स्वायत्तता की सुरक्षा से नहीं है. इसका अर्थ काफी व्यापक है. सुरक्षा का मतलब है राष्ट्रीय जीवन से संबंधित सभी प्रकार की सुरक्षा. राष्ट्र को सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय सभी प्रकार से सुरक्षित होना चाहिए.

हिंदू सांस्कृतिक एकता का विचार जो भारतीय एकता को धर्म, संस्कृति एवं क्षेत्र के रूप में परिभाषित करता है, उस सूत्र को कमज़ोर करता है जो विभिन्न संस्कृतियों, भाषाओं और नस्लों वाले भारत को एकता प्रदान करता है. यह विचारधारा समाज के एक बड़े भाग को राष्ट्रीय एकता से विमुख करती है. ब्रिटिश भारत का विभाजन द्विराष्ट्र सिद्धांत के आधार पर हुआ, लेकिन यह सिद्धांत अंग्रेज सरकार की नीतियों का ही परिणाम था. विभिन्न संस्कृतियों और प्रजातियों के बीच विरोध और असंतोष होता है, लेकिन जब वे अपने को एक राष्ट्र के रूप में परिभाषित करती हैं और अलगाववादी आंदोलन चलाती हैं तो राष्ट्र की सुरक्षा खतरे में पड़ जाती है. इसे भी राष्ट्रीय सुरक्षा प्रबंधन का हिस्सा मानना है. दूसरा महत्वपूर्ण शब्द है सुरक्षा. सुरक्षा से अभिप्राय केवल सीमा की सुरक्षा अथवा राष्ट्रीय एकता और स्वायत्तता की सुरक्षा से नहीं है. इसका अर्थ काफी व्यापक है. सुरक्षा का मतलब है राष्ट्रीय जीवन से संबंधित सभी प्रकार की सुरक्षा. राष्ट्र को सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय सभी प्रकार से सुरक्षित होना चाहिए.

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तीसरा और अंतिम शब्द है प्रबंधन. कोई संगठन अपने लक्ष्य की प्राप्ति हेतु अपने संसाधनों का समुचित उपयोग करता है. इसका संबंध उस संगठन के प्रशासन और परिचालन से होता है. संसाधनों के उपयोग की इस प्रक्रिया को ही प्रबंधन कहते हैं. अब अगर इन तीनों शब्दों को एक साथ रखें तो राष्ट्रीय सुरक्षा प्रबंधन का मतलब है राष्ट्रीय संसाधनों का समुचित उपयोग करके राष्ट्र को सभी संदर्भों में प्रभावी सुरक्षा प्रदान करना. इस समय भारत एक साथ कई मोर्चों पर सुरक्षा संबंधी खतरों का सामना कर रहा है. इसे डर न केवल बाह्य शत्रुओं से है, बल्कि आंतरिक शत्रुओं से भी है. कश्मीर में छद्म युद्ध, सीमा पर आक्रमण यथा कारगिल युद्ध, आतंकवाद, परमाणु आक्रमण का खतरा, सीमा पार से आ रहे घुसपैठियों का दबाव, मादक पदार्थों की तस्करी, धार्मिक कट्टरपंथ, वैश्विक बाज़ार में आई अस्थिरता से उत्पन्न आर्थिक असुरक्षा, पर्यावरण संबंधी खतरा, मीडिया द्वारा किए जा रहे सांस्कृतिक आक्रमण आदि ऐसी समस्याएं हैं, जो भारत की सुरक्षा को प्रभावित करती हैं.

