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देश की आधी मुठभेड़ फर्जी हैं
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देश की आधी मुठभेड़ फर्जी हैं

सोलह साल में 2560 पुलिस और कथित अपराधी मुठभेड़. और इनमें से 1224 फर्ज़ी. यानी, भारत की हरेक दूसरी मुठभेड़ फर्ज़ी है. इतना ही नहीं, इस 1224 फर्जी मुठभेड़ की लिस्ट में बाटला हाउस मुठभेड़ का नाम भी शामिल हो गया है. हालांकि इस मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने दिल्ली पुलिस को पहले क्लीन चिट दे दी थी. लेकिन सूचना क़ानून के तहत आयोग ने जो लिस्ट उपलब्ध कराई है उसमें बाटला हाउस भी फर्ज़ी मुठभेड़ की लिस्ट में शामिल है. आख़िर,  इस विरोधाभास की वजह क्या है. कहते हैं, मरने वाला अकेला नहीं मरता. उसके साथ मरती है कई और ज़िंदगियां. ताउम्र, तिल-तिल कर. और अगर वो मौत असमय हो तो तक़ली़फ और ब़ढ जाती है. फर्ज़ी मुठभेड़ का मामला भी कुछ ऐसा ही है. हर-एक मुठभेड़ के बाद पुलिस जोर-शोर से इसे सही साबित करने की कोशिश करती है तो कुछेक मानवाधिकार संगठन मुठभेड़ की सत्यता की जांच को लेकर हंगामा मचाते हैं. लेकिन, क़ानून को सबूत चाहिए. जांच रिपोर्ट चाहिए, जिसके आधार पर फैसले लिए जाते हैं. लेकिन उस रिपोर्ट के बारे में क्या कहेंगे जिसे बनाने वाला पहले तो क्लिन चिट देता है और बाद में उसी घटना को फर्ज़ी बताता है. आयोग के जवाब से न स़िर्फ बाटला हाउस एनकाउंटर पर सवालिया निशान लगा है, बल्कि सारे 1224 फर्ज़ी मुठभेड़ों के बारे में चिंता हो गई है.

मरने वाला अकेला नहीं मरता. उसके साथ मरती है कई और ज़िंदगियां. ताउम्र, तिल-तिल कर. और अगर वह मौत असमय हो तो तक़ली़फ और ब़ढ जाती है. फर्ज़ी मुठभेड़ का मामला भी कुछ ऐसा ही है. हर-एक मुठभेड़ के बाद पुलिस जोर-शोर से इसे सही साबित करने की कोशिश करती है तो कुछेक मानवाधिकार संगठन मुठभेड़ की सत्यता की जांच को लेकर हंगामा मचाते हैं. लेकिन फिर से पुलिस ऐसी ही कोई कहानी दोहरा देती है. आख़िर क्या है फर्ज़ी मुठभेड़ का सच?

इसके अलावा, एनएचआरसी ने जो सूचना उपलब्ध कराई है उसके मुताबिक़ पिछले 16 साल में सांप्रदायिक हिंसा या जातीय हिंसा की 432 शिक़ायतें आयोग में पहुंची है. हिरासत में पुलिसिया जुल्म की फेहरिस्त भी कोई कम नहीं है. पुलिस हिरासत में मारे जाने के 2320 मामले आयोग तक पहुंचे. पुलिस हिरासत में होने वाली मौत के मामले में महाराष्ट्र नंबर वन पर है. और इसके बाद नंबर आता है गुजरात का जहां साल 2002 के बाद पुलिस हिरासत में मौत की घटनाओं में वृद्धि दर्ज़ की गई है. इसके अलावा, आयोग ने यह भी बताया है कि पिछले सोलह सालों में जितनी भी मुठभेड़े हुई हैं उनमें से महज़ 16 मामलों में ही पीड़ितों को मुआवज़ा मिला है. ज़ाहिर है, इससे भी बड़ा सवाल यह है कि जिन मामलों को आयोग ने फर्ज़ी करार दिया है उसके लिए दोषी पुलिस अधिकारियों पर क्या कार्रवाई हुई? असल में पुलिस वालों का मनोबल इसी लिए ब़ढा रहता है, क्योंकि फर्ज़ी मुठभेड़ में शामिल किसी पुलिस वाले को कठोर सजा नहीं मिलती. दरअसल, किसी दोषी पुलिस अधिकारी की जांच भी तो कोई दूसरा पुलिस वाला ही करता है. ऐसे में अधिकांश मामलों में यह देखा गया है कि एक पुलिस वाला दूसरे पुलिस वाले को बचाने की भरसक कोशिश करता है.

