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सांसत में विकास
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सांसत में विकास

कह सकते हैं कि माओवाद प्रभावित इलाकों के आधे सांसद नहीं चाहते कि सरकार माओवादियों से जंग लड़े. उनके मुताबिक फ़िलहाल अभी हथियारों के इस्तेमाल की नौबत नहीं आई है और माओवादियों को विकास के ज़रिये चुनौती दिए जाने का समय अभी नहीं गुज़रा है. इस राय में झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री एवं भाजपा सांसद अर्जुन मुंडा भी शामिल हैं. माओवाद प्रभावित इलाकों के सांसद पिछले चार जून को गृह मंत्रालय द्वारा वामपंथी अतिवाद पर आयोजित बैठक में जुटे थे. कुछने माओवाद प्रभावित इलाकों के लिए विकास की ख़ास योजनाएं शुरू किए जाने की भी पुरज़ोर पैरवी की. हालांकि 25 में 12 सांसद बैठक में पहुंचे ही नहीं. खैर, गृहमंत्री पी चिदंबरम ने दो टूक कह दिया कि विकास का काम भी जारी रहेगा और माओवादियों के खिलाफ़ युद्ध भी. यह खीज भी उतारी कि माओवाद से बुरी तरह प्रभावित देश के 34 जिलों में विकास के तमाम कार्यक्रमों के लिए राज्य सरकारों को धन की कमी नहीं होने दी गई, लेकिन उसका सही इस्तेमाल नहीं हो सका. माओवादियों के खिलाफ़ अपने कड़े तेवरों को जायज ठहराते हुए यह पुराना दुखड़ा भी रोया कि माओवादियों ने केवल पिछले साल ही 71 स्कूलों की इमारतें ढहा दीं और बच्चों को उनके शिक्षा के अधिकार से वंचित कर दिया.

सबसे पहले विकास का सवाल. सही है कि माओवाद का आधार क्षेत्र वे इलाक़े हैं, जहां विकास की हवा नहीं पहुंची और अगर पहुंची भी तो बस आई-गई हो गई, कुछ रसूखदारों और ओहदेदारों के आंगन में ठहर गई. तो क्या माओवादियों की बढ़त के पीछे महज़ कम विकास या इसकी ग़ैर मौज़ूदगी जिम्मेदार रही है? और फ़िर विकास से हमारा क्या मतलब है? कल्याणकारी कार्यक्रम नई दिल्ली या रायपुर, भुवनेश्वर, रांची, मुंबई, कोलकाता आदि राजधानियों में तय किए जाते हैं और जिनका ज़मीनी ज़रूरतों और लोगों की चाहतों या प्राथमिकताओं से अमूमन कोई लेना-देना नहीं होता और जिसमें लोगों की भागीदारी लाभार्थी से ज़्यादा नहीं होती. अब यह अलग सवाल है कि सरकार के कल्याणकारी कार्यक्रम कितना काग़ज़ों में पूरे किए जाते हैं और किस तरह बंदरबांट की दावत बन जाते हैं. यह पुराना सरकारी रोना है कि माओवादी स्कूल तक को नहीं छोड़ रहे. स्कूल नहीं रहेगा तो बच्चे कैसे पढ़ेंगे? उनका विकास कैसे होगा? ज़माने की रफ्तार कैसे पकड़ेंगे?

