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बिहारः कुर्सी का रिश्‍ता दिखावे का टकराव

बिहारः कुर्सी का रिश्‍ता दिखावे का टकराव

बिहार में जदयू एवं भाजपा के रिश्तों में मौजूदा तल्खी के भले ही लाख मायने निकाले जाएं, पर यहां की ज़मीनी राजनीतिक सच्चाई को समझने वाले इत्मीनान की लंबी-लंबी सांसें ले रहे हैं. भाजपा की तिरंगा यात्रा को लेकर शरद यादव और नीतीश कुमार के बयानों पर भाजपा नेता हरेंद्र प्रताप का गुस्सा यह ज़रूर एहसास कराता है कि पार्टी में कुछ लोगों को यह अच्छा नहीं लगा. लेकिन जब उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी ने ही हरेंद्र प्रताप को ग़लत ठहरा दिया तो लोगों को यह समझने में देर नहीं लगी कि पुरानी कहानी फिर दोहराई जा रही है.

देखा जाए तो नीतीश कुमार की दूसरी पारी में भी संकेत मिलने लगे हैं कि भाजपा हर क़ीमत पर कुर्सी के लिए गठबंधन धर्म निभाएगी, भले ही वह बिहार के विकास के नाम पर हो. दिखावे का विरोध होता रहेगा और यह जताने की कोशिश होगी कि चाल, चरित्र एवं चेहरे के मामले में वह सबसे अलग है और बिहार एवं देश के लिए वह सब कुछ क़ुर्बान करने को तैयार है.

दरअसल बिहार विधानसभा के चुनाव परिणामों ने अगर इस सूबे के कुछ राजनीतिक किस्सों को सुलझा दिया तो इसी के साथ कुछ किस्सों को उलझा भी दिया है. जनता ने नीतीश कुमार को प्रचंड जनादेश देकर विकास की नई कहानी लिखने का टास्क दिया. जातीय दीवार टूटने की झलक मिली और यह साफ हुआ कि जो जनता की बात सुनेगा, वही राज करेगा. लेकिन इसके साथ ही जनता ने भाजपा को जदयू से बेहतर सफलता देकर उसे बहुत सारे अगर-मगर में भी डाल दिया. जिस राज्य में 123 विधायकों से सरकार बनती है, वहां भाजपा के 91 विधायक हो गए हैं. तीन निर्दलीय भी भाजपा समर्थक ही हैं. बिहार में भाजपा की इसी ताक़त के कारण सारे अगर-मगर की शुरुआत होती है. चुनाव परिणाम के बाद ऐसी समझ बनने लगी थी कि भाजपा का जदयू के साथ इस बार गठबंधन लगभग बराबर की हैसियत वाला होगा. पिछले पांच सालों में नीतीश कुमार ने जो एजेंडा तय किया, उसी पर भाजपा चलती रही. भले ही इस कवायद से पार्टी कार्यकर्ताओं में नाराज़गी बढ़ी, पर गठबंधन धर्म निभाने के नाम पर सब कुछ सहन किया जाता रहा, लेकिन विधानसभा में बढ़ी ताक़त से अनुमान लगाया जाने लगा कि भाजपा नीतीश कुमार की हर बात अब सिर हिलाकर नहीं मानेगी. मंत्री पदों का कोटा बढ़ाने की मांग रखकर उसने इसकी हल्की झलक भी दी, लेकिन वह अपना यह तेवर ज़्यादा दिनों तक बरक़रार नहीं रख पाई.

