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भारत कितना लाभान्वित
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भारत कितना लाभान्वित

अमेरिका के साथ मिलकर ईरान ने अन्य राष्ट्रों के साथ परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में समझौता किया है. इस समझौते से विश्‍व के देशों को मंदी की मार से उबरने में काफ़ी हद तक सहायता मिलेगी. इस समझौते से भारत जैसे देश को भी प्रत्यक्ष रूप से फ़ायदा होता दिख रहा है. भारत ने इस समझौते का स्वागत भी किया है. हालांकि विश्‍व के कुछ देश समझौते का विरोध भी कर रहे हैं. अब यह देखने वाली बात होगी कि इस समझौते के क्या दूरगामी परिणाम होंगे.

americaअमेरिका के नेतृत्व में विश्‍व के छह शक्तिशाली देशों के साथ ईरान ने परमाणु ऊर्जा समझौता किया है. ऐसा कर वह अपने आर्थिक संकट को समाप्त करने के लिए एक सकारात्मक क़दम उठाया है. इस समझौते के महत्वपूर्ण बिंदुओं में ईरान को मध्यम औसत के 20 प्रतिशत यूरेनियम संवर्धन की अनुमति प्राप्त होगी, लेकिन वह इससे परमाणु हथियार नहीं बना सकेगा. इसके अलावा ईरान ने जो अधिक संवर्धन किया है, वह इसे रोक देगा और विश्‍व संस्थानों को निरीक्षण करने में सहयोग करेगा. इस समझौते का पूरे विश्‍व में स्वागत किया जा रहा है. भारत जैसे मित्र देश से लेकर संयुक्त अरब अमीरात, जिसका ईरान के साथ तीन द्वीपों अबु मूसा, तनब कुब्रा एवं तनब सुग्रा पर वर्षों से मतभेद जारी है, ने भी इसका स्वागत किया है, लेकिन कुछ ऐसे देश भी हैं, जो इस समझौते से ख़ुश नहीं हैं. इनमें से एक इजराइल है, जो किसी न किसी बहाने ईरान पर हमले का मौका ढूंढ रहा था, लेकिन इस समझौते ने इसके इरादों को नाकाम बना दिया. यही कारण है कि इजराइली प्रधानमंत्री बेनजामिन नेतनयाहू इस समझौते से न केवल नाख़ुश हैं, बल्कि उन्होंने इस समझौते को ऐतिहासिक भूल बताते हुए कहा है कि दुनिया का सबसे ख़तरनाक राष्ट्र दुनिया के सबसे घातक हथियार की प्राप्ति की ओर महत्वपूर्ण क़दम उठाने में सफल हो गया है. साथ ही उन्होंने यह भी साफ़ कर दिया है कि इजराइल इस समझौते पर प्रतिबद्ध नहीं है.

सउदी अरब का रुख सकारात्मक नहीं

सउदी अरब की ओर से जो बयान आ रहा है, इससे भी अंदाज़ा लगाया जा रहा है कि वह इस समझौते को सकारात्क दृष्टि से नहीं देख रहा है. सउदी अरब के विदेशी मामलों के सलाहकार का कहना है कि इस समझौते से ईरान को खाड़ी क्षेत्रों में खुला रास्ता मिल जाएगा. दरअसल, ईरान में 1979 की क्रांति के बाद इजराइल व अन्य अरब राष्ट्र (जहां बादशाहत है) ईरान को अपने लिए बड़ा ख़तरा मानते हैं. इजराइल का आरोप है कि ईरान इजराइल विरोधी संगठनों को आर्थिक सहायता और आधुनिक हथियार उपलब्ध कराता है, जिनमें सबसे ताक़तवर लेबनान का संगठन हिज़्बुल्ला है, जबकि सउदी अरब का आरोप है कि ईरान सुन्नी राष्ट्रों में अप्रभावी शिया बिरादरियों का समर्थन करता है, ताकि बहुल राष्ट्रों को नुक़सान पहुंचाया जा सके. सउदी अरब का कहना है कि ईरान के पास जितने परमाणु प्रतिष्ठान उपलब्ध हैं, उनकी मदद से भविष्य में वह परमाणु बम तैयार कर सकता है. इस समझौते के बाद ईरान को सुन्नी देशों में अपना प्रभुत्व जमाने का एक और मौक़ा मिलेगा, लेकिन क्या सउदी अरब की यह आशंका उचित है? क्या वास्तव में ईरान इस समझौते के बाद अरब देशों में अपनी गतिविधियां बढ़ा पाएगा? अगर परिस्थितियों का जायज़ा लिया जाए, तो अनुमान होता है कि सउदी अरब की आपत्ति का कारण यह समझौता नहीं, बल्कि खाड़ी क्षेत्रों में ईरान का बढ़ता प्रभाव है. ईरान के साथ वर्षों तक युद्ध की स्थिति में रहने वाले इराक की नीति 2003 के बाद बदल गई है और वह एक दुश्मन से मित्र देश बन गया है. हालांकि 2011 में मिस्र में सउदी अरब विरोधी सरकार बनी, लेकिन शीघ्र ही इसका अंत हो गया. इस प्रकार अरब क्षेत्रों में एक ओर ईरान के मित्र देशों की बढ़ती हुई संख्या और दूसरी ओर ईरान की ओर अमेरिकी झुकाव ने सइदी अरब को चिंता में डाल दिया है.

