fbpx
Now Reading:
आखिर कब तक बहेगा खून

खनिज बहुल प्रदेश झारखंड अपने गठन से ही नक्सली हिंसा का शिकार होता आया है. स्थापना वर्ष 2000 से अब तक सूबे में जितनी सरकारें आईं, सभी ने नक्सलियों पर नकेल कसने की बातें दोहराईं, मगर समस्या विकराल होती गई और नक्सली बलशाली होते गए. वे अब तक असंख्य लोगों की जान ले चुके हैं. बीती 2 और 3 मई को नक्सलियों ने एक बार फिर लोहरदगा, सिल्ली एवं झुमरा में कहर बरपाया. 2 मई की देर रात और 3 मई को राज्य के तीन ज़िलों में नक्सलियों ने हिंसक खेल खेला. लोहरदगा में बारूदी सुरंग विस्फोट और ताबड़तोड़ गोलीबारी में पुलिस बल और सीआरपीएफ के 11 जवान शहीद हो गए, जबकि पचास से अधिक गंभीर रूप से घायल. झुमरा के सीआरपीएफ कमांडेंट और सिल्ली के डीएसपी भी नक्सली हिंसा के शिकार बन गए.

माले के जुझारू नेता एवं विधायक महेंद्र सिंह, जदयू के विधायक रमेश सिंह मुंडा, झामुमो के सांसद सुनील महतो, पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी के पुत्र अनूप मरांडी और पुलिस अधिकारी फ्रांसिस इंदवार को नक्सलियों ने बड़ी बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया.

लोहरदगा में पुलिस को सूचना मिली कि सेन्हा थाना अंतर्गत पहाड़ी इलाक़े उड़मुड़ में माओवादियों का दस्ता मौजूद है. इस पर सीआरपीएफ और ज़िला पुलिस के क़रीब 100 जवानों की टीम उड़मुड़ के लिए तुरंत रवाना हो गई. वहां पहुंचने पर जब पता चला कि माओवादी भाग गए तो जवान वापस लौटने लगे. रास्ते में धरधरिया झरने के पास सभी ने पानी पिया. इसके बाद वे पैदल ही आगे बढ़ने लगे. इसी बीच माओवादियों ने लैंड माइंस विस्फोट कर दिया. जवान जब तक संभलते, तब तक नक्सलियों ने गोलियों की बौछार कर दी और छह जवानों ने मौक़े पर ही दम तोड़ दिया. नक्सलियों ने सड़क पर तक़रीबन दो किलोमीटर तक लैंड माइंस लगा रखे थे. माओवादी फायरिंग के साथ-साथ विस्फोट करते गए. बीच-बीच में वे हथियार सौंपने और आत्मसमर्पण करने की चेतावनी भी देते रहे. दूसरी ओर बोकारो ज़िले के झुमरा पहाड़ के निकट सूअरकटवा में नक्सलियों और पुलिस के बीच मुठभेड़ हो गई, जिसमें सीआरपीएफ के सहायक कमांडेंट जख्मी हो गए. वहीं रांची के सिल्ली के कनकट्टा के पास 2 मई की देर रात नक्सलियों की गोलीबारी से डीएसपी आनंद जोसेफ तिग्गा घायल हो गए. पुलिस को कनकट्टा में नक्सलियों के होने की सूचना मिली थी. डीएसपी तिग्गा के नेतृत्व में जैसे ही पुलिस टीम वहां पहुंची, माओवादियों ने फायरिंग शुरू कर दी और डीएसपी के पेट में गोली लग गई. इसके बाद माओवादी वहां से नौ दो ग्यारह हो गए.