माओवादी नहीं चाहते कि आदिवासियों का भला हो और वे मुख्यधारा में आएं. यह तो बेचारे आदिवासियों को पिछड़ेपन की गिरफ्त में बनाए रखने की साजिश है. उनका इरादा नेक नहीं है. उनके लिए आदिवासी केवल ढाल हैं, मोहरा हैं. उनका इकलौता मक़सद हिंसा के रास्ते सत्ता हासिल करना है. इसलिए उनका नामोनिशान मिटा देना जरूरी है. स्कूल पर लौटें. सच है कि माओवादियों ने स्कूल की इमारतों का विध्वंस किया और सच यह भी है कि उन स्कूलों पर ही धावा बोला, जहां सुरक्षाबल अपना डेरा डाला करते थे और उनका इस्तेमाल वाच टावर की तरह किया जाता था. गुनाह किसका है? हिंसाग्रस्त इलाकों में स्कूल-अस्पताल जैसी जगह को आज़ाद रखा जाना चाहिए. यह आदर्श क़ायम करने की उम्मीद सबसे पहले सरकार से की जाती है और सरकार ने ही इस दायित्व से मुंह मोड़ लिया. स्कूलों पर क़ब्ज़ा करना सुरक्षाबलों का अधिकार हो गया. सीआरपीएफ़ ने हर जगह ग्राम पंचायत और गांवसभा को ठेंगे पर रखा और अपने इस अधिकार को जबरिया हासिल किया. समझा जा सकता है कि वर्दीधारी रोबीले जवानों और असलहों के साए में क्या खाक पढ़ाई होगी? होगी भी तो क्या होगी? स्कूल में दहशत की धमक होगी तो इसका बच्चों के दिलोदिमाग़ पर कितना बुरा असर होगा? तो स्कूल कहां रहे? स्कूलों में सुरक्षाबलों के कैंप हो गए. यह कम बड़ा अपराध था? इस पर तो देश की सबसे बड़ी अदालत छत्तीसगढ़ सरकार को तगड़ी फटकार भी लगा चुकी है और यह निर्देश जारी कर चुकी है कि स्कूलों को सुरक्षाबलों के कब्जे से फ़ौरन आज़ाद कराया जाए. बदले में राज्य सरकार बाक़ायदा हलफ़नामा पेश कर चुकी है कि छत्तीसगढ़ में अब ऐसा कोई स्कूल नहीं रहा, जहां सुरक्षाबलों का कैंप हो. यह सरासर झूठ है. बस्तर के बीजापुर जिले में ही 27 स्कूलों पर सुरक्षाबल काबिज़ है. उधर झारखंड में कम से कम 50 स्कूलों पर सीआरपीएफ़ ने स्थाई कब्जा जमा रखा है. वहां पढ़ाई नहीं होती. 43 दूसरे स्कूलों में यह दस्ता जब-तब आ धमकता है और उसके रहने तक बच्चों की छुट्टी हो जाती है. यही दास्तान आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा और महाराष्ट्र की भी है. अब शिकायत किससे की जाए और कैसे? यह तो बैल को सींग मारने का न्यौता देना है, देश को माओवादियों से मुक्त कराने के सरकारी यज्ञ में रुकावट डालना जो है. सीधा सा मामला है कि माओवादियों के खिलाफ़ जंग में सरकार ने स्कूलों का इस्तेमाल किया और माओवादियों ने उन्हें अपने हमले का निशाना बना दिया. और चिदंबरम साहब बच्चों की शिक्षा की दुहाई देकर माओवादियों को कोसने और उन्हें देख लेने के पोज़ में खड़े हैं.

छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले का डोरनापाल वह सीमा है, जहां तक सुरक्षाबलों की छतरी के नीचे सलवाजुडूम का राज चलता है और जहां से माओवादियों के नियंत्रण का इलाक़ा शुरू हो जाता है. डोरनापाल बेहद संवेदनशील जगह है. इस छोटे से क़स्बे की आधी से ज़्यादा आबादी पलायन कर चुकी है. यह जगह आदिवासी पड़ाव कम, छावनी ज़्यादा नज़र आती है. यहां

सलवाजुडूम के कैंप हैं, कहें कि दड़बाखाना, जिसमें खौफ की चाबुक से हांक कर लाए गए आदिवासियों को ठूंस कर रखा जाता है. जो हमेशा से कुदरत की खुली गोद में सांस लेने के आदी रहे हैं, आज वे बंधक की ज़िंदगी जीने को मजबूर हैं. विडंबना यह है कि डोरनापाल में विस्थापितों के स्कूल टेंटों में चल रहे हैं. स्कूल का परिसर ही बच्चों का घर है, जिसके चारों तरफ़ बूटों की गश्त और हथियारों की नुमाइश चौबीसों घंटे जारी रहती है. इन विस्थापित स्कूलों के लगभग सभी बच्चों की एक जैसी कहानी है. किसी की मां सलवाजुडूम के कैंप में है तो किसी का बाप जान बचाता जंगल-जंगल भाग रहा है. सुरक्षाबलों के हाथों किसी का भाई मारा गया तो किसी की बहन के साथ बलात्कार हुआ. सुरक्षाबलों के लिए मुखबिरी करने के आरोप में माओवादियों ने भी हत्याएं कीं. लेकिन यह भी याद रहे कि उनके खाते में बलात्कार का एक भी इल्ज़ाम नहीं है. सत्तर साल की बुढ़िया के स्तन काट देने या दो साल के नन्हें बच्चे की उंगलियां कचर कर अलग कर देने जैसे वहशियाना जुल्म नहीं हैं. किसी शिक्षक, स्वास्थ्यकर्मी, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, मितानिन के साथ बदसलूकी करने या उनके काम में बाधा पहुंचाने की कोई शिकायत नहीं है.