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ग़रीबी, कमज़ोर आर्थिक आधार, बेरोजगारी, संकुचित क्षेत्रवाद, नक्सलवाद, सांप्रदायिकता, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, अलगाववाद और कमजोर संस्थागत संरचना आदि ने राष्ट्रीय सुरक्षा के समक्ष गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है. अगर हम वास्तविक रूप से राष्ट्रीय सुरक्षा को मज़बूत बनाना चाहते हैं तो हमें इन समस्याओं के समाधान के लिए काम करना होगा, अन्यथा भारत की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है. बाह्य खतरों की तऱफ ध्यान देने से पहले हमें देश की आंतरिक व्यवस्था सही करनी चाहिए. भारत सॉफ्ट स्टेट के रूप में जाना जाता है. गुन्नार मीर्डल ने अपनी पुस्तक एशियन ड्रामा में भारत को सॉफ्ट स्टेट कहा था. सबसे पहले हमें इस छवि से बाहर आना है. यह नकारात्मक छवि इसलिए है, क्योंकि कई मोर्चों पर हमें सही नेतृत्व नहीं मिला और हम नाकामयाब रहे. इस कारण हमारी राजनीति और अर्थव्यवस्था पंगु हो गई. जर्जर विधायिका और अनिश्चय की स्थिति में रहने वाली कार्यपालिका यानी एक प्रकार से पूरी सरकार की अकर्मण्यता के कारण राष्ट्रीय सुरक्षा पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है.

भारत के सामने सबसे पहला काम एक ऐसी प्रभावी संस्थागत संरचना का निर्माण करना है, जो राष्ट्रीय मामलों का सही प्रबंधन करे. ऐसी संस्थागत संरचना ही लंबे समय तक राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए लाभप्रद होगी. ऐसा तर्क दिया जाता है कि ढांचागत संरचना और उत्तरदायी सरकार का इस्तेमाल तभी होगा, जब जागरूक, ज़िम्मेदार, चौकस और सहभागी नागरिक समाज हो. यदि इस तरह का नागरिक समाज है तो फिर मानव संसाधन में अधिकाधिक निवेश की आवश्यकता होती है. इसका मतलब है कि सभी लोगों को अच्छा भोजन मिले, अच्छे कपड़े उपलब्ध हों और अच्छी स्वास्थ्य सुविधाओं की व्यवस्था हो. वरना भूखे और बेरोज़गार लोग राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बन जाएंगे. कौटिल्य ने भी अपनी प्रसिद्ध पुस्तक अर्थशास्त्र में इस बात का उल्लेख किया है. अत: भारत को अपने संसाधनों का लोगों के बीच सही वितरण करके और सभी नागरिकों की प्रतिष्ठा की रक्षा करके यह दिखाना है कि वह किसी प्रकार का कोई पक्षपात नहीं करता है.

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यह सही है कि अलग-अलग समुदायों को प्राप्त प्रतिष्ठा में हो रहे पक्षपात के कारण भारत को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. अत: सत्ता में बैठे लोगों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि सभी को समान रूप से न्याय मिले और विकास की दौड़ में कोई समुदाय इतना पिछड़ न जाए कि देश को चलाना मुश्किल हो जाए. प्रसिद्ध दार्शनिक राल्स ने जिसे वितरण न्याय कहा है, उसे लागू करने का प्रयास करना चाहिए. सरकार के लिए यह ध्यान रखना आवश्यक है कि किसी भी समुदाय को सामाजिक अन्याय या असमानता का सामना न करना पड़े और सभी लोग राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल हों. अगर समाज में असमानता रही और सभी को न्याय नहीं मिला तो विद्रोह हो सकता है, जिसके कारण राष्ट्र खंडित हो सकता है, जैसा कि 1971 में पूर्वी पाकिस्तान में हुआ. इसी संदर्भ में मैकियावेली का एक कथन है, सरकार को न केवल न्याय करना चाहिए, बल्कि उसे न्यायपूर्ण दिखना भी चाहिए. इसके साथ ही तीव्र गति से बढ़ रही जनसंख्या पर क़ाबू पाने की भी आवश्यकता है, ताकि उपलब्ध संसाधनों के साथ सामंजस्य बैठाया जा सके. दोनों के बीच सामंजस्य का अभाव समाज में अस्थिरता और विद्रोह उत्पन्न करता है, जो देश के लिए अच्छी बात नहीं है. हमें अच्छी अर्थव्यवस्था की आवश्यकता है, जिसका आधार सशक्त उद्योग और कृषि हो.

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