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जातीय गणित में उलझा उत्तर प्रदेश
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जातीय गणित में उलझा उत्तर प्रदेश

mixer-praniउत्तर प्रदेश की जनता दिल्ली की गद्दी के लिए किसे अपना रहनुमा चुनेगी? चुनाव किन मुद्दों पर लड़ा जाएगा? बढ़ती मंहगाई और भ्रष्टाचार का मुद्दा चुनाव में क्या भूमिका निभाएगा? वोट बैंक की राजनीति लोकसभा चुनाव में भी हावी रहेगी? अगड़े वोटर किधर जाएंगे, पिछ़डों का वोट किसे मिलेगा? दलित बसपा के ही साथ जमे रहेंगे? मुसलमान क्या पाला बदलेंगे? या फिर अबकी पुरानी रवायतों को तोड़कर जनता प्रदेश के विकास की बात करने वालों को चुनेगी? तमाम ऐसे ही सवालों का जबाव तलाशने में उत्तर प्रदेश के लगे हुए हैं. जनता भी इन सवालों में ख़ूब दिलचस्पी ले रही है, पर किसी के हाथ में सही नंबर की चाबी नहीं लग रही है, जिससे उसकी क़िस्मत का ताला खुल जाए. विभिन्न दलों के नेताओं के बीच दिल्ली की सत्ता के लिए चूहे-बिल्ली जैसा खेल चल रहा है. चरित्र हनन से लेकर राजनीतिक चीरहरण तक सब कुछ राजनीति के मंच पर घटित हो रहा है. राजनेताओं की मैं हीरो बाकी सब ज़ीरो की अवधारणा ने राजनीति को बाज़ार और जनता को ग्राहक बना दिया है. फ़िलहाल, ख़ामोशी की चादर ओढ़कर जनता सबको सुन रही है, लेकिन इसे इस बात का मलाल ज़रूर है कि नेताओं के बड़े-बड़े वायदों-इरादों और बड़बोलेपन ने लोकतंत्र को शर्मसार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. मैं सही, बाक़ी सब ग़लत, राजनेताओं में पनपती यह सोच देश के लिए ख़तरे की घंटी साबित हो रही है, लेकिन उसकी किसी को रत्ती भर भी परवाह नहीं है.

