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आंखों देखा नक्‍सलवाद
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आंखों देखा नक्‍सलवाद

विदेशी हथियारों से लैस नक्सलवादी समूहों के पास सरकार से अधिक मज़बूत सूचनातंत्र है. गहराई तक जानें तो, इन नक्सलवादी समूहों के पास पैसा, हथियार, योजना सभी कुछ उम्मीदों से कहीं ज़्यादा है. लेकिन, ये समूह जन विश्वास और जन आस्था धीरे-धीरे खोते जा रहे हैं. उड़ीसा, आंध्र प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य के मध्य पड़ने वाले कुछ ऐसे भूभाग हैं जहां से नक्सलवादियों को लगातार गुज़रना पड़ता है. केंद्र सरकार बिना स्थानीय मदद के इस समस्या पर नियंत्रण कभी नहीं पा सकती. नक्सलवादी समूहों का प्रतिदिन सामना करने वाले और उनके नियंत्रण वाले क्षेत्र में समाज सेवा कर रहे सुधीर साबत का यह कथन वर्तमान में केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा नक्सलवादियों के विरूद्ध चलाए जा रहे अभियान के पूर्णतया विपरीत है. उड़ीसा राज्य में आंध्र प्रदेश की सीमा से सटे हुए गंजाम ज़िले के पात्रपुर, स्वरोडा, भंजनगर, और जगन्नाथ प्रसाद जैसे क्षेत्रों में सामाजिक संस्था इंडियन सोसायटी फॉर रूलर डेवेलपमेंट पिछले 14 सालों से लगातार काम कर रही है. इस संस्था का मुख्यालय ब्रम्हापुर में स्थित है. सोसायटी के डायरेक्टर सुधीर साबत ने नक्सलवादियों के जीवन को बहुत क़रीब से देखा है. पिछले दिनों संस्था के कार्यों के वास्ते भोपाल आए सुधीर साबत ने चौथी दुनिया समाचार पत्र के साथ बातचीत करते हुए नक्सलवाद के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से अपनी बात रखी.

उड़ीसा उन क्षेत्रों में से है जहां से नक्सलवादी आंध्रा से छत्तीसगढ़ तक और छत्तीसगढ़ से आंध्रा तक का स़फर बिना रोकटोक करते हैं. सुधीर साबत के अनुसार, नक्सलवादी आम तौर पर जंगलों के रास्ते पैदल चलना ज़्यादा उचित समझते हैं. साइकिलों पर चलने वाले नक्सलवादी अमूमन सूचनातंत्र के लिए काम करने वाले व्यक्ति होते हैं, इसके अतिरिक्त नक्सलवादियों के वाहनों को भी उड़ीसा में बेरोकटोक हथियार बंद स्थिति में घूमते देखा जा सकता है.

सुधीर साबत के अनुसार, नक्सलवाद प्रभावित आंध्र प्रदेश एवं उड़ीसा सहित छत्तीसगढ़ के विभिन्न भागों में बड़ी संख्या में नक्सलवादी समूह सक्रिय हैं. नक्सलवादी अपनी संख्या को बढ़ाने के लिए युवा और शिक्षित हो रहे वर्ग में से अपने प्रतिनिधियों की बालात खोज करते हैं. हर गांव से नक्सलवादी 5 युवक इस आंदोलन में शामिल होने के लिए चुने जाते हैं. अबोध युवकों को प्रशिक्षण के दौरान न स़िर्फ शारीरिक रूप से नक्सलवादी बनाया जाता है, बल्कि उनका मानसिक परिवर्तन भी नई विचारधारा की ओर कर दिया जाता है. सुधीर साबत के अनुसार गांव वाले स्वेच्छा से इस अभियान में युवकों को नहीं भेजते, परंतु जान जाने की डर से गांव के युवक इस कथित क्रांति की धारा में शामिल कर लिए जाते हैं. हाई स्कूल, कॉलेज और 10+2 शिक्षा प्राप्त युवक-युवतियों को इस आंदोलन से जोड़ा जाता है. सुधीर साबत के अनुसार, नक्सलवादी समूहों को धन देने का काम बड़ी तादाद में निजी मेडिकल, इंजीनियरिंग कॉलेजों द्वारा बड़े ठेकेदारों के द्वारा और कॉरपोरेट क्षेत्र के माध्यम से किया जाता है. इस संदर्भ में स्थानीय स्तर पर संभवत: प्रत्येक व्यक्ति को पूरी जानकारी है. इसकी संभावना नहीं के बराबर है कि नक्लवादी समूहों को धन का आभाव होगा.

