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सऊदी अरब : बगावत के आसार

सऊदी अरब में शाह सलमान के बादशाह बनते ही देश कई प्रकार की समस्याओं में उलझ गया है. शाही परिवार की आंतरिक फूट, शियाओं के विरोध और अब आत्मघाती हमलों के अलावा विदेशी स्तर पर सरकार विरोधी गतिविधियों ने देश के लिए कई समस्याएं खड़ी कर दी हैं. कहा जाता है कि इन सभी समस्याओं की जड़ यमन पर हवाई हमला है.

saudi-arabसऊदी अरब एक ऐसे दलदल में फंसता जा रहा है, जिससे निकलने के लिए वह जितना भी हाथ-पैर मारता है, उतना ही ज़्यादा उलझता चला जा रहा है. देश की स्थिति बदतर होती चली जा रही है. जिस देश को कभी शांति का प्रतीक माना जाता था, आज वहां मसलकी विवादों, शाही परिवार में सत्ता को लेकर आंतरिक मतभेदों और सीमा पर क़बायली हमलों ने एक ख़तरनाक स्थिति पैदा कर दी है. सऊदी इतिहास में पहली बार किसी मस्जिद को आत्मघाती हमले का निशाना बनाया गया, जिसमें 21 लोगों की जानें चली गईं और 80 से अधिक लोग घायल हो गए. शाही परिवार में मतभेद खुलकर सामने आ चुके हैं और सऊद परिवार के शहज़ादे दो धड़ों में बंट गए हैं. एक धड़ा शाह सलमान बिन अब्दुल अज़ीज़ के साथ है, तो दूसरा धड़ा स्वर्गीय अब्दुल्लाह के बेटे मुतअब के साथ है. सत्ता को लेकर गुटबाज़ी का यह सिलसिल यहीं नहीं थमा है, बल्कि यमन पर हवाई हमले को लेकर कुछ वरिष्ठ मंत्री शाह सलमान की नीति के सख्त विरोधी हो गए हैं. ऐसे मंत्रियों में देश के आइकॉन कहे जाने वाले पूर्व विदेश मंत्री सऊद फैसल एवं पूर्व उत्तराधिकारी मुकरीन भी शामिल हैं. यमन पर हवाई हमले का विरोध करने की वजह से इन दोनों को पदमुक्त कर दिया गया है और अब यह सूचना आ रही है कि मुकरीन नज़रबंद हैं.
तमाम विरोधों के बावजूद शाह सलमान ने अपनी जिद के चलते और अमेरिका के इशारे पर यमन पर हमला कर दिया, जिससे उन्हें कोई राजनीतिक लाभ तो हासिल नहीं हुआ, बल्कि इस्लामी दुनिया में उनकी ज़बरदस्त बदनामी हुई है. इस हमले के चलते सऊदी अरब की आंतरिक और विदेशी, दोनों स्तर पर जबरदस्त आलोचना हो रही है. पूरा इस्लामी जगत नाराज़ है, क्योंकि शाह सलमान ने इस फैसले के ज़रिये अपने राजनीतिक हितों के लिए एक मुस्लिम देश को तबाही के मुहाने तक पहुंचा दिया है. इस वजह से यमन में सैकड़ों लोगों की जानें जा चुकी हैं और हज़ारों लोग बेघर हो गए हैं. स्वयंसेवी संगठन ऑक्सफाम के अनुसार, यमन में एक करोड़ 60 लाख लोग स्वच्छ पेयजल से वंचित हैं, जिसके चलते मलेरिया, कालरा और डायरिया जैसी बीमारियों का ख़तरा बढ़ गया है. यह सब सऊदी हमले के चलते हुआ है. इसके अलावा इस जंग ने क्षेत्र में मसलकी विवाद भी भड़का दिए हैं.
