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मेरठ रिलीफ फंड: मदद बहुत आई, ख़र्च नाममात्र
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मेरठ रिलीफ फंड: मदद बहुत आई, ख़र्च नाममात्र

asif-sir-passbook3मई 1987 में हाशिमपुरा एवं मलियाना (मेरठ) नरसंहार के बाद मुस्लिम संगठनों के महासंघ ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिस-ए-मुशावरत के अंतर्गत सेंट्रल रिलीफ कमेटी बनाई गई और फिर 16 जून, 1987 को बंबई मर्कनटाइल बैंक की दिल्ली शाखा में मदद की धनराशि जमा करने के लिए बचत खाता खोला गया, जिसका नंबर 21551 था. मुशावरत की अपील पर देश भर से धनराशियां आईं, जिनमें से अधिकतर को 1987-88 में उपरोक्त बैंक खाते में जमा कर दिया गया.
उपरोक्त आंकड़े (देखिए बॉक्स) प्रसिद्ध पत्रकार स्वर्गीय महफुजुर्रहमान के संपादन में उस समय प्रकाशित हो रहे साप्ताहिक अपना हफ्त रोजा (15-29 अक्टूबर, 1992) से लिए गए हैं, जिसमें मुशावरत द्वारा उक्त बैंक खाते में 1987 से 1988 तक हाशिमपुरा एवं मलियाना के प्रभावितों की मदद के लिए जनता की ओर से भेजी गई धनराशियां जमा करने का विवरण दर्ज है. इस बैंक खाते में उस समय जो रकम जमा की गई, वह 14 लाख 10 हज़ार 508 रुपये थी. इस साप्ताहिक के विशेष अंक से यह भी मालूम होता है कि रिलीफ फंड में आई धनराशि में से मात्र 10 हज़ार रुपये ही प्रभावितों को दिए गए और शेष धनराशि ब्याज लगने से बढ़ती रही. यह राशि अब बढ़कर कितनी हो गई, इसका विवरण तो नहीं मालूम हो सका. अलबत्ता मुशावरत के अध्यक्ष डॉ. जफ़रुल इस्लाम ख़ां ने चौथी दुनिया को बताया कि इस समय मुशावरत के रिलीफ फंड में 15 लाख 66 हज़ार 265 रुपये मौजूद हैं, जिसमें से कुछ पैसा बंबई मर्कनटाइल बैंक में है, तो कुछ शेयरों में इंवेस्ट कर दी गई है.
डॉ. खां कहते हैं, मैं 1987-88 में हाशिमपुरा एवं मलियाना के प्रभावितों के लिए बने रिलीफ फंड के बारे में कुछ नहीं जानता और न इस पर कोई टिप्पणी करने की स्थिति में हूं, क्योंकि मैं मुशावरत में 2001 में शामिल हुआ और उसके बाद की स्थिति से वाकिफ हूं. जहां तक कथित रकम के ब्याज द्वारा बढ़ने की बात है, तो वह बढ़ी होगी और उसमें से समय-समय पर विभिन्न सांप्रदायिक दंगों, भूकंपों एवं बाढ़ के दौरान प्रभावितों को मदद दी गई और अब भी दी जा रही है. जब तक मेरठ के मौलाना यामीन जीवित थे, वह इस फंड से हर माह कुछ न कुछ धनराशि मुकदमे के खर्च के लिए ले जाते थे. उनके देहांत के बाद सैयद शहाबुद्दीन ने उनके बेटे जुनैद को यह खर्च देना जारी रखने को कहा, मगर जुनैद ने मुकदमे का खर्च लेना बंद कर दिया.
इन तमाम विवरणों से यह सत्य सामने आता है कि 1987-88 में मुशावरत के सेंट्रल रिलीफ फंड में आई रकम में से एक बार मेरठ के प्रभावितों को स़िर्फ 10 हज़ार रुपये बांटे गए और फिर हाशिमपुरा के मुकदमे की पैरवी के लिए कोई मामूली रकम मासिक सहायता के तौर पर मौलाना यामीन को दी जाती रही, बाकी रकम इस समय ब्याज द्वारा बढ़कर 15 लाख 66 हज़ार 265 रुपये हो चुकी है और एकाउंट में मौजूद है. अब प्रश्‍न यह है कि उक्त रकम, जो इस समय बैंक खाते में मौजूद है, वह हाशिमपुरा के प्रभावितों की मदद और उनके मुकदमे की पैरवी के लिए क्यों खर्च नहीं की गई? मुशावरत के इस पूरे रवैये को स्वर्गीय महफुजुर्रहमान ने अमानत में खयानत कहा था. आश्‍चर्य का विषय यह है कि इस निर्भीक पत्रकार की रिपोर्ट के बावजूद मुशावरत जागी नहीं और उनके जगाने के 22 वर्षों बाद तक अमानत की यह रकम अपने असल हक़दार तक नहीं पहुंच सकी.

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