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क्रोकोडाइल पार्क परियोजना रामभरोसे
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क्रोकोडाइल पार्क परियोजना रामभरोसे

छत्तीसगढ़ में विकास के नाम पर करोड़ों रुपयों की योजनाओं का भूमि-पूजन एक दिन में तो कर लिया जाता है, परंतु उसके क्रियान्वयन में कई साल लग जाते हैं. राज्य सरकार के उपेक्षा पूर्ण रवैये के कारण कई योजनाएं घोषणा होने के बाद भी लगातार दम तोड़ रही हैं. इनमें से ही एक महत्वपूर्ण योजना क्रोकोडाइल पार्क बनाने से संबंधित है.

कोटमी सोनार का मुढ़ा तालाब जो 86 एकड़ में विकसित है, को क्रोकोडाइल पार्क के रूप में विकसित किए जाने की योजना थी. इस तालाब में 150 से अधिक छोटे बड़े मगरमच्छ हैं. इस परियोजना में अभी तक डेढ़ करोड़ से अधिक की राशि व्यय हो चुकी है. इस पार्क को जांजगीर चंपा के लिए ही नहीं, बल्कि एशिया की सबसे बड़ी क्रोकोडाइल कॉलोनी के रूप में विकसित किए जाने की योजना थी.

जांजगीर-चांपा के ग्राम कोटमी सोनार में क्रोकोडाइल पार्क लोगों की मांग नहीं, बल्कि गांव की आवश्यकता है. इसकी कमी की वज़ह से यहां के दो बच्चे और तीन पुरुष अपनी जान गंवा चुके हैं. इनमें से दो लोग अपंग होकर आज भी अपना जीवन-निर्वाह कर रहे हैं. तीन परिवारों के चिराग़ बुझ चुके हैं, जबकि एक व्यक्ति अपना हाथ गंवाकर पशु-प्रेम की क़ीमत चुका रहा है. जांजगीर ज़िला मुख्यालय से 21 किलोमीटर दूर स्थित कोटमी सोनार नामक गांव मगरमच्छों के लिए प्रसिद्ध है. इस क्षेत्र के निवासियों ने मगरमच्छ को अपनी औलाद की तरह 15 सालों से पाल रखा है. 01 अप्रैल 2006 को प्रजननकाल के दौरान जब कुछ युवकों ने एक मगरमच्छ को छेड़ा तो उसने मंदिर के सीताराम दास पर हमला कर दिया और उसके बाएं हाथ को घसीटते हुए पानी में ले गया. सीताराम का अब एक हाथ नहीं है. इसके बावज़ूद सीताराम आज भी मगरमच्छों के साथ ही जीवन बिता रहे हैं.

कोटमी सोनार का मुढ़ा तालाब जो 86 एकड़ में विकसित है, को क्रोकोडाइल पार्क के रूप में विकसित किए जाने की योजना थी. इस तालाब में 150 से अधिक छोटे बड़े मगरमच्छ हैं. इस परियोजना में अभी तक डेढ़ करोड़ से अधिक की राशि व्यय हो चुकी है. इस पार्क को जांजगीर चंपा के लिए ही नहीं, बल्कि एशिया की सबसे बड़ी क्रोकोडाइल कॉलोनी के रूप में विकसित किए जाने की योजना थी. इस परियोजना के साथ-साथ चिल्ड्रेन पार्क और एनर्जी पार्क बनाने का कार्यक्रम भी रखा गया है.

इस परियोजना पर 06 फरवरी 2006 से काम शुरू हुआ. इस पर ईको टूरिज्म के मद से 72 लाख रुपये स्वीकृत किए गए. प्रदेश के मुखिया डॉ. रमन सिंह ने 09 मई 2006 को इस परियोजना का भूमि-पूजन किया था जबकि  मुढ़ा तालाब के गहरीकरण का काम 12 मई 2006 से प्रारंभ हुआ है. इसके बावज़ूद परियोजना का काम बहुत धीमी गति से चल रहा है. यही कारण है कि करोड़ों रुपये ख़र्च करने के बाद भी अपेक्षाकृत परिणाम सामने नहीं आ सका. परियोजना को प्रभावित करने में संबंधित अधिकारियों का स्थानांतरण होना भी एक महत्वपूर्ण कारण है. स्थानीय प्रशासन ने तालाब के आसपास अवैध क़ब्ज़े को हटाने में भी देरी की. इस गांव के आसपास इलाक़ों में ग्रामीणों और मगरमच्छों के बीच हुए टकराव से आम घटनाएं भी हो चुकी हैं.

