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बंगाल चुनाव: वामपंथ जीता पर वामपंथी हार गए
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बंगाल चुनाव: वामपंथ जीता पर वामपंथी हार गए

बर्लिन की दीवार ढहने और सोवियत संघ के विघटन के कई सालों बाद हिंदुस्तान में पहली बार ऐसा लगने लगा है कि हथौड़ा और हंसिया वाला लाल झंडा बंगाल की खाड़ी में विलीन होने वाला है. पश्चिम बंगाल और केरल में एक साथ वाममोर्चे का स़फाया होना भारत ही नहीं, विश्व के लिए एक ऐतिहासिक घटना है. वह इसलिए, क्योंकि भारत में पहली बार दुनिया की पहली चुनी हुई वामपंथी सरकार केरल में बनी और सबसे ज़्यादा दिनों तक वहां रही. दुनिया के कई देशों में मॉर्क्सवाद का स़फाया हो गया, लेकिन हिंदुस्तान में यह मज़बूती से डटा रहा. वाममोर्चा के लिए पश्चिम बंगाल का नतीजा मनोबल तोड़ने वाला नतीजा है. बंगाल की खाड़ी से हिमालय की गोद तक 34 सालों तक यह परचम लहराता रहा. अ़फसोस इस बात का है कि इस झंडे को लेकर चलने वालों को इसका रंग तो याद रहा, लेकिन उन्होंने इसके हथौड़ा और हंसिया को ही भुला दिया. सोनार बांग्ला कब पीतल और तांबे की बन गई, यह वाममोर्चा सरकार को पता ही नहीं चला. जब जनता को खबर लगी तो उसने इतिहास लिख दिया.

राजनीतिक दलों को एक बीमारी लगने लगी है. यह बीमारी पहले भारतीय जनता पार्टी को लगी थी, अब कम्युनिस्ट पार्टियों को लग गई है. बीमारी यह है कि इन पार्टियों के पास विचारधारा तो है, लेकिन ये उस पर चलती नहीं हैं. इनके पास कार्यकर्ता हैं, लेकिन जनता से तालमेल बनाने की क्षमता नहीं है. मज़बूत संगठन भी है, लेकिन दिशाहीनता की चपेट में है. ज़मीन से जुड़े नेताओं की कमी नहीं है, लेकिन उनकी कोई सुनवाई नहीं है. पार्टी की नीतियों का फैसला वे करते हैं, जिन्हें चुनाव नहीं लड़ना है, जिन्हें जनता के वोट से मतलब नहीं है. एयरकंडीशन कमरों में बैठकर, टेलीविजन चैनलों के स्टूडियो में बहस करके अपनी राजनीति चमकाने वाले नेता जिस किसी पार्टी के कर्ताधर्ता होंगे, चुनाव में उसका हाल यही होगा. देश की जनता ने इस बीमारी को अब पहचान लिया है.

कोई भी दल अगर 34 सालों तक सत्ता में रहता है तो ज़रूर कोई बात होगी. अचानक से यह नहीं हो सकता है कि वाममोर्चा ने सब कुछ ग़लत किया है. अगर ऐसा होता तो अब तक वह चुनाव जीतता नहीं आता. वैसे भी किसी प्रजातंत्र में कोई भी दल हार सकता है, इसमें कोई अचरज की बात नहीं है. यह बिल्कुल ग़लत होगा अगर हम मान लें कि एक चुनाव हारने से किसी पार्टी का अंत हो जाता है. पर समस्या यह है कि पश्चिम बंगाल में पिछले कुछ सालों से वाममोर्चा को हर छोटे-बड़े चुनावों में हार का सामना करना पड़ रहा है. वाममोर्चा चुनाव क्यों हार गया, इसे समझने के लिए यह जानना ज़रूरी है कि बंगाल में वाममोर्चा ने 34 सालों तक सत्ता में बने रहने का इतिहास कैसे रचा.