गोंडीभाषी बच्चों को छत्तीसगढ़ में हिंदी में शिक्षा दी जाती है, जबकि वे छत्तीसगढ़ी भी क़ायदे से समझ-बोल नहीं पाते. गोंडीभाषी शिक्षक बस इक्का-दुक्का हैं. आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र आदि राज्यों में भी यही हाल है. तो इसमें कैसा अचरज कि आजादी से पहले गोंडी बोलने वाले 80 लाख लोग थे, जो आज सिमट कर 20 लाख रह गए हैं. दूसरी तरफ माओवादियों के नियंत्रण वाले इलाक़ों में आठवीं तक की पढ़ाई का माध्यम गोंडी है. सरकार और मीडिया की कृपा से माओवादियों की हिंसक छवि बनी है, लेकिन वे तो बच्चों को स्कूल भेजने, लोगों को जैविक खाद का इस्तेमाल करने, पानी को उबाल कर पीने जैसी नसीहत भी देते हैं. ऐसी ख़बरें कम नहीं, जब उन्होंने दारूबाज या कामचोर शिक्षकों से गांव के प्रतिनिधियों के सामने उठा-बैठक कराई कि वे अपनी आदत से बाज आएंगे. माओवादी इलाकों में महिला दिवस के मौके पर बीते आठ मार्च से महिलाओं के हित-अधिकारों को लेकर सप्ताह भर का उत्सव भी मनाया गया. दूसरी तरफ़ देश की संसद अब तक महिला आरक्षण बिल पास नहीं कर सकी.

छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले से जुड़ा महाराष्ट्र का गढ़चिरौली जिला है. दोनों जिले माओवाद प्रभावित हैं. गढ़चिरौली में तो बस्तर जैसे हालात हैं. तो भी वह पिछले साल मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून) के अमल के मामले में पूरे महाराष्ट्र में अव्वल आया और इसके लिए कलेक्टर को राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के हाथों सम्मान भी मिला. यह उपलब्धि जिला प्रशासन की मुस्तैदी, ईमानदारी और इच्छाशक्ति से मुमकिन हुई. यह कामयाबी क्या माओवादियों के समर्थन के बग़ैर मुमकिन थी? लेकिन गढ़चिरौली तो बस अपवाद है. माओवाद प्रभावित बाकी जिलों में ऐसे उदाहरण दुर्लभ हैं. जॉब कार्ड बनवाने, काम पाने और फ़िर मज़दूरी के भुगतान में देरी-परेशानी और उसके अमल में घोटाला-गड़बड़ी पूरे देश की आम कहानी है और जो माओवाद प्रभावित इलाकों में और दयनीय है. क्या बेतुकी बात है कि सरकारी राशन गांव के बजाय ब्लॉक मुख्यालय पर मिले और दंतेवाड़ा में यही हो रहा है. माओवाद प्रभावित इलाक़ों में पिछले करीब तीन साल में सड़कों का जाल बना है. इसलिए नहीं कि इससे आदिवासियों का भला होगा, बल्कि इसलिए कि सुरक्षाबलों की गाड़ियों के लिए सहूलियत होगी. इधर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की सेहत हमेशा की तरह बुरी बनी रहती है और ऐसे तमाम इलाके हैं, जहां किसी की हालत बेकाबू हो जाए तो उसे जिला अस्पताल पहुंचाने में हफ्ता-दस दिन लग जाता है. विकास के चेहरे की यह सरसरी झलक है.

झारखंड में काम कर रहे कैथोलिक बिशप चार्ल्स सोरेंग माओवादियों की तरफ़दारी में खुलकर बोलते हैं और उन्हें न्याय का हिमायती मानते हैं. कहते हैं कि झारखंड समेत कई राज्यों के इलाके उन्हीं की बदौलत अपराध, तस्करी और भ्रष्टाचार से मुक्त हो सके. महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों पर रोक लगी. सवाल करते हैं कि सीआरपीएफ़ स्कूल पर कब्जा करे और माओवादी उसे उड़ा दें तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है? इसका यह मतलब नहीं कि ईसाई धर्मगुरु माओवादियों के हिमायती हैं. केरल बिशप कौंसिल इसे उनका निजी विचार मानती है. हालांकि झारखंड में कई कैथोलिक संस्थान विस्थापन, विकास की उल्टी धारा और ऑपरेशन ग्रीन हंट पर भी मुखर होकर सवाल उठा रहे हैं.

