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नोटबंदी और जीएसटी के बाद सरकार और कॉरपोरेट का साझा एजेंडा: छीन लेंगे ज़मीन और श्रम
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नोटबंदी और जीएसटी के बाद सरकार और कॉरपोरेट का साझा एजेंडा: छीन लेंगे ज़मीन और श्रम

Land Acquisition

Land Acquisitionनोटबंदी और जीएसटी के बाद अब केन्द्र सरकार की निगाह जमीन और श्रम छीनने पर लगी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार अपने भाषणों में कानून का जंगल साफ करने का जिक्र करते हैं. इससे लोगों को यह चिंता हो रही है कि उद्योगपतियों की बंधक बनी यह संसद अब कौन सा कानून बनाएगी, जिससे देश के किसानों और मजदूरों का हक छीना जाएगा. गौरतलब है कि देश की संसद और विधानसभाओं में किसान-मजदूरों का प्रतिनिधित्व शून्य है. अब भारी संख्या में अरबपति और करोड़पति ही संसद के सदस्य हैं. ऐसे हालात में किसान-मजदूरों, गरीबों, बेरोजगारों, नौजवानों और महिलाओं के हित में कानून तो बन ही नहीं सकते. यदा-कदा कोई जन प्रतिनिधि यदि ऐसी हिमायत करते भी हैं, तो पार्टियों की तरफ से व्हिप जारी कर उनके अधिकारों को प्रतिबंधित कर दिया जाता है.

किसानों के जमीन के अधिकार की बात करें, तो हम पाते हैं कि 1894 में बने भूमि-अधिग्रहण कानून को आजादी के बाद भी समापत नहीं किया गया, साथ ही किसानों से राजस्व वसूली का कानून आज भी यथावत है. आर्थिक उदारीकरण की नीति के तहत देश में विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज़), विशेष विकास क्षे़त्र (एसडीजेड) और औद्योगिक खेती (कॉरपोरेट फार्मिंग) के नाम पर देश के किसानों से लाखों हेक्टेयर जमीन छीन कर उसे कॉरपोरेट घरानों को सौंप दिया गया. इसके लिए विभिन्न राज्यों में किसानों ने अपनी जमीन बचाने के लिए लड़ाई लड़ी और सरकारों ने उन पर गोलियां चलाईं. हजारों किसान मारे गए. सिंगूर, नंदीग्राम, सिसवामहंत कुशीनगर, भटनी देवरिया, करछना इलाहाबाद, दादरी, भट्टा परसौल आदि जगहों में विवाद के बाद आज भी किसानों की जमीनें फंसी हुई हैं.

कुछ जगहों के मामले न्यायालय में हैं और कुछ जगह अधिग्रहण के खिलाफ फैसले भी आए हैं. पूरे देश में किसानों और जनसंगठनों के व्यापक जन-आन्दोलन के बाद केन्द्र की पूर्ववर्ती सरकार ने विवश होकर भूमि-अधिग्रहण कानून 1894 को संशोधित तो किया, लेकिन किसानों की जमीन पर मालिकाना हक की सौ फीसदी मांग को सत्तर से अस्सी फीसदी तक समेट दिया. हालांकि यह संशोधन भी देश के उद्योगपतियों को अच्छा नहीं लगा, क्योंकि वे कदापि नहीं चाहते कि अरबों-खरबों के मालिक फटेहाल किसानों के पास जाकर जमीन के लिए सहमति मांगें और सौदा करें. अभी तक जो जमीनें कॉरपोरेट को दी गईं, वे परियोजना की आवश्यकता से कई गुना ज्यादा थीं और उन जमीनों का मूल्य भी औने-पौने दाम में लगा. जमीन हड़पने की सारी जिम्मेदारी सरकार ने खुद ही उठाई. आज एक-एक उद्योगपति पच्चीस-पच्चीस हजार हेक्टेयर के मालिक हैं और जिन परियोजनाओं के उद्देश्य से उन्हें जमीने दी गईं, उनमें से अधिकतर परियोजनाओं का वहां कोई नामो निशान नहीं है.

सरकार ने जो कानून बनाया, उसमें प्रावधान है कि अगर अधिग्रहित जमीन पर पांच साल के अंदर प्रोजेक्ट लगाने का काम शुरू नहीं होता और दस साल के अन्दर परियोजना चालू नहीं होती, तो सम्बन्धित कम्पनी से जमीन वापस ले ली जाएगी. लेकिन इस प्रावधान के अनुसार आजतक कोई कार्रवाई नहीं हुई. सौ वर्षों के अन्तराल में मजदूर संगठनों ने लगातार संघर्ष कर मजदूरों के श्रम की रक्षा के लिए तमाम तरह के कानून बनवाए, जिनमें कई तरह की सोशल सिक्योरिटी का प्रावधान था. लेकिन धीरे-धीरे हुए संशोधनों के बाद जो कुछ मामूली से अधिकार बचे हैं, वो भी औद्योगिक घरानों को पच नहीं रहा है.