वाममोर्चा की सबसे बड़ी ताकत उसकी विचारधारा है. मॉर्क्सवाद की गहराई और उसकी त्रुटियों को अगर हम नज़रअंदाज़ कर दें, इससे जुड़े वैचारिक एवं सैद्धांतिक सवालों और विवादों को छोड़ दें तो मॉर्क्सवाद भारतीय परिवेश में सरकार चलाने का सबसे सटीक मूलमंत्र देता है. कहने का मतलब यह है कि सरकार उद्योगपतियों एवं पूंजीपतियों के बजाय मज़दूरों और किसानों के विकास के लिए काम करे, समाज में जो लोग शोषित हैं उनके उत्थान और सशक्तिकरण के लिए काम करे, ग़रीबों के लिए विशेष नीतियां और अल्पसंख्यकों के लिए विशेष प्रावधान हों तथा समाज के निचले तबके के लोगों का जीवन स्तर सुधारे, यही किसी भी सरकार का पहला दायित्व होना चाहिए. हालांकि 1991 से केंद्र की सरकार ठीक इससे उल्टा काम कर रही है. नव उदारवाद का सबसे बुरा असर ग़रीबों पर ही दिखता है. निजीकरण और उदारवाद की लपटें बंगाल तक पहुंच गईं. जो विचारधारा वामपंथी दलों की सबसे बड़ी ताक़त होती थी, उसके साथ समझौता करना महंगा पड़ गया. कल-कारखाने बंद हो गए, मज़दूर बेरोज़गार हो गए. जिन्हें काम मिलता भी है तो पैसे कम मिलते हैं. नए उद्योग लगाने में सरकार विफल रही. जबकि दूसरे राज्यों में तेज़ी से विकास हुआ. शिक्षा का स्तर तो बेहतर था, लेकिन शिक्षा व्यवस्था खराब होती चली गई. युवाओं के सामने अवसरों की कमी हो गई. मज़दूर, किसान, युवा और कामगार पश्चिम बंगाल से पलायन करने लगे. वैचारिक दृष्टि से सरकार के ये महत्वपूर्ण दायित्व थे. वामपंथी सरकार ने विचारधारा और दायित्व दोनों को भुला दिया. नतीजा हमारे सामने है.

वाममोर्चा का स़फाया क्यों हुआ, दुनिया के दूसरे देशों की तरह क्या भारत के परिप्रेक्ष्य में भी मॉर्क्सवाद अप्रासंगिक हो गया है, क्या पश्चिम बंगाल और केरल की हार से वामपंथ मृतप्राय: हो गया, क्या भविष्य में वाममोर्चा फिर से मजबूत हो सकता है, क्या भारत में वाम राजनीति का स्थान नहीं रहा, इस हार के बाद वाममोर्चा के पास क्या विकल्प बचा है और आने वाले समय में वामपंथ की मुश्किलें क्या-क्या हैं आदि ऐसे कई सवाल हैं, जिन्हें समझना महत्वपूर्ण है.