भाजपा की बहुप्रचारित तिरंगा यात्रा को ग़ैर ज़रूरी बताकर नीतीश कुमार ने अपने मंसूबे साफ कर दिए. एक तऱफ जम्मू हवाई अड्डे पर सुषमा स्वराज एवं अरुण जेटली रोके जा रहे थे और दूसरी तरफ नीतीश कुमार कह रहे थे कि आज के संदर्भ में इस यात्रा की कोई ज़रूरत नहीं थी. मतलब भाजपा अपने सबसे पुराने एवं सबसे मज़बूत सहयोगी जदयू को अपनी तिरंगा यात्रा का मक़सद ही नहीं समझा पाई. लालकृष्ण आडवाणी से लेकर राजनाथ सिंह तक तिरंगा यात्रा को सफल बनाने के लिए पसीना बहाने में मशगूल थे, पर उनके भरोसे के साथी उसे बेमतलब की कवायद बता रहे थे. स्वाभाविक था कि कुर्सी से बंधे लोगों ने तो कुछ नहीं कहा, पर दूसरे भाजपाइयों को नीतीश कुमार का यह बयान नागवार गुजरा. वरिष्ठ भाजपा नेता हरेंद्र प्रताप ने नीतीश के बयान पर दो टूक कहा कि गठबंधन निभाना केवल भाजपा की ज़िम्मेदारी नहीं है. जदयू में जब दागी तस्लीमुद्दीन को शामिल किया जा रहा था तो क्या भाजपा से पूछा गया था. गठबंधन को भाजपा की कमज़ोरी न समझा जाए. हरेंद्र प्रताप ने अपनी बात ख़त्म भी न की होगी कि जदयू से ज़्यादा भाजपा के नेता ही उन पर बरस पड़े. सी पी ठाकुर एवं सुशील मोदी ने कहा कि हरेंद्र प्रताप को इस तरह की बात नहीं कहनी चाहिए थी.

इन दोनों नेताओं द्वारा ऐसा बोलते ही साफ हो गया कि भाजपा ने हमेशा की तरह गठबंधन धर्म का पालन करते हुए चुप रहने का फैसला किया है. ठीक उसी तरह, जैसे नरेंद्र मोदी प्रकरण पर नीतीश कुमार का रुख़ भाजपा ने आत्मसात कर लिया था. ठीक उसी तरह, जिस तरह खाने का निमंत्रण रद्द होने के बावजूद नितिन गडकरी कहते रहे कि हमारी चुप्पी को हमारी कमज़ोरी नहीं समझना चाहिए. नीतीश कुमार ने कहा कि नरेंद्र मोदी प्रचार के लिए बिहार नहीं आएंगे और ऐसा ही हुआ. ऐसे कई उदाहरण हैं. किशनगंज की सीट लेने की बात हो या फिर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की शाखा खोलने का मामला, हर बार नीतीश कुमार की ही चली. महिला आरक्षण पर भी दोनों दल साथ नहीं दिखाई पड़े. इसके बावजूद दोनों दलों का गठबंधन बदस्तूर जारी है. बड़ी मुश्किल है, कुर्सी के लिए साथ रहना है और देश के लिए सब कुछ क़ुर्बान करने वाली पार्टी की छवि भी बनानी है. भाजपा को यह दोनों काम साथ-साथ करने हैं और कम से कम बिहार में तो वह इन्हें बख़ूबी अंजाम दे रही है. पार्टी की नीति और कार्यक्रम को लेकर जैसे ही जदयू के साथ कोई मतभेद होता है तो एक-दो नेता गरजने लगते हैं, पर अगले ही पल न जाने कितने नेता बेहतर बिहार बनाने एवं जनादेश की दुहाई देकर उन्हें ग़लत ठहरा देते हैं या फिर चुप्पी साध लेने की सलाह दे डालते हैं. बिहार को बचाने की दुहाई देकर अपने ही कार्यक्रम की धार भोथरी करने से भी भाजपाई नहीं चूक रहे हैं, क्योंकि वे जान रहे हैं कि कुर्सी इतनी आसानी से नहीं मिलती.

ताजा मामले में जदयू सांसद शिवानंद तिवारी ने कहा कि हरेंद्र प्रताप जैसे नेताओं को भाजपा की लाइन तय करने का अधिकार नहीं है. इस तरह का काम अरुण जेटली एवं सुषमा स्वराज के ज़िम्मे है. उल्लेखनीय है कि चुनाव से पहले शिवानंद तिवारी बार-बार भाजपा को लताड़ने में लगे थे और उससे अलग होकर चुनाव लड़ने की बात भी करते रहे. देखा जाए तो नीतीश कुमार की दूसरी पारी में भी संकेत मिलने लगे हैं कि भाजपा हर क़ीमत पर कुर्सी के लिए गठबंधन धर्म निभाएगी, भले ही वह बिहार के विकास के नाम पर हो. दिखावे का विरोध होता रहेगा और यह जताने की कोशिश होगी कि चाल, चरित्र एवं चेहरे के मामले में वह सबसे अलग है और बिहार एवं देश के लिए वह सब कुछ क़ुर्बान करने को तैयार है.

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