अमेरिका की सउदी अरब से दूरियां

अमेरिका सउदी अरब से दूर होता जा रहा है. अभी हाल ही में सउदी अरब ने ईरान के एक गहरे मित्र देश सीरिया पर मिसाइल से हमला करने पर दबाव डाला था. सउदी अरब ने युद्ध के सभी ख़र्चे उठाने का भी संकेत दिया था, लेकिन अमेरिका ने अचानक हमले से इन्कार करके सउदी अरब को निराश कर दिया. इधर, सउदी अरब ईरान पर परमाणु ऊर्जा को लेकर आर्थिक प्रतिबंध में अधिक स़ख्ती की आशा कर रहा था, लेकिन पश्‍चिमी देशों ने इस पर प्रतिबंध हटाने का रास्ता साफ कर दिया है.

वैसे, सउदी अरब की यह आशंका किसी हद तक सही भी हो सकती है, क्योंकि रेज़ा शाह पहलवी के कार्यकाल में अमेरिका सउदी अरब के बजाए ईरान से अधिक नज़दीक था, लेकिन इसके बाद ईरान में कट्टर इस्लाम को मानने वालों के हावी होने से अमरीका धीरे-धीरे ईरान से दूर और सउदी अरब से क़रीब होता गया. अहमदीनेज़ाद के दौर में यह दूरी आगे बढ़ी, लेकिन इनके बाद जब हसन रूहानी राष्ट्रपति बने तो उन्होंने उदारवाद का रास्ता अपनाया. उनके इसी उदारवाद की ओर इशारा करते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा भी कह चुके हैं कि उनके राष्ट्रपति बनने के कारण ही यह समझौता संभव हो सका है. ज़ाहिर है, अगर हसन रुहानी कट्टर इस्लामवाद के बजाए उदारवाद को अपनाते हैं, तो रेज़ा शाह पहलवी की तरह अमेरिका का झुकाव ईरान की ओर ही रहेगा और ऐसी स्थिति में ईरान और सीरिया खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका से गठबंधन करके सुन्नी अरब राष्ट्रों के लिए परेशानियां खड़ी कर सकते हैं. ये ही वे कारण हैं, जिससे सउदी अरब नहीं चाहता है कि ईरान पर अमेरिका की नकेल ढीली पड़े एवं इन दोनों राष्ट्रों के संबंध मधुर हों.

अधिकांश राष्ट्र समझौते के पक्ष में

कुछ राष्ट्रों के अलावा सभी राष्ट्र इस समझौते को सकारात्मक दृष्टि से देख रहे हैं. इस समझौते के बाद ईरान को आर्थिक संकट से बाहर निकलने का मौक़ा मिलेगा. यह प्रतिबंध संयुक्त राष्ट्र की ओर से 2006 में लगाया गया था. यूं तो अमेरिका व ईरान के व्यापारिक संबंध 1995 से ही बंद थे, लेकिन 2006 के बाद इस पाबंदी में स़ख्ती बढ़ती गई और 2007 में परमाणु ऊर्जा पर प्रतिबंध के अलावा ईरानी बैंक के साथ लेन-देन पर भी पाबंदी लगा दी गई थी. 2008 में इसमें और तेज़ी आ गई और ईरान के महत्वपूर्ण व्यक्तियों को विदेश यात्रा करने पर रोक लगा दी गई. इसके बाद 2009 और 2010 में भी पाबंदियों में अधिक स़ख्ती की घोषणा की गई. इधर कुछ दिनों से आर्थिक पाबंदी में अधिक स़ख्ती लाए जाने की बात कही जा रही थी, लेकिन अमेरिका के राष्ट्रपति ने इस मामले में रुचि दिखाई और ईरान को इस बात पर राज़ी कर लिया कि वह अपनी परमाणु ऊर्जा के संवर्धन को सीमित रखे. बदले में ईरान के सिविल प्रयोग के जहाज़ों की सुरक्षा के लिए मरम्मत और इसके निरीक्षण और तेल के विक्रय की राशि में लगभग 4.2 अरब अमेरिकी डॉलर रिलीज़ करने, ईरान के लगभग 40 करोड़ अमेरिकी डॉलर की राशि दूसरे देशों में शिक्षण संस्थानों को स्थानान्तरित करने की अनुमति दी जाएगी.