कोई भी सरकार या राजनीतिक पार्टी स़िर्फ विचारधारा की पवित्रता पर नहीं चलती. उसकी नीतियां ही बताती हैं कि वह जनता के साथ खड़ी है या फिर उसके खिला़फ. पिछले तीन दशकों से अपनी नीतियों की वजह से वाममोर्चा ने बंगाल के ग्रामीणों के दिलों पर राज किया. ग्रामीण क्षेत्र वामपंथ का गढ़ माना जाता था. शहरी इलाक़ों में निचले एवं मध्य वर्ग का साथ मिला. वाममोर्चा का समर्थन इतना सशक्त और संपूर्ण था कि जब उसकी सरकार पश्चिम बंगाल में आई, तब उसने भूमि सुधार जैसे क्रांतिकारी क़दम उठाए. जिनके पास जमीन नहीं थी, उन्हें ज़मीन मिली. पूरे देश के लिए पश्चिम बंगाल एक उदाहरण बन गया. मज़दूरों के विकास और कल्याण के लिए भी क़दम उठाए गए. कई सालों तक पश्चिम बंगाल सबसे खुशहाल राज्य रहा. समय के साथ-साथ परिस्थितियां भी बदल जाती हैं. अच्छी सरकार का मतलब होता है, जो समय की ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए नीतियां बदलती है. वाममोर्चा की सरकार यही काम नहीं कर सकी. जब केंद्र सरकार ने उदारवाद की नीतियों को अपनाया तो वाममोर्चा ने इसका विरोध किया, सही किया, लेकिन उसके स्थान पर वह कोई वैकल्पिक योजना देने में कामयाब नहीं हुआ. राज्य की आर्थिक स्थिति खराब होने लगी. सरकार ने जब बदलाव का दामन थामा तो सबसे बड़ी चूक हो गई. इस बदलाव में किसानों और मज़दूरों के लिए कोई जगह नहीं थी. नतीजा यह हुआ कि दार्जिलिंग के चाय बगानों से लेकर कोलकाता-आसनसोल-दुर्गापुर और हुबली के दोनों किनारों पर बसे उद्योगों ने दम तोड़ दिया. गेहूं, दाल और तिलहन के उत्पादन में राज्य पिछड़ गया. बंगाली मध्य वर्ग भी नाराज़ हो गया. भूमि सुधारों वाली दुधारू गाय सूख गई. जमींदारों का एक वर्ग गया तो 32 सालों से बिल्डरी और सरकारी ठेकों का माल खा रहा एक नया मालदार वर्ग तैयार हो गया. जनता को यह लगने लगा कि कभी भूमिहीनों को भूमि देने वाली सरकार किसानों से ज़बरदस्ती ज़मीन छीन रही है, उद्योगपतियों के खिला़फ बोलने वाली पार्टी अब उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाने की कोशिश कर रही है. चुनाव नतीजे लोगों के इसी एहसास का निष्कर्ष हैं.

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नेतृत्व का राजनीति पर गहरा असर होता है. यही किसी भी राजनीतिक दल का चेहरा होता है. 34 सालों तक पश्चिम बंगाल पर शासन करने का श्रेय वाममोर्चा को तो है ही, लेकिन इसमें सबसे बड़ा योगदान ज्योति बसु का भी है. ज्योति बसु की कार्यकुशलता और लोकप्रियता बेमिसाल थी. ज्योति बसु ने जब सक्रिय राजनीति को अलविदा कहा तो उनके पीछे नेताओं की फौज खड़ी थी. ज्योति बसु के जाते ही पश्चिम बंगाल में वाममोर्चा की स्थिति खराब होने लगी. अगर नेता पार्टी का चेहरा है तो पार्टी संगठन बेशक़ उसका शरीर है. किसी भी पार्टी को अपनी लोकप्रियता और अपना समर्थन बनाए रखने और फैलाने के लिए एक सशक्त संगठन की ज़रूरत पड़ती है. वामपंथी पार्टियां इसमें सबसे आगे हैं. इनके संगठन के सामने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का संगठन भी फीका दिखाई पड़ता है. बंगाल का ऐसा कोई गांव नहीं है, कोई पंचायत नहीं है, जहां वामदलों का कार्यालय नहीं है. वहां पार्टी के कार्यकर्ता और समर्थक हर रोज मिलते-जुलते हैं, देश-विदेश की घटनाओं पर बातचीत और बहस करते हैं. कार्यकर्ताओं की बाक़ायदा ट्रेनिंग होती है, कैंप लगाए जाते हैं. वामपंथी दलों का सबसे महत्वपूर्ण योगदान यह है कि उन्होंने बंगाल की जनता को राजनीतिक परिपक्वता दी है. समाज के हर क्षेत्र में इनकी शाखाएं हैं. शहर हो या गांव, सीपीएम और सीपीआई का आधिकारिक कार्यकर्ता होना गर्व की बात होती थी. लोग भी इनका आदर करते थे, लेकिन समय के साथ-साथ इसमें बदलाव आया. पढ़े-लिखे और भद्र लोगों की जगह गुंडे और बदमाशों ने ले ली. पार्टी संगठन विकृत और पथभ्रष्ट हो गया. लोग वामपंथी दलों के कार्यकर्ताओं से डरने लगे. सीपीएम के कार्यकर्ता दुर्गा पूजा या फिर किसी और कार्यक्रम का बहाना बनाकर लोगों से वसूली करने लग गए. पार्टी कार्यकर्ता गुंडों में परिवर्तित हो गए. छात्र राजनीति भी गुंडागर्दी का अड्डा बन गई. पुलिस भी पार्टी के इशारे पर काम करने लगी. ग्रामीण इलाक़ों में कार्यकर्ता खुलेआम पुलिस के सामने हथियार लेकर लोगों को डराने और धमकाने लग गए. पार्टी कार्यकर्ताओं की अकड़ और घमंड से लोग सहम गए.

