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आदिवासी आज भी गुलाम है

आज देश के अधिकांश जंगलक्षेत्र एक ऐसी हिंसा की आग से धधक रहे हैं, जिसकी आंच को कहीं न कहीं पूरा देश महसूस कर रहा है. इस आग का कारण इन क्षेत्रों में माओवादी गतिविधियों का तेज होना है. देश की आज़ादी के बाद से ही सुलग रही इस आग ने आज एक विकराल ज्वालामुखी का रूप धारण कर लिया है. सरकारों द्वारा इस आग को लेकर ज़ाहिर की जा रही चिंताओं और मीडिया द्वारा किए जा रहे प्रचार के कारण आम समाज में भी यह धारणा मज़बूत हो रही है कि इस आग का सबसे बड़ा कारण नक्सलियों द्वारा हिंसक गतिविधियों को अंजाम दिया जाना है.

आज देश के वनों में सबसे बड़ा सवाल भूमि सुधार, वनों पर समुदायों के अधिकार व विकास का है, जिसे हल किए बग़ैर इन क्षेत्रों में शांति की कल्पना नहीं की जा सकती. आज सरकार द्वारा यह प्रचारित किया जा रहा है कि माओवादियों को ख़त्म करने से समस्या का हल हो जाएगा लेकिन यह आम जनता के साथ किया जा रहा एक बहुत बड़ा धोखा है.

यह धारणा एक हद तक सही है, लेकिन यह स्थिति का एकपक्षीय आकलन ही होगा. धरातल पर उतरकर अगर स्थिति का जायज़ा़ लिया जाए तो इसके पीछे सैकड़ों हज़ारो वर्षों से इन जंगलों में रहने वाले आदिवासियों व वनाश्रित समुदायों के साथ सरकारों के दमनात्मक रवैये और इन समुदायों के संघर्षों की एक लंबी दास्तान मिलेगी. विडंबना है कि आज़ादी के 63 वर्ष बीत जाने के बाद सरकार का ध्यान इन क्षेत्रों की तऱफ तब जा रहा है, जब वे ख़ुद इस आग में झुलसने लगी हैं. ऐतिहासिक रूप से वनों में आदिवासियों के संघर्षों का इतिहास लगभग 250 वर्ष पुराना है. वनों के अंदर ही स्वाधीनता पाने के लिए सबसे पहले संघर्ष का बिगुल बजाया गया था. हालांकि वनक्षेत्रों में यह संघर्ष देश आज़ाद हो जाने के बाद आज भी ज़ारी है, यानि देश तो आज़ाद हो गया लेकिन आदिवासी आज भी गुलाम हैं.

ग़ौरतलब है कि इन संघर्षों की तमाम गाथायें आदिवासियों के गौरवमयी इतिहास में दर्ज हैं, जिन्होंने लगातार जनवादी तरीके को क़ायम रखते हुए संघर्ष की राह को नहीं छोड़ा. लेकिन सत्ता की भेदभावपूर्ण नीतियों और वनाश्रित समुदायों के संघर्षों की अनदेखी के चलते नतीजा यह हुआ कि समुदायों द्वारा तैयार किए गए इस जनवादी परिसर पर हथियारबंद ताक़तों ने अपना क़ब्ज़ा जमा लिया. ऐसा नहीं है कि देश के सभी वन क्षेत्रों में हथियारबंद आंदोलन ही चल रहे हों. मिसाल के तौर पर उत्तर प्रदेश, बिहार व झारखंड का कैमूर क्षेत्र, मध्य प्रदेश का रीवा क्षेत्र, उत्तर प्रदेश और नेपाल की सीमा से जुड़ा तराई क्षेत्र, पश्चिम बंगाल का पूर्वी हिस्सा, असम में काज़ीरंगा जैसे कई वनक्षेत्रों में व्यापक पैमाने पर दमन व उत्पीड़न होने के बावजूद जनवादी आंदोलन मज़बूती के साथ चल रहे हैं, जो न केवल सरकारों के लिए एक बड़ी चुनौती बने हुए हैं, बल्कि माओवादियों को भी पीछे धकेलने का काम कर रहे हैं. लेकिन विडंबना यह है कि इन जनवादी आंदोलनों को भी नक्सली आंदोलन की संज्ञा दी जा रही है.

