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आत्‍महत्‍या करने को मजबूर हो रहे किसान
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आत्‍महत्‍या करने को मजबूर हो रहे किसान

कृषि ॠण माफी पैकेज-2008 के तहत किसानों को केंद्र की कांग्रेस सरकार द्वारा 60 हज़ार करोड़ रुपए पैकेज के उपयोग से संबंधित क्रियान्वयन के नीतियों का निर्धारण भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा न होकर जब नाबार्ड द्वारा किया गया तो हर किसान चौंक गया. यह फैसला नाबार्ड और सरकार की मिलीभगत का परिणाम था या मात्र केंद्र सरकार के निर्देश पर नाबार्ड द्वारा लागू किया गया था, इस प्रश्न के उत्तर की अपेक्षा आज देश के हर इस किसान को है. उस किसान को, जो इस ॠण माफी के माध्यम से खुद को ॠण मुक्त होने का सपना देख रहा था. लेकिन आज परिणाम ठीक उसके हितों के विपरीत सामने आए. किसान जो अपनी हैसियत व ईमानदारी से ॠण की किस्तों की अदायगी करते रहे वे इस ॠण माफी से आखिर क्यों महरूम हो गए. अब इनके समक्ष ॠण अदायगी का विकल्प आत्महत्या के अलावा कुछ और नज़र नहीं आ रहा है. कृषिप्रधान देश भारत में आज़ादी के बाद से अब तक जिस तरह राजनेताओं व सरकारों द्वारा किसानों का शोषण हुआ, शायद ही विश्व में कहीं हुआ हो. अन्नदाता की संज्ञा से विभूषित किसान शोषण की पराकाष्ठा को छूते-छूते अब क़र्ज़ की मार के चलते आत्महत्या करने पर मजबूर हो रहा है. ऐसे में क़र्ज़ और किसान की दशा और दिशा का सिंहावलोकन किया जाना स्वाभाविक ही आवश्यक है. शायद इसी आवश्यकता को दृष्टिगत रखते हुए कांग्रेस की गत मनमोहन सिंह सरकार ने ठीक आम चुनावों के पहले क़र्ज़ माफी को ही मुद्दा बनाकर देश के किसानों के लिए 60 हज़ार करोड़ रुपयों का पैकेज देकर अब कोई किसान ॠणी नहीं रहेगा जैसा अति महत्वाकांक्षी और लुभावने नारे उद्घोषित किया. इस संदर्भ में एक समाचार पत्र में 2 मार्च 2008 को प्रकाशित चार बिंदुओं के विज्ञापन में प्रकाशित अंश जिसका हिंदी रूपांतरण-आज़ादी के बाद से अब तक पहली बार एक ॠण माफी पैकेज जो किसानों को जीवन की नई दिशा प्रदान करता है, पर ज़रा नज़र डालिए –

1. किसानों को लगभग 60 हज़ार करोड़ का ॠण राहत पैकेज,

2. 50 हज़ार करोड़ रुपए लघु एवं सीमांत श्रेणी के उन किसानों के लिए जिन्होंने फसलों, कुंओ, पाइप लाइन, बिजली मोटर, पशुधन, फल उत्पादन और मतस्य पालन आदि के लिए ॠण लिए हैं. यह लाभ देश के लगभग 76 प्रतिशत किसानों को होगा.

3. इसके अतिरिक्त 10 हज़ार करो़ड रुपए शेष, इन किसानों को 25 प्रतिशत छूट के रूप में देय होंगे जो कुल ग्रहीत ॠण की एक मुश्त अदाएगी करेंगे.

4. यह ॠण माफी पैकेज उन किसानों के लिए लागू होगा जिन्होंने 31 दिसंबर 2007 तक ॠणों का आहरण किया है.

कृषि प्रधान देश भारत में आज़ादी के बाद से अब तक जिस तरह राजनेताओं व सरकारों द्वारा किसानों का शोषण हुआ, शायद ही विश्व में कहीं हुआ हो. अन्नदाता की संज्ञा से विभूषित किसान शोषण की पराकाष्ठा को छूते-छूते अब आत्महत्या करने को मजबूर हो रहें हैं. ऐसे में क़र्ज़ और किसान की दशा और दिशा का सिंहावलोकन किया जाना स्वाभाविक ही आवश्यक है.

