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भारतीय राजनीति में धर्म निरपेक्षता एक छलावा
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भारतीय राजनीति में धर्म निरपेक्षता एक छलावा

प्रसिद्ध गीतकार जावेद अख्तर ने पिछले दिनों एक बड़े मार्के की बात कही. उन्होंने कहा कि एक मुसलमान होने के चलते वह कभी धर्म निरपेक्ष हो ही नहीं सकते. धर्म निरपेक्षता का मामला तो केवल हिंदुओं तक सीमित है, मुसलमान तो बस मुसलमान हैं. मेरे नज़रिए से उन्हें एक और बात इसमें जोड़ देनी चाहिए थी. उन्हें यह भी बताना चाहिए था कि आम लोगों को अपनी धर्म निरपेक्षता साबित करने की कोई ज़रूरत नहीं है, बल्कि यह काम तो राजनीतिक पार्टियों के नेताओं को करना चाहिए. इसकी वजह यह है कि धर्म निरपेक्षता अब विचारधारा की चीज नहीं रह गई, बल्कि वह स्वार्थ सिद्धि और अवसरवादिता तक सीमित होकर रह गई है.

अदालत का फैसला आने के बाद पार्टी के नेताओं को मंदिर बनने की संभावना नज़र आने लगी तो वह फैसले का गुणगान करने लगे. वे चाहते तो इसी तर्ज पर मस्जिद निर्माण का प्रस्ताव भी रख सकते थे, लेकिन विवेकशीलता के बजाय उन्होंने अपने हिंदू वोट बैंक को सुरक्षित रखने की रणनीति अपनाई. हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के इस फैसले के बाद यदि देश की राजनीतिक पार्टियां धर्म निरपेक्षता के मुद्दे पर अपनी बचकाना लड़ाई को किनारे करने में कामयाब होती हैं, तभी भारतीय राजनीति की दशा और दिशा में किसी अच्छे बदलाव की उम्मीद की जा सकती है.

अयोध्या मामले पर फैसला आने के बाद भारतीय राजनीति की वास्तविक त्रासदी सतह पर आ गई. देश की आम जनता पर इसका कोई खास असर देखने को नहीं मिला. उसके लिए यह अदालत का एक फैसला भर था और इसी रूप में उसने इसे स्वीकार भी किया. समस्या तो राजनीतिक पार्टियों के साथ है, जो इसके बाद से घबराई हुई हैं. इसकी वजह यह है कि आम लोगों के लिए धर्म कोई खास अहमियत नहीं रखता, इससे ज़्यादा महत्वपूर्ण रोज़ाना की ज़िंदगी से जुड़े अन्य मुद्दे हैं, लेकिन राजनीतिक दलों के लिए धर्म का मतलब वोट बैंक है. तथाकथित धर्म निरपेक्ष पार्टियां अपने रुख़ को लेकर असमंजस में हैं. वे यह नहीं तय कर पा रही हैं कि फैसले को मुस्लिम हितों के ख़िला़फ घोषित करें या फिर ज़िम्मेदार संगठन का नज़रिया अपनाते हुए इसे सबको ख़ुश करने वाला बताएं. यहां मुद्दा धार्मिक आस्था या अदालत का फैसला नहीं है, असली मुद्दा तो आगे होने वाले चुनाव हैं. सबसे बड़ी समस्या देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस के साथ है. इसमें अभी भी कई ऐसे लोग हैं, जो धर्म निरपेक्षता की नेहरूवादी विचारधारा के समर्थक हैं. उनके लिए राजनीति में धर्म के लिए कोई जगह नहीं है और इसकी कोई चर्चा तक उन्हें मंजूर नहीं. पार्टी का यह धड़ा सवाल खड़े कर रहा है कि जजों ने क़ानूनी मामले में हिंदुओं की धार्मिक आस्था को आधार बनाकर फैसला क्यों दिया? लेकिन यह विवाद तो तीन साल पहले यूपीए के पहले कार्यकाल में ही ख़त्म हो गया था, जब तत्कालीन क़ानून मंत्री ने राम सेतु मामले में सुप्रीम कोर्ट में यह माना था कि सरकार राम के अस्तित्व और उनके दैविक चरित्र को स्वीकार करती है. कांग्रेस पार्टी के अधिकतर सदस्य धर्म निरपेक्षता की दुहाई देते हैं, लेकिन इसका एकमात्र मक़सद मुस्लिम वोट बैंक को समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल से दूर रखना है. नेहरू के जाने के बाद से धर्म निरपेक्षता के प्रति नज़रिए में काफी बदलाव आ चुका है. मुसलमानों की धार्मिक भावनाओं का सम्मान करना पहली प्राथमिकता बन गया. सलमान रश्दी के सैटेनिक वर्सेज को प्रतिबंधित कर दिया गया. डेनमार्क में बनाए गए पैगंबर मोहम्मद के कार्टूनों की भर्त्सना की गई.

