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कोटा नहीं तो कैसे उठेंगे पिछड़े मुसलमान?

जैसा कि सरकार द्वारा नियुक्त की गई अनेक कमेटियां, जिनमें सच्चर कमेटी और रंगनाथ मिश्र आयोग सबसे प्रमुख हैं, पहले ही बता चुकी हैं कि देश की मुस्लिम जनसंख्या विकास के अधिकांश सामाजिक-आर्थिक मापदंडों पर सबसे निचले पायदान पर खड़ी है. मुस्लिम समुदाय के अंदर पिछड़ी जातियां, जो कुल जनसंख्या की क़रीब 80 प्रतिशत हैं, की हालत सबसे ज़्यादा ख़राब है. लगातार अवहेलना और सरकारी भेदभाव ने देश की इतनी बड़ी आबादी को इस हाल में जीने पर विवश कर दिया है. ऐसी हालत में दलित और अन्य पिछड़ी जातियों से ताल्लुक रखने वाले मुसलमानों के हित में सरकार द्वारा सद्‌भावनापूर्ण पक्षपात की नीति की ज़रूरत को कम करके नहीं आंका जा सकता. लेकिन कितनी निराशा की बात है कि आज जब इस प्रस्ताव पर चर्चा हो रही है तो चारों ओर से विरोध के स्वर उठ रहे हैं.

मुस्लिमों के कल्याण के लिए सरकार के किसी भी क़दम के विरोध में पहला तर्क यही दिया जाता है कि हमारा संविधान धर्म के नाम पर आरक्षण की इजाज़त नहीं देता. यदि ऐसा है तो फिर हाल के दिनों तक देश में पिछड़ी जातियों को मिले आरक्षण का लाभ केवल हिंदू दलित ही क्यों उठा रहे थे?

आज अमेरिका हम भारतीयों के लिए रोल मॉडल बन चुका है. हर अमेरिकन चीज की नकल करने में हमारा शासक वर्ग भी गर्व का अनुभव करता है. लेकिन कितनी ताज्जुब की बात है कि वही शासक वर्ग अमेरिका में मुस्लिम समुदाय के हित में उठाए जा रहे ऐसे क़दमों से आंखें मूंद लेता है. और इतना ही नहीं, समाज के पिछड़े लोगों के हित में उठाए जाने वाले हर क़दम, चाहे वह कितने भी छोटे क्यों न हों, के विरोध में उठ खड़ा होता है.

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मुस्लिमों के कल्याण के लिए सरकार के किसी भी क़दम के विरोध में पहला तर्क यही दिया जाता है कि हमारा संविधान धर्म के नाम पर आरक्षण की इजाज़त नहीं देता. यदि ऐसा है तो फिर हाल के दिनों तक देश में पिछड़ी जातियों को मिले आरक्षण का लाभ केवल हिंदू दलित ही क्यों उठा रहे थे?

इस परिप्रेक्ष्य में ऊंची जातियों के कुछ मुस्लिम राजनीतिज्ञों और इस्लामिक संस्थाओं द्वारा पूरे मुस्लिम समुदाय के लिए आरक्षण की मांग करना भी हैरान करने वाला है. मुसलमानों की पिछड़ी जातियों से संबंध रखने वाले कार्यकर्ताओं का तर्क है कि यह मांग मान भी ली गई तो उन्हें इसका फायदा नहीं होगा. सारा फायदा केवल ऊंची जातियों के मुसलमानों को होगा, जो शैक्षणिक और राजनीतिक धरातल पर दलितों और अन्य पिछड़ी जातियों के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा मज़बूत हैं. वे इस बात को मानने से भी इंकार करते हैं कि कमज़ोर मुस्लिमों के लिए आरक्षण की व्यवस्था से मुसलमान समुदाय बंट जाएगा. उनका कहना है कि आरक्षण विरोधियों का यह तर्क तब पूरी तरह जायज़ है कि किसी भी तरह का आरक्षण समाज को बांटने का काम करता है और इसलिए राष्ट्रीय हित के ख़िला़फ है. अन्य पिछड़ी जातियों के मुसलमानों के लिए आरक्षण के विरोध में अक्सर यह सुनने में आता है कि पहले से मौजूद ओबीसी कोटे का फायदा वे उठा सकते हैं और उनके लिए अलग से आरक्षण की कोई ज़रूरत नहीं है. लेकिन सच्चाई यह है कि विकास की दौड़ में ओबीसी हिंदुओं के मुक़ाबले ओबीसी मुसलमान ज़्यादा पिछड़े हैं. सरकारी स्तर पर मुस्लिमों के ख़िला़फ भेदभाव के चलते वे मौजूदा ओबीसी कोटे का फायदा नहीं उठा पाते. पिछड़ी जातियों के मुसलमानों के लिए आरक्षण की व्यवस्था इसीलिए आज समय की ज़रूरत बन गई है. लेकिन समस्या यह है कि देश का शासक वर्ग समाज के कमज़ोर तबकों के हित में उठाए जाने वाले किसी भी क़दम के विरोध में एक साथ उठ खड़ा होता है.

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भारतीय अर्थव्यवस्था के निजीकरण और वैश्वीकरण के इस दौर में कई ऐसे परंपरागत उद्योग-धंधे और व्यवसाय पूरी तरह पृष्ठभूमि में चले गए हैं, जो दलित और ओबीसी मुस्लिम समुदाय के जीवन का आधार थे. इन उद्योग-धंधों के चौपट होने का नतीजा यह रहा कि कई परिवार आज भुखमरी की हालत में जीने पर विवश हैं. इसे देखते हुए समाज के इस वर्ग के लिए विशेष व्यवस्था करना और भी आवश्यक हो गया है. लेकिन यह व्यवस्था यदि केवल सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों तक ही सीमित हो तो बात नहीं बनेगी, क्योंकि सरकारी नौकरियां पहले ही लगातार कम होती जा रही हैं. समाज से दूर अपराधियों की तरह हिंसा के बीच जीवन बिताने को मजबूर यह समुदाय अंदर से आहत है और ख़़फा भी. इसलिए यह बेहद ज़रूरी है कि इसे समाज से दोबारा जोड़ने और सशक्तिकरण के लिए सरकारी स्तर पर प्रयास किए जाएं. दलित और ओबीसी मुस्लिम की हालत में सुधार पूरे मुस्लिम समाज के कल्याण से जुड़ा अहम मुद्दा है. और, केवल बातें करने का कोई फायदा नहीं है. आज ज़रूरत है कि सरकार खुले तौर पर दलित और ओबीसी मुसलमानों के कल्याण के लिए आगे आए और उनकी समस्याओं के समाधान पर ध्यान केंद्रित करे.

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(लेखक नेशनल लॉ स्कूल बंगलुरू से जुड़े हैं)

1 comment

  • chauthiduniya

    मुसलमान खुद भी इस पिछड़ेपन के लिए कम जिम्मेदार नहीं हैं… ये सिर्फ अधिकारों की बात करते हैं और कर्तव्यों पर ध्यान नहीं देते… यहाँ तक कि अपनी दक़ियानूसी मान्यताओं के चक्कर मे अपनी आने वाली पीढ़ी को भी कमजोर करते जा रहे हैं… इन्हें सब से पहले समाज और दुनिया की मुख्य धारा मे आना होगा तभी अपनी भलाई की बात सोच सकते हैं…

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