ग़ौरतलब है कि उक्त निर्धारित तिथि 31 दिसंबर 2007 तक के ॠण के साथ कहीं इस बात का उल्लेख नहीं किया गया कि किसी किसान ने 2007 से पहले कब ॠण लिया था. यही कारण है कि दस बीस सालों से क़र्ज़दारी में चले आ रहे किसानों में यह हर्ष अनुभूत किया गया था कि अब वे ॠण मुक्त हो जाएंगे, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया. कारण यह कि बाद में नाबार्ड द्वारा यह तय किया गया कि 31 मार्च 1997 से 31 दिसंबर 2007 तक के बीच के आहरित ॠणों की ही माफी होगी. कालांतर में इसे 31 मार्च 1997 को गुप-चुप ढंग से जुलाई 1997 कर दिया गया. 2 अक्टूबर 2007 को केंद्रीय कृषि मंत्री का कथन था कि मैं कृषि कार्य बंद कर देने के बारे में नहीं पूछ रहा हूं बल्कि समय आ गया है, यह निश्चित करने का कि कितने लोग किसानी चालू रखना चाहते है. 10 फरवरी 2008 में पुन: कृषि मंत्री का यह बयान आया कि किसान के यहां जन्म लेने के नाते मैं किसानों की समस्याओं को भली भांति समझता हूं. इन कथनों के साथ पुन: यह कहा जाना कि हम किसानों को लाभ देने के लिए प्रतिबद्ध हैं. कांग्रेस का यह प्रचार कि जब औरों ने स़िर्फ आश्वासन दिए तो हम किसानों के जीवन के लिए नया प्रकाश लेकर आए हैं आदि जैसे मनमोहक विज्ञापन यथार्थ के अंश को भी नहीं छू सके.

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फैजाबाद जनपद और समीपवर्ती अन्य जनपदों के कृषकों की बेबाक़ टिप्पणी फायदा बेईमानों को मिला ईमानदार तो देखते रह गए, जिसने ॠण जमा करने की ईमानदारी दिखाई वह अपात्र और जिसने कभी न जमा करने की बेईमानी बरती वे पात्र माने गए. यहां जिसका लेना कभी न देना की धारणा यथार्थ हो उठी और अन्नदाता फिर एक बार महाछल का शिकार हुआ.