कांग्रेस के तथाकथित धर्मनिरपेक्षवादियों ने उस समय यह नहीं कहा कि कुरान की कुछ आयतों की सच्चाई पर रश्दी ने जो सवाल उठाए हैं, उन्हें इतनी आसानी से ख़ारिज नहीं किया जा सकता. इस मुद्दे पर अभी भी बहस जारी है, खासकर मिस्र में. यह मानने में कोई हर्ज नहीं होना चाहिए कि पैगंबर मोहम्मद के अभिचित्रण को लेकर कुरान में कोई प्रतिबंध नहीं है. ऐसा हो भी नहीं सकता, क्योंकि कुरान में लिखे शब्द ख़ुद अल्लाह के ही हैं. हदीथ में केवल एक वाक्य ऐसा है, जिसे प्रतिबंध के समर्थन में उद्‌धृत किया जाता है, लेकिन शिया मुस्लिम इसे स्वीकार नहीं करते. पैगंबर के चित्रों वाले सिक्के उनकी मौत के पांच सौ साल बाद तक आसानी से उपलब्ध थे. फिर भी यदि प्रतिबंध की बात मान लेने से शांति बनी रहती है तो इसमें कोई बुराई नहीं है. लेकिन यदि ऐसा है तो हिंदुओं की धार्मिक आस्था की बातों, जैसा कि अयोध्या में राम के जन्म का मामला है, चाहे वह अतार्किक ही क्यों न हो, को मानने से परहेज क्यों? और यदि हम सामाजिक शांति बनाए रखने के नाम पर हर धार्मिक समुदाय के अतार्किक विश्वासों को मानने के लिए तैयार हैं तो फिर कांग्रेस और भाजपा के बीच फर्क़ क्या रह जाता है? धर्म निरपेक्षता का मतलब केवल मुस्लिम वोटों के लिए मची धमाचौकड़ी है या फिर यह सिद्धांत से जुड़ा मुद्दा है?

भारतीय जनता पार्टी के लिए भी लचीला रवैया अपनाना खासा मुश्किल काम है. अदालत का फैसला आने के बाद पार्टी के नेताओं को मंदिर बनने की संभावना नज़र आने लगी तो वह फैसले का गुणगान करने लगे. वे चाहते तो इसी तर्ज पर मस्जिद निर्माण का प्रस्ताव भी रख सकते थे, लेकिन विवेकशीलता के बजाय उन्होंने अपने हिंदू वोट बैंक को सुरक्षित रखने की रणनीति अपनाई. हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के इस फैसले के बाद यदि देश की राजनीतिक पार्टियां धर्म निरपेक्षता के मुद्दे पर अपनी बचकाना लड़ाई को किनारे करने में कामयाब होती हैं, तभी भारतीय राजनीति की दशा और दिशा में किसी अच्छे बदलाव की उम्मीद की जा सकती है. विचारधारा के नाम पर इस फर्ज़ी विभाजन के पीछे काफी ऊर्जा ख़र्च हो रही है, जबकि एक सर्वसम्मत सरकार का होना आज समय की ज़रूरत बन चुका है. आर्थिक और सामरिक मामलों में चीन हमसे लगातार आगे निकलता जा रहा है. बाल्टिस्तान में नई संरचनाओं का निर्माण कर वह हमारे दरवाजे तक पहुंच चुका है, जबकि 62 साल बीत जाने के बावजूद हम आज तक कश्मीर में रेलवे नेटवर्क का निर्माण नहीं कर पाए हैं. पिछले कुछ सालों में चीन ने तेज गति वाले कई रेल ट्रैक बनाए हैं, लेकिन हम इस मामले में भी पीछे हैं. भारतीय राजनीति में विभाजन की शुरुआत 1989 में मंडल आयोग की स़िफारिशें लागू करने के बाद हुई. मंदिर-मस्जिद विवाद ने इस विभाजन को और गंभीर बना दिया, लेकिन अब वह समय आ चुका है कि हम इन विभाजनों को ख़त्म करें. आज ज़रूरत इस बात की है कि देश की बागडोर मज़बूत राजनीतिक पार्टियों के हाथों में हो.

1 comment

  • Bhart me aam aadmi to apna vikash karna chahta hai,lekin kuchh swarthi aur bhrmit khash logo ko ye achha nahi lagta,atah ye dharm ,jati,sex,chhetra,aadr kai muddo par baatate aaye hai, aise logo ki ye aadat aaj ki nahi hai prachinkal me char varno me vibhajan,madhyakal me hindu mushlim mahila purush,aadhunik yug me chhetra shampraday auranya chhote chhote muddo par. Aakhir ye kabtak chalega,humko bhi to kuchh sochna chahiye ?.

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