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भीख मांगता है महादलित
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भीख मांगता है महादलित

कहने को तो नीतीश के सुशासन की सरकार ने महादलितों के लिए कई कल्याणकारी योजनाएं चलाई हैं. ये योजनाएं कितनी साकार हुईं हैं, इस बात का सही आकलन इस महादलित विकलांग को देखकर ही किया जा सकता है. खगड़िया ज़िले के मुफसिल थाना अंतर्गत भदास गांव निवासी अर्जुन सदा का 35 वर्षीय पुत्र दिलीप कुमार दोनों पांव से लाचार है. ग़रीबी और बेकारी के कारण राजेंद्र नगर कुष्ट कॉलोनी में रहता है. जनप्रतिनिधियों ने कई योजनाओं के लाभ का सब्जबाग दिखाया, लेकिन यह बेचारा अभी भी किसी तरह सड़कों पर रेंगकर भीख मांग रहा है. इसे क्या कहा जा सकता है? शासन-प्रशासन की महादलित के प्रति बेरु़खी या कोई मजबूरी!

सहरसा-पटना मार्ग बंद

सहरसा-पटना मार्ग पर राहगीरों के लिए स़फर करना आसान नहीं रह गया है. दरअसल 1964 में खगड़िया ज़िले के इसराहा डुमरी पुल के बेहतर रख-रखाव के अभाव में इसकी हालत खस्ता हो गई है. लाखों रुपये बचाने के प्रयास में खर्च किए गए. पर अब यह बड़े वाहन तो क्या छोटे वाहनों के चलने योग्य भी नहीं रह गया है. इसके क्षतिग्रस्त होने से अन्य ज़िलों का सड़क संपर्क कट गया है. खगड़िया ज़िले के बेलदौर प्रखंडवासियों के लिए भी मुसीबत भी खड़ी हो गई है.

सपना अधूरा रह गया

खगड़िया प्रखंड के माड़र गांव के लोग आवागमन में भारी परेशानी का सामना का रहे हैं. गांव के बीचों बीच स्थित मृत मालती नदी पार करने के लिए लोग वर्षों से चचरी पुल पर स़फर करते हैं. कई बार पुल बनाने के सवाल पर धरना-प्रदर्शन हुआ. खगड़िया की विधायक पूनम देवी यादव ने पुल का शिलान्यास तो किया, लेकिन अभी तक पुल नहीं बन सका. वैसे भाकपा के पूर्व विधायक योगेंद्र सिंह ने लाखों की लागत से इस स्थल पर वर्षों पूर्व पुल तो बनवाया था, लेकिन लोगों का सपना इसलिए साकार नहीं हो सका क्योंकि उस पुल को अयोग्य घोषित कर दिया गया. अब लोगों को देखना है कि नई सरकार लोगों का सपना साकार कर पाती है या नहीं!

पंचायत चुनाव अप्रैल में

बिहार में अभी चुनाव का शोर थमने वाला नहीं है. राज्य निर्वाचन आयोग ने पंचायत चुनाव की अधिसूचना जारी करने की तिथि 15 फरवरी 2011 तय की है. यह चुनाव आठ चरणों में होगा. पहले चरण का चुनाव 15 अप्रैल, दूसरे चरण का 19 अप्रैल, तीसरे चरण का 23 अप्रैल, चौथे चरण का 27 अप्रैल, पांचवें चरण का 2 मई, छठे चरण का 6 मई, सातवें चरण का 10 मई और आठवें चरण का चुनाव 14 मई को होगा. लगभग ढाई लाख पदों के लिए चुनाव होंगे, जिनमें मुखिया, सरपंच, वार्ड पार्षद, पंच और ज़िला पार्षद के पद शामिल हैं. पंचायत चुनाव में आरक्षण का फॉर्मूला पुराना ही होगा.

बंद चीनी मिल से बेसुध

करीब दो दशक से बंद पड़ी गुरारू चीनी मिल की सुध अभी तक किसी भी राजनीतिक दल के नेता ने नहीं ली है. राज्य चीनी निगम के अंतर्गत आने वाली इस चीनी मिल के बंद होने से गया ज़िले के टिकारी अनुमंडल के टिकारी, कोचं, गुरारू, परैया प्रखंड समेत गुरुआ प्रखंड के गन्ना किसानों की आर्थिक री़ढ ही टूट गई. फिर भी पिछले दो दशक से होते आ रहे चुनावों में किसी ने इसे मुद्दा नहीं बनाया. – शैलेंद्र कुमार मिश्रा

ज़िला न बनने का दर्द

जंगलों, पहा़डों और छोटी-बड़ी नदियों से घिरे नक्सल प्रभावित नौ-नौ प्रखंडो को अपने दामन में लपेटे है गया ज़िले का शेरघाटी अनुमंडल. लेकिन अब तक इसे ज़िले का दर्जा नहीं दिया गया है. जबकि इससे कम नक्सल प्रभावित अरवल को बहुत पहले ही ज़िला का दर्जा मिल चुका है. शेरघाटी को ज़िला बनाने की मांग वर्षों से उठती रही है, लेकिन चुनाव के वक़्त यह मुद्दा हवा हो जाता है. ज़िले की मांग करने वाले लोग भी चुनाव के समय इस मुद्दे को छोड़कर जाति, सांप्रदायिकता और स्वार्थ की राजनीति से प्रभावित हो जाते हैं. इसी का नतीजा है कि चुनावबाज़ राजनीतिज्ञ भी लोगो को मूल मुद्दे से भटकाकर अपना उल्लू सीधा कर लेते हैं. चुनाव की खुमारी टूटती है तो लोग फिर से शेरघाटी को ज़िला बनाने की मांग को लेकर सक्रिय हो जाते है. इस बार भी यह मुद्दा किसी उम्मीदवार का वोट बैंक प्रभावित नहीं कर रहा है.  – आशुतोष राज

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