भले ही मीडिया के बड़े हिस्से को कम या ग़लत या बिल्कुल सुनाई न दे, लेकिन ऑपरेशन ग्रीन हंट के खिलाफ़ विभिन्न स्तरों पर पूरे देश से आवाजें उठ रही हैं. मानव अधिकारों के पैरोकार संगठन और चुनिंदा बुद्विजीवी हिम्मत के साथ माओवाद के हौव्वे की हवा निकाल रहे हैं. सही है कि उनके बीच माओवादियों के नज़रिये और तरीक़ों को लेकर मतभेद हैं. और सही यह भी है कि वे इस पर एकराय हैं कि सरकार कॉरपोरेट समूहों के चरणों में कुदरत का बेशकीमती ख़ज़ाना भेंट चढ़ा देने पर आमादा है. उन्हें आबोहवा में ज़हर घोलने की इजाज़त दी जा रही है. आदिवासियों को जल, जंगल और ज़मीन से बेदख़ल किया जा रहा है. उनकी आजीविका के साधनों को छीना जा रहा है. अपनी संस्कृति और परिवेश से काट कर उन्हें विस्थापन की त्रासदी में झोंका जा रहा है. इन आवाज़ों से आजिज़ आकर गृह मंत्रालय ने हाल में फ़रमान जारी किया था कि ख़बरदार, अगर ऑपरेशन ग्रीन हंट के ख़िलाफ़ ज़ुबान खोली. ऐसी हिमाकत की तो माओवादियों का साथ देने का आरोप ठोंक कर जेल पहुंचा दिया जाएगा, लेकिन इस धमकी की हवा निकल गई. महाश्वेता देवी अपनी ही जनता के साथ जंग लड़े जाने के सख़्त ख़िलाफ़ रही हैं और उस पर लगातार लिखती-बोलती रही हैं. उन्होंने छूटते ही कहा कि हां, मैं माओवादी हूं. आओ और मुझे गिरफ्तार करो. अरुंधति राय और गौतम नवलखा ने बस्तर के जंगलों में माओवादियों के साथ कुछ दिन गुज़ारे थे. उनके लेखों और बयानों पर भूचाल मचा. छत्तीसगढ़ के पुलिस प्रमुख सह लेखक विश्वरंजन सामाजिक सुरक्षा के नाम पर राज्य में लागू काले कानून के तहत अरुंधति राय पर लगाम कसे जाने की बात करने लगे. गृहमंत्री पी चिदंबरम तो न जाने कब से ऑपरेशन ग्रीन हंट के विरोध में खड़े मानव अधिकारों के हिमायती सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों पर हल्ला बोलते रहे हैं. यहां तक कि उन पर माओवादियों के साथ तालमेल रखने का आरोप भी मढ़ते रहे हैं.

लेकिन इस जुगत से कितनों का मुंह बंद किया जा सकता है. यहां तो लंबी कतार है. कालिन गोंसाल्वेज़ जैसे नामी वकील हैं तो दिल्ली, कोलकाता, बंगलौर समेत विभिन्न उच्च शिक्षा केंद्रों से जुड़े शिक्षक भी हैं. इनमें जेएनयू के उपकुलपति और मशहूर वैज्ञानिक प्रो. यशपाल भी शामिल हैं. बीते 6 अप्रैल को दंतेवाड़ा में सीआरपीएफ की टुकड़ी पर घात लगाकर हुए माओवादी हमले में 76 जवान मारे गए थे. गृह मंत्रालय ने इसकी जांच का ज़िम्मा बीसीएफ के पूर्व प्रमुख एनई राममोहन को सौंपा और उन्होंने ही माओवाद विरोधी सरकारी अभियान को कठघरे में खड़ा कर दिया. रिटायर्ड आईएएस, बस्तर के कलेक्टर और भारत के अनुसूचित जाति-जनजाति आयोग के अध्यक्ष रहे डॉ. बीडी शर्मा सरकारी ज़िद की बखिया उधेड़ते हुए इस नाइंसाफ़ी को रोकने के लिए राष्ट्रपति से दख़ल देने की गुहार लगा चुके हैं. आदिवासियों के इतिहास, संस्कृति और संघर्षों पर उन्होंने दर्जनों शोधपरक पुस्तिकाएं लिखी हैं, लेकिन सरकार को उन्हें चोर-लुटेरा बताने के लिए प्रदर्शन प्रायोजित करवाने में तनिक शर्म नहीं आई. देखिए, देश को गृह युद्ध से बचाने की सद्बुद्धि सरकार को कब आती है?

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