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बिजली संकट बीमारी कुछ, इलाज कुछ
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बिजली संकट बीमारी कुछ, इलाज कुछ

प्रदेश में पिछले दस सालों से बिजली संकट गहराया हुआ है, लेकिन भाजपा के लिए यह केवल एक राजनीतिक मुद्दा भर है. 2003 के विधानसभा चुनाव में बिजली संकट पर हंगामा करके ही भाजपा ने जीत हासिल की थी. 2008 के चुनाव में भी बिजली संकट के लिए केंद्र को ज़िम्मेदार बताकर वह अपनी सत्ता बचाने में सफल हो गई. लेकिन, अब बिजली संकट भाजपा के गले की हड्डी बना हुआ है. फिर भी सरकार को इसकी कोई परवाह नहीं है. वर्ष 2003 में राज्य में 800 मेगावाट बिजली की कमी थी, जो आज बढ़कर 1200 से 1500 मेगावाट तक हो गई है. बिजली संकट का समाधान ज़्यादा बिजली पैदा करके ही किया जा सकता है, लेकिन सरकार को इससे क्या लेना-देना. पार्टी नेता केवल हो-हल्ला मचाते हैं और समाधान के नाम पर सरकार बिजली ख़रीद कर चुपके से बेच देती है. एक बात तो सा़फ है कि बिजली की ख़रीद-बिक्री के इस काम में करोड़ों रुपये की काली कमाई की गुंजाइश ज़रूर हो जाती है. ग़ौरतलब है कि पावर बैकिंग के नाम पर सरकार द्वारा बिजली की कमी पूरा करने के लिए दूसरे राज्यों और अन्य स्रोतों से बिजली ख़रीदना तो समझ में आता है, लेकिन उसी बिजली को बेच देना समझ में नहीं आता. जानकारों के अनुसार, कुछ निजी कंपनियों के माध्यम से बिजली की ख़रीद-बिक्री नेताओं और आला अ़फसरों के लिए फायदेमंद होती है, इसीलिए यह कारोबार बदनामी के बावजूद भी जारी है.

मध्य प्रदेश की शिवराज सिंह सरकार न जाने कौन सी राह चल रही है कि समस्याएं हल होने के बजाय लगातार बढ़ती जाती हैं. बिजली संकट इसका ताज़ा उदाहरण है, जिससे उबरने के लिए सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयास स़िर्फ राजकीय कोष पर भार डालने वाले साबित हो रहे हैं.

राज्य सरकार ने अपनी विद्युत उत्पादन क्षमता में वृद्धि के लिए कोई गंभीर प्रयास नहीं किए. वर्तमान में राज्य की कुल उपलब्ध विद्युत क्षमता 9878.25 मेगावाट है. इसमें केंद्रीय कोटे एवं संयुक्त उपक्रम जल विद्युत परियोजनाओं से मिलने वाली बिजली और उद्योगों के निजी केप्टिव उत्पादन की विद्युत क्षमता भी शामिल है. राज्य सरकार ने अपने स्रोतों से केवल 210 मेगावाट की एक ताप बिजली परियोजना पिछले वर्ष पूरी की है, जबकि चालू वित्तीय वर्ष के लिए सरकार ने किसी भी नई परियोजना को शुरू या पूरा करने की कोई योजना नहीं बनाई है. पूरा दारोमदार केंद्र और अन्य क्षेत्रों से प्राप्त होने वाली बिजली पर है, लेकिन इससे बिजली संकट दूर होने वाला नहीं है. बिजली के क्षेत्र में निवेश के लिए सरकार ने कई निवेशकों और निजी विद्युत कंपनियों को आकर्षित करने के उपाय किए, लेकिन शासन-प्रशासन के हठी और भ्रष्ट रवैये से तंग आकर निवेशक जल्दी ही भाग खड़े हुए. इससे राज्य में 26000 मेगावाट बिजली उत्पादन का सपना भी भंग हो गया. भारत सरकार ने कोयला भंडारों की सीमित क्षमता और जल भंडारों पर बढ़ते दबाव को ध्यान में रखते हुए ग़ैर परंपरागत ऊर्जा क्षेत्र को बढ़ावा देने की योजना पर काम शुरू किया है. तमिलनाडु, गुजरात, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक एवं राजस्थान आदि राज्यों ने अपने यहां ग़ैर परंपरागत ऊर्जा स्रोतों से बिजली पैदा करने के लिए पिछले तीन वर्षों में सराहनीय प्रयास किए हैं, लेकिन मध्य प्रदेश अभी भी फिसड्डी बना हुआ है.