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आज देश के वनों में सबसे बड़ा सवाल भूमि सुधार, वनों पर समुदायों के अधिकार व विकास का है, जिसे हल किए बग़ैर इन क्षेत्रों में शां‍ति की कल्पना नहीं की जा सकती. आज सरकार द्वारा यह प्रचारित किया जा रहा है कि माओवादियों को ख़त्म करने से समस्या का हल हो जाएगा, लेकिन यह आम जनता के साथ किया जा रहा एक बहुत बड़ा धो़खा है. दरअसल आज मामला माओवादियों से कहीं बहुत आगे जा चुका है, मामला अब जनता और सरकार के बीच सीधी टक्कर का है. यही वजह है कि सरकार को भी यह रास्ता आसान दिखाई पड़ता है कि माओवाद की आड़ लेकर जनवादी आंदोलनों को कुचल दिया जाए. इसकी वजह यह है कि सरकारों के लिए जनवादी आंदोलनों से जूझना, हथियार बंद आंदोलनों से जूझने से कहीं ज़्यादा मुश्किल होता है. आज वनक्षेत्रों में लोग सन्‌ 2006 में पास किए गए वनाधिकार क़ानून के तहत अपने अधिकारों को पाने के लिए जनवादी तौर-तरीक़ों से लामबंद हो रहे हैं. लेकिन इस क़ानून के लागू हो जाने के बाद भी सरकार की तऱफ से वनसमुदायों को उनके अधिकार वास्तविक रूप में देने के लिए कोई राजनैतिक इच्छा नहीं दिखाई दे रही है. इस क़ानून को लेकर सरकार में एक असमंजस की स्थिति बराबर बनी हुई है.

छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में सीआरपीएफ के जवानों की हत्या के बाद वन एवं पर्यावरण मंत्री ने माओवादियों से लड़ने के लिए वन विभाग की मदद लेने की बात कही. हैरत की बात है कि देश की आज़ादी के 63 सालों में से क़रीब 40 वर्षों तक राज करने वाली पार्टी को शायद यह नहीं मालूम कि देश के जंगल क्षेत्रों में हथियार बंद आंदोलनों का सबसे बड़ा कारण वन विभाग द्वारा समुदायों के साथ किया गया अन्याय व उत्पीड़न ही है, जो आज भी बदस्तूर जारी है व जिसका उल्लेख वनाधिकार क़ानून की भूमिका में भी है. ग़ौर किया जाए तो इस क़ानून में नक्सल समस्या को हल करने के सूत्र भी छुपे हैं. यह देखना ज़रूरी होगा कि जिन इलाक़ों में माओवादी गतिविधियां जोर पर हैं, वहां वन विभाग की स्थिति क्या है. अगर इन इलाक़ों में वन विभाग मज़बूत है, तो ज़ाहिर सी बात है कि वहां माओवाद नहीं है. अगर है भी तो वह माओवादियों के नाम पर राज्य को मदद करने वाला क्षेत्रीय सामंतों तथा पुलिस का पैदा किया कोई गुट हो सकता है. उदाहरण के तौर पर झारखंड, बिहार, मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ राज्यों की सीमा से सटे उत्तर प्रदेश के कैमूर क्षेत्र में आने वाले जनपद सोनभद्र का नाम लिया जा सकता है. इस जनपद में सामंती ताक़तों, बड़ी-बड़ी कंपनियों, वन विभाग व पुलिस द्वारा यहां के वनक्षेत्रों में रहने वाले दलित-आदिवासी समुदायों और अन्य ग़रीब वनाश्रितों का किया जाने वाला उत्पीड़न अपने चरम पर है. इस जनपद को राज्य पुलिस द्वारा माओवादी गतिविधियों का गढ़ माना जाता है. इस इलाक़े में जंगल, खनिज और अन्य प्राकृतिक संपदाओं का अपार भंडार होना ही यहां के आदिवासी और अन्य वनाश्रितों की दरिद्रता का सबसे बड़ा कारण है. यहां आज़ादी के बाद राष्ट्र के विकास के नाम पर सरकार और बड़ी-बड़ी कंपनियों द्वारा आदिवासियों की जंगल, ज़मीन और प्राकृतिक संपदाओं की बड़े पैमाने पर लूट की गई. एक तऱफ अशिक्षित और विकास के रास्तों से पूरी तरह वंचित यहां के मूल निवासी आदिवासी व अन्य वनाश्रित समुदाय तो दूसरी तऱफ यहां की ज़मीनों पर बड़े पैमाने पर काबिज़ सभी तरह की सुविधाओं से लैस सामंती तबके व बाहर से आई पूंजीवादी ताक़तें. यानि एक ही ज़िले में एक-दूसरे से ठीक उलट दो तरह की दुनिया.

