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स्वास्थ्य मंत्री के क्षेत्र में ही बीमार हैं सरकारी अस्पताल

स्वास्थ्य मंत्री के क्षेत्र में ही बीमार हैं सरकारी अस्पताल

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hospitalबक्सर के सांसद तथा केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्यमंत्री अश्विनी कुमार चौबे के संसदीय क्षेत्र में स्वास्थ्य विभाग लकवाग्रस्त हो गया है. यहां के सरकारी अस्पताल इतने बीमार हैं कि यहां आने वाले लोग बेमौत मरने को विवश हैं. जिले में ध्वस्त हुई स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर मंत्री का लोगों ने बक्सर में घेराव कर प्रदर्शन भी किया. लगभग 28 वर्ष बाद बक्सर के सांसद अश्विनी कुमार चौबे को केंद्र सरकार में स्वास्थ्य मंत्री बनने का मौका मिला. इससे उम्मीद जगी कि यहां के लोगों को बेहतर चिकित्सा सुविधा मिलेगी. लेकिन व्यवस्था इतनी पंगु हुई कि यहां के लाखों लोगों के अरमान पर पानी फिर गया. बक्सर में सरकारी अस्पतालों की इतनी बदतर व्यवस्था है कि इलाज के नाम पर यहां मरीजों को सिवाय परेशानी के कुछ नहीं मिल रहा है. दवा की कमी तथा डॉक्टरों की लापरवाही के कारण बक्सर व डुमरांव के अस्पतालों में कई मौत के बाद भारी हंगामा तथा विवाद हुआ.

पिछले सप्ताह बक्सर सदर अस्पताल में दर्द से तड़पती सनकेसरी देवी की इसलिए मौत हो गई क्योंकि डॉक्टर ने इंजेक्शन नहीं दिया. उसके बाद तो वहां जमकर हंगामा हुआ और डॉक्टरों पर इंजेक्शन के लिए रुपए मांगने तथा लापरवाही का आरोप भी मृतक के बेटे मुन्ना राम ने लगाया. नगर थाने में प्राथमिकी दर्ज करने का आवेदन भी दिया पर मामले को दर्ज नहीं किया गया. दूसरी घटना जय नारायण साह के साथ हुई. खून चढ़ाने में डॉक्टरों ने इतनी देर की कि रोगी की मौत हो गई. इसके अलावा, डुमरांव अनुमंडलीय अस्पताल में दो प्रसूता महिलाओं की मौत से डॉक्टरों की लापरवाही उजागर हुई.

जन जागरूकता अभियान समिति के अध्यक्ष हरे कृष्ण सिंह की शिकायत पर स्वास्थ्य सेवा की अपर निदेशक ने जांच का आदेश दिया और सिविल सर्जन डॉक्टर डीएन ठाकुर के नेतृत्व में डॉक्टर भूपेंद्र नाथ तथा डॉक्टर एएन सिंह ने मामले की जांच की. 5 अप्रैल को जांच में लापरवाही का मामला उजागर होने के बाद भी मामले को दफन कर दिया गया. बक्सर के सरकारी अस्पतालों की रोज होती बदतर स्थिति से आक्रोशित युवा शक्ति के अध्यक्ष रामजी सिंह के नेतृत्व में केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री अश्विनी चौबे का घेराव कर बक्सर में प्रदर्शन किया गया.

उन्होंने माना कि अस्पतालों की हालत ठीक नहीं है. लेकिन कार्रवाई करना मेरे बस में नहीं है. व्यवस्था से नाराज मंत्री चौबे ने स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव को फोन कर सिविल सर्जन, डीएस तथा चार डॉक्टरों को हटाने की बात कहीं. उन्होंने प्रधान सचिव से यहां तक कह दिया कि इन लापरवाह डॉक्टरों पर कार्रवाई नहीं हुई, तो विधि-व्यवस्था भी बिगड़ जाएगी. राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष दिलमणी देवी ने भी अस्पताल का निरीक्षण करने के बाद कहा कि मामूली दवा के अभाव में यहां रोगी मर रहे हैं. सरकारी अव्यवस्था का आलम यह है कि सदर अस्पताल में 33 डॉक्टरों के बदले मात्र 20 डॉक्टर ही पदस्थापित हैं. शिशु रोग विशेषज्ञ नहीं हैं. ए ग्रेड कर्मी 63 के बदले 33 हैं. 2 साल से ईसीजी मशीन लगी है, पर जांच करने वाले विशेषज्ञ डॉक्टर की नियुक्ति आज तक नहीं की गई. एक्सरे पैथोलॉजी तो जिले में सभी अस्पतालों में बंद है. रोगियों को दवा देने के नाम पर महज खानापूर्ति की जाती है.