सरकारी सूत्रों के मुताबिक़, राज्य में ग़ैर परंपरागत ऊर्जा स्रोतों से 212.800 मेगावाट बिजली पैदा किए जाने की क्षमता है, लेकिन वर्तमान में इसका केवल 18 फीसदी ही उपयोग हो रहा है. ग़ैर परंपरागत ऊर्जा कार्यक्रमों को बढ़ावा दिया जाना शिवराज सिंह सरकार की प्राथमिकता में नहीं है, इसलिए राज्य को केंद्र सरकार की योजनाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है. प्रदेश के चार महानगरों को सोलर सिटी के रूप में स्थापित करने का काम तो आज तक शुरू नहीं हो सका, जबकि यह काम 2009 में पूरा हो जाना चाहिए था. ख़बर है कि भोपाल नगर निगम ने हाल में ही इस आशय का प्रस्ताव मध्य प्रदेश ऊर्जा विकास निगम को भेजा है, जबकि केंद्र सरकार बहुत पहले इसकी परियोजना रिपोर्ट तैयार करने के लिए 50 लाख रुपये की राशि स्वीकृत कर चुकी है. इतना ही नहीं, भारत सरकार एवं नवीनीकरण ऊर्जा मंत्रालय की माइग्रेशन योजना के तहत राज्य में अब तक एक भी सोलर प्रोजेक्ट नहीं लग सका है. मंत्रालय की ओर से इस योजना के लिए राज्य को भारी अनुदान मिलने की संभावना है. केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग ने भी केंद्र की सोलर परियोजनाओं को बढ़ावा देने के लिए 18.44 रुपये प्रति यूनिट की दर से बिजली ख़रीदने का प्रस्ताव पारित कर दिया है. बावजूद इसके ऐसे मामले जब राज्य सरकार के पास आते हैं तो अटक कर रह जाते हैं. सूत्रों का कहना है कि राज्य सरकार इस क्षेत्र में आने वाले निवेशकों को समय पर न तो ज़मीन मुहैया कराती है और न ही परियोजना की स्वीकृति का सरलीकरण ही करती है. इसके अलावा ऐसी कोई प्रोत्साहन योजना भी राज्य सरकार ने नहीं बनाई है, जिससे निवेशकों का रुझान इस ओर बढ़ सके.

राज्य सरकार बिजली संकट को हल करने में नाकाम रही है. इसका सबूत यही है कि विद्युत उत्पादन संयंत्र जब-तब ख़राब हो जाते हैं और एक माह तक बंद पड़े रहते हैं.

सुरेश पचौरी, अध्यक्ष, मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी

सोलर परियोजनाओं के संबंध में राज्य सरकार के ऊर्जा विभाग के पास महीनों से प्रस्ताव लंबित हैं, लेकिन सही दिशानिर्देश जारी न होने की वज़ह से निवेशकों में असमंजस की स्थिति बनी हुई है. जानकारी के अनुसार, सौर ऊर्जा से प्रदेश को कम से कम 500 मेगावाट बिजली मिल सकती है. यदि इस परियोजना के लिए प्रदेश में व्यापक सर्वेक्षण कराया जाए तो यह आंकड़ा दो हज़ार मेगावाट तक पहुंच सकता है, लेकिन हालात यह है कि प्रदेश में सौर ऊर्जा का कोई भी प्रोजेक्ट आज तक स्थापित नहीं हो सका. दूसरी ओर बायोमास से भी प्रदेश में विद्युत उत्पादन की अपार संभावनाएं हैं. करीब 470 मेगावाट की परियोजनाओं के प्रस्ताव राज्य सरकार और उसकी नोडल एजेंसी के पास लंबित पड़े हैं, लेकिन इनमें एकाध को छोड़कर शेष को अभी तक स्वीकृति नहीं मिली. बताया जाता है कि बायोमास आधारित बिजली परियोजनाओं के लिए राज्य सरकार ने ज़मीन देने का प्रावधान तो कर रखा है, लेकिन बेलगाम नौकरशाहों ने प्रक्रिया को इतना जटिल बना दिया है कि निवेशकों ने सरकारी ज़मीन पर परियोजना लगाने से तौबा कर ली है. राज्य सरकार के पास बायोमास आधारित विद्युत परियोजनाओं के बीस से ज़्यादा प्रस्ताव लंबित हैं और सभी निवेशक निजी भूमि पर ही परियोजना स्थापित कर रहे हैं. इसके अलावा ग्रिड कनेक्टिविटी और प्रदूषण निवारण विभाग की अनुमति लेने में भी अनावश्यक समय लगता है.