इस गांव में 85 मगरमच्छ अनेक तालाबों में रहा करते थे. इस गांव के अलावा तटीय बड़गांव, रैड़ा सहित अन्य गांवों में मगरमच्छों को स्थानांतरित किया गया है. क्रोकोडाइल पार्क के प्रभारी डीएफओ

इवाशीश बनर्जी के अनुसार, अब तक प्रथम चरण में 72 लाख रुपया, द्वितीय चरण में 70 लाख रुपया और तृतीय चरण में एक करोड़ रुपये का काम पूरा किया जा चुका है. प्राप्त राशि से मगरमच्छों को अंडे देने के लिए तालाब का गहरीकरण, रेत को इकट्ठा करके टीला बनाना, तालाबों की फैंसिंग करना और मगरमच्छों के आहार के लिए तालाब में मछली डालना जैसे कार्य अब तक किए गए हैं. उनके अनुसार चौथे चरण के लिए एक करोड़ रुपये की स्वीकृति प्राप्त हो गई है. बनर्जी के अनुसार पार्क की दशा 2010 तक बदल दी जाएगी और 2011 में पर्यटक स्थल के रूप में यह पार्क विकसित हो जाएगा. फिलहाल यहां लगभग 400 पर्यटक प्रतिदिन पहुंचते है. यह स्थिति तब है जब पार्क के संबंध में सरकार के द्वारा कोई प्रचार-प्रसार नहीं किया गया है. इस परियोजना के निर्माण के साथ-साथ व्यापक प्रचार-प्रसार की आवश्यकता भी है. वन विभाग वर्तमान में चिल्ड्रेन पार्क, एनर्जी पार्क, रेस्ट हाउस, स्टाफ क्वाटर, कॉफी हाउस, भीम वेल्ट और पार्किंग स्थल का निर्माण इस क्षेत्र में करवा रहा है.

मगरमच्छों से जुड़ी जानकारियां

कोटमी सोनार का यह क्रोकोडाइल पार्क प्राकृतिक रूप से प्रजनन एवं संरक्षण के नज़रिए से देश का पहला पार्क है. रेप्टाईल प्रजाती के मगरमच्छ मुख्य रूप से का़फी शर्मिले स्वभाव के होते हैं, पानी के भीतर ये घंटों बैठकर अपने संभावित शिकारों पर हमले की मुद्रा में ताक़ लगाए रहते हैं. यह पानी के नीचे बिना सांस लिए एक घंटे तक छिपे रह सकते है. इन मगरमच्छों के पेट का आकार महज़ एक फुटबॅाल के समान होता है. एक वयस्क नर मगरमच्छ की औसतन आयु 35 से 40 वर्ष तक होती है. यह जीव मीठे व खारे पानी में भी रह सकते हैं. मगरमच्छ 3 से 4 मीटर पानी के भराव वाले इलाक़े में रहना पसंद करते हैं. वहीं मादा मगरमच्छ नर की तुलना में अपेक्षाकृत छोटी होती हैं. मादा मगरमच्छ औसतन 30 से 40 अंडे देती हैं. इनमें महज़ 8 से 10 बच्चे ही पूर्ण विकसित हो पाते हैं. मादा मगरमच्छ अपने अंडे को मिट्टी या रेत के बने टीलों में लगभग 3 से 5 फीट की गहराई तक गाड़ कर दिन रात उसकी रखवाली करती हैं. मादा मगरमच्छ के अंडे से जून और जुलाई माह में ही बच्चे निकलते हैं. अंडे से निकलने वाले बच्चों की अनुमानित लंबाई लगभग 6 इंच तक की होती है. मगरमच्छों को छेड़ने पर ये उग्र भी हो जाते हैं. पानी में इनके संवेदनशील अंग ज़रा सी भी कंपन को भांप लेते हैं.मगरमच्छों को खाना पचाने के लिए सूर्य की गर्मी की आवश्यकता होती है. अन्य मांसाहारी जीवों की तुलना में इनका 25 से 30 फीसदी खाने पर ही गुज़ारा हो जाता है. शेष खाना इन्हें सूर्य की किरणों से प्राप्त होता है. इसी कारण मगरमच्छ विषम परिस्थितियों में भी अपने वज़ूदों को बचा पाने में सक्षम होते हैं. जिन देशों में मगरमच्छ की बहुतायत है वहां के लोग इसे मारकर इसके चमड़ियों से जैकेट एवं जूते बनाने का काम करते हैं. यही वज़ह है कि यह प्रजाति विलुप्ति के कगार पर है. मगरमच्छों का स्वभाव जितना क्रूर है, पर्यावरण के लिहाज से इन्हे उतना ही स़फाई खोर भी माना जाता है. एक पूर्णरूप से विकसित मगरमच्छ की औसतन लंबाई 10 फीट तक होती है, वहीं उसका वज़न 200 किलो से भी अधिक हो सकता है. मगरमच्छों का मुख्य भोजन मछली है. मछलियों की अनुपलब्धता में मगरमच्छ किसी भी सड़ी-गली लाश, या मांश के लोथड़ों से अपना पेट भर लेते हैं. इनकी पाचन-प्रणाली का़फी अच्छी होती है. यहां तक कि येहड्डियों को भी पचा सकते हैं. मगरमच्छ अपनी पूंछ पर अतिरिक्त चर्बियों को जमाकर रख सकते हैं. भोजन नहीं मिलने की स्थिति में यह उसी चर्बी के सहारे महीनों तक जिंदा रह सकते हैं.

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