आज हालात यह हैं कि जो नेता खोजने पर भी नहीं मिलते थे, वह जनता के क़रीब आने का मौक़ा तलाशते रहते हैं. सामाजिक से लेकर निजी कार्यक्रमों तक में नेताओं की भागीदारी अचानक काफ़ी तेजी से बढ़ गई है. बड़ी-बड़ी जनसभाएं करके मतदाताओं को लुभाया जा रहा है. राजनीति के मैदान में कांगे्रस-भाजपा और समाजवादी पार्टी तो काफ़ी समय से ताल ठोंक ही रही थीं, अब बसपा नेत्री मायावती भी मैदान में कूद पड़ी हैं. गत दिनों वह लगभग तीन माह के बाद लखनऊ पहुंची तो उनके तेवरों ने विरोधियों के छक्के छुड़ा दिए. संगठन के पेंच कसने, प्रत्याशियों की ज़मीनी हक़ीक़त का अंदाज़ा लगाने के अलावा बसपा सुप्रीमो मायावती के पहले ही वार में साफ़ हो गया कि वह किसी को छूट नहीं देंगी. भाजपा ने उन्हें तिकड़ी की उपमा दी तो माया ने आडवाणी-मोदी और राजनाथ को तिकड़ी कह कर संबोधित किया. उन्होंने कहा कि इस तिक़डी के बीच चल रहे आपसी संघर्ष का फ़ायदा बसपा को मिलेगा. इसके साथ ही कांगे्रस को भी बता दिया कि वह इस ग़लतफहमी में न रहे कि बसपा उनके साथ मिलकर आम चुनाव लड़ने जा रही है. माया के बयान से इन कांगे्रसियों को करारा झटका लगा है, जो 2014 के आम चुनाव मे बसपा की बैसाखी से कांगे्रस को मज़बूती देने की कोशिश में लगे थे. इस मामले में एक केन्द्रीय मंत्री और बसपा की तरफ़ से कोई बयान नहीं जारी करने की वजह से गठबंधन को लेकर अफवाहों का बाज़ार काफ़ी समय से गर्म था. बसपा नेतृत्व को क़ानूनी मामलों से राहत दिए जाने के बाद तो कांगे्रस-बसपा के बीच कुछ पक रहा है, इसको लेकर चर्चा काफ़ी ही गंभीर हो गई थी. माया ने न केवल कांगे्रस के साथ गठबंधन की बात नकार दी, बल्कि उन्होंने राहुल को भी आड़े हाथों लिया. माया ने राहुल पर तंज कसते हुए कहा कि वह चाहें तो हज़ार दलित नेता पैदा कर सकते हैं, उन्हें किसने रोका है. ग़ौरतलब हो राहुल ने गत दिनों आरोप लगाया था कि मायावती ने किसी दूसरे दलित नेता को नहीं उभरने दिया था. वैसे, गठबंधन वाली बात पर राजनीतिक पंडितों का कहना है कि मायावती ऐसे ही नहीं कांग्रेस से गठबंधन की बात से इन्कार कर रही हैं. उनका 1996 में कांगे्रस के साथ का अनुभव अच्छा नहीं है. तब दोनों ने मिलकर उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव लड़ा था. इस प्रयोग से बसपा को नुकसान उठाना पड़ा था और बसपा नेतृत्व ने कहा भी था कि दलित वोट बैंक तो कांगे्रस में ट्रांसफर हो गया, लेकिन कांगे्रस के वोटरों ने बसपा प्रत्याशियों को वोट नहीं दिया. बसपा के एक नेता का कहना था कि पश्‍चिमी उत्तर प्रदेश में दंगों के बाद कांगे्रस को अपने सहयोगी राष्ट्रीय लोकदल पर भरोसा नहीं रह गया है, इसीलिए वह बसपा की ओर देख रही है. माया का कहना था आगामी लोकसभा और चार राज्यों के चुनाव में बसपा बैलेंस ऑफ पॉवर बन कर उभरेगी.

बसपा सुप्रीमो ने एक तरफ तो लम्बे समय से चल रहे कयासों को विराम देते हुए स्पष्ट कर दिया कि न तो उनका गठबंधन कांगे्रस से होगा, न ही भाजपा से, वह अपने दम पर चुनाव लड़ेगी तो दूसरी तरफ मायावती ने सबसे तगड़ा हमला अपनी प्रबल प्रतिद्वंद्वी सपा पर किया. समाजवादी पार्टी के पिछड़े कार्ड की हवा निकालने की तैयारी करके दिल्ली से लखनऊ पधारीं माया ने पिछड़ों को मुलायम से सचेत रहने का आह्वान किया. समाजवादी पार्टी की सामाजिक न्याय यात्रा को उन्होंने छलावा करार देते हुए कहा कि समाजवादी पार्टी ने पहले ही ओबीसी (पिछड़ा वर्ग) का ख़ासा नुकसान किया है, अब इसे और बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. बसपा सुप्रीमो ने कहा कि सपा को सामाजिक न्याय यात्रा पर जाने से पूर्व इन 17 जातियों के साथ किए गए पहले अपराध पर मांफ़ी मांगनी चाहिए थी.

बताते चलें कि सपा सरकार ने पिछले शासनकाल में भी एक शासनादेश जारी किया था, जिसे कोर्ट ने अवैध क़रार दे दिया था. बसपा समाजवादी पार्टी पिछड़ा कार्ड खेलने को लेकर पूरी तरह से तत्पर है.

