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महिलाएं दुर्व्यवहार सहती रही हैं
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महिलाएं दुर्व्यवहार सहती रही हैं

जिस दिन अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के सौ साल पूरे हो रहे थे, उसी दिन दिल्ली में एक युवती की दिनदहाड़े हत्या कर दी गई. कुछ समय पहले ख़बर आई कि जोधपुर के एक अस्पताल में सोलह महिलाओं की मौत हो गई. जहां तक मेरी जानकारी है, मैं कह सकता हूं कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने उस अस्पताल का दौरा तक नहीं किया. इसमें कोई शक नहीं है कि इसके लिए उनके पास पर्याप्त बहाना भी था. बहाना इस बात का कि यह राज्य का मामला है और अशोक गहलोत को जाकर सहानुभूति प्रकट करनी चाहिए.

महिलाएं हमेशा से दुर्व्यवहार सहती रही हैं. द्रौपदी को भरी सभा में नंगा किया गया, जहां उसके सारे संबंधी मौजूद थे. सीता को अपनी पवित्रता साबित करने के लिए ख़ुद की अग्नि परीक्षा देनी पड़ी. अहिल्या को पत्थर बनना पड़ा. लेकिन भारत तभी एक महाशक्ति बन पाएगा, जब यहां की महिलाओं को उनके अंतिम पड़ाव तक एक शालीन जीवनशैली मिले.

अपने यहां एक अजीब पहेली इन दिनों देखी जा सकती है. भारतीय राजनीति में हर एक उच्च पद पर महिलाएं आसीन दिख रही हैं, चाहे वह राष्ट्रपति का पद हो या लोकसभा अध्यक्ष या कांग्रेस अध्यक्ष का पद. यहां तक कि लोकसभा में नेता विपक्ष, दिल्ली और उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री और बहुत संभव है कि तमिलनाडु एवं बंगाल में भी संभावित मुख्यमंत्री महिला ही हो. दूसरी ओर महिलाओं की जनसंख्या दिन-प्रतिदिन घटती ही जा रही है. भ्रूण हत्या के रूप में महिलाओं को जन्म लेने से पहले ही मार दिया जा रहा है. कम उम्र की युवतियों को ज़हर देकर या उनकी उपेक्षा (स्वास्थ्य संबंधी) करके भी उन्हें मौत के मुंह में धकेल दिया जाता है. नव विवाहिताओं को इसलिए पीटा जाता है कि वे अपने साथ दहेज में ख़ूब सारा सामान और पैसा क्यों नहीं लाईं. और तो और, खाप पंचायतों के तुग़लकी ़फरमान के बाद उन मासूम लड़कियों को मौत के घाट उतार दिया जाता है, जो अपनी मर्जी से अपना जीवनसाथी चुनना चाहती हैं. आख़िर हम इस विरोधाभास को कैसे देखें? एक ओर उच्च पदों पर आसीन महिलाएं और दूसरी ओर बाक़ी दुनिया की.

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ज़ाहिर है, यह सब एक वर्ग और लिंग का मिश्रण है. उच्च वर्ग और उच्च जातियों की महिलाओं के पास इतने अवसर हैं कि वे आगे बढ़ सकें. साथ ही उन्हें अपने परिवार का समर्थन भी हासिल है. ऐसी महिलाएं जो राजनीति में हैं और अविवाहित हैं या जिन्हें अपने पति का पूरा समर्थन है (जैसे राष्ट्रपति पाटिल),उन्हें सहूलियत होती है. कई पति तो अपनी पत्नियों का करियर आगे बढ़ाने के लिए ख़ूब मेहनत भी करते हैं और समर्थन भी देते हैं. लालू यादव द्वारा राबड़ी देवी को आगे बढ़ाने का उदाहरण सामने है, लेकिन मेरी दृष्टि में महिलाओं की अवहेलना के मामले बढ़ते जा रहे हैं. ऐसा भारतीय संस्कृति में का़फी समय से चलता आ रहा है. अगर आप भगवद्‌गीता पढ़ें तो इसके 700 श्लोकों में महज़ दो जगह महिलाओं का ज़िक्र आता है. पहले अध्याय में अर्जुन कहता है कि यदि उसने अपने भाइयों को मारा तो इससे कुल का नाश हो जाएगा और कुल की महिलाएं पथभ्रष्ट हो जाएंगी. ऐसी स्थिति में वर्ण में मिलावट आ जाएगी. कृष्ण उसकी बातों का जवाब नहीं देते, बल्कि उसे आगे बढ़ने और हत्या करने के लिए कहते हैं.

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बाद में कृष्ण यह कहते हुए सुनाई देते हैं कि जो लोग पापायोन्याह यानी नीच उत्पति (महिला, वैश्य और शूद्र) के होते हैं, वे भी भक्ति के रास्ते मेरे क़रीब आ सकते हैं. इन दो अवसरों (दोनों श्लोक महिलाओं के प्रति नकारात्मक) को छोड़कर शेष गीता में सारी बातें पुरुषों से ही संबंधित हैं. एक आम धारणा यह हो सकती है कि संपूर्ण गीता पुरुष-पुरुष संवाद पर आधारित है या मनुष्य-भगवान संवाद है या कर्म योग या ज्ञान योग की बातें हैं, जिनमें महिलाओं के लिए कुछ न होना सामान्य बात है (यहां तक कि वैश्य और शूद्रों के लिए भी). बहुत से पुरुषों ने गीता पर टीकाएं लिखी हैं, लेकिन कितनी महिलाओं ने ऐसी टीका लिखी है? जहां तक मुझे याद है, एनी बेसेंट एक ऐसी अकेली महिला हैं, जिन्होंने गीता पर टीका लिखी. हो सकता है कि कुछ और महिलाओं ने भी लिखा हो, लेकिन कुल मिलाकर गीता अभी भी पुरुषों के ही क़ब्ज़े में है. यह कोई दुर्घटना नहीं है. महिलाओं के लिए गीता एक प्रतिकूल दस्तावेज़ है.

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महिलाएं हमेशा से दुर्व्यवहार सहती रही हैं. द्रौपदी को भरी सभा में नंगा किया गया, जहां उसके सारे संबंधी मौजूद थे. सीता को अपनी पवित्रता साबित करने के लिए ख़ुद की अग्नि परीक्षा देनी पड़ी. अहिल्या को पत्थर बनना पड़ा. लेकिन भारत तभी एक महाशक्ति बन पाएगा, जब यहां की महिलाओं को उनके अंतिम पड़ाव तक एक शालीन जीवनशैली मिले.

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