  • बाटला हाउस एनकाउंटर भी फ़र्जी है
  • सोलह साल में 2560 मुठभेड़, इसमें से 1224 फर्ज़ी मुठभेड़
  • उत्तर प्रदेश में सबसे ज़्यादा फर्ज़ी मुठभेड़

सोहराबुद्दीन फर्ज़ी एनकाउंटर को ही अगर देखें तो शुरुआत से ही इस मामले से जुड़े जांच अधिकारियों पर आरोपी पुलिस वालों को बचाने का आरोप लगता रहा है. सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर गुजरात सरकार ने सोहराबुद्दीन एनकाउंटर की जांच के लिए वरिष्ठ पुलिस अधिकारी गीता जौहरी को चुना. लेकिन गीता जौहरी के ख़िला़फ भी आरोपी पुलिसवालों को बचाने के आरोप लगे. सोहराबुद्दीन के भाई रुबाबुद्दीन को इस जांच पर भरोसा ही नहीं रहा. बाद में, सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात में चल रहे इस मामले के ट्रायल पर रोक लगा दी और पूरा रिकार्ड सील करने का आदेश दिया. सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ वकील गोपाल सुब्रमण्यम को अपनी मदद के लिए एमेकस क्यूरी नियुक्त किया. एमेकस क्यूरी ने कई ऐसी लापरवाहियां गिनाईं जिससे गीता जौहरी ख़ुद संदेह के घेरे में आ गईं. उनके मुताबिक़ इस एनकाउंटर में राज्य के बड़े पुलिस अधिकारी और सरकारी तंत्र भी शामिल था, लेकिन गीता जौहरी ने जांच के  दायरे में उन्हें नहीं लिया. हालांकि, पिछले कुछ समय में ऐसे मामले भी सामने आए हैं जिसमें अदालत ने फर्ज़ी मुठभेड़ के आरोपी पुलिसवालों को सजा सुनाई है. उत्तर प्रदेश में सोनभद्र ज़िले में वर्ष 2003 में एक फर्ज़ी मुठभेड़ हुई थी. सितंबर 2003 में सोनभद्र में बीएससी के छात्र प्रभात कुमार और उसके दोस्त रमाशंकर साहू को शातिर बदमाश बताकर पुलिस ने फर्ज़ी मुठभेड़ में मार डाला था. 6 साल की लंबी सुनवाई के बाद ज़िला फास्ट ट्रैक अदालत ने पांच पुलिसकर्मियों को उम्रकैद की सजा सुनाई. साथ ही इन पर 50 हज़ार से लेकर एक लाख रुपये तक जुर्माना भी ठोंका. फर्ज़ी मुठभेड़ में मारे गए दोनों युवक झारखंड के गढ़वा ज़िले के निवासी थे. इसी तरह, देहरादून में गाज़ियाबाद के रहने वाले रणवीर सिंह की हत्या भी फर्ज़ी मुठभेड़ में कर दी गई थी. बाद में काफी हो-हल्ला होने पर इसकी जांच सीबीआई को सौंपी गई. सीबीआई और एसआईटी दोनों ने अपनी पड़ताल के बाद इसे फर्ज़ी मुठभेड़ कहा. सीबीआई-एसआईटी टीम ने जब मुठभेड़ स्थल का दौरा किया तो वहां ज़मीन के अंदर दबा कर रखे गए 10 कारतूस भी बरामद किए गए. सीबीआई ने अपनी जांच में 18 पुलिसवालों को फर्ज़ी मुठभेड़ के लिए दोषी माना. कुछ के ख़िला़फ केस भी दर्ज़ हुए हैं. लेकिन अभी भी यह देखना बाक़ी है कि इन दोषी पुलिसवालों को सजा मिलती भी है कि नहीं. पूर्वोत्तर भारत की हालत तो और भी ख़राब है जहां आर्म्ड फोर्स स्पेशल पावर एक्ट जैसा क़ानून लगा कर सुरक्षा बलों को निरंकुश ताक़त दे दी गई है. मणिपुर में तो सरे बाज़ार लोगों को गोली मार दी जाती है और बाद में कहा जाता है कि ये आतंकवादी थे. मणिपुर में फर्ज़ी मुठभेड़ और मानवाधिकार उल्लंघन तो आम बात है. साल 2008 में मणिपुर कमांडो पर उत्पीड़न और हत्या के 27 मामलों के आरोप लग चुके हैं. साल 2004 में इंफाल में महिलाओं द्वारा निर्वस्त्र प्रदर्शन पुलिस बल के उत्पीड़न के ख़िला़फ ही था. निश्चित तौर पर वह प्रदर्शन अभी भी लोगों ने भुलाया नहीं होगा. यह प्रदर्शन असम राइफल्स के जवानों द्वारा एक मणिपुरी महिला से दुष्कर्म के बाद उसकी हत्या के विरोध में किया गया था. साल 2000 में असम राइफल्स के जवानों ने दस नागरिकों के साथ एक ऐसे युवक को मार गिराया था जिसे 1988 में राष्ट्रीय बाल वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. इस हत्याकांड के विरोध में 28 वर्षीया इरोम शर्मिला की भूख हड़ताल आज भी चल रही है.

मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट के बाद जो सबसे बड़ा सवाल उठता है वह यह कि क्या सरकार इसपर कोई कार्रवाई करेगी? आयोग की रिपोर्टों को कूड़ेदान में डालने की सरकारी तंत्र की पुरानी आदत है. आयोग को वैसे भी कोई क़ानूनी अधिकार है नहीं. पर पुलिस विभाग में काम करने वाले तमाम लोगों पर लगाम लगाने की जरुरत है.

फ़र्जी है बाटला हाउस मुठभेड़!

जिस राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने बाटला हाउस एनकाउंटर की जांच करने के बाद दिल्ली पुलिस को क्लिन चिट दे दी थी उसी आयोग ने अब यह मान लिया है कि बाटला हाउस का एनकाउंटर फर्ज़ी था. यह खुलासा ख़ुद आयोग के उस लिस्ट से हुआ है जिसमें पिछले सोलह साल के दौरान हुए फर्ज़ी मुठभेड़ों की चर्चा है. सूचना क़ानून के तहत मानवाधिकार आयोग ने दिल्ली के अफरोज आलम को 50 पन्नों की जो लिस्ट उपलब्ध कराई है उसमें 1224 फर्ज़ी मुठभेड़ के विवरण शामिल हैं. फर्ज़ी मुठभेड़ों की इसी सूची में एल-18 पर बाटला हाउस एनकाउंटर भी शामिल है. बाटला हाउस मुठभेड़ में दिल्ली पुलिस के इंस्पेक्टर मोहनचंद्र शर्मा की मृत्यु हुई थी. इसमें दो संदिग्ध आतंकवादी के मारे जाने की बात पुलिस कहती रही है. इनकी पहचान आतिफ़ अमीन और मोहम्मद साजिद के रूप में हुई थी और यह बताया गया था कि इनका संबंध इंडियन मुजाहिदीन से है. कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने जब आजमग़ढ में ये कहा कि बाटला हाउस एनकाउंटर फर्ज़ी था तो राजनीतिक हलकों में तू़फान मच गया. बाद में उन्हें अपने बयान से पलटना पड़ा.

उत्तर प्रदेश, यानी फ़र्जी मुठभेड़ का प्रदेश

विकास के किसी भी पैमाने पर उत्तर प्रदेश कहीं नहीं ठहरता. लेकिन एक क्षेत्र ऐसा है जिसमें इसने बाक़ी सभी राज्यों को बहुत पीछे छोड़ दिया है. वह क्षेत्र है फर्ज़ी मुठभेड का. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की ओर से उपलब्ध कराई गई सूचना के मुताबिक़ पिछले 16 साल में पूरे देश में जितने फर्ज़ी एनकाउंटर हुए हैं, उनमें से सबसे ज़्यादा फ़र्ज़ी एनकाउंटर उत्तर प्रदेश में  हुए. इस  दौरान यहां पर 716 फ़र्ज़ी पुलिस मुठभेड़ हुए. ग़ौरतलब है कि इतने ही समय में पूरे देश में कुल 1224 फर्ज़ी एनकाउंटर हुए. कुल फर्ज़ी मुठभेड़ की आधी से भी अधिक संख्या स़िर्फ उत्तर प्रदेश से है. इसके बाद नंबर आता है बिहार का. बिहार में 79 फ़र्ज़ी मुठभेड़ हुए. आंध्र प्रदेश, जहां 73 लोगों की जानें फर्ज़ी मुठभेड़ के नाम पर चली गईं. महाराष्ट्र भी फर्ज़ी एनकाउंटर के मामले में ज़्यादा पीछे नहीं है. इस राज्य में 61 फर्ज़ी एनकाउंटर की घटनाएं हुईं. फिर भी, उत्तर प्रदेश का आकड़ा दिल दहलाने वाला है. हरेक साल लगभग 50 की औसत से होने वाले फर्जी एनकाउंटर की घटना तो आम आदमी के दिल में भी असुरक्षा की भावना पैदा करने के लिए काफी है.

राज्यवार फ़र्जी मुठभेड़ों की संख्या

आंध्र प्रदेश      73

असम   11

बिहार   79

गुजरात  20

हरियाणा 18

जम्मू और काश्मीर      18

कर्नाटक 10

मध्य प्रदेश     36

महाराष्ट्र  61

मणिपुर 18

उड़ीसा   3

पंजाब   31

राजस्थान       11

तमिलनाडु      24

त्रिपुरा   4

उत्तर प्रदेश      716

प. बंगाल       8

अंडमान और निकोबार    1

दिल्ली  22

छत्तीसगढ़       6

झारखंड 21

उत्तराखंड 29

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