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किसानों की आत्महत्या का सिलसिला शुरू
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किसानों की आत्महत्या का सिलसिला शुरू

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farmersबिहार के किसान 2017 में आई बाढ़ की विभीषिका से उबर भी नहीं पाए थे कि बिना दाने वाले मक्के की फसल ने उनके समक्ष एक बड़ी परेशानी खड़ी कर दी है. बिहार के लगभग सभी जिलों में मक्का की खेती होती है. विगत साल बिहार में मक्का का रिकार्ड उत्पादन हुआ था. बिहार को इसके लिए कर्मण पुरस्कार भी मिला. इससे उत्साहित किसानों ने पहले से भी ज्यादा भूमि पर मक्के की खेती की, लेकिन इसबार मक्का में दाना हीं नहीं आया. बाढ़ से रवि फसल बर्बाद होने के बाद किसानों ने बैंकों और महाजनों से कर्ज लेकर मक्के की खेती की थी, लेकिन इसबार वो भी दगा दे गई.

हताश-परेशान बिहार के किसान भी अब आत्महत्या की राह चुनने को मजबूर हैं. एक तरफ जहां कृषि वैज्ञानिक इसे मौसम की मार कह रहे हैं, वहीं बीज की खराबी की बात भी सामने आ रही है. विपक्ष इसके लिए सरकार की गलत नीतियों को जिम्मेदार बता रहा है. केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री बिहार से ही हैं. लेकिन किसानों की दुर्दशा से बेखबर कृषि मंत्री राधामोहन सिंह पिछले दिनों भैंसे के साथ सेल्फी खिंचवाते देखे गए. हालांकि सवाल यह नहीं है कि वे सेल्फी क्यों खिंचवा रहे थे, सवाल यह है कि क्या बिहार के मक्का किसानों को उनकी मेहनत और लागत का वाजिब हक मिलेगा और यदि इस मामले में खराब बीज की बात सामने आती है, तो क्या बीज कम्पनियों को इसकी सजा मिलेगी?

किसान बदहाल, कम्पनियां मालामाल

1977 से ही बिहार में मक्का की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है. बिहार में लगभग एक दर्जन मक्का प्रसंस्करण केंद्र हैं. मुंगेर, मुजफ्फरपुर, भागलपुर, दरभंगा, सारण, पूर्वी चम्पारण, पश्चिम चम्पारण, शिवहर, पलामू, रोहतास, कैमूर, गया, जहानाबाद, अरवल, नवादा, औरंगाबाद, बांका, जमुई, लखीसराय, शेखपुरा तथा कोशी क्षेत्र में मुख्य रूप से मक्का की खेती की जाती है. देश का औसत मक्का उत्पादन 19.07 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है, जबकि बिहार में यह उत्पादकता करीब दो गुणा ज्यादा 36.11 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है. 2016-17 में राज्य में 38.46 लाख मीट्रिक टन मक्का का उत्पादन हुआ था, वहीं 7.21 लाख हेक्टेयर में मक्का की खेती की गई थी.

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लेकिन इसबार किसानों की उम्मीदों पर पानी फिर गया. 50 प्रतिशत से ज्यादा मक्के की फसल में दाना ही नहीं आया. एक एकड़ मक्के की फसल उत्पादन में लगभग 25 हजार की लागत आती है. लेकिन किसानों को मक्के का 1400 रुपए प्रति क्विंटल या इससे भी कम दाम मिलता है, जबकि विभिन्न कम्पनियां और ट्रेडर इसके जरिए करोड़ों की कमाई करते हैं. किसानों को एक किलो मक्के के 14 रुपए मिलते हैं, जबकि मॉल में 100 ग्राम पॉपकॉर्न की कीमत 100 रुपए से ज्यादा होती है. मक्के का प्रयोग विभिन्न खाद्य पदार्थों सहित ग्लूकोज, दवा, फीड तथा फूड प्रोडक्ट बनाने में होता है.

बिहार में भी किसान आत्महत्या का दौर शुरू

शिवहर जिले के हिरम्मा थाना क्षेत्र अंतर्गत राजाडीह गांव के 55 वर्षीय किसान नारद राय ने बिना दाने के मक्के की फसल को देखकर खेत में ही जहर खा लिया. परिजन उसे बेहोशी की हालत में ही मुजफ्फरपुर के एक निजी अस्पताल ले गए, जहां डॉक्टरों ने नारद को मृत घोषित कर दिया. किसान पांच पुत्र व एक पुत्री का पिता था. परिजनों के मुताबिक, मक्के की फसल में दाना नहीं आने के कारण वे विगत दो सप्ताह से काफी परेशान और निराश थे. उन्होंने कर्ज लेकर खेती की थी. नारद राय के पास मात्र 7 कट्‌ठा जमीन ही है. उन्होंने गांव के ही मंटू राय से ढाई एकड़ जमीन 10 क्विंटल प्रति एकड़ के दर से हुंडा ले रखा था. हुंडा लेने की परिस्थिति में जमींदारों को किसी भी सूरत में तय की गई राशि या फसल देनी होती है. शायद इसी दबाव और चिंता में नारद राय ने आत्महत्या कर ली.

