fbpx
Now Reading:
आजाद कौन है?

सीपीआई (माओवादी) के प्रवक्ता कामरेड आज़ाद यानी गहरे रंग के और लंबे-दुबले चेरुकुरी राजकुमार नहीं रहे. आंध्र प्रदेश की पुलिस ने अपनी पीठ थपथपाते हुए बताया कि उन्हें आदिलाबाद के जोगपुर जंगल में हुई मुठभेड़ में मार गिराया गया. पुलिस के मुताबिक़, मुठभेड़ सरकेपल्ली गांव इलाक़े में हुई और लगभग चार घंटे तक चली. मुठभेड़ की बताई गई जगह पर बांस के घने पेड़ों और पथरीली चट्टानों का लंबा सिलसिला है यानी बचकर ग़ायब हो जाने की पूरी सहूलियत. मुठभेड़ रात के सन्नाटे में हुई, लेकिन आसपास के ग्रामीणों को गोलियां चलने की आवाज़ नहीं सुनाई दी. मुठभेड़ में आज़ाद के साथ स्वतंत्र पत्रकार एवं पार्टी के धुर समर्थक हेमचंद्र पांडे भी मारे गए. पुलिस के मुताबिक़, उसका सामना 25-30 माओवादियों से हुआ था, जो दोनों के ढेर होते ही भाग निकले. हैरत यह कि पुलिस टुकड़ी में कोई घायल नहीं हुआ. आज़ाद पार्टी में तीसरे नंबर के नेता थे और उनके चारों ओर लगभग 70 माओवादियों का सुरक्षा घेरा रहता था. अपने इलाक़े से निकल कर वह ख़ुद निहत्थे होते थे और निहत्थे समर्थकों के भरोसे रहते थे.

आज़ाद की हत्या ने माओवादी उभार में आग झोंकने और फ़िलहाल युद्ध विराम की कोशिशों पर विराम लगा देने का काम किया है. माओवादी ऐलान कर चुके हैं कि इस हत्या का बदला लिया जाएगा. मतलब कि उनकी ओर से अब अधिक और बड़े हमले होंगे. दूसरी तरफ़ पुलिस और सुरक्षाबलों की कार्रवाइयां और ज़ोर पकड़ेंगी. माओवादियों से निपटने के नाम पर वर्दीधारी गांवों पर धावा बोलेंगे. बेकसूर आदिवासियों को अपनी बंदूकों का निशाना बनाएंगे और महिलाओं पर अपनी मर्दानगी का जौहर दिखाएंगे. कुल मिलाकर गृह युद्ध के हालात परवान चढ़ेंगे.

मुठभेड़ की फ़र्ज़ी पुलिसिया कहानी का सच यह है कि आज़ाद का आदिलाबाद जाने का कोई कार्यक्रम नहीं था. वैसे भी इस इलाक़े से बहुत पहले माओवादियों का सफ़ाया हो चुका है और वहां उनका कोई सांगठनिक ढांचा नहीं है. नागपुर में बीती एक जुलाई को आज़ाद और हेमचंद्र सुबह साढ़े दस बजे रेल से पहुंचे थे, जहां सादी वर्दी में तैनात राज्य के स्पेशल इंटेलिजेंस ब्यूरो (एसआईबी) ने उन्हें धर दबोचा. पहले उन्हें करीमनगर ले जाने की योजना थी, लेकिन तेज़ बारिश के चलते किसी अज्ञात जगह ले जाया गया और वहां से मुठभेड़ की जगह तक. इस तरह आज़ाद और उनके साथी को उनकी ज़िंदगी से आज़ाद कर दिया गया. उनके शव के पास एक बंदूक भी बरामद दिखा दी गई. डॉ. रमन सिंह से लेकर चिदंबरम तक माओवादियों को कायर करार देते हैं कि वे घात लगाकर हमला बोलते हैं. लेकिन यह किस सभ्यता, नैतिकता और न्याय की निशानी है कि निहत्थे आदमी पर हमला किया जाए. न जाने कब से और पूरी दुनिया में इसे बहादुरी नहीं, कायरता में गिना जाता है. जिनेवा समझौता भी इसकी इजाज़त नहीं देता, जिस पर भारत ने भी दस्तख़त किए हैं.