अस्पताल में इलाज कराने आने वाले बाहर से दवा खरीद कर लाते हैं. सरकार की दवा सूची के अनुसार सदर अस्पताल में बाह्य रोगी के लिए 71 तथा इनडोर रोगी के लिए 96 प्रकार की दवा देने का प्रावधान केवल कागजों में सिमट कर रह गया है. अस्पताल में कुल 167 प्रकार की दवाओं के बदले मात्र 16-17 प्रकार की दवाएं ही मिलती हैं. सूची में संशोधन कर कुछ दवाओं को हटा दिया गया है. इसकी जगह कैंसर व सूगर की दवाओं को जोड़ दिया गया है. लेकिन ये दोनों दवाएं भी आज तक अस्पताल में नहीं आई हैं. अनुमंडलीय अस्पताल में 123 प्रकार के बदले मात्र 8-10 तरह की दवाओं से काम चलाया जा रहा है.

बक्सर जिले के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की हालत तो और भी बदतर है. ग्रामीण क्षेत्रों के अस्पतालों में एक भी महिला डॉक्टर नहीं हैं. महिलाओं के बंध्याकरण या ऑपरेशन पुरुष डॉक्टर ही करते हैं. रघुनाथपुर के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में बेड बढ़ाकर छह से 30 कर दिया गया, लेकिन सुविधाएं आज भी वही हैं. चौंकाने वाली बात यह है कि जिले के विभिन्न अस्पतालों में आयुर्वेद तथा होम्योपैथिक डॉक्टरों को पदस्थापित कर दिया गया है. लेकिन आज तक आयुर्वेदिक तथा होम्योपैथिक दवाओं की आपूर्ति नहीं की गई है. जाहिर है, ये डॉक्टर भी मरीजों को अंग्रेजी दवा लिखते हैं. इससे सहज ही समझा जा सकता है कि जिले में स्वास्थ्य व्यवस्था की स्थिति कैसी है.

केंद्रीय स्वास्थ्य राज्यमंत्री अश्विनी चौबे के संसदीय क्षेत्र में चिकित्सा की लचर व्यवस्था पर लोगों को इसलिए अधिक आश्चर्य हो रहा है कि क्योंकि सूबे में भाजपा समर्थित सरकार है और स्वास्थ्य मंत्रालय भी भाजपा नेता मंगल पांडेय के पास है. यहां के डॉक्टर इतने बेलगाम हो चुके हैं कि ड्यूटी करना या ना करना उनकी इच्छा पर निर्भर करता है. जबकि डॉक्टर हर माह लाखों रुपए वेतन के रूप में सरकार से ले रहे हैं. हालांकि सदर अस्पताल के सिविल सर्जन डॉ डीएन ठाकुर का कहना है कि डॉक्टर रोस्टर के हिसाब से ड्यूटी करते हैैं, अस्पताल में कुछ कमियां हैं, जिनको शीघ्र दूर करने का प्रयास किया जा रहा है.

पिछले दिनों जिलाधिकारी राघवेंद्र कुमार ने सदर अस्पताल का औचक निरीक्षण किया, जिसमें उन्होंने कई खामियां पाई. डीएम ने वरीय उपसमार्हता शिशिर मिश्रा को सदर अस्पताल का नोडल पदाधिकारी नियुक्त किया और उन्हें हर दिन की रिपोर्ट देने का निर्देश दिया. लेकिन आश्चर्य यह है कि डीएम के आदेश का भी सख्ती से पालन नहीं हो रहा है. वरीय उपसमार्हता ने डीएम को सौंपी गई अपनी रिपोर्ट में कहा है कि अस्पताल में तैनात डॉक्टर रोस्टर के हिसाब से ड्यूटी नहीं कर रहे हैं. इनकी अपनी मनमर्जी है. डॉक्टरों की मनमर्जी का लाभ निजी अस्पताल के डॉक्टर उठा रहे हैं. उनकी दुकानें धड़ल्ले से चल रही है.

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