भारत की कूटनीति

भारत शुरू से ही ईरान की पाबंदी को लेकर अमेरिका से सीधे बात करने की ओर ध्यान दिलाता रहा है. लिहाज़ा, पिछले साल गुट निरपेक्ष आन्दोलन (एनएएम) के अवसर पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने तेहरान में ईरानी सुप्रीम लीडर आयतुल्ला ख़ामनेई से भेंट के दौरान अमेरिका से सीधे बात करने की सलाह दी थी, लेकिन तब यह ईरान की कड़ी नीतियों के कारण संभव नहीं हो सका. राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ईरान चाहता, तो बातचीत के द्वारा बहुत पहले ही इस समस्या को हल कर सकता था, लेकिन ये चीज़ें नई सरकार के आने के बाद ही संभव हो सकीं. भारतीय विदेश मंत्रालय ने इस समझौते का स्वागत करते हुए कहा है कि इस समझौते के बाद आगे की बातचीत के रास्ते प्रशस्त होंगे. इस समझौते से भारत इसलिए भी ख़ुश है, क्योंकि दोनों देशों के स्थिर व्यापारिक संबंध हैं. लंबे समय तक भारत ईरान के कच्चे तेल का दूसरा सबसे बड़ा क्रेता रहा है. हालांकि पश्‍चिमी राष्ट्रों की ओर से प्रतिबंध के बाद क्रय में कमी आई थी, फिर भी 2011-12 में भारत ने ईरान से 14.689 मिलियन टन तेल क्रय किया था. हालांकि पश्‍चिमी राष्ट्रों ने भारत को ईरान से संबंध ख़त्म करने और तेल न ख़रीदने पर बहुत दबाव डाला था, लेकिन भारत ने ईरान के साथ पुराने रिश्ते की ख़ातिर पश्‍चिमी दबाव को स्वीकार करने से इन्कार कर दिया था और अब, जबकि 6 देशों के साथ ईरानी समझौते के बाद पांबदी हटने की संभावनाएं पैदा हो गई हैं, तो उम्मीद है कि भारत एक बार फिर ईरानी तेल का बड़ा ख़रीदार बन जाएगा. इस समझौते के कारण भारत को सस्ता तेल मिलने की आशाएं बढ़ गई हैं. पेट्रोलियम मंत्रालय के अनुसार, अगर भारत ईरान से अतिरिक्त 11 मिलियन टन कच्चा तेल क्रय करता है तो 531 अरब रुपये की बचत होगी. इससे आम आदमी को फ़ायदा होगा और पेट्रोल व डीज़ल के मूल्यों में बार-बार होने वाली वृद्धि पर रोक भी लग पाएगी. इस समझौते से भारत को यह फ़ायदा होगा कि तेल क्रय का भुगतान भारत डॉलर में कर रहा था, लेकिन ईरानी बैंकों पर पाबंदी के कारण भारत के लगभग 5.3 अरब रुपये की राशि रुक गई थी. नये समझौते के बाद ईरान आसानी से डॉलर में राशि वसूल कर सकता है. इसके अलावा भारत-ईरान पाइप लाइन पर भी तेज़ी से काम होने की उम्मीद है. अगर यह उम्मीद पूरी हो जाती है और पाइप लाइन का काम चल पड़ता है तो भारत में गैस आपूर्ति की लागत में 20 से 30 प्रतिशत तक की कमी हो सकती है. इसके अलावा अन्य कई प्रयोग की चीज़ें जैसे चाय पत्ती, ऑटो मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक, पुर्जे़ और कृषि पैदावार में उच्च स्तर पर व्यापार होने के अलावा क्षेत्रीय ट्रांस्पोर्ट नेटवर्क और क्षेत्रीय सिक्योरिटी पर भी दोनों देशों के बीच काम हुआ है और अब इनमें तेज़ी आने की संभावना भी प्रबल

हुई है.

बहरहाल, ईरान को 6 महीने का समय दिया गया है. इस दौरान ईरान को समझौते की सभी शर्तों को अमल में लाना होगा. विशेषत: ईरान को अपनी परमाणु योजना के समझौते के अनुसार सीमित करना होगा, लेकिन प्रश्‍न यह है कि क्या ईरान अपनी ऊर्जा योजना को कम करेगा. अगर वह इसमें सफल नहीं हो सका, तो अमेरिका ने साफ़ कर दिया है कि सभी पाबंदियां पुन: लगाई जा सकती हैं.

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