ममता बनर्जी ने कुछ नया नहीं किया. उन्होंने वामपंथी सरकार द्वारा दिए गए मौक़े का फायदा उठाया. ममता की कोई विचारधारा नहीं है, कोई नीति नहीं है, कोई संगठन नहीं है. बुद्धिजीवी ममता को हमेशा अपरिपक्व मानते रहे. लेकिन ममता में जज़्बा है. दबी-कुचली, शोषित, बेरोज़गार और असहाय जनता के लिए लड़ने का जज़्बा.

पश्चिम बंगाल का बुद्धिजीवी वर्ग वाममोर्चा के साथ रहा. बंगाल के बुद्धिजीवियों ने हमेशा वाममोर्चा की विचारधारा, योजना, लीडरशिप और संगठन की स़िर्फ हिमायत ही नहीं की, बल्कि यह प्रचार किया और संदेश दिया कि वाममोर्चा दूसरी किसी भी पार्टी से बेहतर है, लेकिन पिछले कुछ सालों से यह बुद्धिजीवी वर्ग वाममोर्चा से दूर चला गया. इतना दूर कि नंदीग्राम, सिंगूर और लालगढ़ की घटनाओं के बाद ये लोग सरकार के खिला़फ सड़क पर उतर आए. कभी वाममोर्चा से का़फी नजदीक रहने वाले लेखक अतिन बंदोपाध्याय कहते हैं कि वाममोर्चा को तो बीस साल पहले ही सत्ता से बाहर कर देना चाहिए था, क्योंकि वामदलों के आतंक और अहंकार से लोग तंग आ चुके हैं. बंगाल के कलाकारों और लेखकों के बीच बुद्धदेव भट्टाचार्य का़फी लोकप्रिय हुआ करते थे. फिर ऐसी क्या ग़लतियां हुईं, जिनसे बंगाल का बुद्धिजीवी वर्ग समर्थक से विरोधी बन गया. लेखक सिर्शेंदु मुखोपाध्याय कहते हैं कि वामदलों के कार्यकर्ताओं एवं नेताओं की बॉडी लैंग्वेज और नकारापन वाममोर्चा की हार की वजह है. अब तक वे स़िर्फ फर्ज़ी मतदान की वजह से जीतते आ रहे थे. जो बुद्धिजीवी तीन साल पहले तक वामदलों के सक्रिय समर्थक थे, मॉर्क्सवाद में विश्वास रखते थे, वे आज खिला़फ हो गए.

