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आंदोलन के बहाने देशी शिक्षा
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आंदोलन के बहाने देशी शिक्षा

इतिहास गवाह है कि जब भी किसी देश को ग़ुलाम बनाया गया तो उसकी शिक्षा पद्धति में सबसे पहले परिवर्तन किया गया. आज़ादी के का़फी पहले से देश के विद्वानों और आंदोलनकारियों ने इस बात को समझ लिया था. अतः स्वदेशी आंदोलन के बहाने देशी शिक्षा पद्धति पर जोर देते हुए शिक्षा और ब्रिटिश शिक्षालयों से बहिष्कार दोनों काम एक साथ किया गया. आज़ादी के बाद लगभग दो-तीन दशकों तक शिक्षालयों के संचालन और स्थापना दोनों में आंदोलनकारियों की अधिकता रही. कम पूंजी होने के बावज़ूद उद्देश्यों की पवित्रता की वज़ह से तत्कालीन समाज के धन-संपन्न लोगों द्वारा शिक्षालयों को अतिरिक्तसुविधाओं के लिए आर्थिक मदद मिल जाती थी. राजनैतिक पदों पर आसीन लोगों ने भी शिक्षा का प्रचार-प्रसार अपने एजेंडे में सर्वोपरि बनाए रखा. कई राजनेताओं ने भी शिक्षालय स्थापित किए. तब स्कूल-कॉलेज स्थापित करना और उनका संचालन करना एक सम्मानीय कार्य माना जाता था. पर आजकल सम्माननीय कार्य व्यवसाय रूप ले चुका है. अब राजनेता और पैसे वालों ने शिक्षा के व्यवसायीकरण पर जोर देना शुरू कर दिया है. अंबानी, नादार और जी समूह भी अब अंतरराष्ट्रीय स्तर के स्कूल-कॉलेज स्थापित करने लगे हैं. शिक्षा के क्षेत्र में बड़ा नाम स्थापित करने वालों ने अब राजनीति में भी घुसपैठ शुरू कर दी है. इसमें कई बड़े तो कई छोटे नाम शामिल हैं. इन्हीं नामों में भरथना से बसपा विधायक शिव प्रसाद यादव और कानपुर से जगेंद्र स्वरुप आदि के नाम भी शामिल हैं, जिन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में नाम कमाने के बाद राजनीति का पेशा चुना है. वर्तमान सरकार के लगभग सभी हारे-जीते विधायक और सांसद के प्रत्याशी इसी तर्ज़ पर काम कर रहे हैं. वर्तमान माध्यमिक शिक्षा मंत्री रंगनाथ मिश्र और उच्च शिक्षा मंत्री राकेशधर त्रिपाठी के द्वारा रेवड़ी की तरह बांटी गई नए कॉलेजों को मान्यताएं उत्तर प्रदेश के लोकायुक्त के द्वारा जांची जा रही है.

चौथी दुनिया के पास उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर कानपुर के इस संस्थान में भी विधायक निधि से बीस लाख से अधिक की धनराशि नियम-क़ानून को ताक पर रख कर व्यय की गई है. सांसद और विधायक निधियों के इस तरह दुरूपयोग का मामला भी लोकायुक्त उत्तरप्रदेश के संज्ञान में लाया जा चुका है.

ऐसा नहीं है कि इसी सरकार में ऐसा हो रहा है. भाजपा सरकार के समय में माध्यमिक शिक्षा मंत्री डॉ. नेपाल सिंह के समय भी इंटर कॉलेजों की मान्यता के संबंध में उदारता बरती गई थी. ऐसे कई नए कॉलेज खुल गए थे जो मात्र 200 वर्ग मीटर के क्षेत्रफल में बने थे. वह फाइलें खुलेंगी तो भगवा पार्टी के सर्वशिक्षा अभियान की पोल भी खुल जाएगी. वहीं समाजवादी पार्टी के काल में भी इसी की पुनरावृत्ति की गई. तमाम नियमों और मानकों को दरकिनार करते हुए इंटर और डिग्री कॉलेजों को मान्यता दी गई.

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चौथी दुनिया के पास उपलब्ध छत्रपति साहू जी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर से प्राप्त दस्तावेजों के आधार पर एक ऐसे ही कॉलेज की मान्यता देने में की गई क़ानूनी-कोताही और खुले-आम नियमों के उड़ाए गए माखौल का मामला सामने आता है. कानपुर में 26.11.2002 को भवन रहित भूखंड की लीज डीड शैक्षणिक संस्थान के नाम की गई और साथ ही विश्वविद्यालय को मान्यता के लिए आवेदन कर दिया गया. साथ ही प्रस्तावित भवन का मानचित्र भी प्रस्तुत किया गया. लेकिन इस मानचित्र में भूखंड के सभी तऱफ की बाजुओं की लंबाई और चौड़ाई नहीं दर्शाई गई.