एक तरफ किसान परिवार हताश है, वहीं जिला प्रशासन का कहना है कि यह आत्महत्या मक्का की फसल की उत्पादकता से जुड़ी हुई नहीं लगती. इस मामले में स्थानीय जिलाधिकारी राजकुमार का कहना है कि प्रथम दृष्टया यह मामला मक्के में दाना नहीं आने को लेकर आत्महत्या का नहीं लगता है. जांच रिपोर्ट आने के बाद ही कुछ कहा जा सकता है. इधर लखीसराय में भी एक किसान आत्महत्या का मामला सामने आया है. जिले के बड़हिया थाना क्षेत्र के डुमरी गांव के मुकेश सिंह ने फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली. मुकेश सिंह खेती-मजदूरी कर परिवार का भरण-पोषण करता था. इस वर्ष अच्छी फसल नहीं होने से वो महाजन का कर्ज चुका पाने में असमर्थ था. गौरतलब है कि बीते साल बिहार के सात किसानों-मजदूरों ने आत्महत्या कर ली थी.

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किसान आत्महत्या पर सियासत

मक्के की फसल में दाना नहीं आने के कारण शिवहर के किसान द्वारा की गई आत्महत्या ने बिहार में सियासी रूप ले लिया है. राष्ट्रीय जनता दल और भाकपा माले के सदस्यों ने इस मुद्दे को विधानसभा में उठाया. माले सदस्य महबूब आलम और सुदामा प्रसाद ने इस मामले में सरकार से सवाल पूछा. प्रश्नोत्तर काल शुरू होने पर माले, राजद व कांग्रेस के सदस्य भी वेल में आ गए. वहीं विधान परिषद की कार्यवाही शुरू होने के पहले नेता प्रतिपक्ष राबड़ी देवी के नेतृत्व में राजद सदस्यों ने किसानों की समस्याओं को लेकर जमकर नारेबाजी की. राजद सदस्य मक्का किसानों की क्षतिपूर्ति की मांग कर रहे थे.

उनका कहना था कि बीज कम्पनियों ने किसानों को गलत बीज दे दिया. सदस्यों ने आरोप लगाया कि सरकार जांच के नाम पर मामले को ठंडे बस्ते में डालना चाहती है. किसान लुट गए हैं और सरकार चुप बैठी है. इधर सरकार ने इसे असमय बुआई से जोड़ दिया है. बिहार के कृषि मंत्री डॉ. प्रेम कुमार ने इस मामले में कहा है कि असमय बुआई व तापमान में गिरावट के कारण मक्के में दाने नहीं निकले. लेकिन सरकार बीज उत्पादक कम्पनियों की जांच करा रही है, साथ ही किसानों के नुकसान का आकलन कराया जा रहा है. कृषि मंत्री ने यह भी कहा कि अधिकारियों व वैज्ञानिकों की संयुक्त जांच समिति पूरे राज्य में जांच कर रही है. किसानों के नुकसान की भरपाई होगी.

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कृषि वैज्ञानिकों की जांच को डीएम की चुनौती

कृषि विश्वविद्यालय सबौर से आई जांच टीम ने प्रभावित क्षेत्रों का निरीक्षण किया है. कृषि विवि सबौर के मुख्य वैज्ञानिक डॉ. सुनील कुमार पाठक के नेतृत्व में जांच टीम ने कई जिलों के किसानों से मुलाकात की और खेत में पहुंचकर मक्के की फसल का जायजा लिया. जांच टीम में बिहार कृषि विवि के डॉ. एसएस मंडल आदि शामिल थे. मुख्य वैज्ञानिक डॉ. पाठक के अनुसार मक्के में परागण होने के लिए 10 से 35 डिग्री के बीच तापमान होना चाहिए. लेकिन इस बार मौसम में थोड़ा बदलाव आया. जिन किसानों ने अक्टूबर में मक्के लगाए थे, उनकी फसल में जनवरी में परागण होना चाहिए था, लेकिन चूंकि जनवरी में तापमान 8 डिग्री से कम था, इसलिए फसल में परागण नहीं हो पाया और मक्के में दाने नहीं आ पाए.

इधर मधेपुरा के जिलाधिकारी ने वैज्ञानिकों के दावों पर सवाल खड़े कर दिए हैं. अपने स्तर से जांच के बाद डीएम मोहम्मद सोहैल ने कहा है कि मौसम की मार के कारण नहीं, बल्कि बीज में खामियों के कारण मक्के की फसल में दाने नहीं आए. उन्होंने कहा कि पायोनियर कंपनी का 3522 बीज लगाने वाले मक्का उत्पादक किसानों को भारी क्षति उठानी पड़ी है. इस बीज को प्रतिबंधित करने के लिए सरकार को पत्र भेजा जाएगा. डीएम ने कृषि वैज्ञानिक के तर्कों को मानने से इंकार करते हुए कहा कि अगर ऐसा होता तो सभी खेतों के मक्के दाना विहीन होते. जिन किसानों ने पायोनियर कंपनी के 3522 बीज का प्रयोग किया, उन्हीं की फसल में दाने नहीं आए, वहीं जिन्होंने पायोनियर का ही 3535 बीज लगाया, उनके मक्के में भरपूर दाने हैं. डीएम ने आशंका व्यक्त करते हुए कहा कि शायद बीज के प्रोसेसिंग में गलती हुई है. इसके लिए बीज कम्पनी को ब्लैक लिस्टेड कर कार्रवाई की जाएगी.

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