लापरवाही का आलम यह है कि इन परियोजनाओं के प्रस्तावों को दो वर्ष से ज़्यादा बीत गए, लेकिन राज्य सरकार की ओर से अंतिम स्वीकृति अभी तक जारी नहीं की गई है. बार-बार परेशान होने के कारण निवेशक अब गुजरात की ओर रु़ख कर रहे हैं, क्योंकि वहां एकल खिड़की प्रणाली से परियोजना को समय सीमा में स्वीकृत कर दिया जाता है और निवेशकों को अनुमतियों के लिए अलग-अलग विभागों में भटकना नहीं पड़ता. राज्य सरकार की लालफीताशाही के कारण अब लगता है कि पवन ऊर्जा परियोजना के निवेशकों ने मध्य प्रदेश को अलविदा कह दिया है. 5500 मेगावाट की कुल क्षमता के विरुद्ध मध्य प्रदेश में अब तक 212 मेगावाट की ही पवन ऊर्जा परियोजनाएं स्थापित हो सकी हैं. अनुकूल माहौल न बन पाने के कारण निवेशकों और डेवलेपर्स कंपनियों ने यहां पंजीयन तो 1200 मेगावाट के कराए थे, लेकिन अब उनका रुझान गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान की ओर ज़्यादा है. इन राज्यों में पवन ऊर्जा परियोजना के लिए सरकारी भूमि की सहज उपलब्धता, कम प्रोसेसिंग शुल्क और बिजली की उच्च क्रय दरों ने निवेशकों को ख़ासा आकर्षित कर लिया है. गौरतलब है कि राज्य में पवन ऊर्जा की शुरुआत 1995 में हुई थी. राज्य में इस ओर अनदेखी की गई, परिणामस्वरूप दूसरे राज्यों में यह परियोजना बाद में शुरू होने के बावजूद मध्य प्रदेश की अपेक्षा ज़्यादा विकास की राह पर है. निवेशकों को अवसाद में लाने की शिवराज सिंह सरकार की नीति का इससे बेहतर उदाहरण कोई नहीं हो सकता है कि केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग द्वारा पवन ऊर्जा से उत्पादित बिजली के लिए ख़रीद दर 5.44 रुपये प्रति यूनिट निर्धारित की गई है, जबकि राज्य सरकार यहां के निवेशकों को औसतन 3.35 रुपये प्रति यूनिट से ज़्यादा नहीं देना चाहती.

