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किसानों के लिए गूंगी-बहरी है सरकार, न मांगें सुनती है न बदहाली देखती है
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किसानों के लिए गूंगी-बहरी है सरकार, न मांगें सुनती है न बदहाली देखती है

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Potatoपिछले कुछ समय से देश के अलग-अलग हिस्सों में किसान आन्दोलन उठते रहे हैं. इन सभी किसान आन्दोलनों की प्रमुख मांग रही है, स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू करो. लगभग एक पखवाड़े की जद्दोजहद के बाद राजस्थान में चला किसान आन्दोलन थम गया. इसके पहले महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश में भी ऐसा ही हुआ. भाजपा द्वारा उत्तरप्रदेश में किसानों का कर्जा माफ करना सुर्ख़ियों में जरूर रहा, लेकिन किस किसान का कितना कर्ज माफ़ हुआ तथा राजनीतिक अर्थशास्त्र के दृष्टिकोण से इसका व्यापक परिप्रेक्ष्य क्या है, यह एक अलग सवाल है और विवाद भी है. राजनीतिक जुमलेबाजियां और बौद्धिक जुगालियों से इतर हम पश्चिमी उत्तर प्रदेश के आलू किसानों की हालत देखें, तो सत्ताधारी दल से लेकर तमाम राजनीतिक दलों के प्रति घोर घृणा का भाव पैदा होता है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के वो इलाके जिन पर रिकॉर्ड आलू उत्पादन के लिए देश को गर्व होना चाहिए, वहां का किसान रो रहा है.

मेहनत की सारी कमाई लगा देने के बाद यहां का किसान कंगाल हो चुका है. परेशान होकर वह अपनी दुर्दशा अंधी-गूंगी-बहरी सरकार के सामने रखने के लिए उत्तर प्रदेश की विधानसभा और मुख्यमंत्री के आवास के बाहर आलू फेंक रहा है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों ने पहले अपने जिला मुख्यालयों पर डीएम-कमिश्नरों के दफ्तर के आगे आलू फेंके, लेकिन जब बात नहीं बनी तो लखनऊ में मुख्यमंत्री आवास के सामने और विधानसभा के सामने आलू बिखेर दिए.

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हालत यह है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान कोल्ड स्टोरेज से आलू उठाने की स्थिति में नहीं हैं. कोल्ड स्टोर में रखे उनके आलू की कीमत इतनी भी नहीं रह गई है कि वे उसको बेचकर किराया अदा कर सकें. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मेरठ के अलावा, शामली, बागपत, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, बुलंदशहर, मुरादाबाद, गाजियाबाद, गौतमबुद्धनगर, बदायूं, हाथरस, अलीगढ़, मथुरा, आगरा, फिरोजाबाद, इटावा, एटा, हापुड़, रामपुर, बरेली जैसे जिलों में आलू की खेती बड़े स्तर पर होती है. इन इलाकों को आलू-पट्टी कहा जाता है.

पश्चिमी और दक्षिणी यूपी में देश के कुल आलू उत्पादन का लगभग 20 प्रतिशत पैदा होता है. इन जिलों में आलू ही लगभग 80 प्रतिशत किसानों की मुख्य फ़सल है. इलाके के किसान बताते हैं कि आलू की इतनी बुरी हालत कभी नहीं हुई. अक्टूबर 2016 में नोटबंदी से ठीक पहले तक किसान का जो आलू 8-10 रुपए प्रति किलो बिक रहा था, नोटबंदी होते ही वह 5-6 रुपए प्रति किलो पर आ गया. वर्ष 2017 में जब नई फसल आई, तो दाम गिरकर 3-4 रुपए प्रति किलो ही रह गया. अब फरवरी 2018 में नई फसल आ रही है. हालात और ज्यादा खराब होने का खतरा है. किसान अभी तक लगभग 30 फ़ीसदी आलू कोल्ड स्टोर से उठाने ही नहीं गए, क्योंकि उसकी कीमत कोल्ड स्टोर के भाड़े से भी कम है.

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आलू की बुवाई मध्य अक्टूबर से लेकर नवम्बर महीने के पहले सप्ताह तक होती है. आलू के उत्पादन में लगभग 5 रुपए प्रति किलो का खर्चा आता है. अक्टूबर में बोई गई फ़सल लगभग चार महीने बाद फ़रवरी में तैयार होती है. खुदाई के बाद लगभग 10 फ़ीसदी फ़सल किसान बेच देते हैं और बाकी बची लगभग 90 फ़ीसदी फ़सल खुदाई और पैकिंग के बाद कोल्ड स्टोरेज में आगे बेचने के लिए रख देते हैं. खुदाई, पैकिंग और कोल्ड स्टोर तक ले जाने में लगभग 2 रुपए प्रति किलो का खर्चा अलग से लग जाता है. कोल्ड स्टोर में रखने का खर्चा भी लगभग 2 रुपए प्रति किलो आता है. किसान की कोशिश कम से कम 10 रुपए प्रति किलो बेचने की होती है, लेकिन 2017 में खोदी गई सारी की सारी फसल केवल कोल्ड स्टोरेज के भाड़े में ही चली गई.

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किसान 10 रुपए की लागत में से 2 रुपए भी बड़ी मुश्किल से निकाल पाया. इस साल आलू किसानों को लगभग 8 रुपए प्रति किलो का नुकसान उठाना पड़ा. योगी सरकार ने किसानों को राहत देने के लिए 487 रुपए प्रति क्विंटल आलू खरीदने का वादा किया था, लेकिन इसे कई शर्तों में उलझा कर रख दिया गया. सरकार की तरफ से आलू की खरीद नहीं की गई. किसान आलू की कीमत 1500 रुपए प्रति क्विंटल देने की मांग कर रहे हैं, लेकिन सरकार बहरी और अंधी है, उसे न किसानों की मांगें सुनाई पड़ती हैं और न सड़कों पर बिखरे आलू दिखाई पड़ते हैं.

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