दरअसल, सऊदी अरब हौतियों से यमन की राजधानी सनआ को ख़ाली कराना चाहता है. हौती ईरान से समर्थन प्राप्त शिया समूह है, जो राष्ट्रपति मंसूर हादी के महल पर क़ाबिज़ हो गया था. मंसूर हादी को सत्ता वापस दिलाने के लिए सऊदी अरब यह सारा खेल खेल रहा है. इस खेल की वजह से ईरान तो नाराज़ है ही, सऊदी अरब के अंदर 15 प्रतिशत शिया आबादी भी सख्त नाराज़ है. यह 15 प्रतिशत आबादी पहले भी सऊद परिवार को तख्त से बेदख़ल करने की कोशिश कर चुकी है.
लिहाज़ा, 2011 में शिया बहुसंख्यक क्षेत्र क़ती़फ में शाही परिवार के ख़िला़फ प्रदर्शन हुआ था, जिसमें 20 लोग मारे गए थे. अभी हाल में भी एक प्रदर्शन हुआ है, जिसमें शेख़ बाक़िर के समर्थन में सरकार के विरुद्ध नारे लगाए गए. शिया धर्मगुरु बाक़िर अलनमर को फांसी की सज़ा सुनाई गई है. शेख़ बाक़िर की सज़ा-ए-मौत और यमन में हौतियों पर हमले को लेकर पड़ोसी देश बहरीन में भी सऊदी अरब के ख़िला़फ प्रदर्शन हुआ है और ख़ुद यमन क़बायली अब हमले से नाराज़ होकर सऊदी अरब के सीमावर्ती क्षेत्रों में स्थित सरकारी संपत्तियों को नुक़सान पहुंचा रहे हैं. सऊदी हमले का बदला लेने के लिए यमन के क़बायली ज़ोहरान, जाज़ान और नजरान, जो कि यमन के सीमावर्ती क्षेत्र हैं, उनकी बस्तियों पर हमले करके सरकारी संपत्तियों को ज़बरदस्त नुक़सान पहुंचा रहे हैं. इन हमलों में कभी-कभी नागरिकों को भी नुक़सान पहुंचता है.
ख़ुलासा यह है कि क़ती़फ में शियाओं के विरोध, पड़ोसी देश बहरीन में हुए प्रदर्शन और यमन की ओर से क़बायली हमलों ने सऊदी अरब के लिए आंतरिक-विदेशी, दोनों स्तरों पर एक ऐसा दलदल तैयार कर दिया है, जिससे निकलना उसके लिए कठिन से कठिन बनता जा रहा है. यही कारण है कि फ्रांस के राष्ट्रपति ने खाड़ी चोटी कांफ्रेंस में मशविरा दिया था कि सऊदी अरब को यह समस्या बातचीत द्वारा हल करके जल्द से जल्द इस दलदल से बाहर आना चाहिए.

सऊदी अरब हौतियों से यमन की राजधानी सनआ को ख़ाली कराना चाहता है. हौती ईरान से समर्थन प्राप्त शिया समूह है, जो राष्ट्रपति मंसूर हादी के महल पर क़ाबिज़ हो गया था. मंसूर हादी को सत्ता वापस दिलाने के लिए सऊदी अरब यह सारा खेल खेल रहा है. इस खेल की वजह से ईरान तो नाराज़ है ही, सऊदी अरब के अंदर 15 प्रतिशत शिया आबादी भी सख्त नाराज़ है. यह 15 प्रतिशत आबादी पहले भी सऊद परिवार को तख्त से बेदख़ल करने की कोशिश कर चुकी है. लिहाज़ा, 2011 में शिया बहुसंख्यक क्षेत्र क़ती़फ में शाही परिवार के ख़िला़फ प्रदर्शन हुआ था, जिसमें 20 लोग मारे गए थे. अभी हाल में भी एक प्रदर्शन हुआ है, जिसमें शेख़ बाक़िर के समर्थन में सरकार के विरुद्ध नारे लगाए गए. शिया धर्मगुरु बाक़िर अलनमर को फांसी की सज़ा सुनाई गई है.

