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भाजपा का सम्‍मान जदयू का अपमान

भाजपा का सम्‍मान जदयू का अपमान

बिहार की जनता ने जदयू-भाजपा गठबंधन को भारी बहुमत से सत्ता की चाबी सौंपी तो देश-दुनिया के लोगों ने सूबे के लोगों की राजनीतिक चेतना की तारी़फ की. कहा गया कि लोगों ने बिहार की ज़रूरत को समझा और विकास के लिए जातिपात से ऊपर उठकर एकजुट होकर मतदान किया. लेकिन लगता है कि जीत पर गठबंधन की राय एक नहीं हो पाई और दोनों दलों ने जीत की अलग-अलग व्याख्या कर डाली. भाजपा ने रिकॉर्ड तोड़ सफलता के लिए अपने कार्यकर्ताओं का सम्मान किया तो जदयू ने लगभग छह सौ कार्यकर्ताओं, कुछ सांसदों एवं मंत्रियों से जवाब-तलब कर डाला. भाजपा ने माना कि उसकी अब तक की सबसे बड़ी सफलता का रास्ता सा़फ करने में पार्टी कार्यकर्ताओं ने दोनों हाथ लगा दिए. यही वजह रही कि पटना के गांधी मैदान में पहली बार कार्यकर्ता सम्मान समारोह आयोजित कर यह संदेश दिया गया कि भाजपा के कार्यकर्ताओं ने शानदार काम किया और लोकसभा चुनाव में भी इसी ज़ज्बे को बरक़रार रखना है.

भाजपा ने बिहार चुनाव में मिली रिकॉर्ड तोड़ सफलता के लिए अपने कार्यकर्ताओं और सांसदों का सम्मान किया तो वहीं जदयू ने लगभग छह सौ कार्यकर्ताओं, कुछ सांसदों एवं मंत्रियों से जवाब-तलब कर डाला. जीत के मायने किस तरह से बदले, इसका नमूना दोनों दलों ने दिखा दिया है. अब सवाल उठता है कि इस तरह के रवैए के बाद पार्टी कार्यकर्ताओं की प्रतिक्रिया क्या होगी. वे इस अपमान को चुपचाप बर्दाश्त कर लेंगे या फिर वे भी जवाब में कोई नया सियासी पैंतरा आज़माएंगे.

समारोह की गंभीरता का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि इसमें नितिन गडकरी सहित कई बड़े नेताओं ने कार्यकर्ताओं की पीठ थपथपाई. दूसरी तऱफ जदयू ने छह सौ से अधिक कार्यकर्ताओं को नोटिस भेजकर उन्हें पटना बुलाया और पार्टी विरोधी गतिविधियों का जवाब पूछा. बाढ़ के विधायक ज्ञानेंद्र कुमार उ़र्फ ज्ञानू की अनुशासन समिति ने सांसद ललन सिंह, उपेंद्र कुशवाहा, मोनाज़िर हसन, पूर्णमासी राम, मंगनी लाल मंडल, महाबली सिंह के अलावा पूर्व सांसद अरुण कुमार, विधान पार्षद प्रेम कुमार मणि सहित सैकड़ों कार्यकर्ताओं को तलब किया. लेकिन जैसा कि तय था, ललन सिंह, उपेंद्र कुशवाहा और प्रेम कुमार मणि समिति के सामने पेश नहीं हुए. ललन सिंह ने तो सा़फ कह दिया कि उन्हें कोई नोटिस नहीं मिला है. जबकि उपेंद्र कुशवाहा ने कहा कि ज्ञानू समिति को सांसदों को तलब करने का अधिकार ही नहीं है. मैंने कोई भी दल विरोधी काम नहीं किया है. अगर मुझे कोई स़फाई देनी या बात कहनी होगी तो नीतीश कुमार या फिर शरद यादव के सामने कहूंगा. ये दोनों जहां बुलाएं, मैं वहां आकर अपनी बात कहने को तैयार हूं. इसके साथ ही कुशवाहा ने सवाल दागा कि जो पार्टी अपने छह सौ से अधिक कार्यकर्ताओं को नोटिस देती है, उसमें आंतरिक लोकतंत्र का क्या हाल होगा, इसका अनुमान लगाया जा सकता है. इसका मतलब है कि कार्यकर्ताओं की बात सुनी नहीं गई, एकतऱफा फैसला लिया गया, जिसके कारण कार्यकर्ताओं ने अपनी लाइन खुद तय कर ली. अब चेहरा बचाने के लिए कार्यकर्ताओं को अपमानित किया जा रहा है.

