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अब शंकराचार्य पद को लेकर बवाल
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अब शंकराचार्य पद को लेकर बवाल

इसी स्तंभ में अभी कुछ दिन पूर्व मैंने लिखा था कि बिना विवाद के कोई कुंभ पूरा नहीं होता है. विवादों का, वह भी साधु-संन्यासियों के परस्पर विवादों का कुंभ के साथ चोली-दामन का साथ है. हरिद्वार के महाकुंभ 2010 में भी दूसरे शाही स्नान तक आते-आते यह बात एक बार फिर सच साबित हो रही है. अक्सर साधु-संन्यासियों के विवाद अखाड़ों के परस्पर विवाद हुआ करते हैं. कभी संन्यासी अखाड़ों के भीतर के विवाद तो कभी बैरागी अखाड़ों के भीतर के विवाद. और, कभी-कभी संन्यासी-बैरागियों के झगड़ों के चलते समस्याएं पैदा हो जाती हैं. पर इस बार विवाद अखाड़ों को लेकर नहीं, बल्कि शंकराचार्य पद को लेकर है.

इस बार के महाकुंभ में फिलहाल स्वयंभू शंकराचार्यों का मुद्दा उभरा है. पर विडंबना यह है कि यह मुद्दा ख़ुद द्वि-पीठाधीश्वर स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के खेमे से उभरा है. इस खेमे से मांग उठाई गई है कि फर्ज़ी शंकराचार्यों को कुंभ क्षेत्र से खदेड़ा जाए. उनके भूमि आवंटन रद्द हों और उनके फ्लैक्स-बैनर नगर से हटवा दिए जाएं. इन लोगों को दी गई सरकारी सुविधाओं से वंचित किया जाए. अगर ऐसा न हुआ तो स्वामी स्वरूपानंद कुंभनगर में नहीं आएंगे. इस घोषणा से व्यथित निर्मल अखाड़े के एक उत्साही युवा महामंडलेश्वर स्वामी संजीव चंद्रहरि ने गंगाजल उठाकर कसम खा ली कि ऐसा हुआ तो वह अपने ग्यारह शिष्यों के साथ जल मरेंगे.

अब से क़रीब साढ़े बारह सौ वर्ष पूर्व आदि शंकराचार्य का आविर्भाव हुआ था. तब उन्होंने सनातन वैदिक धर्म के पुनरुद्धार के लिए देश में चार मठाम्नायों की स्थापना और संन्यासियों के लिए दशनामी परंपरा का सूत्रपात किया था. उस व़क्त अपने चार शिष्यों को चार दिशाओं में शांकरीपीठों पर स्थापित करते हुए शायद उन्होंने यह सोचा भी न होगा कि आगे चलकर उनकी परंपरा में चार से अधिक शंकराचार्य हो जाएंगे और वे परस्पर उन शांकरीपीठों को ही नहीं, बल्कि शंकराचार्य के परम पावन पद को भी विवादित कर देंगे. उन्होंने तो एक विशिष्ट ग्रंथ की रचना करके अपने बाद की व्यवस्था के लिए सब कुछ बिल्कुल स्पष्ट कर दिया था. इस ग्रंथ में उन्होंने चारों मठों के नाम, उनके संप्रदाय, दशनामों में से उनके अंकित पद, मठ का तीर्थ, क्षेत्र का नाम, आराध्य देव और देवी, वहां के ब्रह्मचारी का नाम, गोत्र तथा वेद ही नहीं, पीठ का महावाक्य तक तय कर दिया था. आदि शंकराचार्य द्वारा नियुक्त चारों पीठों के प्रथम आचार्य भी सर्वविदित ही हैं. उन चारों पीठों के अंतर्गत आने वाले इलाक़े भी ग्रंथ में स्पष्टत: उल्लेखित हैं. शैव संन्यासियों के लिए आदि शंकराचार्य की वसीयत इस महत्वपूर्ण ग्रंथ को मठाम्नाय, मठाम्नायसेतु या मठेतिवृत्त के नाम से जाना गया. इस ग्रंथ के अनुसार, पहला मठ पश्चिम में द्वारिकापुरी में शारदामठ है. इसका संप्रदाय कीटवार तथा अंकित पद तीर्थ और आश्रम है. इसका तीर्थ गोमती तथा क्षेत्र का नाम द्वारका है. इस पीठ के आराध्य देव सिद्धेश्वर और देवी भद्रकाली हैं. यहां के ब्रह्मचारी का नाम स्वरूपक है, जो सामवेद के प्रवक्ता हैं. गोत्र का नाम अविगत है. पीठ का महावाक्य तत्वमसि है. आदि शंकराचार्य द्वारा नियुक्त इस पीठ के प्रथम आचार्य हस्तामलक हैं. सिंधु, सौवीर, सौराष्ट्र और महाराष्ट्र आदि इलाक़े इस पीठ के अंतर्गत आते हैं.