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यह मामला सत्ताधारी दल समाजवादी पार्टी के दबंग विधान-परिषद सदस्य से जुड़ा हुआ था. इसलिए तीन दिन बाद ही विश्वविद्यालय ने भवन मान्यता के मानकों के अनुरूप तैयार होने की सूचना उच्च शिक्षा विभाग को भेजते हुए मान्यता की संस्तुति भेजी. विश्व विद्यालय और प्रबंधक के द्वारा किए गए इस घालमेल को पूरी तरह से अनदेखा करते हुए उच्च शिक्षा विभाग ने 09 जनवरी 2003 को शेष मानक पूरे करने संबंधी निर्देश जारी कर दिए. शहरी क्षेत्र में डिग्री कॉलेज की मान्यता के लिए संस्थान के  पास आवश्यक भूखंड 5000 वर्गमीटर के अनिवार्य नियम के स्थान पर इस संस्थान के  पास कुल 3910 वर्ग गज भूमि है. यह संस्थान एक विवादित भूमि पर बना हुआ है. भूमि के मालिकाना हक़ के लिए विवाद कानपुर के ज़िला न्यायालय और उच्च न्यायालय में है. विवाद के चलते कानपुर विकास प्राधिकरण से इस कॉलेज को मानचित्र की  स्वीकृति नहीं मिल पाई है. इसके बाद भी यह कॉलेज पिछले सात वर्ष से भी ज़्यादा समय से चल रहा है. और तो और एन.सी.टी.ई. ने भी हॉस्टल आदि मानकों को दरकिनार करते हुए इस संस्थान में बी.एड. की मान्यता 01/07/2004 को प्रदान कर दी. इस कॉलेज के प्रबंधक सरसौल विधान सभा क्षेत्र से सपा के विधायक हैं और उनके पिता इसी दल के पूर्व विधान परिषद सदस्य रह चुके हैं. इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेशों की धज्जियां उड़ाते हुए इस महाविद्यालय के भवन निर्माण की प्रक्रिया जारी है. महाविद्यालय के प्रथम तल का मानचित्र स्वीकृत नहीं है और तीसरे तल में निर्माण कार्य जारी है. कानपुर विकास प्राधिकरण की जोनल प्रवर्तन अधिकारी उर्मिला सोनकर खाबरी ने इस निर्माण को रोकने के लिए पुलिसिया मदद की मांग की, पर मामला विपक्ष के दबंग छवि के राजनीतिज्ञ से जुड़े होने के कारण दब सा गया है.

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विश्वविद्यालय के अधिकारी अपने पूर्व के अधिकारियों के नियमों की अनदेखी का रोना रो कर अपने कर्तव्यों की इति श्री मान लेते हैं. उत्तर प्रदेश के लोकायुक्त ने इस पूरे मामले को अपने संज्ञान में लेते हुए जांच के लिए अपने समक्ष प्रस्तुत करने के लिए निर्देश दिए हैं. प्रदेश में प्राइमरी स्कूल से स्थापित कर डिग्री कॉलेज तक की उन्नति करने का चलन नहीं रहा. अब इन नव-धनाढ्यों ने सीधे डिग्री, इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट कॉलेजों की स्थापना करनी शुरू कर दी है. इन संस्थानों में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के मानकों के अनुरूप शिक्षकों का घोर अभाव है. प्रदेश में किसी की भी सरकार क्यों न हो इन्हें क़ानून और नियमावलियों से कोई भय नहीं है. इसकी वज़ह यह है कि सभी राजनैतिक दलों में इसी प्रकार के शिक्षा माफिया घुस आए हैं, जिन्होंने राजनीति के साथ-साथ शिक्षा के क्षेत्र में भी अपनी मज़बूत पैठ बना ली है. ऐसे जन-प्रतिनिधियों ने विधायक और सांसद निधियों से दूसरी संस्थाओं के स्थान पर अपनी और अपने रिश्तेदारों के संस्थानों को ही अनुदान देना शुरू कर दिया है. चौथी दुनिया के पास उपलब्ध दस्तावेजों के  आधार पर कानपुर के इस संस्थान में भी विधायक निधि से बीस लाख से अधिक की धनराशि नियम-क़ानून को ताक़ पर रख कर व्यय की गई है. सांसद और विधायक निधियों के इस तरह दुरूपयोग का मामला भी लोकायुक्त उत्तर प्रदेश के संज्ञान में लाया जा चुका है. अब देखना यह है की शिक्षा के मंदिरों में वास्तव में शिक्षा की देवी की स्थापना कब हो पाती है.

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