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इसी तरह प्रेम कुमार मणि कहते हैं कि क्यों स़फाई दें हम, कोई सरकारी सेवा में हैं. ईमानदारी से सिद्धांतों के साथ राजनीति करते हैं और जनता की बात करते हैं. उन्होंने कहा कि अनुशासन समिति की कोई ज़रूरत ही नहीं थी. केवल दिखावा हो रहा है. इससे पार्टी का भला होने वाला नहीं है. मणि के अनुसार, जो पार्टी अपने सांसदों, विधायकों और कार्यकर्ताओं का सम्मान नहीं करेगी, उसका क्या हाल होगा, यह आसानी से समझा जा सकता है. लेकिन अनुशासन समिति के प्रमुख ज्ञानेंद्र सिंह ज्ञानू की दलील कुछ और ही है. उनका कहना है कि पार्टी कायदे-क़ानून से चलती है, न कि मनमानी से. चुनाव के समय जिन नेताओं पर दल विरोधी काम करने का आरोप लगा है, उनसे स़फाई मांगने में क्या बुराई है. जब कई सांसद एवं बड़े नेता समिति के सामने अपनी बात रख सकते हैं तो ललन सिंह, उपेंद्र कुशवाहा एवं मणि पेश क्यों नहीं हो सकते. इसका तो यही मतलब है कि ये तीनों नेता खुद को पार्टी संविधान से ऊपर मानते हैं.

ज्ञानू के अनुसार, इन तीनों नेताओं के खिला़फ समिति के पास का़फी साक्ष्य हैं और मार्च के प्रथम सप्ताह तक हम अपनी रिपोर्ट मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह को सौंप देंगे. उसके बाद इन नेताओं पर फैसला लिया जाएगा. बताया जा रहा है कि ललन सिंह की सदस्यता रद्द करने और उपेंद्र कुशवाहा एवं प्रेम कुमार मणि को पार्टी से बाहर करने की स़िफारिश की जा सकती है.

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धीमी आंच पर पक रही है नई खिचड़ी

जदयू के अंदरूनी टकराव से राजनीति की नई कोपलें फूट सकती हैं. बिहार की विकल्पहीन सियासत में विपक्ष की अहमियत धेले भर की रह गई है. ऐसे में सत्ताधारी दल के भीतर राजनीतिक रसूख एवं व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के कारण आपसी भिड़ंत में सियासी महारथियों को नई संभावना दिख रही है. सूत्रों पर भरोसा करें तो उपेंद्र कुशवाहा एवं डॉ. अरुण कुमार के बीच धीमी आंच पर नई खिचड़ी पक रही है. जदयू में वापसी के बाद ये दोनों नेता ठगा सा महसूस करते हैं. इन्हें बड़ी चालाकी के साथ पार्टी में लाकर चुनाव के दौरान हाशिए पर डाल दिया गया. इन दोनों नेताओं को गत विधानसभा चुनाव के ठीक पहले बड़ी मिन्नत-आरजू के साथ दल में लाया गया था. तब उपेंद्र कुशवाहा को राज्यसभा सदस्य भी बनाया गया, लेकिन चुनाव संपन्न होते ही इन दोनों को कथित अनुशासनहीनता एवं पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में कारण बताओ नोटिस थमा दिया गया.

