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बंगाल को खाक कर देगी नानूर की चिंगारी

बंगाल को खाक कर देगी नानूर की चिंगारी

बंगाल के माथे पर देश की सांस्कृतिक राजधानी होने का ताज है, पर हाल के वर्षों में इसने कई और रिकार्ड बनाए हैं. किसी दल के लगातार 33 साल शासन में रहने का रिकॉर्ड इसके नाम है तो राजनीतिक हत्याओं के मामले में भी यह देश का सबसे कुख्यात राज्य बन गया है. बंगाल के आज के हालात बिहार के उन दिनों की याद दिलाते हैं, जब निजी सेनाओं के हाथों किए जाने वाले नरसंहार सुर्खियां बने रहते थे, पर बंगाल अब काफ़ी आगे निकल गया है. वैसे तो हिंसा की चिंगारी पूरे बंगाल की हवा में तैर रही है, लेकिन हाल के सालों में वीरभूम ज़िले का नानूर और बर्दवान ज़िले का मंगलकोट ज्वालामुखी बन गए हैं. यहां से उठते लावों ने आसपास के गांवों को तो चपेट में ले ही लिया है, पड़ोस में माओवादी जले पर नमक छिड़क रहे हैं.

हाल की हिंसा नानूर में माकपा के पूर्व विधायक आनंद दास की हत्या के कारण भड़की है. 2000 में नानूर में हुई 11 हत्याओं के बाद यहां तृणमूल के राजनीतिक क़दम पड़े और एक पंचायत पर उसका क़ब्ज़ा हुआ. फिर क्या था, वामदलों का गढ़ कहे जाने वाले इस इलाक़े में खूऩखराबा शुरू हो गया. नानूर के संबंध में सीआईडी ने मुख्यमंत्री को जो रिपोर्ट सौंपी है, उसके मुताबिक़ सूचपुर, पापुरी, थुपसारा एवं बासापाड़ा में दोनों गुटों के लोगों ने बड़ी मात्रा में हथियार और गोला-बारूद इकट्ठा कर रखा है. इस वजह से एक चिंगारी उठते ही हिंसा भड़क उठती है.

हाल में कोलकाता नगर निगम एवं अन्य स्थानीय निकाय चुनावों में तृणमूल की जीत और राज्य माकपा की बैठक में पार्टी में नई जान फूंकने की कवायद के कारण टकराव बढ़ गया है. चुनावी राजनीति गरमाती जा रही है और सत्ता के केंद्र कोलकाता का तापमान भी बढ़ता जा रहा है. इन दोनों गांवों की आग में बलि चढ़ रहे हैं ग़रीब कार्यकर्ता. मतलब यह कि राजनीतिक बकरे हलाल हो रहे हैं. नेता राजनीतिक रोटियां सेंक रहे हैं. खोई हुई ज़मीन पाने और नई राजनीतिक ज़मीन हथियाने की इस जंग के अगले विधानसभा चुनावों तक थमने के आसार नज़र नहीं आते. इस हालात में, जबकि आरोप है कि कुछ राजनीतिक दल अपने चुनावी फायदे के लिए इस आग को जलाए रखना चाहते हैं, अमन की उम्मीद करना रेगिस्तान में पानी खोजने जैसा है.