द्वितीय मठ पूर्व में जगन्नाथपुरी में गोवर्धनमठ है. इसका संप्रदाय भोगवार तथा अंकित पद वन और अरण्य है. इसका तीर्थ महोदधि तथा क्षेत्र का नाम पुरुषोत्तम है. इस पीठ के आराध्य देव जगन्नाथ और देवी विमला हैं. ब्रह्मचारी का नाम प्रकाशक है, जो ऋृग्वेद के प्रवक्ता हैं. गोत्र का नाम काश्यप है. पीठ का महावाक्य प्रज्ञानं ब्रह्म है. आदि शंकराचार्य द्वारा नियुक्त इस पीठ के प्रथम आचार्य पद्मपादाचार्य हैं. अंग, बंग, कलिंग, उत्कल, मगध और बर्बर आदि पूर्व के इलाक़े इस पीठ के अंतर्गत आते हैं. तृतीय मठ उत्तर में बदरिकाश्रम में ज्योतिर्मठ है. इसका संप्रदाय आनंदवार तथा अंकित पद गिरि, पर्वत और सागर हैं. इसका तीर्थ अलकनंदा तथा क्षेत्र का नाम बदरिकाश्रम है. इस पीठ के आराध्य देव नारायण और देवी पूर्णागिरि हैं. ब्रह्मचारी का नाम आनंद है, जो अथर्ववेद के प्रवक्ता हैं. गोत्र का नाम भृगु है. पीठ का महावाक्य अयमात्मा ब्रह्म है. आदि शंकराचार्य द्वारा नियुक्त इस पीठ के प्रथम आचार्य त्रोटकाचार्य हैं. कुरु, कश्मीर, कंबोज, पांचाल आदि उत्तर के इलाक़े इस पीठ के अंतर्गत आते हैं.

चौथा मठ दक्षिण में श्रृंगेरीमठ है. इसका संप्रदाय भूरिवार तथा अंकित पद सरस्वती, भारती और पुरी हैं. इसका तीर्थ तुंगभद्रा तथा क्षेत्र का नाम रामेश्वरम है. इस पीठ के आराध्य देव आदिवाराह और देवी कामाक्षी हैं. ब्रह्मचारी का नाम चैतन्य है, जो यजुर्वेद के प्रवक्ता हैं. गोत्र का नाम भूर्भुव: है. पीठ का महावाक्य अहम्‌ ब्रह्मास्मि है. आदि शंकराचार्य द्वारा नियुक्त इस पीठ के प्रथम आचार्य सुरेश्वराचार्य हैं. आंध्र, द्रविड़, कर्नाटक, केरल आदि दक्षिण के इलाक़े इस पीठ के अंतर्गत आते हैं. इन चार मठों के अलावा कांची कामकोटिपीठ के नाम से एक पांचवा मठ भी सैकड़ों बरसों से दक्षिण में अस्तित्व में है. कहा जाता है कि चार मठ स्थापित कर देने के बाद आदि शंकराचार्य यहीं रहे थे. इसीलिए इस स्थान को भी शंकरमठ का दर्ज़ा दे दिया गया. पर बात यहीं तक सीमित नहीं रही. कालांतर में कोल्हापुर की करवीरपीठ, मध्य प्रदेश की भानुपुरा पीठ और काशी की सुमेरुपीठ पर भी शंकराचार्य पदवीधारी बैठने लगे. इन तीनों पीठों से जुड़े लोग अनेक दस्तावेज़ी प्रमाण देने की बात करते हैं, पर यह भी सच है कि ये पीठ आदि शंकराचार्य ने स्थापित नहीं की थीं. आदि शंकराचार्य और उनका पद तो अखिल विश्व के हिंदुओं के लिए एक अत्यंत पूजनीय और परम-पावन पद रहा है. हिंदू उन्हें साक्षात शिव का अवतार मानते हैं. पर उनके निर्देशों में कहीं एक मठ के दो या अधिक आचार्य होने या दो पीठों पर एक आचार्य के होने की बात नहीं कही गई है.