उधर कुशवाहा समाज के नेताओं को एकजुट करने का प्रयास भी चल रहा है. बताया जाता है कि पूर्व मंत्री नागमणि, भगवान सिंह कुशवाहा एवं उपेंद्र कुशवाहा के बीच सुलह-स़फाई की कोशिशें सामाजिक स्तर पर चल रही हैं. इसी के तहत लंबे अर्से के बाद उपेंद्र कुशवाहा एवं भगवान सिंह कुशवाहा दानापुर में एक सामाजिक कार्यक्रम के दौरान एक साथ एक मंच पर मौजूद थे. बेचैनी की बड़ी वजह यह है कि 2005 के विधानसभा चुनाव में जदयू ने 19 टिकट कुशवाहा समाज के नेताओं को दिए थे, गत चुनाव में इस समाज के स़िर्फ 14 नेताओं को पार्टी का उम्मीदवार बनाया गया. नीतीश सरकार के पिछले मंत्रिमंडल में चार कुशवाहा नेताओं को मंत्री पद से नवाजा गया था. वर्तमान कैबिनेट में मात्र दो कुशवाहा विधायक मंत्री हैं. इसलिए इस समाज में बेचैनी का आलम है. शायद यही वजह थी कि संजय गांधी जैविक उद्यान में आयोजित कुशवाहा समाज के वार्षिक वन भोज में जब कतिपय नेतागण नीतीश चालीसा का पाठ कर रहे थे, तब उपेंद्र कुशवाहा ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि समाज को दिशानिर्देश प्राप्त करने के बजाय दिशानिर्देश देने की स्थिति में आना चाहिए. उपस्थित जनसमूह ने उनके इस कथन को उत्साहित होकर सराहा. वहीं उनके नेतृत्व में पटना के कृष्ण मेमोरियल हॉल में जुटी भीड़ इस बात का इशारा है कि नए विकल्प की तैयारी चल रही है.

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महात्मा फुले परिषद के प्रदेश महासचिव विनोद मेहता के अनुसार, उपेंद्र कुशवाहा समाज के सर्वमान्य नेता के तौर पर स्वीकार्य हो सकते हैं. यही वजह है कि जदयू की ओर से कुशवाहा समाज के ही निरंजन कुमार पप्पू एवं सी पी सिन्हा ने उपेंद्र कुशवाहा की संपत्ति में कथित बेतहाशा वृद्धि पर सवाल उठाया था. इसके जवाब में उपेंद्र ने अपनी ही संपत्ति की जांच की मांग करके तुरुप का पत्ता फेंक दिया और बीती 24 जनवरी को वह इसके लिए भूख हड़ताल पर भी बैठे. बताया यह भी जा रहा है कि ललन सिंह भी इस कवायद में पूरी रुचि ले रहे हैं. बिहार में नए विकल्प के लिए जुटे लोगों को राष्ट्रीय राजनीति से प्रेरणा मिल रही है. देश में कांग्रेस के एकदलीय शासन का अंत पार्टी के पैरोकारों के बीच आंतरिक विवाद की वजह से हुआ था. कांग्रेस (एस) एवं कांग्रेस (आई) के बीच विभाजित कांग्रेसी ही 1977 में पार्टी के सत्ताच्युत होने की प्रमुख शुरुआती वजह बने. पार्टी से बग़ावत करके बाहर निकले मोरार जी देसाई देश के पहले ग़ैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री बने. उधर राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस को 1984 में ज़बरदस्त बहुमत मिला था. विपक्ष पूरी तरह हताश था. इसी बीच कांग्रेस में विद्रोह की चिंगारी फूटी. विश्वनाथ प्रताप सिंह इसके अगुवा बने. वही तीसरे ग़ैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री बने. इसे बिहार में पुन: दोहराने की संभावना जताई जा रही है. जदयू के बागियों के भरोसे नया राजनीतिक समीकरण बनाने की कवायद पर गहरी नज़र है. इसमें राजद के भी कुछ नेता साथ हैं. सोनपुर के पूर्व विधायक रामानुज प्रसाद एवं राम बिहारी सिंह काफी सक्रिय रहे हैं.

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