भूमि अधिग्रहण कानून-2013 तथा श्रम सुधार कानून में बदलाव की सीमा हायर एंड फायर तक जाती है. मुख्य बात यह है कि ये मोदी का नहीं, बल्कि कॉरपोरेट का एजेंडा है. मोदी जी ने गुजरात में कृषि विश्वविद्यालय की 2000 एकड़ जमीन टाटा को नैनो कार बनाने के लिए दे दी, तो रतन टाटा ने उन्हें विकास पुरुष कहा. उत्तर प्रदेश के चुनाव प्रचार में मोदी जी ने श्मशान, विकास और किसान कर्जमाफी का नारा देकर जनता से मांग की कि वे यूपी में भाजपा की बहुमत वाली सरकार बनाएं. इसका मुख्य अभिप्राय तब समझ में आया, जब मार्च 2017 में एक अमेरिकी विशेषज्ञ की राय आई कि 2018 में राज्यसभा में बहुमत हो जाने पर मोदी सरकार भूमि अधिग्रहण कानून 2013 में संशोधन और श्रम सुधार विधेयक पास करने में सफल हो जाएगी. इससे स्पष्ट है कि जब नरेंद्र मोदी बार-बार कानून का जंगल साफ करने की बात करते हैं, तो सबसे बड़ा संकट किसानों-मजदूरों की जमीन और श्रम के अधिकार पर मंडराता दिखता है.

भारतीय जनता पार्टी के चुनावी घोषणा पत्र में स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को  लागू कराने की बात थी. खुद प्रधानमंत्री जी ने कहा था कि किसानों को उनकी लागत मूल्य का डेढ़ गुना समर्थन मूल्य दिया जाएगा और किसानों की सम्पूर्ण ऋणमुक्ति होगी, लेकिन वे अपने वादे पर खरे नही उतरे. श्रम सुधार बिल के खिलाफ श्रम संगठनों ने भारी संख्या में एकजुट होकर संसद पर मार्च किया. साथ ही अब उपरोक्त प्रस्तावों के खिलाफ लड़ने के लिए किसान मजदूर संगठनों के बीच एकता पर बल दिया जा रहा है.

ब्रिटिश हुकूमत में राजस्व वसूली का जो कानून था, उसके तहत तहसीलदार और कलेक्शन अमीन किसान को पकड़ कर तहसील के हवालात में डाल देते थे. पैसे न जमा करने पर चौदह दिनों तक हवालात में रखा जाता था और हवालात में रहने का खर्च भी दस प्रतिशत कलेक्शन चार्ज और ब्याज के साथ राजस्व में जोड़ दिया जाता था. हवालात में रहने के बाद भी उस किसान की मुक्ति नहीं हो पाती थी. छह महीने बाद फिर से उस किसान को हवालात में डाल दिया जाता था. राजस्व वसूली का वही काला कानून आज देश के किसानों पर लागू किया जा रहा है. उन अन्नदाता किसानों पर, जो स्वयं कर्ज में डूबे रहकर और चीथड़े लपेट कर गुजारा करते हैं.

लेकिन देश की बैंकों में देश की जनता का जमा धन उद्योगपतियों को कर्ज में दे दिया जाता है. बाद में सरकार बैंक और उद्योगपतियों की आपसी तालमेल से बेल-आउट पैकेज, बेल-इन पैकेज, बट्टा-खाता, राइट-ऑफ आदि के माध्यम से उन उद्योगपतियों को मुक्त कर दिया जाता है. पुनः विकास और उत्पादन के नाम पर उन्हें ही ब्याज दर कम करके बिना शर्त कर्ज दे दिया जाता है. उनके लिए न तो किसी तहसीलदार कोई जवाबदेही तय है, न कलेक्शन अमीन की, न हवालात की और न ही कानून की. इस देश में प्रतिवर्ष राजस्व वसूली के नाम पर लाखों सम्मानित किसान तहसीलों के हवालातों में बंद होते हैं, बेईज्जत किए जाते हैं और उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा नष्ट की जाती है.

कभी-कभी शर्म के मारे किसान आत्महत्या कर लेते हैं. किसी भी सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए कि वो अंग्रेजी हुकूमत से चले आ रहे ऐसे काले कानूनों को तत्काल खत्म करे. किसानों-मजदूरों के हितैषी, गरीब के बेटे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मजदूरों की सोशल सिक्यिोरिटी पुख्ता करने के लिए पूर्ववर्ती सरकार द्वारा खत्म किए गए मजदूरों की सामाजिक सुरक्षा वाले कानून को फिर से लाना चाहिए. इसके लिए भी संसद को कानून बनाना चाहिए कि प्रत्येक किसान परिवार की सालाना आय एक सांसद के वेतन और भत्ते के बराबर हो. देश के आम चुनाव में व्यापक स्तर पर सुधार कर एक कानून इसके लिए भी बनाना चाहिए कि संख्या के आधार पर लोकसभा और विधानसभा क्षेत्र निर्धारित कर संसद और विधानसभाओं में किसानों-मजदूरों की भागीदारी सुनिश्चित की जाय. साथ ही चुनाव प्रक्रिया को नौकरशाही से मुक्त करना चाहिए. प्रधानमंत्री को यह समझना चाहिए कि किसानों-मजदूरों की भागीदारी के बिना सच्चे लोकतंत्र की कल्पना करना बेमानी है.

 (लेखक यूपी के किसान नेता हैं)

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