लेकिन पिछले अनेक वर्षों से देश में आदि शंकराचार्य के इन सुस्पष्ट निर्देशों का भी खुला उल्लंघन हमारे सामान्य धर्माचार्यों द्वारा किया जा रहा है. ज्योतिर्मठ और शारदामठ पर बरसों से स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती क़ाबिज़ हैं. मज़े की बात यह है कि ज्योतिर्मठ पर ही स्वामी वासुदेवानंद और स्वामी माधवाश्रम भी अपना अधिकार बताते हैं. तीनों के अपने-अपने तर्क हैं, जिनके चलते आम हिंदू समाज में भ्रम की स्थिति बनी हुई है. स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के ज्योतिर्मठ पर ही नहीं, शारदामठ पर भी कनखल के स्वामी राजराजेश्वराश्रम अपना अधिकार जताते हैं. इस तरह ये दोनों ही मठ स्वयं धर्माचार्यों द्वारा ही विवादों के घेरे में ला दिए गए हैं. उधर गोवर्धनमठ पर शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद के सम्मुख स्वामी अधोक्षजानंद बरसों से मोर्चा संभाले हुए हैं. वहां भी एक मठ पर दो शंकराचार्यों का विवाद अख़बारों की सुर्ख़ियां बनता ही रहता है. इनके अलावा शंकराचार्य पद को अपने नाम के साथ लगाने वाले और भी अनेक संन्यासी हैं. उन सबका नामोल्लेख यहां आवश्यक नहीं है. पर यह स्थिति बेहद चिंताजनक है. दुखद यह भी है कि शैव साधुओं की तरह ही वैष्णव बैरागियों के संप्रदायों में इसी तरह के विवाद पनपते रहते हैं. वहां भी अनेक संप्रदाय हैं, जिनके मुखिया रामानंदाचार्य, वल्लभाचार्य, निंबार्काचार्य, मध्वाचार्य, विष्णुस्वामी आदि उच्च पदों से विभूषित होते हैं. पर इन पर भी विवादों के बादल मंडराते रहते हैं. वैष्णवों में भी एक से ज़्यादा लोग स्वयंभू संप्रदाय-प्रमुख बने बैठे हैं.

इस बार के महाकुंभ में फिलहाल स्वयंभू शंकराचार्यों का मुद्दा उभरा है. पर विडंबना यह है कि यह मुद्दा ख़ुद द्वि-पीठाधीश्वर स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के खेमे से उभरा है. इस खेमे से मांग उठाई गई है कि फर्ज़ी शंकराचार्यों को कुंभ क्षेत्र से खदेड़ा जाए. उनके भूमि आवंटन रद्द हों और उनके फ्लैक्स-बैनर नगर से हटवा दिए जाएं. इन लोगों को दी गई सरकारी सुविधाओं से वंचित किया जाए. अगर ऐसा न हुआ तो स्वामी स्वरूपानंद कुंभनगर में नहीं आएंगे. इस घोषणा से व्यथित निर्मल अखाड़े के एक उत्साही युवा महामंडलेश्वर स्वामी संजीव चंद्रहरि ने गंगाजल उठाकर कसम खा ली कि ऐसा हुआ तो वह अपने ग्यारह शिष्यों के साथ जल मरेंगे. इस बयान से एक नया हंगामा हो गया. उनसे उन्हीं के अखाड़े ने आत्मदाह वाली घोषणा को लेकर जवाब तलब कर लिया. उन्हें माफी मांगनी पड़ गई. स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती की इस मांग पर कुंभनगर में बवाल है. मामला अखाड़ा परिषद में भी उठा, पर कोई समाधान न निकलते देखकर परिषद ने इस विवाद से ही हाथ खींच लिया. पर नतीजा ये पंक्तियां लिखे जाने तक सिफ़र है. कोई धर्माचार्य कुंभ क्षेत्र से चले जाने पर आमादा है तो कोई अपने शिविर बंद करने पर उतारू है. कोई इस मुद्दे पर जलसमाधि या आत्मदाह की धमकी दे रहा है तो कोई इस कुंभ में इस विवाद का हल निकालने का आग्रही हो रहा है.

पर सच्चाई यह भी है कि फर्ज़ी शंकराचार्यों का मुद्दा उठाकर कुंभ नगर हरिद्वार को आंदोलित करने वाले स्वामी स्वरूपानंद अगर एक मठ पर बने रहकर दूसरा मठ किसी अन्य सुयोग्य व्यक्ति को सौंप देते तो संभवत: इन विवादों पर कभी का विराम लग चुका होता. धर्मक्षेत्र में नए-नए शंकराचार्यों के उद्‌भव पर भी रोक लग गई होती, पर दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हो सका. उनसे जब भी कहा या पूछा गया तो उनका जवाब था कि कोई सुयोग्य व्यक्ति मिल ही नहीं रहा है, जिसे वह दूसरा मठ सौंप सकें. कष्टप्रद यह भी है कि इन शंकराचार्यों पर राजनीतिक बिल्ले भी चस्पां हैं, जो उनके धर्मपद को विवादित करने के लिए पर्याप्त हैं. इन विवादों के चलते शंकराचार्य पद के अवमूल्यन की अनेक घटनाएं सामने आई हैं.

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