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आज जबकि तमाम वनाश्रित तबकों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्यायों को स्वीकार करते हुए बनाया गया वनाधिकार क़ानून देशभर में लागू हो चुका है, तब भी यहां के दलित आदिवासियों को उनके पुश्तैनी घर व ज़मीनों से लगातार बेदख़ल किया जा रहा है. इस इलाक़े में माओवादियों के होने की घोषणा किए जाने के पहले वन विभाग का जो अत्याचार था, वह इस घोषणा के बाद भी बरक़रार है. वन विभाग द्वारा आज़ादी के बाद से लगातार इस इलाक़े में क़ानूनी प्रक्रियाओं को पूरा किए बग़ैर अंग्रेजों द्वारा बनाए गए भारतीय वन अधिनियम, 1927 को इस्तेमाल करके स्थानीय लोगों की ज़मीनों को अपने नाम कराकर वनभूमि में बेशुमार इज़ा़फा किया गया. इसी काले क़ानून का इस्तेमाल करके यहां के आदिवासियों को अतिक्रमणकारी घोषित करके झूठे मुक़दमे दायर करना व जेल भेजना आज भी बदस्तूर जारी है. अवैध तरीक़े से जंगलों की अंधाधुंध कटाई और खनिज व वन संपदाओं की लूट में शामिल जहां का वन विभाग इतना ताक़तवर हो चुका हो कि बेख़ौ़फ होकर इन सारी कारगुज़ारियों को अंजाम दे रहा हो और जिसका अत्याचार अपने चरम को छू रहा हो, वहां पर माओवाद भला कैसे हो सकता है? लेकिन पुलिस व प्रशासन की रिकॉर्ड में यहां माओवाद ज़िंदा है, जिसे ख़त्म करने के नाम पर करोड़ो रुपयों का बजट आता है, जिसकी बंदरबांट की जाती है. दूसरी तऱफ कुछ दिन पहले यहां दौरे पर आए उत्तर प्रदेश के एडीजी ने यह बयान दिया कि अब उत्तर प्रदेश में माओवाद नहीं के बराबर रह गया है. सवाल है कि फिर वह कौन सा माओवाद है, जिसका शोर यहां की स्थानीय पुलिस लगातार मचाती रहती है. दरअसल उत्तर प्रदेश की सीमा में आने वाले इस इलाक़े में यहां की पुलिस का काम है झारखंड पुलिस द्वारा सौंपे गए कथित नक्सलियों को माओवादी साबित करके उनका एनकाउंटर कर देना या फिर उन्हें यहां की जेलों में ठूंस देना. यह स्थिति तब है जब उत्तर प्रदेश में फिलहाल दलित आदिवासी तबकों की हिमायती सरकार है, जिसके मूल एजेंडे में ज़मीन का सवाल प्रमुखता के साथ शामिल है. दूसरे यहां के लोग अपने जनवादी आंदोलनों की ताक़त से अपने छिने हुए हक़ कहीं-कहीं हासिल भी कर रहे हैं, जिसके कारण यहां वंचित समुदायों में एक उम्मीद सी बंधी रहती है और वे अति उग्रवाद के रास्ते को अख्तियार नहीं करते. लेकिन ज़मीन पर प्रशासनिक अमला सरकार की मंशा के ख़िला़फ ही तमाम कार्रवाईयां कर यथास्थिति को बनाए रखने की कोशिश में ही लगा रहता है.

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दरअसल वनों पर समुदायों के अधिकार का मामला सीधे-सीधे वर्ग संघर्ष का मामला है. वनाधिकार क़ानून के रूप में वनाश्रित समुदायों को पहली बार एक राजनैतिक हथियार हासिल हुआ है. इस क़ानून में यह निश्चित किया गया है कि वनभूमि, जिस पर राज्य व अभिजात्य वर्गों का एकाधिकार रहा है, उसे वंचित वनाश्रितों को हस्तांतरित किया जाए. भूमि हस्तांतरण की इस प्रक्रिया में ही ख़ूनी संघर्ष की प्रबल संभावनाएं छुपी हैं, जिसे स्वयं राजसत्ता में यथास्थिति बनाए रखने वाली ताक़तें हस्तांतरण की प्रक्रिया के दौरान अंजाम दे सकती हैं. एक तथ्य यह भी है कि जो हिंसात्मक गतिविधियां इन जंगलों में चल रही हैं, चाहे वह सरकार या माओवादी किसी तऱफसे भी हों, उनके केंद्र में वनाधिकार या फिर भूमि सुधार का मुददा कहीं भी नहीं है. इस बात पर भी कोई ग़ौर नहीं किया जा रहा कि मौजूदा दौर में वंचित तबकों में जिस सामूहिक राजनैतिक चेतना का उभार आ रहा है, वह दोनों तऱफ की दमनात्मक कार्यवाहियों पर सवाल उठा रहा है.

अगर आने वाले दिनों में कोई वर्ग संघर्ष होता भी है तो उसका नेतृत्व किसी माओवादी संगठन के हाथों में न होकर आम वनाश्रित, भूमिहीन, वंचित समुदायों के उसी तबके के हाथों में होगा, जो दोनों तऱफ की हिंसा का लगातार शिकार होते-होते पूरी तरह नाउम्मीदी के दौर से गुज़र रहा है. अब तय सरकारों को ही करना है कि वे वंचित समुदायों के अधिकारों को छीनने की प्रक्रिया को और तेज़ करके इस वर्गसंघर्ष को अपनी पराकाष्ठा तक पहुंचाने में मदद करना चाहती हैं या फिर पीढ़ियों से अपने बुनियादी हकों की बाट जोह रहे वंचितों के हकों की बहाली का रास्ता अख्तियार करके इस संभावित वर्ग संघर्ष का रुख़ अमन और शांति की दिशा की ओर मोड़ने में कामयाब साबित होती हैं.

(लेखिका सामाजिक कार्यकर्ता हैं)

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