किसानों से पांच अरब की वसूली

मध्य प्रदेश विद्युत मंडल और उसकी सहायक बिजली कंपनियों की वित्तीय स्थिति ख़राब हो रही है. भारी घाटा सह रहे विद्युत मंडल ने बिजली कंपनियों को अपनी स्थिति सुधारने की हिदायत दी है. कंपनियों ने बकाएदारों से विद्युत शुल्क वसूलने की तैयारी पूरी कर ली है. राज्य की तीन विद्युत वितरण कंपनियों को किसानों से लगभग 5 अरब रुपये वसूली करने हैं, लेकिन राज्य सरकार के हस्तक्षेप के कारण यह वसूली अब तक नहीं की जा सकी. केवल पश्चिम क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी को ही दो लाख किसानों से लगभग 250 करोड़ रुपये वसूलने हैं. इस वर्ष राज्य में गेहूं की अच्छी फसल हुई है, इसे ध्यान में रखकर बिजली कंपनियां मान रही हैं कि किसान बकाया भुगतान की स्थिति में आ चुके हैं.  इसीलिए कंपनियां अगली फसल में सिंचाई के लिए बिजली देने से पहले ही किसानों से बकाया राशि वसूल कर लेना चाहती हैं. किसान राहत योजना की अवधि सरकार ने 31 दिसंबर 2009 से बढ़ाकर 30 अप्रैल 2010 कर दी है. इस कारण लगभग साढ़े तीन लाख किसानों से बिजली शुल्क वसूलना फिलहाल स्थगित है, लेकिन 30 अप्रैल के बाद बिजली कंपनियां बकाया वसूली अभियान चलाने के लिए स्वतंत्र हो जाएंगी. बुंदेलखंड को अलग से 100 मेगावाट बिजली राज्य के बुंदेलखंड अंचल में बिजली संकट दूर करने के लिए केंद्र सरकार अलग से 100 मेगावाट बिजली केंद्रीय पूल से उपलब्ध कराएगी. यह बिजली केवल बुंदेलखंड अंचल को दी जाएगी. मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष सुरेश पचौरी ने छतरपुर में कांग्रेस के पंच-सरपंच सम्मेलन को संबोधित करते हुए यह जानकारी दी. पचौरी ने कहा कि राज्य सरकार बिजली संकट को हल करने में नाकाम रही है. इसका सबूत यही है कि विद्युत उत्पादन संयंत्र जब-तब ख़राब हो जाते हैं और एक माह तक बंद पड़े रहते हैं. बिजली बोर्ड की आर्थिक स्थिति भी ख़राब है. संकट के बावजूद राज्य सरकार दूसरे राज्यों को बिजली बेचती है, यह यहां के किसानों और ग्रामीणों के साथ छल है. गांवों में हर दिन 12 से 15 घंटे बिजली कटौती हो रही है.

दो बिजली संयंत्र कई दिनों से बंद

बिजली संयंत्रों की देखरेख पर ध्यान न दिए जाने के कारण सतपुड़ा में 210 मेगावाट और अमरकंटक में 120 मेगावाट क्षमता के दो विद्युत उत्पादन संयंत्र बंद पड़े हैं. सतपुड़ा विद्युत संयंत्र पिछले डेढ़ माह से बंद है. इसे 30 मार्च तक चालू किया जाना था, लेकिन यह अभी तक चालू नहीं हो सका है. सतपुड़ा ताप विद्युत गृह की यूनिट क्रमांक 9 में टरबाइन ब्लेड टूट गई थी और इसे सुधारने के लिए 31 मार्च तक का समय तय किया गया था, लेकिन मरम्मत का काम अब तक पूरा नहीं हो सका है. वहीं अमरकंटक ताप बिजलीघर की यूनिट क्रमांक 4 संरचनात्मक सुधार के कारण बंद पड़ी है. इससे 120 मेगावाट विद्युत उत्पादन होता है. इस यूनिट को फिर से चालू करने के लिए 30 अप्रैल तक का समय तय किया गया है.

जबलपुर में गोबर गैस संयंत्र

गोबर गैस प्लांट से उत्पादित होने वाली बिजली के लिए पहला विद्युत क्रय अनुबंध मध्य प्रदेश पावर ट्रेडिंग कंपनी और आरडीएम केयर इंडिया कंपनी के बीच पूरा हुआ. गोबर गैस से उत्पादित होने वाली बिजली क्रय के एमओयू पर मध्य प्रदेश पावर ट्रेडिंग कंपनी के मुख्य महाप्रबंधक एबी वाजपेयी और आरडीएम केयर कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मलिंदर सिंह आनंद ने हस्ताक्षर किए. अनुबंध के तहत आरडीएम केयर कंपनी 14 करोड़ रुपये की लागत से जबलपुर शहर की परियट नदी पर अपना गोबर गैस आधारित बिजली संयंत्र स्थापित करेगी. इस संयंत्र में 120 मेगावाट बिजली उत्पादित की जाएगी.

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