बसपा नेत्री ने मुसलमानों पर भी डोरे डाले. मुज़फ़्फ़रनगर दंगों के आरोपियों को कठोर क़ानूनी सज़ा न मिल पाने का मुद्दा उठाते हुए मायावती ने इसे सपा और भाजपा के बीच मिलीभगत से जोड़कर पेश किया. माया का हमला तीखा था. यही वजह थी कि

समाजवादी नेता बुरी तरह से बौखला गए. सपा के प्रवक्ता और अखिलेश सरकार में मंत्री राजेन्द्र चौधरी ने माया पर कटाक्ष करते हुए कहा कि वह पुराने पन्ने पढ़ने की आदी हैं. सपा-भाजपा के बीच मिलीभगत का अरोप लगाते समय मायावती अपने राखी के बंधन को भूल गईं. भाजपा के ही चलते वह तीन बार मुख्यमंत्री बनी थीं. भाजपा ने भी माया को नसीहत दी कि वह भाजपा नेताओं के लिए परेशान न हों और अपनी चिंता करें.

बहरहाल, इसे देश का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि हमारे नेतागण अपने राजनीतिक हित साधने के लिए देश महापुरुषों को भी जाति के फंदे में कसने से बाज़ नहीं आते हैं, जो महापुरुष ताउम्र जातिवाद से दूर रहे, उनकी जातियों को खंगाला जा रहा है. सरदार पटेल कभी भारत की आन-बान-शान हुआ करते थे, लेकिन अब उनका नाम पिछड़ों को लुभाने के लिए इस्तेमाल होता है. पटेल की विरासत को लेकर भाजपा और कांगे्रस में ही नहीं, कई क्षेत्रियों दलों तक में ठनी हुई है. इसी प्रकार से महात्मा गांधी कभी देश के बापू हुआ करते थे, लेकिन वो दिन लद गए. अब गांधी जी बनिया जाति के हैं. स्वामी विवेकानंद कभी राष्ट्र के गौरव होते रहे होंगे, अब कायस्थ जाति के हैं. समाजवादी विचारधारा के चिंतक डॉ. राम मनोहर लोहिया जी अब अग्रवाल हो गए हैं. राष्ट्र के लिए त्याग तपस्या और शौर्य के लिए कभी स्थापित रहे होंगे महाराणा प्रताप, कभी बाबा साहब अंबेडकर ने संविधान का मसौदा तैयार करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया होगा, लेकिन आज महाराणा प्रताप राजपूत जाति के तो बाबा साहब दलित जाति का होने के कारण अपनी पहचान बना रहे हैं. सरदार वल्लभभाई पटेल कभी राष्ट्रीय एकता के पर्यायवाची रहे होंगे, लेकिन आज कुर्मी जाति के हैं. सारे महापुरुष किसी न किसी जाति के फ्रेम में बांध दिए गए हैं. बात पिछले कुछ दशकों की करें तो इस दौर में भी कई सर्वमान्य नेताओं को भी उनके समर्थकों ने समय-समय पर जातिवाद की चाशनी में खूब डुबोया. भाजपा ने अटल बिहारी वाजपेयी, कलराज मिश्र, मुरली मनोहर  जोशी को ब्राहमण, कल्याण सिंह को लोध, राजनाथ सिंह को क्षत्रिय, ओम प्रकाश सिंह को पिछड़ा समाज, विनय कटियार को हिन्दुत्व का चेहरा बनाकर खूब राजनीति की. इसी तरह से कांगे्रस ने पहले कमलापति त्रिपाठी, नारायण दत्त तिवारी, राम प्रकाश गुप्ता, महावीर प्रसाद जैसे तमाम नेताओं का इस्तेमाल जातिवाद की राजनीति को हवा देने के लिए किया और अब यही काम केन्द्रीय मंत्री श्री प्रकाश जायसवाल, सलमान खुर्शीद, बेनी प्रसाद वर्मा जैसे नेता कर रहे हैं. तीन बार मुख्यमंत्री बने मुलायम सिंह यादव हमेशा अपने आप को पिछड़ों और मुसलमानों के नेता के रूप में प्रचारित-प्रसारित करते रहे. यही काम अब उनके पुत्र अखिलेश यादव कर रहे हैं. सपा में आजम खां अपने आप को अल्पसंख्यकों का रहनुमा, नरेश अग्रवाल वैश्य समाज का ठेकेदार समझते हैं. मायावती तो अपने आप को दलितों का मसीहा ही मानती हैं. भले ही उनके विरोधी कहते रहते हैं कि मायावती दलित की नहीं दौलत की बेटी हैं.

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