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विचारधारा, संगठन, नीतियां, नेतृत्व और बुद्धिजीवियों का समर्थन वाममोर्चा की असली ताक़त थी. वामपंथी दलों की ताक़त कमज़ोरी में बदल गई. ऐसे में बंगाल की राजनीति में धीमी गति से ही सही, मगर सतत एक ज़मीनी नेतृत्व छाने लगा. नीले बॉर्डर वाली सफेद साड़ी और पैरों में हवाई चप्पल. पानी और कीचड़ भरी सड़कों पर चलते तेज कदम, नाकामियों से निराश न होने वाला आक्रामक चेहरा, जनता के दु:ख-दर्द को अपना समझने वाला भाव, पश्चिम बंगाल की तीन दशकों की वाम राजनीति के कुरुक्षेत्र में यह चेहरा हर जगह दिखा है. ममता बनर्जी ने कुछ नया नहीं किया. उन्होंने वामपंथी सरकार द्वारा दिए गए मौक़े का फायदा उठाया. ममता की कोई विचारधारा नहीं है, कोई नीति नहीं है, कोई संगठन नहीं है. बुद्धिजीवी ममता को हमेशा अपरिपक्व मानते रहे. लेकिन ममता में जज्बा है. दबी-कुचली, शोषित, बेरोजगार और असहाय जनता के लिए लड़ने का जज्बा. जब सिंगूर में टाटा का नैनो कारखाना लगने के समय ममता को लगा कि बहुत सारे किसान अनिच्छुक हैं और सरकार उन्हें पर्याप्त मुआवज़ा दिए बिना ज़मीन ले रही है तो उन्होंने आंदोलन किया. किसानों की ज़मीन बचाने के लिए जो काम वामपंथी दल करते आए, वही काम ममता बनर्जी ने किया. फिर नंदीग्राम के केमिकल हब के लिए भूमि अधिग्रहण की अधिसूचना जारी होते ही आंदोलन भड़का. ममता का वह आंदोलन पूरे दक्षिण बंगाल में फैल गया. समय के साथ-साथ ममता में मुद्दों की समझ भी बढ़ती गई. बांग्ला भद्रलोक को भी लगने लगा है कि ममता अब परिपक्व हो गई हैं. ममता ने आंधी-पानी, जलती दुपहरिया में और  धूल भरे रास्तों पर जनता से जुड़े मुद्दों को लेकर संघर्ष किया. यही तो वामपंथ की आत्मा है. वामपंथियों को इस बात से खुश होना चाहिए कि ममता की जीत उन मूल्यों की जीत है, जिन मूल्यों का आधार वामपंथ है.

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दिल्ली में बैठे देश चलाने वाले लोग इस चुनाव नतीजे की अपने ही अंदाज में व्याख्या करने में जुटे हैं. वाममोर्चा की हार को नव उदारवाद की जीत समझा जा रहा है. यही खतरा है. कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना यह है कि जिस तरह महाराष्ट्र, गुजरात और दिल्ली में उदारीकरण और निजीकरण की वजह से तरक्की हुई है, वैसा विकास बंगाल में नहीं हुआ. इसलिए लोगों ने वाममोर्चा को उखाड़ फेंका. यूरोप और अमेरिका के अ़खबारों में यह लिखा जा रहा है कि कांग्रेस की यूपीए सरकार को पीछे खींचने, उदारवाद पर ब्रेक लगाने, न्यूक्लियर डील को पटरी से उतारने और भारत की छवि बिगाड़ने की वजह से लोगों ने वामपंथियों को सबक सिखाया है. आश्चर्य की बात यह है कि दिल्ली में बैठे कई लोग इसी दलील को सही मान रहे हैं. इस तरह के विश्लेषण से बचने की ज़रूरत है. अगर वामपंथ की हार को उदारवाद और बाज़ारवाद के चश्मे से देखा गया तो हम ग़लत नतीजे पर पहुंच जाएंगे, जो घातक साबित हो सकता है. पश्चिम बंगाल में वामपंथी दलों की हार नव उदारवाद की नहीं, वामपंथ के मूल्यों की ही जीत है.

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