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हाल की हिंसा नानूर में माकपा के पूर्व विधायक आनंद दास की हत्या के कारण भड़की है. 2000 में नानूर में हुई 11 हत्याओं के बाद यहां तृणमूल के राजनीतिक क़दम पड़े और एक पंचायत पर उसका क़ब्ज़ा हुआ. फिर क्या था, वामदलों का गढ़ कहे जाने वाले इस इलाक़े में खूऩखराबा शुरू हो गया. नानूर के संबंध में सीआईडी ने मुख्यमंत्री को जो रिपोर्ट सौंपी है, उसके मुताबिक़ सूचपुर, पापुरी, थुपसारा एवं बासापाड़ा में दोनों गुटों के लोगों ने बड़ी मात्रा में हथियार और गोला-बारूद इकट्ठा कर रखा है. इस वजह से एक चिंगारी उठते ही हिंसा भड़क उठती है. कहा जा रहा है कि पूर्व विधायक के हत्यारे कभी माकपा समर्थक ही थे, पर सत्ता परिवर्तन की बयार देख उन्होंने पाला बदल लिया है. वैसे नानूर वाममोर्चा के घटकों के बीच की आपसी जंग का इतिहास भी समेटे हुए है. इसी साल 20 मार्च को माकपा समर्थक उपद्रवियों ने आरएसपी कार्यकर्ता शमसुल हुदा के घर में आग लगा दी. माकपा-आरएसपी नेताओं ने बैठकें कर तनाव कम करने की कोशिश की, पर वे कामयाब नहीं हुए, क्योंकि बताने की बात नहीं कि उपद्रवी तत्वों की राजनीतिक प्रतिबद्धता की डोर काफी कमज़ोर होती है और वह धन एवं राजनीतिक संरक्षण के आक्सीजन से ज़िंदा रहती हैं. उपद्रवी तत्व अपने हितों के लिए दुश्मनी का माहौल जारी रखना चाहते हैं. इनमें से ज़्यादातर तृणमूल में शामिल हो चुके हैं. पालिका चुनावों के बाद पाला बदलने की प्रक्रिया और तेज़ हो गई है.

पाला बदल का संकेत पुलिस महकमे में भी मिल रहा है. लगातार तीन दशक के शासन में पुलिस के सामने कोई असमंजस नहीं था, पर अब बदलाव की हवा के कारण माकपा की बात मानने वाले र्एंसर अपनी छवि बदल कर भविष्य सुरक्षित करने में लगे हैं. मालूम हो कि 1977 में भी पुलिस को इसी वैचारिक संक्रांति का सामना करना पड़ा था, जब नक्सली उत्पात और इमर्जेंसी के बाद सिद्धार्थ शंकर राय के खिलाफ़ हवा बन गई थी. पूर्व विधायक की हत्या के बाद सरकार ने सबसे पहला क़दम वीरभूम के एसपी रवींद्रनाथ मुखर्जी के तबादले के रूप में उठाया. वैसे कहा गया कि यह रुटीन तबादला है. वामदलों ने पुलिस पर निशाना साधा, क्योंकि पहले पूर्व विधायक के घर में तोड़फोड़ और फिर घर से खींचकर उनकी हत्या की गई. मुख्यमंत्री ने भी कहा कि नानूर में पुलिस ने लापरवाही बरती. उन्होंने यह उम्मीद जताई कि नए एसपी हुमायूं कबीर वहां हालात क़ाबू में कर पाएंगे. इसे लेकर जब विधानसभा में वाममोर्चा के घटक आरएसपी के विधायकों ने हो-हल्ला किया तो मुख्यमंत्री ने सदन में ही एसपी के तबादले का ऐलान किया. विधानसभा के स्पीकर ने भी माना कि उन्होंने कभी मुख्यमंत्री को सदन में किसी पुलिस अधिकारी के तबादले का ऐलान करते हुए नहीं सुना. मुख्यमंत्री का ऐलान दूसरे ज़िलों के पुलिस र्एंसरों के लिए भी एक संदेश था कि वे उपद्रव रोकने के लिए सक्रिय हों. इधर माकपा की पीड़ा इसलिए बढ़ गई है कि उसे तृणमूल के उपद्रवियों के साथ माओवादी हिंसा का भी सामना करना पड़ रहा है.

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राज्य माकपा सचिव विमान बोस के मुताबिक़, 2009 के लोकसभा चुनावों के बाद जंगल महल यानी बांकुड़ा, पुरुलिया और मिदनापुर में 242 वाम समर्थक मारे गए हैं. उधर एसपी के तबादले पर ममता ने बुद्धदेव पर निशाना साधा है. उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री राजनीतिक रूप से पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं. वर्ष 2000 में जब नानूर में 11 तृणमूल कार्यकर्ताओं की हत्या की गई थी, तब क्यों नहीं तबादले किए गए? उन्होंने दावा किया कि केवल नानूर में पिछले कुछ सालों में 20 तृणमूल कार्यकर्ताओं की हत्या की गई. मालूम हो कि उस समय वाममोर्चा ने इन 11 लोगों को डकैत कहा था. इस तरह ज्योति बसु के शासनकाल से ही नानूर हिंसा का केंद्र बना हुआ है. हिंसा का दूसरा ज्वालामुखी बर्दवान के मंगलकोट में सुलग रहा है. मंगलकोट में तृणमूल के नेता शमशुर रहमान की हत्या के बाद आग भड़की. बाद में इसमें कांग्रेसी भी झुलस गए. मंगलकोट के कुलसोना गांव में बीती 6 जुलाई को माकपा-कांग्रेस समर्थकों के बीच हुई झड़पों में 3 लोग घायल हो गए और पुलिस को मोर्चा संभालना पड़ा.