अपने क्षेत्र में कार्य करते हुए सुधीर साबत ने नक्सलवादियों के पास विदेशी हथियारों को बड़े पैमाने पर देखा है. नक्सलवादी प्रत्येक दस गांव के बीच अपना शस्त्र गोदाम स्थापित करते हैं. नक्सलवाद की योजना के लिए प्रत्येक गांव में एक लीडर, प्रत्येक दस गांव में एक लीडर और इसी तरह 10-10 के समूहों में इनके नेतृत्व की संख्या बढ़ती जाती है. सुधीर साबत के मुताबिक, उड़ीसा क्षेत्र का कंदमाल क्षेत्र वर्तमान में नक्सलवादियों का गढ़ बन चुका है.भुवनेश्वर से 280 किमी दूर स्थित इस क्षेत्र में बड़े जंगल होने के चलते और छिपने की पर्याप्त जगह होने के कारण नक्सलवादियों को एकत्र होने में सुविधा होती है. नक्सलवाद की मुहिम में वर्ष 1956 के बाद से लगातार परिवर्तन होता आया है. वर्तमान में नक्सलवादी नेता इस वारदात और धमकियों के तंत्र का उपयोग स्वयं का घर भरने के लिए कर रहे हैं, जिसका प्रमाण पिछले दिनों उड़ीसा में एक बड़े नक्सलवादी नेता की पत्नी के एकाउंट में पुलिस द्वारा 1 करोड़ रुपये की राशि का पकड़ा जाना, माना जा सकता है. सुधीर साबत बताते हैं कि नक्सलवादी समूहों को मुख्य धारा से जोड़ने के लिए उनकी संस्था ने कई प्रयास किए हैं, जिसके तहत नक्सलवादियों से सीधी बातचीत भी की गई है. नक्सलवादी समूह सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओं के प्रति पूर्णत: असंतोष प्रदर्शित करते हुए क्षेत्र के विकास, रोज़गार और दूसरे बुनियादी सुविधाओं को हथियार के रूप में इस्तेमाल करते हैं, जबकि स्थिति इसके विपरीत है. नक्सलवाद प्रभावित क्षेत्रों में सरकारी अधिकारियों ने जाना बिल्कुल बंद कर दिया है. ठेकेदार काम करने को तैयार नहीं हैं. नतीजा ये सभी क्षेत्र विकास की गतिविधियों से पूरी तरह कट चुके हैं.

केंद्र सरकार द्वारा चलाई जा रही ऑपरेशन ग्रीन हंट भी इन क्षेत्रों में पूरी तरह क्रियान्वित नहीं की जा सकती. सरकार के पास सूचनातंत्र की कमी है, जबकि नक्सलवादी किसी भी क्षेत्र की सूचना कुछ ही मिनटों में अपने तंत्र के माध्यम से हासिल कर पाने में पूरी तरह से सक्षम हैं. 50 किलोमीटर वृत्त के क्षेत्र में नक्सलवादियों का कोई भी समूह आपसी सूचनातंत्र के बड़े जाल में सुरक्षित रहता है. सरकार चाहकर भी इस सूचनातंत्र को आतंकित ग्राम वासियों के कारण लागू नहीं कर सकती. उड़ीसा सरकार द्वारा नक्लवाद के लिए बनाई गई कोई भी योजना कंदमाल जैसे वन आच्छादित क्षेत्र में कभी सफलता प्राप्त कर सकेगी, इसमें संदेह है. नक्सलवादियों पर लगाम लगाने के लिए सुधीर साबत ने गांव वालों को आत्मनिर्भर बनाना शिक्षा-प्रणाली का व्यापक विस्तार करना और आत्मनिर्भरता के लिए रोज़गार के नए अवसरों को ईमानदारी से गांव तक पहुंचाना, एक महत्वपूर्ण कदम माना है. सुधीर साबत के मुताबिक़, बेहतर भविष्य के लिए क्रांति का सूत्रपात करने के स्वप्न दिखाकर युवा वर्ग को नक्सलवाद की ओर मोड़ा जाता है. इस बुनियादी व्यवस्था की दिशा परिवर्तन करने के स्थान पर हम नक्सलवाद से संघर्ष करने की कोशिश कर रहे हैं. उड़ीसा क्षेत्र में ही कुछ गांव ऐसे बचे हैं, जिन्होंने नक्सलवादियों को किसी भी तरह का सहयोग देने या उनसे संबंध रखने से इंकार कर दिया. इन गांवों में अभी भी नक्सलवाद नहीं पहुंच पाया है.