सऊदी अरब के अख़बारों में इमाम अबु तालिब मस्जिद पर हमले के पीछे ईरान का हाथ बताया जाता है. ईरान पर इस प्रकार के संदेह पहले से भी किए जाते रहे हैं. जैसा कि अमेरिका के सेना विशेषज्ञ ऑर्थर एच कोर्ड सुमान ने वर्ष 2005 में एक रिपोर्ट में कहा था कि सऊदी अरब को बाहरी ताक़तों से ज़्यादा आंतरिक ताकतों से ख़तरा है. यही शक्ति सऊदी की शहंशाहियत के लिए ख़तरनाक बनेगी. अलक़ायदा के ख़ात्मे के बाद शायद देश को शाह विरोधी ताकतों से मुक्ति मिल जाती, लेकिन ईरान के परमाणु संवर्धन और इराक में उसकी बढ़ती ताकत ने सऊदी राजनेताओं की नींद उड़ा दी. हो सकता है कि ईरान, जो सऊदी ख़ानदान का पहले से ही विरोधी था, सऊदी सरकार को कमज़ोर करने के लिए शियाओं को इस्तेमाल कर सकता है और शायद इसी मक़सद के लिए क़दीह की शिया मस्जिद इमाम अबु तालिब पर आत्मघाती हमले कराए गए हों, ताकि शिया और सुन्नी आपस में उलझ जाएं और देश फूट का शिकार हो जाए.
जानकारों का मानना है कि आत्मघाती हमले के लिए क़दीह का चयन करने के पीछे कोई साजिश हो सकती है. दरअसल, यह क्षेत्र सऊदी अरब के लिए अति संवेदनशील और महत्वपूर्ण है. यहां पेट्रोल, खजूर, मेवा और मछलियों का भंडार है. इस क्षेत्र में हीरों का व्यापार बड़े पैमाने पर होता है. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जिस गांव अलक़दीह में यह मस्जिद थी, वह शिया बाहुल्य है. लिहाज़ा ईरान के लिए यहां के नौज़वानों को मसलकी बुनियाद पर अपनी मुहिम में शामिल करना आसान है और दूसरा फायदा यह है कि इस उपजाऊ क्षेत्र में राजनीतिक उथल-पुथल पैदा कर देने से सरकार को आर्थिक दृष्टि से बड़ा नुक़सान पहुंचाया जा सकता है. इस क्षेत्र को चुनने के पीछे एक कारण और भी हो सकता है. वह यह कि अरब क्रांति के मौक़े पर सीरिया में जो कुछ हुआ, उस तारीख़ को सऊदी अरब में लौटाना. यानी जिस तरह से 2011 में दमिश्क में 10 प्रतिशत सुन्नियों के क्षेत्र से बशर अलअसद के ख़िला़फ बग़ावत का आगाज़ हुआ था और यह बग़ावत फैलती हुई पास के ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंच गई थी और फिर कुछ महीनों में उसने पूरे देश को अपनी लपेट में ले लिया था.
