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भूदान आंदोलन के 60 वर्ष: सपनों का मर जाना खतरनाक होता है

भूदान आंदोलन के 60 वर्ष: सपनों का मर जाना खतरनाक होता है

आचार्य विनोबा भावे की अगुवाई में वर्ष 1951 में शुरू हुए भूदान आंदोलन के साठ वर्ष पूरे हो गए हैं. बिहार सहित देश के कई स्थानों पर विनोबा जी के आंदोलन की सराहना की गई, लेकिन इसके ठीक विपरीत बिहार में हज़ारों भूदान किसानों की जमीन खिसक रही है. जिस मक़सद से विनोबा जी ने भूमिहीनों के लिए ज़मीन हासिल की थी, वह पूरा नहीं हो पाया यानी ज़मीन का सही वितरण आज तक नहीं हो सका. बिहार की मौजूदा नीतीश सरकार भी इस दिशा में कोई ठोस क़दम नहीं उठा रही है. नतीजतन बिहार के ग़रीब भूदान किसान अब गांधी-विनोबा का रास्ता छोड़कर हिंसा वाली विचारधारा के करीब जाने के लिए मजबूर हो रहे हैं. दरअसल भूदान की हजारों एकड़ ज़मीन पर दबंगों की नज़र लग गई है.

सरकार भी दबंगों से भूदान किसानों की ज़मीन बचाने में विफल नज़र आ रही है. सरकारी मालगुजारी रसीद न दिखाने पर भूदान किसानों को उनकी ज़मीन से बेदखल किया जा रहा है. अगर अंचलाधिकारी भूदान किसानों को उनकी ज़मीन की रसीद नहीं देंगे और पुलिस उनकी ज़मीन हड़पने वाले बाहुबलियों की मदद करेगी तो भूदान किसानों को हिंसा का रास्ता अख्तियार करने से रोकना मुश्किल हो जाएगा.

सरकार भी दबंगों से भूदान किसानों की ज़मीन बचाने में विफल नज़र आ रही है. सरकारी मालगुजारी रसीद न दिखाने पर भूदान किसानों को उनकी ज़मीन से बेदखल किया जा रहा है. अगर अंचलाधिकारी भूदान किसानों को उनकी ज़मीन की रसीद नहीं देंगे और पुलिस उनकी ज़मीन हड़पने वाले बाहुबलियों की मदद करेगी तो भूदान किसानों को हिंसा का रास्ता अख्तियार करने से रोकना मुश्किल हो जाएगा. भूदान को लेकर बिहार की तस्वीर दूसरे प्रदेशों से अलग है. विनोबा भावे को अपनी भूदान यात्रा के दौरान सबसे अधिक ज़मीन बिहार में मिली थी. फिलहाल बिहार में भूदान यज्ञ कमेटी के कर्मचारियों की हालत दयनीय है. भूमि सुधार आयोग ने इस कमेटी को मज़बूत करने की सिफारिश की थी, जिस पर अभी तक अमल नहीं हो सका है. बिहार भूदान यज्ञ कमेटी के चेयरमैन शुभमूर्ति के अनुसार, भूदान आंदोलन से 6 लाख 48 हजार 593 एकड़ और 14 डिसमिल जमीन प्राप्त हुई थी, जिसमें 2 लाख 63 हजार 176 एकड़ और 2 डिसमिल ज़मीन कृषि योग्य थी. विनोबा जी ने इन जमीनों को ग्रामसभा के ज़रिए बांटने का प्रस्ताव पारित किया था. हालांकि जून 2011 तक 2 लाख 55 हज़ार 452 एकड़ और 87 डिसमिल ज़मीन का वितरण किया जा चुका है. शेष 2 हज़ार 26 एकड़ और 54 डिसमिल ज़मीन का वितरण नहीं किया गया है. बिहार भूदान यज्ञ कमेटी के मुताबिक़, 5 हज़ार 696 एकड़ और 61 डिसमिल ज़मीन का दानपत्र भी उसने सरकार को सौंप दिया है, जिसे सरकार ने अभी तक कंफर्म नहीं किया है, लिहाजा उसका वितरण नहीं हो सका. कमेटी के अनुसार, भूदान की ज़मीन 3,86,859 भूमिहीन किसानों में बांटी गई है, लेकिन इनमें से लगभग 50 फीसदी किसान अभी तक ज़मीन पर क़ब्ज़ा नहीं पा सके हैं. इसी तरह करीब 50 प्रतिशत लोगों की जमीनों का दाखिल खारिज नहीं हुआ है. जिन किसानों को कब्जा मिल गया है, उनमें से आधे लोगों की जमीनों का दाखिल खारिज लंबित है. मुंगेर, खगड़िया, बेगूसराय, सहरसा, दरभंगा, बक्सर, जहानाबाद, औरंगाबाद, पूर्वी चंपारण, भागलपुर और मुजफ्फरपुर आदि जिलों में भूदान की जमीन से जुड़े काफी मामले लंबित हैं. भूदान यज्ञ कमेटी का कहना है कि बिहार की पिछली सरकारें उसे 23 लाख रुपये का अनुदान देती थीं, जिसे नीतीश सरकार ने बढ़ाकर 70 लाख रुपये कर दिया, लेकिन इतने बड़े काम के लिए, जिसमें 2 करोड़ रुपये की ज़रूरत हो, वहां 70 लाख रुपये की धनराशि पर्याप्त नहीं कही जा सकती.

