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चुनाव में खून बहेगा
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चुनाव में खून बहेगा

चुनावी शंखनाद के साथ ही शांतिपूर्ण मतदान पर नक्सली आतंक का साया मंडराने लगा है. ऑपरेशन ग्रीन हंट और अपने नेताओं की गिरफ्तारी से बौखलाए नक्सली चुनावी स़फर को रक्तरंजित करने की तैयारी में जुट गए हैं. आधुनिक हथियारों से लैस नक्सलियों के मारक दस्तों ने चुनावी हिंसा की रणनीति को अंतिम रूप दे दिया है. लखीसराय में इसकी झलक भी नक्सलियों ने दिखा दी है. सूबे में दूसरे राज्यों से भी मारक दस्तों के आने की सूचना है. राज्य सरकार इनसे निबटने के लिए कितनी तैयार है, इसका अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि कजरा की पहाड़ियों में तीन सौ से ज़्यादा नक्सलियों से निपटने के लिए केवल 20 जवानों को भेजा गया था. नक्सली जमावड़े की खुफिया जानकारी के बावजूद इस तरह की लापरवाही से सूबे में चुनाव के दौरान बड़े पैमाने पर खून बहने की आशंका प्रबल हो गई है.

पिछले पांच सालों में नक्सल समस्या को जितने हल्के ढंग से लिया गया, उससे वारदातों में इजाफा हुआ है और जवानों के शहीद होने के आंकड़े बढ़े हैं. राज्य में होने वाले चुनाव पर लौटें तो खु़फिया रिपोर्ट बताती है कि नक्सली पूरी तैयारी में हैं और छोटी सी भी चूक बड़े नुक़सान का कारण बन सकती है. खुफिया रिपोर्ट बताती है कि नक्सली चुनाव प्रकिया को बाधित करने की पूरी कोशिश करेंगे. कुछ ज़िलों में बड़े पैमाने पर हिंसा हो सकती है.

नक्सली वारदातों के आंकड़ों पर ग़ौर करें तो सूबे में बिगड़े हालात की बड़ी ही भयावह तस्वीर सामने आती है. पिछले तीन वर्षों में पुलिस और नक्सलियों के बीच 130 बार भिड़ंत हो चुकी है, जिसमें 62 पुलिसकर्मी शहीद हो गए. इस अवधि में नक्सलियों ने 302 घटनाओं को अंजाम दिया, जिसमें जानमाल का भारी नुक़सान हुआ. बिहार पुलिस मेन्स एसोसिएशन के महामंत्री के के झा इसका कारण राजनेताओं के बीच सामंजस्य न होना मानते हैं. उनका मानना है कि केंद्र व राज्य सरकार के विरोधाभासी बयानों से नक्सलियों का मनोबल बढ़ा है. राज्य के दो तिहाई ज़िलों में नक्सलियों का दबदबा कायम है. इस वजह से वह जो भी फरमान जारी करते हैं, वह लागू हो जाता है.

विकास योजनाओं की पहली ईंट बिना नक्सलियों को लेवी दिए नहीं जोड़ी जा सकती है. यह कोई नया किस्सा नहीं है, पर पिछले पांच सालों में नक्सल समस्या को जितने हल्के ढंग से लिया गया, उससे वारदातों में इजाफा हुआ है और जवानों के शहीद होने के आंकड़े बढ़े हैं. राज्य में होने वाले चुनाव पर लौटें तो खु़फिया रिपोर्ट बताती है कि नक्सली पूरी तैयारी में हैं और छोटी सी भी चूक बड़े नुक़सान का कारण बन सकती है. खुफिया रिपोर्ट बताती है कि नक्सली चुनाव प्रकिया को बाधित करने की पूरी कोशिश करेंगे. कुछ ज़िलों में बड़े पैमाने पर हिंसा हो सकती है. पटना का दियारा क्षेत्र, वैशाली विधानसभा क्षेत्र, राबड़ी देवी का निर्वाचन क्षेत्र राघोपुर और मुजफ्फरपुर के कुछ विधानसभा क्षेत्रों में चुनावी हिंसा राजनीतिक दलों की शह पर असमाजिक तत्व कर सकते हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि जमुई, कैमूर, गया, शिवहर, सीतामढ़ी, औरंगाबाद और सारण ज़िलों में नक्सली चुनाव के दौरान उत्पात मचा सकते हैं. विशेषकर स्कूल भवनों को निशाना बनाया जा सकता है. पुलिस के भरोसेमंद सूत्रों पर भरोसा करें तो नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में कई प्रत्याशी चुनाव जीतने के लिए नक्सलियों से मदद लेने की कोशिश कर रहे हैं. इसमें पैसों के लेन-देन का खेल बड़े पैमाने पर खेला जा रहा है. दिक़्क़त यह है कि तमाम जानकारी होने के बावजूद समय पर कारगर क़दम नहीं उठाए जा रहे हैं. हालांकि नक्सलियों की तैयारियों के मद्देनजर पुलिस प्रशासन भी जवाबी रणनीति बनाने में जुट गया है. मगर, सवाल यह है कि इस रणनीति को अमलीजामा पहनाने में कितनी ईमानदारी बरती जाएगी. अगर चूक हुई तो चुनाव के दौरान बिहार की धरती को खून से लाल होने से रोकना मुश्किल हो जाएगा.

बिहार पुलिस पर हुए प्रमुख नक्‍सली हमले

  • 13 अप्रैल 08 – झाझा स्टेशन पर जीआरपी एवं सैप के चार जवानों सहित छह की हत्या.
  • 26 अप्रैल 08 – वैशाली के जंदाहा स्थित अमथावा गांव में नक्सलियों के साथ मुठभेड़ में जंदाहा थाना प्रभारी सुरेंद्र कुमार सुमन घायल हो गए.
  • 21 अगस्त 08- इमामगंज के रानीगंज बाज़ार में माओवादियों के हमले में पांच सैप जवान और जमादार शही समेत दो अन्य की मौत.
  • 16 जनवरी 09- जमुई कोर्ट हाजत पर नक्सलियों ने हमला कर दस कैदियों को छुड़ाया.
  • 09 फरवरी 09 – नवादा के कौवाकोल थाने के महुलियाटांड में नक्सलियों ने थाना प्रभारी रामेश्वर राम समेत दस जवानों की हत्या कर हथियार लूटे.
  • 22 अगस्त 09- जमुई के सोना में नक्सली हमले में एसआई मो. कलामुद्दीन और चार सैप जवान शहीद.
  • 6 जनवरी 2010- भागलपुर में बीएमपी कैंप पर नक्सली हमला, चार जवान जख्मी, दो कारबाइन और चार एसएलआर लूटे.
  • 13 फरवरी 2010- कोंच थाने के मझियावां गांव में छापेमारी करने गई  पुलिस पर नक्सली हमला. टेकारी थाना प्रभारी मिथिलेश प्रसाद शहीद.
  • 2 मई 2010- औरंगाबाद के टड़वा बाज़ार में  चार जवानों की हत्या, चार एसएलआर, कारबाइन, हैंड ग्रेनेड और गोलियां लूटीं.
  • 29 अगस्त 10 जमुई के कजरा में नक्सली हमले में सात पुलिसकर्मी शहीद.

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