आज़ाद की हत्या ने माओवादी उभार में आग झोंकने और फ़िलहाल युद्ध विराम की कोशिशों पर विराम लगा देने का काम किया है. माओवादी ऐलान कर चुके हैं कि इस हत्या का बदला लिया जाएगा. मतलब कि उनकी ओर से अब अधिक और बड़े हमले होंगे. दूसरी तरफ़ पुलिस और सुरक्षाबलों की कार्रवाइयां और ज़ोर पकड़ेंगी. माओवादियों से निपटने के नाम पर वर्दीधारी गांवों पर धावा बोलेंगे. बेकसूर आदिवासियों को अपनी बंदूकों का निशाना बनाएंगे और महिलाओं पर अपनी मर्दानगी का जौहर दिखाएंगे. कुल मिलाकर गृह युद्ध के हालात परवान चढ़ेंगे. हालांकि अभी से सीआरपीएफ माओवादियों के नियंत्रण वाले इलाक़ों में जाने से इंकार करने की मुद्रा में आ गई है. उसे पुलिस की हिफ़ाज़त की दरकार है. ख़बर गर्म है कि इस मुद्दे को लेकर छत्तीसगढ़ में पुलिस और सीआरपीएफ के आला अफसरों की बैठक में तीखी नोंकझोंक भी हुई. क्या पता कब सीआरपीएफ के जवानों में नौकरी छोड़ने के लिए भगदड़ मच जाए?

Related Post:  उत्तर प्रदेश: रामपुर में IPS अजय पाल शर्मा ने बच्ची के रेपिस्ट को मारी गोली

माओवादियों के ख़िला़फ सरकारी उन्माद से आख़िर किसका भला होगा? उन्हीं का, जो नहीं चाहते कि अमन-चैन क़ायम हो. कौन हैं वे लोग? उनकी शिनाख्त इस तथ्य की रोशनी में की जा सकती है कि सरकार के साथ बातचीत की ताज़ा कोशिशों में आज़ाद अहम किरदार थे. केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम ने बातचीत की शुरुआत के लिए इस जुलाई माह की तीन तारीख़ें तय की थीं, जिस पर माओवादियों को तीन जुलाई तक अपनी प्रतिक्रिया देनी थी. आज़ाद इसी सिलसिले में पार्टी नेताओं से मिलने नागपुर गए थे.

ऑपरेशन ग्रीन हंट की धमक के साथ ही कई संगठनों और व्यक्तियों की ओर से तमाम कोशिशें हुईं कि दोनों पक्ष बातचीत की मेज़ पर पहुंचें, लेकिन सरकारी रवैये ने आख़िरकार उन कोशिशों की हवा निकाल दी. ताज़ा पहल स्वामी अग्निवेश ने की थी. इस सिलसिले में माओवादियों से बातचीत के लिए सरकार की शर्तों को रखते हुए 11 मई को पी चिदंबरम ने उन्हें पत्र लिखा था. कहने को यह पत्र गोपनीय था, लेकिन ख़ुद गृह मंत्रालय ने इसे लीक करा दिया, ताकि देश को बताया जा सके कि मसले के हल के लिए सरकार किस क़दर संजीदा है. माओवादियों की ओर से आज़ाद ने 31 मई को स्वामी अग्निवेश को ख़त लिख कर सरकार की शर्तों पर अपना पक्ष रखा था. इसे अचरज कहें या सरकारी दबाव का नतीज़ा कि आज़ाद का यह खुला ख़त मीडिया की सुर्ख़ियां नहीं बन सका. 26 जून को आज़ाद के नाम लिखा गया स्वामी अग्निवेश का भी ख़त गोपनीय था और गोपनीय बना रहा. इसे कहते हैं ईमानदारी का तक़ाज़ा.

