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गांजे के खेतों में पनप रहा माओवाद
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गांजे के खेतों में पनप रहा माओवाद

भारत-नेपाल सीमा से सटे हिस्सों में गांजे और अफीम की खेती माओवादियों के संरक्षण में इन दिनों खूब फल-फूल रही है. यहां से दुनिया भर में गांजे और अफीम की तस्करी होती है. इससे जुड़े लोग अकूत धन कमा रहे हैं. गांजे और अफीम की खेती करने वालों से माओवादी लेवी वसूलते हैं. इससे वे हथियार खरीद कर अपना दबदबा कायम रखते हैं. नेपाल के नारायण घाट, भिसवा, पोखरिया, बरधाट, गुरमी, हथौड़ा आदि इलाक़ों में अफीम और गांजे की खेती जमकर हो रही है. भारतीय इलाक़ों में सिकटा, मैनाटाड़, भेलाही, रक्सौल, सुगौली, नरकटियागंज, पनियहवा, ठकराहा आदि स्थान तस्करों के लेनदेन के केंद्र बन चुके हैं. इन रास्तों से उनका कारोबार भारत के चुनिंदा शहरों और राजधानी तक हो रहा है. गांजे और अफीम की खेती को माओवादियों का खुला समर्थन और पैसे की वसूली देख लोग हतप्रभ हैं, क्योंकि नेपाल में माओवादी सरकार के गिरने और लोकतंत्रवादी सरकार की स्थापना के बाद उन्होंने फिर से अपना पुराना हिंसात्मक आंदोलन शुरू कर दिया है. उनके मंसूबों को देखकर सीमावर्ती भारतीयों को यह लगने लगा है कि माओवादी अफगानिस्तान की राह अपना कर नेपाल की लोकतंत्रीय सत्ता को फिर से पलटने की तैयारी तो नहीं कर रहें हैं?

नेपाल में माओवादियों की सरकार तो ज़रूर बनी, लेकिन वह अपने मंसूबे में कामयाब नहीं हो सकी. इसलिए उन्होंने उस सरकार को गिरा देना ही मुनासिब समझा. अब वे फिर से सत्ता में आने के लिए अपनी पुरानी रणनीति को अमलीजामा पहनाने की तैयारी कर रहे हैं.

नेपाल में माओवादियों की सरकार तो ज़रूर बनी, लेकिन वह अपने मंसूबे में कामयाब नहीं हो सकी. इसलिए उन्होंने उस सरकार को गिरा देना ही मुनासिब समझा. अब वे फिर से सत्ता में आने के लिए अपनी पुरानी रणनीति को अमलीजामा पहनाने की तैयारी कर रहे हैं. इसलिए वे गांजे और अफीम जैसे मादक पदार्थों की खेती करके अपनी आमदनी बढ़ाना चाहते हैं और अपनी ताक़त में भी बढ़ोत्तरी की रणनीति बना रहे हैं.

बताया जाता है कि एक एकड़ खेत में लगी अफीम या गांजे की फसल से डेढ़ हज़ार रुपये माओवादियों, पांच सौ रुपये पुलिस और दो हज़ार रुपये प्रशासन को मिलते हैं. इसके बदले में कारोबारियों को सुरक्षा मिलती है. स्थानीय लोगों का विरोध भी चढ़ावे के सामने कोई काम नहीं करता. माओवादियों और प्रशासन की मिलीभगत से नेपाल स्थित मधवल, भौराटार, वरधाट, मधुबन, हथौड़ा, पचरुखी, पिड़ारी, गुरमी, पोखरिया, सतवरिया, भीसवा एवं ठोरी आदि क्षेत्रों में गांजे और अफीम की खेती हो रही है. भारतीय क्षेत्र से सटे नेपाल के पर्सा ज़िले के वीरगंज में भी इसकी खेती हो रही है. हैरत तो उस समय हुई, जब इस वर्ष फरवरी में वीरगंज से 20 किलोमीटर दूर पश्चिम में पोखरिया चौक के पास गांजे के खेत में माओवादियों की बैठक हुई, जिसमें माओवादी नेता पुष्प कमल दहल प्रचंड भी शामिल थे. यह बैठक जालिम मियां नामक शख्स ने बुलाई थी. इसमें प्रशासन के लोग भी मौजूद थे. सीमावर्ती लोगों में प्रतिक्रिया होने लगी कि नेपाल में गांजे और अफीम की खेती नहीं हो रही है, बल्कि माओवाद के खेत में उग्रवाद उपजाने की तैयारी हो रही है. इस पर नेपाल सरकार को रोक लगानी चाहिए, लेकिन वह मौन है. जिस तरह से गांजे और अफीम की खेती करके हथियारों का कारोबार हो रहा है, उससे तो यही लगता है कि आने वाले समय में नेपाल माओवादियों के कहर से एक बार फिर धू-धूकर जलेगा. इस कारोबार से सीमावर्ती भारतीय क्षेत्र भी प्रभावित हो रहे हैं. तस्करों का नेटवर्क भारत के कई शहरों में फैला है. नेपाल के कारोबारी अपने नेटवर्क के हिसाब से भारतीय सीमा में माल उपलब्ध करा देते हैं. प्रशासन के चौकस रहने पर खेप मोटरसाइकिलों, साइकिलों एवं कुरियर द्वारा गोरखपुर, सुगौली और मुजफ्फरपुर आदि जगहों पर पहुंचा दी जाती है. तस्कर अपना माल पहुंचाने के लिए सप्तक्रांति, सत्याग्रह एवं वैशाली एक्सप्रेस आदि ट्रेनों का उपयोग करते हैं. इनसे वे आसानी से माल को दिल्ली पहुंचा देते हैं. समय-समय पर प्रशासन छापामारी करके माल जब्त भी करता है.

27 दिसंबर 2007 को भारत-नेपाल सीमा स्थित कठिया-मठिया गांव के पास एसएसबी ने पिंटू भगत नामक तस्कर को चरस के साथ गिरफ्तार किया था. वह बैशखवा टोले का रहने वाला था. सूत्रों की मानें तो 2009 के दिसंबर माह तक 9,160 किलो गांजा, 1,075 किलो अफीम एवं 230 किलो चरस  की बरामदगी की जा चुकी थी. सूत्रों के मुताबिक़, बीते जून माह में भी सीमावर्ती पुलिस ने छापामारी की. बलथर थाना पुलिस ने 35 किलो चरस, सिकटा थाना पुलिस ने 7 क्विंटल गांजा जब्त किया. 23 जून को ठकराहा पुलिस ने सवा दो क्विंटल गांजा बेलवारी गांव के कुडिया सरेह से जब्त किया, लेकिन तस्कर भागने में सफल रहे. लोजपा के ज़िलाध्यक्ष वीरेश्वर राय कहते हैं कि माओवादियों द्वारा अफीम और गांजे की खेती के लिए प्रोत्साहन देना, फिर पैसा ऐंठकर हथियार खरीदना निंदनीय है.

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