इस बग़ावत में ईरान सुन्नियों के ख़िला़फ बशर अलअसद के साथ था, जबकि सऊदी अरब सुन्नियों का साथ दे रहा था. यहां तक कि उसने अमेरिका को सीरिया पर सैन्य हमले करने के लिए अनुशंसा भी कर दी थी, लेकिन अमेरिका क्षेत्र में किसी नई जंग की स्थिति में नहीं था. लिहाज़ा, वह जंग से बचता रहा. ईरान अब उसी तारीख़ को लौटा रहा है और सऊदी अरब के क्षेत्र क़ती़फ में शिया बाहुल्य क्षेत्रों से उसी प्रकार शाही परिवार के ख़िला़फ बग़ावत बुलंद कराना चाहता है, जिस प्रकार सऊदी अरब ने सीरिया में सुन्नी बाहुल्य क्षेत्र से शिया सरकार यानी बशर अलअसद के ख़िला़फ विद्रोह को हवा दी थी. अगर यह विश्लेषण सही है, तो समझ लेना चाहिए कि सऊदी अरब बेहद चिंताजनक परिस्थितियों से गुज़र रहा है, क्योंकि सीरिया में बशर अलअसद ने सुन्नी विद्रोह पर तो नियंत्रण कर लिया, लेकिन सऊदी अरब में तो शाही परिवार के अंदर ही विद्रोह ज़ोरों पर है. ऐसी स्थिति में अगर बग़ावत होती है, तो शाह सलमान के लिए हालात पर नियंत्रण पाना बहुत मुश्किल हो जाएगा. लेकिन, कुछ विद्वानों का कहना है कि सऊदी के शिया हालांकि शाही परिवार के विरोधी हैं, लेकिन वे ईरान के हाथों का खिलौना बनकर अपने देश को नुक़सान नहीं पहुंचा सकते. यही वजह है कि इतनी बड़ी घटना को लेकर वे आक्रोशित और दु:खी तो हैं, लेकिन अनियंत्रित नहीं हुए और न इसके लिए सुन्नियों को दोषी ठहरा रहे हैं.
विद्वानों का कहना है कि इस घटना को अंजाम देने वाला संगठन आईएसआईएस हो सकता है, जैसा कि उसने स्वीकार किया है और उसके एक सदस्य सालेह अब्दुल रहमान काशमी की पहचान भी हो चुकी है, जिसने अपने शरीर पर विस्फोटक बांध रखा था. दरअसल, आईएसआईएस सऊदी अरब से इराक और सीरिया पर हुए सैन्य हमलों का बदला लेना चाहता है. सऊदी अरब आईएसआईएस के विरुद्ध सहयोगियों में शामिल है और इराक़ में हवाई हमले करके आईएसआईएस को नुक़सान पहुंचा चुका है. उसी नुक़सान का बदला लेने के लिए आईएसआईएस ने सऊदी अरब में ऐसी वारदात को अंजाम दिया. इस सिलसिले में व्हाइट हाउस के प्रवक्ता जोश आर्नेस्ट का कहना है कि अभी विश्वास से नहीं कहा जा सकता कि इस घटना के पीछे कौन है. रही बात आईएसआईएस की, तो वह दबदबा क़ायम रखने के लिए इस प्रकार के झूठे दावे करता रहता है. ख़ैर, इस घटना को किसी ने भी अंजाम दिया हो, लेकिन यह एक शर्मनाक कृत्य है, जिसकी भारत के अनेक संगठनों समेत पूरी दुनिया की ओर से निंदा की जा रही है.
सऊदी अरब के बारे में अगर यह विश्लेषण सही है, तो इसका मतलब यह हुआ कि यमन पर हमला सऊदी अरब के गले की ऐसी फांस बन चुका है, जिसे न निगलते बने और न उगलते. इस हमले की वजह से पड़ोसी देशों में रोष है. इस्लामी जगत की ओर से आलोचना हो रही है, यमन की ओर से सीमावर्ती गांवों पर हमले हो रहे हैं, देश के अंदर जनता में आक्रोश पैदा हो रहा है और शियाओं के विद्रोह में तेज़ी आ गई है. सबसे बड़ी बात यह है कि शाही परिवार के कई वरिष्ठ सदस्य-पदाधिकारी शाह सलमान के ़िखला़फ हो गए हैं. यह विरोध कभी भी अपना रंग दिखा सकता है. यमन पर हमले के बाद शियाओं समेत सुन्नियों की भी एक बड़ी आबादी सरकार से नाराज़ है. जाहिर है, यह नाराज़गी किसी तूफान का कारण बन सकती है, जिस पर सऊदी राजनेताओं को अभी से ही विचार करना चाहिए.

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