ख़ासकर पिछले साल से माओवादियों के साथ बातचीत के लिए कोशिशों का दौर चल रहा है. हमेशा की तरह इस बार भी चिदंबरम ने बातचीत के लिए 72 घंटे का फार्मूला पेश किया था. पिछली बार किशन जी ने इसका जवाब 72 दिन के प्रस्तावित युद्ध विराम से देकर चिदंबरम की नीयत की बखिया उधेड़ देने का काम किया था. इस पर चिदंबरम ने यह तकनीकी पेंच भिड़ा कर इस प्रस्ताव को पटखनी देने की नाकाम कोशिश की कि इस बात का क्या सबूत कि किशन जी का प्रस्ताव उनकी पार्टी की ओर से आया है, उसे तो पोलित ब्यूरो की ओर से आना चाहिए था. जवाब पर जवाब का दौर गर्म हुआ और यह सिलसिला आख़िरकार ठप्प हो गया. पुलिस और सुरक्षाबलों की घेराबंदी बढ़ी और माओवादियों के सफ़ाए के नाम पर हत्या, बलात्कार, आगजनी, लूट से लेकर बेगुनाहों को फ़र्ज़ी मामलों में फंसाने का मोर्चा अधिक व्यापक और घना होता गया. बदले में माओवादी हमलों में भी इज़ाफ़ा हुआ. अमन और इंसा़फ के पक्षधरों ने उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा. इसके बदले उन्हें माओवादियों के समर्थक के तमगे से भी नवाज़ा गया. इस बार आज़ाद सामने थे और उन्होंने भी 72 घंटे के ़फार्मूले को बकवास करार दिया. किशन जी तमाम घेराबंदी तोड़ते हुए सरकार के हाथ नहीं लगे, लेकिन आज़ाद उनकी तरह ख़ुशक़िस्मत नहीं निकले. पकड़े गए और शहीद कर दिए गए.

Related Post:  दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल की अपराधियों से मुठभेड़, अक्षरधाम के पास एक लुटेरा घायल मौक़े से गिरफ्तार

बीती चार जुलाई को हैदराबाद के पुंजगुट्टा श्मशान स्थल पर क्रांतिकारी गीतों और नारों के साथ आज़ाद को आख़िरी सलामी दी गई. हालांकि आंध्र प्रदेश सरकार ने उनके सिर पर ज़िंदा या मुर्दा 12 लाख रुपये का ईनाम रखा था, लेकिन ख़ु़फिया एजेंसियों की आंख में चढ़ जाने के ख़तरों को धता बताते हुए अंतिम संस्कार में सैकड़ों की भीड़ उमड़ी और उसने बताया कि आज़ाद कितने लोकप्रिय थे. इसमें उनके दोस्तों, नाते-रिश्तेदारों और समर्थकों के अलावा समर्पण कर चुके माओवादी भी शामिल थे. आज़ाद का अंतिम संस्कार इस बात का सबूत था कि भले ही राज्य से माओवादियों का लगभग सफ़ाया किया जा चुका है, लेकिन उनके आंदोलन को बुद्धिजीवियों, संस्कृतिकर्मियों, वकीलों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के बड़े हिस्से का समर्थन हासिल है. इसका मतलब यह भी नहीं कि वे माओवादी हिंसा का समर्थन करते हैं, लेकिन उनके मक़सद का समर्थन ज़रूर करते हैं. क्रांतिकारी गायक गदर ने गीत गाकर दिवंगत नेता को श्रद्धांजलि दी. कवि वरवर राव के मुताबिक़, आम जनता की पूर्ण मुक्ति और साम्राज्यवादी ताक़तों का पतन आज़ाद की ज़िंदगी का मक़सद था और उसके लिए वह कुर्बान हो गए. आज़ाद हमेशा कहते थे कि माओवादियों ने उस परियोजना का कभी विरोध नहीं किया, जिससे ग़रीबों का भला होने वाला हो. उन्होंने सड़कों के निर्माण में अगर रुकावट डाली तो इसलिए कि बड़ी कंपनियों को आदिवासी इलाक़ों में प्राकृतिक संसाधनों की लूट के लिए आने से रोका जा सके. अंतिम संस्कार में सीपीआई (एमएल)-जनशक्ति के पूर्व नेता अमर भी शामिल थे. इन तीनों शख्सियतों ने 2004 में राज्य सरकार के साथ हुई शांति वार्ताओं में मध्यस्थ की भूमिका अदा की थी. पीयूसीएल के अध्यक्ष के जी कन्नाबिरन ने उन्हें बहादुर योद्धा के तौर पर याद किया. क्या क्रूर विरोधाभास है कि श्मशान स्थल से कुल आधा किलोमीटर दूर मुख्यमंत्री आवास पर उसी दिन उनकी सालगिरह का जश्न चल रहा था.