इस संबंध में एक वयोवृद्ध कृषक शिवराम शुक्ल अपनी व्यथा व्यक्त करते हुए कहते हैं कि वह फैजाबाद की मिल्कीपुर तहसील के एक पढ़े-लिखे किसान हैं. उन्होंने बतौर लघुजोत किसान के स्थानीय इनायत नगर स्थित ग्रामीण बैंक से क़र्ज़ लिया था. वे कहते हैं कि सरकार द्वारा 22 जनवरी 2008 को ॠण माफी योजना जिस तरह जारी की गई, इसका इतना छोटा परिणाम होगा इसे हम क़र्ज़दार किसान नहीं जानते थे. ॠण माफी योजना से सरकार के कथनानुसार 76 प्रतिशत किसानों के लाभान्वित होने के ठीक विपरीत 70-80 प्रतिशत किसान इस ॠण माफी से वंचित रह गए. इन किसानों का अपराध महज़ इतना था कि बैंकों के ब्याज व आरसी जारी होने से बचने तथा अपना मान-सम्मान बचाने की गरज से 31 मार्च से लेकर 31 दिसंबर 2007 के बीच इन्होंने कुछ रक़म जमा कर दी थी. दिशा निर्देश बनाने वाली समिति ने सरकार की घोषित मंशा पर पानी फेर दिया. कृषकगण बैंको में चस्पा सूची ही देखते रह गए. शुक्ल कहते हैं कि उनका तो क़र्ज़ माफी सूची में नाम भी था, लेकिन उन्हें क़र्ज़ माफी नहीं मिली. वे दिशा निर्देश के स्वतंत्र अनुच्छेद 5-(1) का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि छोटे व मझोले जोत के किसानों की पूर्ण ॠण माफी होनी चाहिए थी. अनुच्छेद 13 (1) व 13 (2) का उल्लेख करना वह नहीं भूलते. जिसमें कहा गया है कि यदि किसी अनुच्छेद को लागू करने में कोई बाधा आती है तो भारत सरकार उसे दूर करेगी. क़र्ज़ का माफ न होना हम जैसे क़र्ज़दार किसानों के लिए सबसे बड़ी बाधा थी और इस बाधा को किसी बैंक ने शायद सरकार के संज्ञान में नहीं डाला, जब सरकार को कुछ जानकारी मिली भी तो उसने 2 मार्च 08 को एक नोटीफिकेशन जारी कर 31 दिसंबर 07 के सभी किसानों को शामिल कर लिया. लेकिन इसकी भी बैंकों ने अनदेखी ही की. जब कृषक शिवराम शुक्ल ने अपनी पात्रता का हवाला देते हुए 21 जनवरी 2008 को उत्तर प्रदेश उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर किया, तब 6 महीने बाद न्यायालय की अवमानना का आरोप लगाने के बाद बैंक ने अपना जवाब दावा माननीय उच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया. यह याचिका स्वीकृत होकर निर्णय हेतु लंबित है. शिवराम शुक्ल कहते हैं कि उन्होंने कृषि ॠण 2005 में लिया है और वे पूर्णतय: कृषि ॠण माफी के पात्र है. इस श्रृंखला में पात्र होकर भी अपात्र ठहराए गए कुछ अन्य कृषकों में फैजाबाद के श्रीपाल सिंह पुत्र तेजवंत सिंह निवासी ग्राम व पोस्ट उरूवा वैश्य, जिनका पंजाब नेशनल बैंक आस्तीकन शाखा से आहरित ॠण राशि 75 हज़ार रुपए है. जीत नाथ पांडेय निवासी इनायतनगर, एक ऐसे कृषक हैं जिन्हें पूर्ण ॠण माफी के बाद नोड्‌यूज प्रमाण पत्र भी दे दिया गया है लेकिन उनसे अब इस नोड्‌यूज को ग़लत कहकर बैंक द्वारा बकाया धनराशि जमा किए जाने का बार-बार दबाव बनाया जा रहा है. जनपद फैजाबाद से इतर जनपद अंबेडकरनगर के त्रिलोक नाथ तिवारी पुत्र जगन्नाथ भी पीएनबी शाखा गोठवल के ॠणी हैं और अपने को पात्र होते हुए भी ॠण माफी से वंचित बताते हैं. ऐसे दर्जनों किसान हैं जो ग्रामीण बैंक, इलाहाबाद बैंक, स्टेट बैंक, पीएनबी बैक, केनरा बैंक जैसी शाखाओं के आज भी ॠणी हैं. फैजाबाद में पंजाब नेशनल बैंक शाखा की बात करें तो यहां के शाखा प्रबंधक किसानों के बारे में कुछ कहने के नाम पर मुंह खोलना भी उचित नहीं समझते. इस शाखा की गतिविधियों के बारे में खाता धारकों का कहना है कि बैंक द्वारा उनके खातों में जमा निकासी स्वत: ही कर ली जाती है और उसके खातेदारों को पता ही नहीं चलता. गत जनवरी माह में फैजाबाद के ही मिल्कीपुर तहसील के दो किसानों द्वारा ॠण के बोझ से ऊब कर आत्महत्या कर लिए जाने के समाचार ने संपूर्ण जनपद के किसानों को हिलाकर रख दिया है. बताते चलें कि उक्त ॠण माफी योजना के फलस्वरूप आम किसानों में यह धारणा भी अब पूर्णतया बलवती हो चली है कि यदि उन्होंने बैंको को क़र्ज़ की रक़म कुछ भी न लौटाई होती तो वे भी ॠण माफी योजना का लाभ पाते. तो अब इसी का अनुसरण क्यों न किया जाए. इसी का परिणाम है कि अब बैकों को ॠणों की वसूली में  पसीना आ रहा है और किसानों को आरसी की नोटिसों के चलते छिपने का ठिकाना नहीं मिल रहा है. इसकी स्वीकारोक्ति के रूप में जनपद के कई बैंकों के अधिकारियों ने बताया कि कतई ॠण अदायगी न करने का मन बना चुके किसानों से वसूली कर पाना अब असंभव सा लग रहा है. ऐसे में अपेक्षित वसूली के अभाव में पुन: ॠण वितरण कर पाना भी हमारे लिए समस्या बनकर सामने आ रही है. जिस प्रकार क्रय शक्ति के हस के कारण बाज़ारों में माल उपलब्ध होने के बावजूद व्यापारियों के सामने अपेक्षित विक्रय न होने की विकराल समस्या आई है, ठीक उसी प्रकार खेती में नुक़सान उठा चुके किसान पुराने ॠणों की अदायगी कर सकने में पूर्णतया असमर्थ हैं. मौजूदा अलाभकारी और महंगी खेती को चालू रखने के लिए उन्हें स़िर्फ एक ही विकल्प दिखाई प़डता है कि उन्हें एक बार ॠण माफी मिले और इसके लिए आम किसान ब़डी आशा भरी निगाहों से सकरार की ओर देख रहा है.

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इसके अलावा अब समय आ गया है कि वह इस सत्तारूढ़ सरकार से कड़ाई और प्रभावी ढंग से यह पूछें कि आपके वायदे के मुताबिक़ तो 76 प्रतिशत किसानों को ॠण मुक्त किया जाना था, लेकिन 76 प्रतिशत तो ॠण माफी से वंचित ही रह गए. 80 प्रतिशत किसान आत्महत्या को मजबूर हैं. कृषकहितों की बात करने वाले राजनेता काश किसानों के दर्द को समझ पाते.

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