कांग्रेस विधायक रवींद्रनाथ चटर्जी ने कहा कि बमों के हमले में पार्टी के 17 कार्यकर्ता घायल हुए. दोनों दलों के नेता एक-दूसरे पर तीन परिवारों के घर जलाने का आरोप लगा रहे हैं. मंगलकोट पिछले साल तब सुर्ख़ियों में आया, जब माकपा समर्थकों ने बंगाल कांग्रेस के वर्तमान अध्यक्ष मानस भुइयां एवं पूरी कांग्रेसी टीम को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा था. आज तनाव का आलम यह है कि इलाक़े के बहुत सारे लोग दूसरी जगह शरण लिए हुए हैं. हावड़ा और उत्तर 24 परगना ज़िले हिंसा की आग में लगातार जल रहे हैं. जुलाई के पहले पखवाड़े में हावड़ा के डोमजूर में माकपा समर्थित उपद्रवियों ने तृणमूल के पंचायत सदस्य तपन कुमार मंडल की हत्या कर दी. पंचायत कार्यालय पर गोलियों व बमों के ज़रिए किए गए हमले में पंचायत समिति के सह सभापति कल्याण घोष बाल-बाल बच गए और कई अन्य नेता घायल हो गए. बाद में बर्दवान के बद्रावपुर में माकपा और तृणमूल समर्थकों को तितर-बितर करने के लिए पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा. मालूम हो कि लोकसभा चुनावों तक राजनीतिक हिंसा में लगभग 66 लोग मारे गए. पश्चिम मिदनापुर में 20, मुर्शिदाबाद में 9, पूर्व मिदनापुर में 8, दक्षिण 24 परगना में 8, बर्दवान में 6, नदिया में 4, पुरुलिया में 4, उत्तर 24 परगना में 2, मालदा में 2 और हुगली, दक्षिण दिनाजपुर एवं कूचबिहार में एक-एक व्यक्ति को अपनी जान गंवानी पड़ी. विमान बोस के मुताबिक़ 242 वाम कॉडर मारे गए हैं तो ममता के मुताबिक़ 20 तृणमूली मारे गए. इसे देखते हुए मरने वालों की संख्या 66 से काफी ज़्यादा यानी चौगुनी से भी ज़्यादा बैठती है. हालांकि वामदलों के ज़्यादातर कॉडर माओवादी हिंसा के शिकार हुए हैं. इसी साल 15 मई को नानूर प्रखंड के गुजतीपाड़ा, गारपाड़ा एवं मोद्दा आदि गांवों में हुई राजनीतिक झड़पों में कम से कम 3 तृणमूल कार्यकर्ता मारे गए और 70 घर आग के हवाले कर दिए गए. इसके पहले 25 अप्रैल को कथित तौर पर माकपा कॉडरों ने तृणमूल समर्थकों के 250 घरों को फूंक दिया था. नानूर विश्वकवि रवींद्र नाथ टैगोर के शांति निकेतन से 20 किलोमीटर दूर है, पर आज यह पूरा इलाक़ा अशांति निकेतन बन गया है. अजय एवं मयुराक्षी नदियों के किनारे बसा ख़ूबसूरत नानूर प्रखंड टेराकोटा की कारीगरी के लिए प्रसिद्ध है, पर आज यहां की ज़मीन खून के थक्कों से काली पड़ गई है. कब थमेगा यह सिलसिला, कोई नहीं बता सकता. कहीं नानूर की चिंगारी पूरे बंगाल को ही न खाक कर दे.

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