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अनुमंडल न्यायालय और रिश्वतखोरी

अनुमंडल न्यायालय यानी एसडीएम कोर्ट को निचली अदालत कहा जाता है. यहां ज़मीन से जुड़े विवादों का निपटारा किया जाता है. जिस मकसद से सब-डिवीजन स्तर पर इन न्यायालयों का गठन किया गया था, वह आज तक पूरा नहीं हो सका. इसमें कोई शक नहीं कि बिहार के ज़्यादातर अनुमंडल न्यायालयों में भ्रष्टाचार कायम है. इस बात के गवाह वे हजारों वादी-प्रतिवादी हैं, जो कई वर्षों से अपने मुकदमे के सिलसिले में अदालतों के चक्कर काट-काटकर थक चुके हैं. आंकड़ों के मुताबिक़, बिहार के अनुमंडल न्यायालयों में हज़ारों मुकदमे तीस-तीस साल से लंबित पड़े हैं. न्यायिक व्यवस्था का सबसे बड़ा मजाक तब देखने को मिलता है, जब मुकदमे का फैसला अपने पक्ष में कराने के लिए इन न्यायालयों में खुलेआम रिश्वत की बोली लगाई जाती है. यही वजह है कि बिहार के आम लोगों में यह धारणा बन चुकी है कि एसडीओ कोर्ट में बिना पैसा दिए फैसला होता ही नहीं. न्याय के इस मंदिर को कलंकित करने वाले वे रिश्वतखोर एसडीएम (सब-डिवीजनल मजिस्ट्रेट) हैं, जिनके कार्यालय में विधायक, पंचायत के मुखिया और ठेकेदार मुकदमे की पैरवी के लिए आते हैं. फिलहाल बिहार के अनुमंडल न्यायालय की जो हालत है, उससे आम लोगों को न्याय मिलने की कोई उम्मीद नज़र नहीं आती. यहां के अनुमंडल न्यायालयों में भूदान के सैकड़ों मामले लंबित हैं. इसके अलावा अंचल कार्यालय और डीसीएलआर कार्यालय में भी भूदान की जमीनों का बंदरबांट किया जा रहा है. नीतीश कुमार भले ही सुशासन का दावा करते हों, लेकिन सच्चाई यही है कि जिला, ब्लॉक और सब-डिवीजन मुख्यालयों में भ्रष्टाचार के मामलों में कोई कमी नहीं आई है.

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नीतीश का महादलित प्रेम

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार में महादलित कार्ड खेला, जिससे उन्हें जबरदस्त कामयाबी मिली. विपक्षी पार्टियों को फिलहाल इसकी काट नज़र नहीं आ रही है. महादलितों के लिए नीतीश कुमार ने कई लाभकारी योजनाएं चलाईं. खासकर आवासहीन महादलित परिवार को 3 डिसमिल ज़मीन देने का फायदा उन्हें गत विधानसभा चुनाव में मिला. यहां मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से यह पूछा जाना बेहद ज़रूरी है कि वह महादलितों को कौन सी ज़मीन दे रहे हैं. इसके अलावा सरकार को कई ज़िलों में महादलितों के लिए ज़मीन खरीदने की ज़रूरत क्यों पड़ी, जबकि उसके पास सीलिंग से हासिल की गई हजारों एकड़ भूमि मौजूद है. इसके अलावा गैर मजरूआ आम और भूदान की जमीन भी पर्याप्त है. उल्लेखनीय है कि जमींदारी उन्मूलन के बाद बिहार सरकार ने भू-हदबंदी कानून (सीलिंग एक्ट) के तहत बड़े-बड़े जमींदारों से हजारों एकड़ जमीन हासिल की थी, लेकिन भूदान की जमीन की तरह सीलिंग की जमीन भी आज तक जरूरतमंदों के बीच वितरित नहीं की जा सकी है. पिछली सभी सरकारें सीलिंग की जमीनों को दबंगों से मुक्त कराने में नाकाम रहीं. अगर भूदान और सीलिंग की जमीनों का सही वितरण हो जाए तो बिहार के लाखों भूमिहीनों की ग़रीबी दूर हो सकती है. अफसोस की बात तो यह है कि भूमि सुधार का सब्जबाग दिखाने वाले नीतीश कुमार भी इस मामले में कोई ठोस कदम नहीं उठाना चाहते. दरअसल वह पौधे की जड़ में पानी देने के बजाय उसके पत्तों को सींच रहे हैं.

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भूमि विवाद हत्याओं का मुख्य कारण

बिहार में होने वाली हत्याओं पर नज़र डालें तो उनके पीछे सबसे बड़ा कारण है भूमि विवाद. राज्य में हर साल कई लोगों का कत्ल ज़मीन विवाद के कारण होता है. बिहार में अब तक कई नरसंहार हुए, जिनमें ज़्यादातर भूमि विवाद के कारण हुए. मुंगेर के तौफीर दियारा नरसंहार और खगड़िया के अमौसी बहियार नरसंहार की जड़ में भी भूमि विवाद ही थे. क़ानूनी जानकारों के मुताबिक़, बिहार की निचली अदालतों ने भूमि विवाद का निपटारा करने के बजाय उन्हें और अधिक उलझा दिया है. बासगीच पर्चा, ग़लत दाखिल खारिज़, गलत लगान निर्धारण करने में अंचलाधिकारी, डीसीएलआर और अपर समाहर्ता मिसाल कायम कर रहे हैं. चंद रुपयों के लालच में भ्रष्ट अधिकारी यह भी नहीं सोचते कि उनके इस कृत्य से कितनी लाशें बिछ जाएंगी. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सुशासन का लब्बोलुआब दिखा रहे हैं, लेकिन अगर सुशासन का असली चेहरा देखना हो तो उसे बिहार के प्रखंड और अनुमंडल कार्यालयों में ब़खूबी देखा जा सकता है.

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