उड़ीसा उन क्षेत्रों में से है जहां से नक्सलवादी आंध्रा से छत्तीसगढ़ तक और छत्तीसगढ़ से आंध्रा तक का स़फर बिना रोकटोक करते हैं. सुधीर साबत के अनुसार, नक्सलवादी आम तौर पर जंगलों के रास्ते पैदल चलना ज़्यादा उचित समझते हैं. साइकिलों पर चलने वाले नक्सलवादी अमूमन सूचनातंत्र के लिए काम करने वाले व्यक्ति होते हैं, इसके अतिरिक्त नक्सलवादियों के वाहनों को भी उड़ीसा में बेरोकटोक हथियार बंद स्थिति में घूमते देखा जा सकता है. इंडियन सोसायटी फॉर रूलर डेवेलपमेंट का मुख्यालाय भुवनेश्वर से 180 किमी दूर है. गंजाम ज़िले की सीमा आंध्र प्रदेश के इच्छापुर ज़िले से सीधे जुड़ती है.

नक्सलवादी समूहों ने दंतेवाड़ा की घटना को अंजाम देने के पूर्व इसी रास्ते से छत्तीसगढ़ तक आवागमन किया था. सुधीर साबत के अनुसार, नक्सलवाद की समस्या अब धीरे-धीरे क्षेत्र के रूके हुए विकास और आतंकवाद के प्रति युवकों के रूझान से जुड़ती जा रही है. बेराज़गारी के चलते और घटते खेती के रकबे के कारण ग्रामीण युवा इस कथित क्रांति की ओर मुड़ रहा है. भारत सरकार की आयकर में छूट संबंधी 35 एसी, की छूट का पूरा उपयोग नक्सलवादी समूहों द्वारा धन संग्रह के लिए किया जा रहा है. सुधीर साबत के मतानुसार, स्वयंसेवी संगठनों की भूमिका नक्सलवाद को लगाम लगाने की दिशा में महत्वपूर्ण हो सकती है. स्वयंसेवी संगठनों में से वे समूह जो नक्सलवादियों के साथ सीधी बातचीत कर उन्हें राष्ट्र निर्माण और विकास की ओर मोड़ने की ताक़त रखते हैं, का उपयोग इस अभियान के तहत किया जाना चाहिए. माओवादी संगठनों से संबद्ध नक्सलवादियों द्वारा भी जन, जंगल और ज़मीन के लिए संघर्ष क्रांति के माध्यम से किया जा रहा है. गांधीवादी चिंतन या विचारधारा पर इन समूहों का कोई प्रभाव नहीं है. राज्य या केन्द्र सरकार यदि अपने स्तर पर स्वयंसेवी संगठनों के उस वर्ग को खोज करे, जो इस समस्या के मूल में छिपे असंतोष को शांत कर पाने में सक्षम हो, तो नक्सलवाद का स्थाई हल निकाला जा सकता है. इस आंदोलन को रोकना राष्ट्र के एकीकरण के लिए आवश्यक मानते हुए सुधीर साबत का मत है कि आपसी टकराहट इन घने जंगलों के मध्य सुरक्षा बलों के लिए बहुत बड़ा ख़तरा है. इन क्षेत्रों में कार्यरत छोटे शासकीय कर्मचारियों सहित नक्सलवाद प्रभावित क्षेत्रों में कार्यरत बड़े अधिकारी तक आतंक के कारण नक्सलवादियों का हिस्सा बन चुके हैं.