Related Post:  योगी सरकार की अनोखी पहल, हिंदी, अंग्रेजी के अलावा संस्कृत में भी जारी होगी प्रेस रिलीज

पुलिस पर नक्सली हमला कोई नई बात नहीं है. अब तक चार सौ से ज़्यादा पुलिसकर्मी शहीद हो चुके हैं. राज्य गठन के कुछ ही दिनों पहले नक्सलियों ने लोहरदगा के तत्कालीन एसपी अजय कुमार सिंह समेत सात पुलिसकर्मियों को मार डाला था. 2001 में चाईबासा ज़िले के मनोहरपुर थाना अंतर्गत विटकलसोय क्षेत्र में 19 पुलिसकर्मी शहीद हुए. 2002 में हज़ारीबाग के चुरचू थाना अंतर्गत 11 पुलिसकर्मी मारे गए. 2003 में तो चाईबासा के बलिवा इलाके में नक्सलियों ने एक साथ 39 पुलिसकर्मियों को मारकर पूरे राज्य को हिला दिया था. उसी वर्ष लातेहार की अमझरिया घाटी में 11 पुलिसकर्मियों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा. 2006 में 14 पुलिसकर्मी नक्सलियों के हाथों मारे गए. 2009 में केकरांग घाटी में पुलिस गश्ती दल पर नक्सलियों ने हमला कर दिया था, जिसमें दो सीआरपीएफ जवानों को अपनी जान गंवानी पड़ी. 2010 में लातेहार के बरवाडीह में बारूदी सुरंग विस्फोट में सात पुलिसकर्मी मारे गए. 2011 के अभी महज़ चार माह बीते हैं और नक्सली अब तक 46 लोगों को मौत के घाट उतार चुकें हैं, इनमें पुलिस के जवानों के साथ आम नागरिक भी शामिल हैं.

Related Post:  छत्तीसगढ़ में नक्‍सलियों ने पुलिसवाले को उतारा मौत के घाट, इलाके में दहशत

सा़फ ज़ाहिर है कि क्रांति की दुहाई देकर बदलाव की बात करने वाले नक्सली किस कदर रक्तपात करने, हिंसक खेल खेलने और लोगों की जान लेने पर तुले हुए हैं. जवानों को मारने और बस, रेल पटरियों एवं स्कूल भवनों को उड़ाने, ट्रेन का अपहरण करने तथा प्रशासनिक अधिकारियों को अपनी गिरफ्त में लेने जैसी घटनाओं को अंजाम देकर नक्सली आख़िर किस परिवर्तन की तलाश में हैं, यह समझ के परे है. नक्सली माओवादी विचारधारा के अनुयायी नहीं, बल्कि लेवी के नाम पर अकूत दौलत इकट्ठा करने वाले आतंकी गिरोह बनकर रह गए हैं. राज्य में नक्सलियों का विस्तार यूं ही नहीं हुआ है. भूख, ग़रीबी, बेरोज़गारी, आर्थिक असमानता, उत्पीड़न और विस्थापन आदि समस्याएं इसके मूल में हैं. लोग अहिंसात्मक आंदोलन करते हैं तो उन्हें अनसुना कर दिया जाता है. नतीजतन, हिंसात्मक गतिविधियों के प्रति उनका रुझान बढ़ जाता है.

Related Post:  झारखंड के दुमका में हुई मुठभेड़ में चार नक्‍सली ढेर, एक जवान शहीद, चार घायल

पृथक राज्य बनते समय झारखंड का कोई भी ज़िला नक्सल प्रभावित नहीं था, लेकिन आज राज्य के सभी 24 ज़िले माओवादी उग्रवाद से त्रस्त हैं. नक्सलियों द्वारा बंद आयोजित करने से संपूर्ण राज्य ठहर सा जाता है. बीते दस वर्षों में बारूदी सुरंग विस्फोटों और कथित जन अदालतों में कथित दोषियों को मौत के घाट उतारने की अनगिनत घटनाओं को अंजाम दिया जा चुका है. माले के जुझारू नेता एवं विधायक महेंद्र सिंह, जदयू के विधायक रमेश सिंह मुंडा, झामुमो के सांसद सुनील महतो, पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी के पुत्र अनूप मरांडी और पुलिस अधिकारी फ्रांसिस इंदवार को नक्सलियों ने बड़ी बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया. नक्सलियों की संभावित वार्षिक आमदनी 1500 करोड़ रुपये है. वे केंद्र एवं राज्य सरकार की तमाम परियोजनाओं से भी नियमित रूप से लेवी वसूलते हैं. बर्बादी का यह सिलसिला कब तक चलता रहेगा, यहां की धरती कब तक ख़ून से सराबोर होती रहेगी, इन यक्ष प्रश्नों का उत्तर दूर-दूर तक दिखाई नहीं पड़ता.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Input your search keywords and press Enter.