शेक्सपियर ने ग़लत नहीं कहा था कि ज़रूरत पड़ने पर शैतान भी पवित्र मंत्रों का जाप करने लगते हैं. शांति के सरकारी अलाप पर इससे सटीक टिप्पणी और क्या हो सकती है, जिसके पीछे अशांति को क़ायम रखने और माओवादियों के समूल नाश के इरादों का नगाड़ा बज रहा है. जबकि शांति की बहाली असंतोष और प्रतिरोध की आवाज़ों के दमन से नहीं की जा सकती. शांति का सिक्का न्याय के पहिए से चलता है, नसीहतों और धमकियों से नहीं. सरकार कॉरपोरेट समूहों के आगे बिछने से तौबा करे और उनके साथ हुए करारनामों को रद्द करे. आदिवासियों एवं ग़रीब-वंचित समुदायों की ज़मीन हड़पने और उन्हें विस्थापन के अंधे कुएं में ढकेलने से बाज आए. शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सेवाओं की सेहत सुधारे और सुरक्षाबलों को वापस बुलाए. वह सीपीआई (माओवादी) को देश के लिए ख़तरा समझने की अपनी भूल सुधारे और उस पर लगी पाबंदी हटाए. इतना हुआ कि समझिए, शांति का चौड़ा रास्ता खुल गया.

Related Post:  जम्मू-कश्मीर: पुलवामा में आईईडी ब्लास्ट, 5 जवान घायल

अगर दिल और दिमाग़ दुरुस्त है तो समझा जा सकता है कि बिजली, सड़क, टीवी एवं मोबाइल जैसी सुविधाओं की पहुंच या जीडीपी में बढ़त किस काम की, अगर ज़िंदा रहने का सवाल सबसे बड़ा हो और बचाव या राहत के तमाम दरवाज़े बंद हों. ऐसे में हिंसा बनाम अहिंसा की बहस का क्या मोल? आख़िर अमन बहाली के लिए बातचीत करने से मुंह कौन चुरा रहा है और क्यों?

आज़ाद

आज़ाद ज़मींदार ख़ानदान के थे, लेकिन उन्होंने दबे-कुचले लोगों के हक़ में लड़ने का रास्ता चुना. लोकतांत्रिक अधिकार सुरक्षा संगठन के महासचिव सी भास्कर राव पुरानी यादें ताज़ा करते हुए कहते हैं, 1979 की बात है, जब आंध्र विश्वविद्यालय के दो शोधार्थियों की बस से कुचल कर मौत हुई थी. तब आज़ाद ने बस सुविधा को सरकारी क्षेत्र में लाए जाने के लिए ज़ोरदार आंदोलन छेड़ा था और अपनी इस मांग को मनवा कर ही दम लिया. राजनीति में आज़ाद का प्रवेश 1973 में छात्र नेता के तौर पर हुआ था. केमिकल इंजीनियरिंग में एम टेक करने के दौरान उन्हें रेडिकल स्टूडेंट्‌स यूनियन का राज्य अध्यक्ष चुना गया था. बढ़ती लोकप्रियता के चलते वह राज्य सरकार की आंख में चुभने लगे और इसी कारण उन्हें 1980 में भूमिगत होना पड़ा. जल्द ही वह गिरफ़्तार कर लिए गए और 1983 में रिहा हुए. इसके बाद दोबारा भूमिगत हो गए और कोई 27 साल तक पुलिस की पकड़ से आज़ाद रहे. इंजीनियरिंग कॉलेज के उनके सहपाठी बताते हैं कि आज़ाद अक्सर कहते थे कि बंदूक़ और कलम से बड़ा ताक़तवर व्यक्ति होता है, जो समाज में बदलाव लाता है. 55 वर्षीय आज़ाद बेहतरीन वक्ता और संगठनकर्ता थे. स्थितियों पर तीखी पकड़ रखते थे और अकाट्‌य तर्कों के मालिक थे. पार्टी के प्रकाशनों और कार्यक्रमों के लिए लगातार लिखते रहते थे. उनके अंग्रेजी ज्ञान का सभी लोहा मानते थे. ख़ासकर विदेशी मीडिया से मुख़ातिब होने की ज़िम्मेदारी उन्हीं पर थी.

हेमचंद्र

तीस वर्षीय हेमचंद्र पांडे उत्तराखंड के पिथौरागढ़ शहर के क़रीब स्थित एक गांव के वाशिंदे थे. नैनीताल विश्वविद्यालय से उन्होंने इतिहास से एमए किया था. आज़ाद की तरह राजनीति में उनका प्रवेश भी छात्र राजनीति से हुआ था. बाद में वह पार्टी से जुड़े. अल्मोड़ा के किसानों को संगठित करने और उनकी समस्याओं को सतह पर लाने में उनकी अग्रणी भूमिका थी. वह विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में ताज़ा सवालों और मुद्दों पर छद्म नामों से लिखा करते थे.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Input your search keywords and press Enter.