यहां तक कि, इन अधिकारियों द्वारा अर्जित की गई अवैध धन राशि का एक बड़ा हिस्सा इन नक्सलवादियों को चंदे के रूप में नियमित दिया जाता है. नक्सलवाद की समस्या धीरे-धीरे क्षेत्र में धार्मिक उन्माद को बढ़ाने या घटाने का भी एक कारण बन रही है. नक्सलवादी समूह अपनी गतिविधियों के लिये हिंदुओं और इसाई मिशनरी के साथ पक्ष-विपक्ष में कार्यवाही करने लगे हैं. कंदमाल में एक साल पूर्व लोखड़़ानंद सरस्वती की हत्या इस कथन की पुष्टि के लिए पर्याप्त है. धार्मिक आधार पर नक्सलवादी समूह समाज को विघटित कर उसमें आतंक भर देना चाहते हैं. उड़ीसा, छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश तीनों ही राज्यों में हिंसा की गतिविधियों का आधार यदि नक्सलवादियों द्वारा धार्मिक कर दिया गया तो यह समस्या और घातक हो जाएगी. अपने व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर सुधीर साबत का मानना है कि अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों में होने वाली सामाजिक गतिविधियों में नक्सलवादी दखल नहीं देते और न ही किसी स्वयंसेवी संगठन को इस बात के लिए मजबूर करते हैं, कि वे उनकी विचारधारा के अनुसार अपने कार्यों का संचालन करे.

नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के जन प्रतिनिधियों के बारे में स्वयंसेवी संगठन के संचालक का मत है कि जनप्रतिनिधि इन क्षेत्रों में आतंक के सामने नतमस्तक हो चुके हैं. व्यापारिक और राजनैतिक गतिविधियों के शून्य हो जाने के कारण नक्सलवाद प्रभावित क्षेत्र इन तीनों ही राज्यों में लकवाग्रस्त हो चुके हैं. केन्द्र सरकार दिल्ली में बैठकर नक्सलवाद को आतंकवाद समझते हुए इसके ख़ात्मे की कोई भी योजना बना ले, परंतु एक सामाजिक समस्या के रूप में 1956 में पैदा हुआ असंतोष धीरे-धीरे युवा वर्ग की आय और छीनकर कुछ हासिल करने की प्रक्रिया का एक हिस्सा बनता जा रहा है. इसका परिणाम यह है कि नक्सलवाद को जड़ से उखाड़ देने की बात एक मिथ्या बनकर रह गई है.

सुधीर साबत के अनुसार, उड़ीसा राज्य में इन दिनों नक्सलियों का भारी जमावड़ा है. बार-बार यह अंदेशा व्यक्त किया जा रहा है कि इस राज्य में नक्सली किसी बड़ी वारदात को अंजाम दे सकते हैं. राज्य से मिल रही सूचनाओं के अनुसार, दंतेवाड़ा की घटना के बाद आंध्र प्रदेश और छत्तीसगढ़ से पलायन कर बड़ी तादात में नक्सली उड़ीसा राज्य में पहुंच चुके हैं. दंतेवाड़ा की घटना के बाद से इन प्रभावित राज्यों में पुलिस तंत्र का नक्सली प्रभवित क्षेत्रों में निष्क्रिय होना और सूचना तंत्र का यथावत होना इस अभियान के प्रति बढ़ती जा रही उपेक्षा का परिणाम है. नक्सलवादी बेरोकटोक अपनी योजनाओं पर लगातार काम कर रहे हैं, जबकि केन्द्र और राज्य सरकार उच्च स्तर पर योजना बनाने के नाम पर बैठकों पर संभवत: और कुछ नहीं कर रही है.

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